essay on Janmashtami in hindi | कृष्ण जन्माष्टमी पर निबंध | श्री कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी पर्व क्यों मनाया जाता है | Why is Janmashtami celebrated?

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essay on Janmashtami in hindi | कृष्ण जन्माष्टमी पर निबंध | श्री कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी पर्व – Shri Krishna Janmashtami Festival

जन्‍माष्‍टमी ( Janmashtami) – श्रीमद्भागवत गीता के प्रणेता भगवान योगेश्‍वर कृष्‍ण के गीतातत्‍व, निष्‍काम कर्म सिद्धांत, भारत ही नहीं पूरी दुनिया में जानी जाती है । जिनके जीवन से असंख्‍य प्राणी प्रेरणा प्राप्‍त कर रहें हैं । असंख्‍य प्राणी जिसके पावन नाम मात्र को लेकर अपने जीवन को धन्‍य समझते हैं ऐसे महामना के धरती में प्रकट होने का प्रकटोत्‍सव कृष्‍णजन्‍माष्‍टमी महापर्व के रूप में भारत के साथ-साथ विश्‍वभर में भारतवंशीयों, भारतीय प्रवासियों और भारतीय मेथोलॉजी से प्रभावित विदेशी मूल के लोगों के द्वारा मनाया जाता है । इस प्रकार यह उत्‍सव विश्‍वव्‍यापी उत्‍सव के रूप में जनकल्‍याण के लिये मनाया जाता है ।

वैदिक मान्‍यताओं के अनुसार इस सृष्टि के परम शक्ति परम पिता परमात्‍मा भगवान बिष्‍णु का उद्घोष है कि जब-जब धरती पर अधर्म, पाप की वृद्धि होती है तब-तब वह किसी न किसी रूप में धरती में अवतरित होते हैं । इस तथ्‍य पर विश्‍वास पूर्वक स्‍वीकार किया जाता है कि भगवान ने इस धरती में चौबीस अवतार ग्रहण किये हैं । 

भगवान की संपूर्ण कला 16 मानी गई हैं । श्रीराम और कृष्‍ण अवतार को छोड़कर शेष सभी अवतारों को अंशावतार माना जाता है । श्रीराम अवतार को 12 कला का माना जाता है जिसमें भगवान राम ने धरातल में मर्यादा स्‍थापित की श्री राम का जीवन चरित्र मानव देह के लिये अनुकरणीय है । वहीं भगवान कृष्‍ण संपूर्ण 16 कला से अवतरित माने जाते हैं । अर्थात संपूर्ण ईश्‍वरीय शक्ति भगवान कृष्‍ण में ही स्‍वीकार किया गया है । इस महाशक्ति योगेश्‍वर कृष्‍ण का अवतरण दिवस का पर्व है कृष्‍णजन्‍माष्‍टमी पर्व

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कब और क्‍यों जन्‍माष्‍टमी पर्व मनाया जाता है – When and why is Janmashtami celebrated?

कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी का पर्व हिन्‍दी कलेण्‍डर विक्रम संवत के भादो महिना के कृष्‍ण पक्ष के अष्‍टमी तिथि को मनाया जाता है । मान्‍यता के अनुसार इसी तिथि को रोहणी नक्षत्र में भगवान कृष्‍ण मथुरा में कंस के कारागार में प्रकट हुये थे।

कृष्‍ण जन्‍म की कथा – Story of the birth of Krishna

जन्‍माष्‍टमी Janmashtami

श्रीमद्भागवत पुराण के दसम् स्‍कन्‍ध को भागवत पुराण की आत्‍मा मानी गई है क्‍योंकि इसी स्‍कन्‍ध में भगवान कृष्‍ण के अवतरण की कथा से लेकर बाल चरित्र की कथा विस्‍तारित है । इस कथा के अनुसार मथुरा नगर में महाबलशाली दैत्‍य कंस अपने पिता को पदच्‍युत कर राज करते थे । 

कंस अपनी बहन देवकी से बहुत अधिक स्‍नेह रखता था इसी कारण वह देवकी के विवाह के बाद स्‍वयं सारथी बन देवकी-वासुदेव को छोड़ने जा रहे थे तभी आकशवाण हुई जिस बहन को तू इतने स्‍नेह से छोड़ने जा रहा है उसके गर्भ से उत्‍पन्‍न आठवां संतान तुम्‍हारा काल होगा । 

इतना सुनते ही कंस देवकी को मारने के लिये तत्‍पर हो गया किंतु वासुदेव के इस आश्‍वसन पर कि जन्‍म के तत्‍काल बाद मैं अपनी प्रत्‍येक संतान दे दूंगा दोनों को अपने कारागार में बंद करा दिया । प्रत्‍येक शिशु को जन्‍म लेते ही कंस मार देते थे । अंत में आठवीं संतान का जन्‍म हुआ । यही संतान स्‍वयं भगवान कृष्‍ण थे । 

जन्‍म होते ही ईश्‍वरी प्रेरणा से कारागार के सभी दरवाजे स्‍वयं खुल गये पहरी बेहोश हो गये । इसी समय वासुदेव नवजात को मथुरा से गोकुल नंदबाबा के यहां छोड़ आये । किसी को इस बात का ज्ञान नहीं हुआ । नंदबाबा को लाल का जन्‍म हुआ है मानकर गोकुल में जन्‍मोत्‍सव मनाया गया । बाद में यही कृष्‍ण कंस वध करके संसार को कंस के अत्‍याचार से मुक्‍त कराया । कृष्‍ण का जन्‍म भादो मास के कृष्‍ण पक्ष के अष्‍टमी तिथि को रात्रि बारह बजे हुआ था । इसी कारण इस दिन भगवान का ज्‍नमोत्‍सव पर्व के रूप में दुनिया भर में मनाया जाता है ।

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कृष्‍णजन्‍माष्‍टमी मनाने की परम्‍पराएं – Krishna Janmashtami traditions

1.देश में कृष्‍णजन्‍माष्‍टमी पर्व का मुख्‍य आयोजन भगवान के जन्‍मस्‍थली मथुरा में आयोजित किया जाता है जिसमें देश-विदेश के लाखों भक्‍त भाग लेते हैं । यह महोत्‍सव जन्‍माष्‍टमी के सप्‍ताह भर पूर्व प्रारंभ हो जाता है । इस आयोजन के लिये ‘व्रज विकास परिषद’ का गठन किया गया है जो पूरे आयोजन की रूपरेखा तैयार करता है । 

एक सप्‍ताह तक चलने वाले इस उत्‍सव में देश-विदेश के अनेक कलाकार अपनी प्रस्‍तुति देते हैं । इस आयोजन में भगवान कृष्‍ण के जीवन पर आधारित प्रस्‍तुति लोकनाट्य, लोक संस्‍कृति, शास्‍त्रीय गायन, नृत्‍य के अतिरिक्‍त पेंटिंग, रंगोली के माध्‍यम से करने के साथ-साथ फिल्‍म प्रदर्शन, लेजर लाइट प्रदर्शन के द्वारा भी किया जाता है ।

पूरे सप्‍ताह व्रज क्षेत्र मथुरा, गोकुल, बरसाना, वृदांवन आदि के सभी स्‍थानों पर स्थित मंदिरों के साज-सज्‍जा पर विशेष ध्‍यान दिया जाता हैं । अनेक मंदिरों में कई-कई प्रकार से धार्मिक आयोजन किये जाते हैं ।

मुख्‍य उत्‍सव जन्‍माष्‍टमि तिथि को मनाया जाता है । इस दिन सुबह से मंदिरों में भक्‍तों का आना-जाना प्रारंभ हो जाता है किन्‍तु इस दिन रात्रि में बारह बजे जन्‍मोत्‍सव मनाया जाता है इसी समय भक्‍तों की अपार शक्ति प्रभु मूरत की दर्शन के लिये कतारबद्ध हो भगवान के गगनभेदी जयकार से मंदिर परिसर को गुंजायमन करती रहती हैं । दिन भर निर्जला व्रत करने वाले भक्‍तों का व्रतपरायण भगवान के दर्शन से ही होता है । इसी समय भगवान की विधिवित पूजा आरती की जाती है ।

2. देश के कोने-कोने में जन्‍माष्‍टमी पर्व धूम-धाम से मनाया जाता है । विदेशों में भी यह पर्व इसी प्रकार मनाया जाता है । देश-विदेश  जहां भी भगवान कृष्‍ण का मंदिर किसी भी रूप में हो उस मंदिर को विशेष तरीके से सजाये जाते हैं दीपमालाओं या लाइट, लेजर लाइट से प्रकाशित किया जाता है । भगवान की विशेष विधि-विधान से पूजा की जाती है । अनेक मंदिरों में भगवान के बाल प्रतिमा से झूला झांकी बनाया जाता है । इस झूलें को मात्र स्‍पर्श करने के लिये भक्‍त उत्‍सुक रहते हैं ।

3. दही-लूट की परम्‍परा- इस अवसर पर देश के अनेक भागों में दही-लूट परम्‍परा का निर्वाह किया जाता है । कहीं-कहीं झांकी के रूप दही-लूट का प्रदर्शन किया जाता है तो कहीं-कहीं प्रतियोगिता के रूप में इसका आयोजन किया जाता है । दही-हांड़ी प्रतियोगिता ऐसे देश के कई स्‍थानों पर आयोजित किये जाते हैं किन्‍तु महाराष्‍ट्र मुबंई में इसका विशेष आकर्षण रहता है जहॉं प्रतियोगिता का पुरस्‍कार लाखों में होता है । 

छोटे-बड़े कई शहरों-गांवों में दही-लूट का आयोजन धूम-धाम से किया जाता है, जिसमें दूध-दही से भरे मटके को किसी ऊॅचे खम्‍भों में लटका दिया जाता है जिसे बाल कृष्‍ण रूप में या उनके सखाओं के रूप में इस मटके को तोड़ते हैं । कई स्‍थानों पर कृष्‍ण भजन मंडली इनके साथ नृत्‍य-गायन करते हुये साथ देते हैं । यह दृश्‍य इतना मनोरम होता है कि हर कोई देखने के लिये उत्‍सुक रहता है । यही कारण है कि जहां भी यह आयोजन होता है वहां अपार भीड़ देखी जाती है ।

4.  झांकी-झूला की परम्‍परा- अनेक मंदिरों के अतिरिक्‍त सार्वजनिक स्‍थानों पर भी भगवान के बाल रूप को झूलों में रख कर सजाया जाता है । इस झूले से लंबी रस्‍सी जोड़ देते हैं जिस रस्‍सी को पकड़ कर लोग झूले को हिलाते हैं । इसके पिछे यह धारण होती है कि भगवान के बाल स्‍वरूप को झूले मे उसी रूप मे झूलाते हैं जैसे घर में शिशु को झूले पर झूलाया जाता है । दिल्‍ली का झूला झांकी विश्‍व प्रसिद्ध है ।

5. व्रत-उपवास की परम्‍परा- कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी पर व्रत रखने की परम्‍परा है । अनेक कृष्‍ण भक्‍त इस दिन निर्जला व्रत बिना कुछ खाये, बिना कुछ पिये उपवास करते हैं तो कुछ भक्‍त निराहर अर्थात बिना कुछ खाये केवल जल लेकर उपवास करते हैं तो कुछ भक्‍त फलाहार कर अर्थात केवल फल खाकर उपवास करते हैं । व्रत-उपवास अपनी-अपनी श्रद्धा और शारीरिक क्षमता के अनुरूप करते हैं । अपने व्रत का परायण रात्रि बारह बजे के बाद ही किया जाता है ।

6. आठे कन्‍हैया की परम्‍परा- देश के अनेक भागों में आठे कन्‍हैया की प्रथा प्रचलित है । यह कोई पृथ्‍क प्रथा नहीं अपितु केवल एक पूजा पदृयति का भाग है । जो लोग इस समय देव-देवालय मंदिर नहीं जा पाते जो घर में पूजा करते है उनमें से कुछ लड़डू गोपाल की प्रतिमा की पूजा करते हैं, कुछ लोग तस्‍वीर की पूजा करते हैं वहीं बहुत लोग अपने पूजा घर के दीवार में दोनो और चार कॉलम के क्रम में आठ पुतले रंग की सहायता से रेखा चित्र के रूप में बनाते हैं, इन्‍हीं आठ पुतलों को आठे कन्‍हैया कहा जाता है ।

 ये आठ पुतले माता देवकी के गर्भ से उत्‍पन्‍न सभी आठ संताने है जिसमें 6 कंस के द्वारा मारे जा चुके, एक बलराम और एक कृष्‍ण है । इस प्रकार भगवान कृष्‍ण के सभी भाइयों की पूजा एक साथ कर ली जाती है । इसका दूसरा अर्थ अष्‍टमी तिथि से भी लगाया जाता है भगवान का जन्‍म अष्‍टमी को हुआ है इसलिये आठ पुतले बना कर उनकी पूजा की जाती हैं ।

जन्‍माष्‍टमी Janmashtami

कृष्‍णजन्‍माष्‍टमी का महत्‍व – Importance of Krishna Janmashtami

कृष्‍णजन्‍माष्‍टमी का अपना एक विशेष अध्‍यात्मिक एवं सांकृतिक महत्व है । भगवान कृष्‍ण को योगेश्‍वर, मायापति जैसे नामों से संबोधित किया जाता है क्‍योंकि भक्‍तों की आस्‍था और विश्‍वास है कि भगवान कृष्‍ण उन्‍हें अध्‍यात्मिक चिंतन और अध्‍यात्मिक शक्ति प्रदान करते हैं । इस अध्‍यात्मिक शक्ति की सहायता से भक्‍त मोक्ष को प्राप्‍त कर सकते हैं । इस शक्ति कों संचित करने लिये इस पर्व का विशेष महत्‍व है ।

यह पर्व भारत के विभिन्‍न संस्‍कृतियों में से एक है । यह पर्व पूरे देश भर में मनाया जाता है । इसलिये संपूर्ण देश को एक सूत्र में पिरोने में, एक बंधन में बांधने में, सामाजिक मूल्‍यों को बढ़ावा देने में विशेष भूमिका निभाता है । अनेकता में एकता के भारतीय परिदृश्‍य को यह स्‍पष्‍ट करता है ।

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श्री कृष्णा जन्माष्टमी पर निबंध || Hindi Essay On Janmashtami || Few Lines On Shree Krishna

References
Janmashtami Wikipedia
जन्‍माष्‍टमी Wikipedia

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