हमारा राष्ट्रीय पक्षी: मोर पर निबंध | Essay on National Bird Peacock in Hindi | Essay on Peacock in Hindi

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मैं पक्षियों का राजा हूँ, बारिश का दीवाना हूँ

काले -काले बदल देख, भावविभोर हो जाता हूँ

सिर पर ताज लिए, मेहप्रिय कहलाता हूँ

मनमोहक छवि है मेरी, मैं चित्त चोर कहलाता हूँ

बताओ मैं कौन हूँ?

अमूमन हमारे बचपन की यादों का पिटारा बेहद खास होता है। लेकिन बचपन में नई सी लगने वाली हर चीज समय के साथ आम हो जाती है। वहीं बचपन की यादों की इस फेहरिस्त में कुछ चीजों की चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। मोर इसका एक बेहतरीन उदाहरण है।

कक्षा में याद की गयी मोर की कविता भले ही आज जुबां पर न हो लेकिन हर बरसात में पंख फैलाए मोर का नाच देखना आज भी उतना ही रोमांचकारी अनुभव देता है, जितना कभी बचपन में दिया करता था।

आसमान में बादल छाए

मोर थई थई नाच दिखाए

उसके सर पे कलगी ऐसी

बादशाह के ताज जैसे

मोर छमाछम नाच दिखाए

भारत का राष्ट्रीय पक्षी कहलाये

“मोर हमारा राष्ट्रीय पक्षी है”…ये लाइने हमें बचपन से ही रटी हुईं हैं। हालांकि मोर से लगाव का कारण महज बचपन की यादों नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति से मोर का सदियों पुराना जुड़ाव भी है।

भगवान कृष्ण के मुकुट की शोभा बढ़ाने से लेकर राजा-महाराजा के महलों की शान होने तक मोर हर युग में देश की सभ्यता का अहम हिस्सा रहा है।

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मोर की आकर्षक सुंदरता और भारतीय संस्कृति से सदियों पुराने जुड़ाव के चलते ही भारत सरकार ने 26 जनवरी 1963 में मोर को देश का राष्ट्रीय पक्षी घोषित कर दिया। वहीं म्यांमार और श्रीलंका का भी राष्ट्रीय पक्षी मोर ही है।

अमूमन मोर भारत के अलावा मोर की अन्य प्रजातियां समूचे अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाए जाती हैं। पूरे विश्व में अलग-अलग प्रजातियों के कुल दस लाख से भी ज्यादा मोर देखने को मिलते हैं। IUCN की रेड लिस्ट में मोर को कम चिंता (least concern) की श्रेणी में रखा गया है।

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भारतीय मोर ज्यादातर नीले रंग का होता है, जिनके पंख लगभग पांच से छह फीट लम्बे होते हैं। मोर के नीले और हरे रंग के इन सुनहरे पंखों पर आंखों की आकृति बनीं होती है। वहीं अन्य कई जगहों पर सफेद मोर भी देखने को मिलते हैं।

आम तौर पर मोर 12 से 20 साल तक जीवित रहते हैं। वहीं उनका औसत वजन तीन से छह किलोग्राम और कुल लम्बाई 34 इंच से 42 इंच तक होती है। हालांकि अपने भारी शरीर के कारण मोर ज्यादा दूर तक नहीं उड़ सकते हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में नर पक्षी को मोर और और मादा को मोरनी कहा जाता है। जहां मोर अपने लम्बे, घने और सुन्दर पंखों के लिए हर किसी के आकर्षण का केंद्र होता है, वहीं भूरे और हल्के हरे रंग की मोरनी के पास पंख नहीं होते हैं। जिसके कारण मोर और मोरनी को आसानी से पहचाना जा सकता है। कवि दीन दयाल शर्मा के शब्दों में-


सजी है सुन्दर कलंगी सिर पर

आँखें कजरारी चित्तचोर

रिमझिम-रिमझिम बरखा बरसे

सबके मन को भाता मोर ।

पँखों में रंगीला चँदा

पिकोक पिको बोले पुरज़ोर

बरखा जब हो जाए बन्द तो

नाचना बन्द कर देता मोर ।।


मोर और मोरनियों का प्रजनन समय स्थान पर निर्भर करता हैं। उदाहरण स्वरुप भारत में ज्यादातर मोर मोर जून और जुलाई के महीने में प्रजनन करते हैं, वहीं श्रीलंका में अप्रैल-मई और आस्ट्रेलिया में दिसम्बर-जनवरी के समय मोरों का प्रजनन होता है।

मोर अपना घोसला लम्बे पेड़ों की ऊंची शाखाओं पर बनाते हैं। जिनमें मोरनी अंडा देती हैं। मोरनी द्वारा  अंडे देने के 27 से 30 दिन भीतर यह अंडे फूटना शुरु करते हैं, जिनमें से मोर के नवजात बच्चे निकलते हैं।

दूसरे पक्षियों की तरह नर और मादा मोर दोनों मिलकर अपने बच्चों का पालन-पोषण करते हैं और भोजन कराने के साथ-साथ उड़ना सिखाते हैं। अमूमन मोर एक मांसाहारी पक्षी होता है, जो घास-फूस, फल, फूल के अलावा कीड़े-मकौड़े, सांप और मेंढ़क जैसे जानवरों को मारकर अपना पेट भरता है।

वहीं शेर, चीता, बाघ और भेड़िए जैसे जंगली जानवर कई बार अपनी भूख मिटाने के लिए मोर का शिकार भी करते हैं। हालांकि मोरों का शिकार जंगली जानवरों के ज्यादा शिकारियों द्वारा किया जाता है। कुछ लोग जहां गोश्त का सेवन करने के लिए मोर का शिकार करते हैं, तो कुछ उसके पंखों और खाल को अपनी दीवारों पर लगाने के शौकीन होते हैं।

हालांकि बीते कुछ सालों में मोरों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गयी है। जिसके मद्देनजर भारत सरकार ने मोर को संरक्षण प्रदान करने के लिए उसे वन्यजीव अभ्यारण अधिनियम 1972 (wildlife protection act 1972) की सूची में रखा है।

10 lines on National Bird Peacock /10 लाइनें राष्ट्रीय पक्षी मोर पर हिंदी में /Essay on Peacock

वास्तव में मोर शब्द संस्कृत भाषा के मौर्य से बना है, जिसका अर्थ होता है सांपों को मारने वाला। 1963 में देश का राष्ट्रीय पक्षी घोषित करने से सदियों पहले भी मोर भारतीय विरासत की अद्भुत शान रह चुका है। मोर के मनोहर रुप का बखान करते हुए एक कवि लिखते हैं-

कैसा रूप है तुमने पाया,

रंग मनोहर है छिटकाया।

सिर पर सुंदर ताज सजाया,

तभी तो पक्षी-राज कहलाया।

खासकर हिन्दू धर्म में कई देवी-देवताओं का प्रिय होने के कारण मोर को काफी महत्वपूर्ण माना गया है। मोर के पंख भगवान कृष्ण के श्रृंगार का अभिन्न अंग हैं, जिन्हें वो अपने मुकुट पर धारण करते हैं। कृष्ण के मुकुट पर मोर पंख की सुंदरता का जिक्र करते हुए रसखान जी लिखते हैं-

मोर के चंदन मोर बन्यौ दिन दूलह हे अली नंद को नंद।

श्री कृषयानुसुता दुलही दिन जोरी बनी विधवा सुखकंदन।

आवै कहयो न कुछु रसखानि री दोऊ फंदे छवि प्रेम के फंदन।

जाहि बिलोकैं सबै सुख पावत ये ब्रज जीवन हैं दुख ढ़ंढन।

तो वहीं पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने अपने पुत्र कार्तिकेय को सवारी के रुप में मोर उपहार में दिया था। मोर की सवारी करने के कारण कार्तिकेय को मुरुगन के नाम से भी जाना जाता है। रामायण के अनुसार देवताओं के राजा इंद्र ने रावण से पराजित होने के बाद एक मोर के पंखों में शरण ली थी।

हिन्दू धर्म के अलावा बौद्ध धर्म में भी मोर को समृद्धि का प्रतीक माना गया है। यही कारण है कि आज भी बौद्ध धर्म की कई परंपराओं में मोर के पंखों का इस्तेमाल किया जाता है। मोर का अस्तित्व ईसाई धर्म से भी अछूता नहीं है। मध्यकाल में युरोप में योद्धाओं द्वारा युद्ध पर जाने से पहले मयूर शपथ लेने का प्रचलन था। वहीं विजयी होने पर युद्ध के शहीदों को मोर पंख के साथ ही दफनाया जाता था। आज भी कई देशों में सुबह उठकर सबसे पहले मोर को देखना काफी शुभ मानते हैं।

यही नहीं मोरों की सुंदरता से मोहित होकर प्राचीनकाल और मध्यकाल में कई राजा महाराज अपने महल की शोभा बढ़ाने के लिए मोरों को पाला भी करते थे। वहीं कई एतिहासिक सिक्कों, मोहरों और महलों की वास्तुकला पर भी मोर की छाप आसानी से देखी जा सकती है।

मुगल बादशाह शाहजहां तो मोरों सुंदरता के कुछ इस कदर कायल थे कि, उन्होंने लाल किले में स्थित दीवान-ए-आम में मोर की ही आकृति के आलीशान सिहासंन का निर्माण करवाया था। इस सिंहासन को तख्त-ए-ताऊस के नाम से जाना जाता है। तख्त-ए-ताऊस उस जमाने की खूबसूरत कलाकृतियों में से एक था, जिसपर बैठ कर बादशाह अपनी प्रजा से रुबरु होते थे।

वर्तमान में बच्चों का पसंदीदा पक्षी होने के नाते मोर पंचतंत्र से लेकर हर छोटे-बड़े किस्सोंका हिस्सा होता है। तो वहीं आयुर्वेद में भी मोर के तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है। माना जाता है कि सांप के काटने पर मोर का मांस काफी असरदार इलाज साबित हो सकता है।

कई लोग घरों में मोर पंख को रखना बेहद शुभ मानते हैं। कहा जाता है कि घर में मोर पंख रखने से सांप घर में नहीं आते हैं। दरअसल सांप मोरों का मनपसंद भोजन है, जिसके चलते किसी क्षेत्र में मोर की उपस्थिति के कारण सांप उस क्षेत्र से दूरी बना कर रखते हैं। मोर पंख के बारे में कहा जाता है-


मोर पंख अतिशय शुभ है

विद्यादायनी कहलाता है

जिस घर रहता शुभ करता

कान्हा का मुकुट सजता है।


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