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The Biography of Motilal Nehru – मोतीलाल नेहरू की जीवनी

मोतीलाल नेहरू, भारत के जाने माने वकील, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता थे। वे राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य भी थे और यहां तक की वे दो बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। वे भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पिता थे और नेहरू- गाँधी परिवार के सबसे मुख्य सदस्य रहे।

पत्नी/ Wifeस्वरुप रानी नेहरू
बेटे/ Sonजवाहरलाल नेहरू
पोती/ Grand daughterइंदिरा गाँधी
परपोते/ Great Grand sonsराजीव गाँधी, संजय गाँधी
मोतीलाल नेहरू की जीवनी

Motilal Nehru ki Starting life – शुरुवाती ज़िंदगी

The Biography of Motilal Nehru - मोतीलाल नेहरू की जीवनी

मोतीलाल नेहरू का जन्म 06 मई, सन् 1861 में हुआ था। वे उनके परिवार के सबसे छोटे बेटे थे। उनके पिताजी गंगाधर नेहरू दिल्ली के आखिरी कोतवाल थे और 1857 के ग़दर के समय वे दिल्ली से आगरा आ गये। 1857 के ग़दर में उनके घर परिवार को बहुत नुक्सान हुआ था। आगरा आने के बाद गंगाधर ने सबसे पहले अपनी दोनों बेटियों का विवाह कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में कर दिया। गंगाधर नेहरू की मृत्यु सन् 1861 में हुई थी, मोतीलाल नेहरू के जन्म से सिर्फ तीन महीने पहले।

मोतीलाल नेहरू से बड़े उनके दो और भाई थे , बंसीधर नेहरू और नन्दलाल नेहरू। मोतीलाल नेहरू के जन्म के समय दोनों की ही उम्र 19 साल और 16 साल थी। दो सालों के अंदर ही नंदलाल नेहरू की नौकरी , खेत्री के राजा के दरबार में क्लर्क के पद पर लग गयी।  मोतीलाल नेहरू बहुत काम उम्र में खेत्री आ गये जो उस वक़्त जयपुर की एक बहुत जरूरी संपत्ति थी। नंदलाल नेहरू अपनी माँ और छोटे भाई को जीवन व्यापन में सहयोग करने लगे।

नंदलाल नेहरू को राजा फ़तेह सिंह, जो की उनकी ही उम्र के थे, से सहयोग मिला और उनको खेत्री का दीवान बना दिया गया। सन् 1870 में फ़तेह सिंह की मृत्युं के बाद उनके कोई बच्चा ना होने के कारण, उनके भाई को राजा की गद्दी पर बैठा दिया गया। उस वक़्त नन्दलाल नेहरू ने वापिस आगरा आने का फैसला लिया। क्योंकि वे खेत्री में लिटिगेंट्स को मुकदमें में मदद किया करते थे, जब उन्हें अपनी इस काबिलियत का पता चला तो उन्होंने सारे जरूरी इम्तेहान पास करे ताकि वे ब्रिटिश कोर्ट में वकालत कर पाएं। 

आगरा आने के बाद उन्होंने हाई कोर्ट  में अपनी वकालत शुरू की और जब हाई कोर्ट को आगरा से अलाहबाद शिफ्ट किया गया , तब पूरा परिवार अलाहबाद जाके बस गया। यहीं से फेमस नेहरू – गाँधी परिवार्फ़ की नीव रखी गयी।

How he studied ? – शिक्षा कैसे हुई ?

नन्दलाल नेहरू की व्यावसायिक सफलता का लाभ मोती लाल नेहरू को हुआ।  उन्हें आगरा और अलाहबाद दोनों ही जगह, खूब अच्छे स्तर की शिक्षा प्राप्त हुई। दूर की सोच रखने वाले नंदलाल नेहरू के छोटे भाई मोतीलाल नेहरू उन चुनिन्दा लोगों में शुमार हुए जिनको पश्चिमी शैली की कॉलेज शिक्षा मिली। उन्होंने अपनी मैट्रिक्स की परीक्षा कानपुर से पास की और उच्च शिक्षा के लिए मुइर सेंट्रल कॉलेज, अलाहबाद गए।

यहाँ पढ़ें : Jawaharlal Nehru ki Jeevani

साल 1883 में उन्होंने अपनी लॉ की पढ़ाई खत्म की और तीन साल कानपूर में प्रैक्टिस करने के बाद उन्होंने अलाहबाद आकर अपने बड़े भाई की पहले से ही स्थापित प्रैक्टिस संभाली। सन् 1887 में उनके बड़े भाई चल  मोतीलाल नेहरू, अपने परिवार के अकेले कमाने वाले सदस्य बन गए जिनके सर अपने 7 बच्चों का भी भार आ गया।  

 Career of Motilal Nehru- मोतीलाल नेहरू का कैरियर

पेशे से वकील मोतीलाल नेहरू, बड़े- जमींदारों के सिविल के केस लिया करते थे और इन्ही के दम पर मोतीलाल नेहरू ने अपनी  छवि पूरे अलाहबाद ,में बना ली थी। इसी सफलता से, सन् 1900 में उन्होंने अपने परिवार के लिए एक बड़ा मकान अलाहबाद के सिविल लाइन्स में ले लिया। 1909 में वे अपने करियर के शिखर पर थे जब उनको ग्रेट ब्रिटैन की प्रिवी कॉउन्सिल में जाने की अनुमति मिल गयी। लेकिन कश्मीरी पंडित ख़ासा नाराज़ थे क्योंकि ब्रिटैन जाने की वजह से जो ” प्रायश्चित ” की क्रिया उनको करनी थी उसके लिए उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया।         

वे पहले तो “दी लीडर्स” नाम के अखबार, जो की अलाहबाद से प्रकाशित होता था , के बोर्ड के पहले चेयरमैन बने और फिर 1919 में उन्होंने एक नया अखबार ” दी इंडिपेंडेंट” शुरू किया जो की मोतीलाल नेहरू के हिसाब से ज्यादा लिबरल था।वे राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य तो थे ही, गांधीजी से प्रभावित होकर उन्होंने वेस्टर्न कपड़े और सामान त्याग दिया।            

Political Career of Motilal Nehru- मोतीलाल नेहरू का राजनैतिक कैरियर

मोतीलाल नेहरू पर 1919 के जालियाँवाला बाग़ काण्ड ने गहरी छाप छोड़ी और उन्होंने अपनी वकालत छोड़ कर पूरी तरह से राजनीति में आने का निर्णय लिया।  यही नहीं वे गाँधी जी के असहयोग आंदोलन में भी शामिल हुए। इसी साल उन्हें राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया और उनका कार्यकाल साल 1920 तक रहा।

साल 1920 में कलकत्ता कांग्रेस में दरारें आ गयी।  वे दो पक्षों में विभाजित हो गए। एक,  जो पूर्ण स्वराज की मांग कर रहे थे व दूसरे, जो कुछ हद्द तक ब्रिटिश सरकार में भारतियों का प्रभाव चाहते थे। गांधीजी ने इसका हल निकाला और ब्रिटिश सर्कार को चेतावनी दे दी की अगर वे एक साल में इस डोमिनिय पर हामी नहीं देते हैं,ल तो वे पूर्ण स्वराज की मांग करेंगे।

मोतीलाल जी कई साल जेल में भी रहे और चौरी चौरा में एक पोलिस वाले की हत्या के बाद जब गाँधीजी के पीछे हटने के निर्णय की आलोचना भी की। बाद में मोतीलाल नेहरू जी स्वराज पार्टी में शामिल हो गए और सन् 1923 में , वे न्यू सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में भी चुने गए और प्रतिपक्ष के नेता बनें। बाद में वे कमेटी के सदस्य बने जहां उन्होंने सेना में भारतीय सैनिकों को भदावा देने की मांग उठाई।      

सन् 1926 में, उन्होंने ब्रिटिश संसद में भारत को  पूर्ण डोमिनान्स देने वाले संविधान की रूप रेखा तैयार करने के लिए एक प्रतिनिधि सम्मेलन की मांग की जिसे ब्रिटिश असेंबली ने सिरे से खारिज कर दिया जिसके बाद नेहरूजी व उनके सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया और दुबारा कांग्रेस में शामिल हो गए।

Family of Motilal Nehru -मोतीलाल नेहरू का परिवार

मोतीलाल नेहरू जी का विवाह स्वरुप रानी के साथ हुआ था।  इसके अलावा भी उनकी 4 शादियां हुई लेकिन ये ग़ैरकानूनी शादियां थीं। उनकी पत्नी स्वरुप रानी ने दो बेटियों और एक बेटे को जन्म दिया। बेटे  जवाहर लाल नेहरू रखा गया और बेटियों का नाम, कृष्णा हुतेसिंग और विजय लक्ष्मी पंडित रखा गया।

जवाहर लाल नेहरू आगे जाकर भारत के सबसे पहले और सबसे लम्बे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री बनें और विजय लक्ष्मी पण्डित, यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। 

Other works of Motilal Nehru – मोतीलाल नेहरू के कुछ और काम

नेहरू ने जब डोमिनियन स्टेटस का प्रस्ताव रखा था तो सबसे पहले उन्होंने नेहरू रिपोर्ट बनाई थी। जिसे हम भारत का पहला संविधान भी कह सकते हैं। ये नेहरू रिपोर्ट को बनाने के लिए सन् 1928 में नेहरू कमीशन की स्थापना की जिसके जवाहरलाल नेहरू चेयरमैन बनें। इसे, देश की बाकी राष्ट्रीय पार्टियों ने उसे मानने से इंकार कर दिया जो पूर्ण स्वराज की मांग कर रहे थे। यहां तक की मुस्लिम लीग ने भी इसे नहीं माना और मोहम्मद अली जिन्नाह ने इससे मुसलमानो के लिए अनुचित बताया।

 Death of Motilal Nehru and his Legacy – मोतीलाल नेहरू की मृत्यु और विरासत

मोतीलाल नेहरू ने अपनी अंतिम सांसें, 6 फेब्रुअरी 1931को  लखनऊ में लीं।जब वे मरे तब उनकी 61 साल थी। जिस समय उनकी तबियत बिगड़ रही थी  उस समय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य बना लिया था।  नमक सत्याग्रह के दौरान उन्हें गांधीजी  हुई लेकिन उनकी बिगड़ती तबियत को देखते हुए उन्हें रिहा कर दिया गया। अपने अंतिम दिनों में उन्हें अपने बेटे , जवाहरलाल नेहरू और गांधीजी के साथ समय बिताने का अवसर मिला।

यहाँ पढ़ें : इंदिरा गाँधी ki Jeevani

मोतीलाल नेहरू को हमेशा भारत की सबसे ताक़तवर राजनैतिक वंश का पिता माना जाता है। उन्होंने जो नीव रखी वो भारत के इतिहास की गौरवमयी  इमारत बनकर तैयार हुई। इन्ही के परिवार ने भारत को तीन प्रमुख प्रधान मंत्री भी दिए, जवाहर लाल नेहरू ,इंदिरा गाँधी ,  राजीव गाँधी। यहां तक की उनके दो परपोते आज भी लोक सभा के सदस्य हैं और इस परिवार को गौरान्वित कर रहे हैं |

Some books on Motilal Nehru – मोतीलाल नेहरू पर कुछ किताबें

  • वॉइसेस ऑफ़ फ्रीडम  : स्पीचेस ऑफ़ मोतीलाल नेहरू  – के. एम।  पानीकर
    Voice of freedom : speeches of motilal nehru –  K. M .panikker
  • मोतीलाल नेहरू और भारतीय राजनीति – संध्या मिश्रा
    Motilal nehru and indian politics
  • दी नेहरूज़  – मुशीरुल हसन
    The Nehru’s – Mushril Hasan
  • दी नेहरूज़ : मोतीलाल नेहरू एंड जवाहर लाल नेहरू – बलराम नंदा
    The Nehru’s: Motilal nehru and Jawaharlal Nehru – Bal ram nanda
  • फोर डायमंड्स ऑफ़ आनंद भवन -निरंजन खिलनानी
    Four Diamonds of Anand Bhawan – Niranjan Khilnani

References

Written by Utkarsh Chaturvedi

नमस्कार, मेरा नाम उत्कर्ष चतुर्वेदी है। मैं एक कहानीकार और हिंदी कंटेंट राइटर हूँ। मैं स्वतंत्र फिल्म निर्माता के रूप में भी काम कर रहा हूँ। मेरी शुरुवाती शिक्षा उत्तर प्रदेश के आगरा में हुई है और उसके बाद मैं दिल्ली आ गया। यहां से मैं अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा हूँ और साथ ही में कंटेंट राइटर के तौर पर काम भी कर रहा हूँ।

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