पर्यावरण पर निबन्ध | Environment essay in Hindi | Essay on Environment in Hindi | Essay in Hindi | Hindi Nibandh

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मशहूर शायर मोहम्मद अली साहिल कि ये पंक्तियां कुदरत के रुप को बखूबी बयां करती हैं। कुदरत यानी प्रकृति… ये शब्द अपने आप में अथाह है, जिसे महज कुछ पन्नों में समेट पाना लगभग ना मुमकिन है। धरती पर रहने वाले सभी जीव-जंतु, पेड़-पौधे, वनस्पतियां, यहां तक की हवा, पानी, आकाश, बादल, सूर्य की रोशनी, पहाड़ और नदियां आदि पर्यावरण का अटूट हिस्सा हैं।

ये भी कुदरत का करिशमा है कि दुनिया में कोई
आज तक ये न समझ पाया कि कुदरत क्या है…

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दरअसल अपने इसी अद्भुत पर्यावरण के कारण पृथ्वी समूचे ब्रम्हाण में जीवन देने वाली अकेली ग्रह है। साथ ही पृथ्वी पर पर्यावरण और मनुष्य का रिश्ता हमेशा से ही कुछ खास रहा है। इसी संदर्भ में कवि राज नारायण लिखते हैं-

बूंदें पड़ी थीं छत पे कि सब लोग उठ गए।
कुदरत के आदमी से अजब सिलसिले रहे।।
पर्यावरण का महत्व

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वास्तव में पर्यावरण का सम्पूर्ण महत्व आज भी सभी के लिए पहेली बना हुआ है। जहां एक तरफ मनुष्य कुदरत को समझने के लिए अंतरिक्ष की खाक छान रहा है, तो दूसरी तरफ समुद्र की गहराई और धरती की गर्भ आज भी वैज्ञानिकों के लिए राज बनी हुई है।

बावजूद इसके नित नए आविष्कारों ने पर्यावरण के कई रहस्यों पर से पर्दा हटाया है। पर्यावरण ने सदियों से मनुष्यों के जीवन को स्वास्थय और खुशहाल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। तमाम पर्यावर्णीय संतुलन बनाने से लेकर सभी जीव-जंतुओं को आसरा और भर पेट भोजन मुहैया कराने के लिए प्रकृति ही जिम्मेदार है।

यही नहीं मनुष्यों का सम्पूर्ण जीवन किसी न किसी रुप में पर्यावरण पर ही निर्भर है। वर्तमान में मनुष्य अपनी रोजमर्रा की दौड़ भाग में मशगूल रहता है। जिसके चलते खासकर शहरों में पार्कों और खेल मैदानों का महत्व भी बढ़ता जा रहा है। कुछ लोग मन की शांति के लिए आस-पास के पार्कों में सुबह की सैर, योगा और खेल-कूद को तवज्जो देते हैं, तो कुछ अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर पहाड़ों की चोटी से लेकर समुद्र की लहरों को छूना पसंद करते हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि अपनी अद्भुत सुंदरता के चलते पर्यावरण न सिर्फ तमाम लोगों को शारीरिक रुप से मजबूत बनाता है बल्कि मानसिक रुप से भी स्वास्थय बनाने में अहम योगदान देता है।

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पर्यावरण पर निबन्ध

पर्यावरण के लाभ

अमूमन पर्यावरण की खूबियों को किसी फेहरिस्त में समेटना खासा मुश्किल है। इसके अहसान को मनुष्य अपनी पूरी जिंदगी प्रयत्न करके भी उतार नहीं सकता। पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जतुं जीवित रहने के लिए जिस हवा, पानी, आग, आकाश, मिट्टी, जंगल, पेड़-पौधों पर निर्भर है ये सभी कुछ हमें पर्यावरण से ही मिलता है।

एक तरफ पेड़ पानी को शुद्ध बनाने के अलावा बाढ़ के खतरों को कम करते हैं, सूरज के रोशनी पाते ही कमल के साथ-साथ समूची धरती खिल उठती है, तो दूसरी तरफ अनगिनत वनस्पतियों का घर कहलाने वाले जंगल, नदियों और समुद्र में पशु-पक्षियों की अद्भुत प्रजातियां पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में अमिट योगदान देती हैं।

इन सबसे परे पर्यावरण कई मायनों में मनुष्यों की संस्कृति और परंपरा का हिस्सा भी रहा है। यही कारण है कि सदियों से देश की लाइफलाइन मानी जाने वाली गंगा नदी को लोग देवी के रुप में पूजते हैं, तो सूर्य देवता को रोज सवेरे अर्घ देना भारतीय संस्कृति का अटूट हिस्सा है।

इसके अलावा बारिश के देवता इंद्र के लिए हवन करना, नीम और पीपल के पेड़ की पूजा, पहाड़ों की गोंद में केदारनाथ, अमरनाथ, कैलाश पर्वत और वैष्णों देवी जैसे अनगिनत तीर्थस्थल सहित हर तीज त्योहार में मनुष्य और प्रकृति के प्रेम की झलक साफ देखी जा सकती है।

वहीं देश की जनसंख्या में अहम हिस्सा रखने वाले आदिवासी और कई पिछड़े वर्ग के लोग भी अपने जीवनयापन के लिए पर्यावरण पर ही निर्भर रहते हैं। सूरज की रोशनी और बारिश के पानी पर निर्भर रहने वाली किसान की खेती से लेकर जंगल की लकड़ियों तक में पर्यावरण की भूमिका साफ नजर आती है। संक्षेप में कहा जाए तो पर्यावरण प्रकृति के जीवनचक्र को संचालित करता है।

पर्यावरण पर खतरा

जंगल, पेड़, पहाड़, समंदर
इंसा सब कुछ काट रहा है
छील-छील के खाल जमीं की
टुकड़ा-टुकड़ा बांट रहा है
आसमान  उतरे मौसम
सारे बंजर होने लगे हैं
मौसम बेघर होने लगा हैं।

मशहूर कवि गुलजार की ये पंक्तियां वर्तमान में पर्यावरण की हालत पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। मनुष्यों को जीवन देने वाले पर्यावरण का जीवन भी खतरे में है और इस खतरे की मुख्य वजहों में मनुष्य ही शामिल है। दरअसल आधुनिकता के इस युग में जहां एक तरफ मनुष्य दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की कर रहा है तो वहीं इस आधुनिकता का सीधा प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है।

प्रदूषण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हवा में प्रदूषण से लेकर घटता जल स्तर और नदियों का दूषित पानी पर्यावरण के विघटन को बढ़ावा दे रहे हैं। इसी कारण कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, मीथेन गैस, नाइट्रोजन गैस और सल्फर डाई ऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों में इजाफा हो रहा है, जोकि ओजोन परत में छेद और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने का अहम कारण बन चुका है।

नतीजतन पहाड़ों की बर्फ से लेकर नदियों के पानी तमाम प्राकृतिक संसाधनों का विघटन धरती के साथ-साथ मनुष्यों के लिए खतरे की घंटी साबित हो रही है।

हाल की ही एक रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के चलते ध्रुवों की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिसके परिणामस्वरुप साल 2050 तक न्यूयॉर्क, लंदन, जकार्ता, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और मालदीव सहित दुनिया के कई महत्वपूर्ण शहर डूब जाएंगे।

वहीं नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक महज कुछ सालों में देश की राजधानी दिल्ली सहित कई महानगरों में जमीनी जलस्तर समाप्त हो जाएगा।

निष्कर्ष साफ है कि, कुदरत को नजरअंदाज कर मनुष्यों के द्वारा किया गया अनियंत्रित विकास प्रकृति के विकास में बाधा बन रहा है। गिद्ध, शेर और चीता जैसे जानवरों का घटती संख्या धरती की खाद्य श्रृंख्ला को प्रभावित कर रही है, तो बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग बड़े पैमाने पर मानसून की हवा और बदलते मौसम को बढ़ावा दे रहे हैं।

पर्यावरण को सुरक्षित रखने के प्रयास

 आधुनिकता के इस युग में खासकर औद्योगीकरण की शुरुआत के बाद पर्यावरण पर गहराता संकट राष्ट्रीय-अतंर्राष्ट्रीय मंचों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र से लेकर महाशक्तियों की मीटिंग तक में पर्यावरण संरक्षण एक अहम मुद्दा बनकर उभर रहा है। इसी कड़ी में दुनिया के कई देशों ने एकजुट होकर पर्यावरण को सुरक्षित रखने की मुहीम छेड़ दी है।

इस फेहरिस्त में पहला नाम 70 के दशक में हुए स्टॉकहोम कंवेशन का है, जहां पहली बार पर्यावरण संरक्षण को महत्वपूर्ण मुद्दा घोषित किया गया। जिसके बाद वेटलैंड के संरक्षण के लिए रामसार कंवेशन अस्तित्व में आया।

वहीं 80 के दशक में ओजोन परत के संरक्षण के लिए वियाना कंवेंशन और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्ष्कर किए गए। जिसके बाद 1992 में ब्राजील के रियो डी जिनोरियो में पर्यावरण संक्षरण की सबसे बड़ी अतंर्राष्ट्रीय बैठक का आयोजन किया गया। जिसे अर्थ समिट के नाम से जाना जाता है।

इसके अलावा क्योटो प्रटोकॉल और पेरिस समझौते के तहत अमेरिका, चीन और भारत सहित दुनिया के कई बड़े देशों ने कार्बन न्यूट्रल होने का एलान कर दिया है। वहीं सतत् विकास लक्ष्यों में जलवायु परिवर्तन महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है।

इसी सिलसिले में भारत सरकार ने भी कई अहम कदम उठाए हैं। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन इसका एक बड़ा उदाहरण है। वहीं गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार ने फेम इंडिया जैसी पहल की हैं, जिसके तहत ईलेकिट्रिक व्हीकल को बढ़ावा देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

साथ ही सरकार अधिक से अधिक पौधे लगाने, जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों के रख-रखाव के लिए भी सजग है। इसके अलावा नागरिकों को इस मुहीम में शामिल करने का प्रयास किया गया है। स्वच्छ भारत अभियान और हर घर जल इसी का एक उदाहरण हैं।

आखिरकार जाने-माने दार्शनिक रूसो के शब्दों में –

परिश्रम एंव संयम ही मानव हेतु प्राकृतिक चिकित्सक है।

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