श्री वरलक्ष्मी व्रत (Shri Varalaxmi vratam) ? भारत देश आस्थाओं और मान्यताओं को अपने आप में समेट कर रखा है। हमारे देश को तीज-त्योहारों के नाम से जाना जाता है, व्रत-उपासना आदि के लिये जाना जाता है। हमारे देश में 33 कोटि देवताओं की मान्यताएँ हैं। सप्ताह के सातों दिन किसी न किसी देवी-देवताओं की उपासना या व्रत करने का विधान है। जैसे सोमवार को भोलेनाथ का, मंगलवार को हनुमानजी का आदि। इसी प्रकार हिन्दी महीने की हर तिथि भी किसी न किसी रूप में व्रत से जुड़ी है। जैसे एकादशी का व्रत, प्रदोषव्रत, पूर्णिमा व्रत आदि।
इसी प्रकार कुछ व्रत वर्ष में एक बार होते हैं जो किसी महीने के निश्चित तिथि से जुड़े होते हैं। जैसे जन्माष्टमी व्रत प्रति वर्ष भाद्र माह के कृष्ण पक्ष के अष्टमी को मनाया जाता है। किन्तु एक ऐसा व्रत है जिसे वर्ष में केवल एक बार रखा जाता हैं किन्तु यह किसी तिथि में न होकर दिन में होता है। जी हां, प्रति वर्ष सावन माह के अंतिम शुक्रवार को इस व्रत को रखा जाता है। इस व्रत को श्रीवरलक्ष्मी व्रत या श्रीवरदलक्ष्मी व्रत कहते हैं ।
धन-धान्य, सुख-संपत्ती किस व्यक्ति को नहीं चाहिये। हर व्यक्ति इसके लिये प्रयास करता रहता है। कोई कड़ी मेहनत करके, कोई योजना बना के, तो कोई और किसी प्रकार से। आस्थावान व्यक्ति पूजा-पाठ, व्रत-उपवास करके अपने भाग्य को अपने कर्मो के साथ जोड़कर विशेष सफलता प्राप्त करने का प्रयास करता है ।
आज के समय धन से सुख की पूर्ति संभव है। धन से ही भौतिक सुख सुविधाओं का विकास होता है। यही कारण है कि हर व्यक्ति किसी न किसी रूप मे धन अर्जन का उपाय करता है। फिर कहा गया है- ‘किसी को भाग्य से पहले और भाग्य से ज्यादा न कभी कुछ मिला है न कभी कुछ मिलेगा।‘ इसी कारण प्राय: व्यक्ति अपने कर्म, पुरूषार्थ करने के साथ-साथ भाग्य का साथ भी चाहता है। वास्तव में कर्म से ही भाग्य बनता है और कर्मफल के रूप में प्राप्त होता है।

भारतीय चिंतन के अनुसार यद्यपि प्रत्येक महिला, पुरूष का भाग्य अपना स्वयं का होता है, अपना कर्म अपना स्वयं का होता है। फिर भी किसी दम्पत्ती के लिये पुरूष को कर्म एवं महिला को भाग्य का प्रतिक माना गया है। इसी आधार आप अपने चारों ओर देख सकते हैं पुरूष धन अर्जन के प्रयास में लगातार मेहनत करता फिरता रहता है, वहीं महिला अपने पति के स्वास्थ्य, लंबी आयु, सफल व्यवसाय की कामना करते हुये नाना प्रकार के व्रत-उपवास आदि रखती है। यही कारण अधिकांश व्रत ज्यादातर महिलाएं रखती हैं।
पुरूष भी व्रत रखते हैं किन्तु महिलाओं की तुलना में कम रखते हैं। कुछ विशेष व्रत पति-पत्नी एक साथ रखते हैं। इसी प्रकार एक व्रत है ‘श्रीवरलक्ष्मी व्रत’ जिसके करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है । महिलायें सौभग्यवती होती हैं, संतान सुख प्राप्त होता है ।
श्री वरलक्ष्मी व्रत – Shri Varalaxmi Vrat
माँ लक्ष्मी जी की पूजा संपर्ण भारत में समान रूप से होता है। किन्तु श्रीवरलक्ष्मी व्रत उत्तर भारत से अधिक दक्षिण भारत मे अधिक धूम-धाम से एवं श्रद्धा-विश्वास पूर्वक मनाया जाता है । दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्यों में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के दसमीं तिथि जिसे वरदा दसमीं भी कहते हैं से श्रीवरलक्ष्मी व्रत को उत्सव के रूप में मनाते और श्रावण के अंतिम शुक्रवार को विधि-विधान से इस व्रत को धारण करते हैं ।
श्री वरलक्ष्मी व्रत कब रखते हैं – When is Shri Varalaxmi Vrat kept?
परिवार में सुख-संपत्ति की कामना से किये जाने वाले कई व्रतों में एक है श्रीवरदलक्ष्मी व्रत जिस व्रत के रखे जाने से माता लक्ष्मी का आर्शीवाद प्राप्त होता है, परिवार में धन का अभाव नहीं रहता। इस व्रत को किसी तिथि विशेष में न रख कर दिन विशेष पर रखा जाता है। इस व्रत को प्रतिवर्ष सावन महीने के अंतिम शुक्रवार को रखा जाता है ।
इस व्रत को कौन रख सकता है – Who can keep this fast?
1.इस व्रत को सुहागन स्त्रीयाँ कर सकती हैं, अविवाहित कन्याओं को यह व्रत नहीं करना चाहिये। इस व्रत के करने से सुहागन महिलायें सौभाग्यवती होती हैं ।
2.पति-पत्नी यदि व्रत को एक साथ रखें तो इससे विशेष लाभ होता है। इस व्रत को करने वाले दम्पत्ती को संतान सुख, पारिवारिक सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है ।
व्रत विधान – Vratam Act

श्री वरलक्ष्मी व्रत धारण करने वाले को व्रत के दिन अर्थात श्रावण के अंतिम शुक्रवार को सुबह-सुबह जल्दी उठकर, घर की साफ-सफाई कर, स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण कर तैयार हो जाना चाहिये ।
तैयार होने के बाद पूजा स्थल को गोबर से लिपकर अथवा गंगा जल छिड़कर पवित्र कर लेना चाहिये। इस पवित्र स्थान पर सुंदर लकड़ी के पाटे पर मंड़प सजाना चाहिये । मंडप सजाने के लिये पुष्प, आम के पत्ते, केले के पत्ते, अक्षत आदि का प्रयोग किया जाना चाहिये। फिर इस मंडप में चावल फैला कर गौरी-गणेश एवं कलश की स्थापना कर गणपति एवं वरमुद्रा में माँ लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करना चाहिये ।
पूजन की सारी सामाग्री अपने समीप रख कर पदृमासनमुद्रा में बैठकर पहले व्रत का संकल्प करना चाहिये। फिर षोडशोपचार विधि से मंत्रोंच्चार सहित पूजन करना चाहिये। यदि आपको षोडशोपचार मंत्र याद न हो तो मानसिक रूप से पूजन सामाग्री समर्पित करते जायें। षोडशोपचार का साधारण अर्थ सोलह प्रकार के पूजन सामाग्री चंदन, गुलाल, रोली-कुंकुम, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि समर्पित करना है। यदि षोडशोपचार से पूजन करना संभव न हो तो पंचोपचार अर्थात पांच पूजन सामग्री से पूजन किया जा सकता है ।
पूजन के पश्चात दिन भर निराहार रहना चाहिये। संध्या समय माँ लक्ष्मी की आरती करने के पश्चात अपने सामर्थ्य के अनुसार 5, 7, 9 या 21 सुहागन महिलाओं को सुहाग सामाग्री दान करना चाहिये ।
अंत में अपने व्रत का परायण फला हार ग्रहण करके करना चाहिये ।
वरलक्ष्मी व्रत कथा – Varalaxmi Vrat Story
पौराणिक कथा अनुसार एक बार भगवान शंकर कैलाश में ध्यान मुद्रा में बैठे थे। तभी माँ पार्वती ने आकर हाथ जोड़कर प्रणाम करके पूछा हे देव, कोई ऐसा व्रत विधान बताइये जिसके करने से सुहागन महिला को सौभाग्य एवं संतान सुख की प्राप्ति हो। इस पर भोलेनाथ ने कहा हे देवी एक ऐसा व्रत है जिसके करने महिलाएं सौभाग्य एवं संतान सुख प्राप्त कर सकती हैं।
इस पर देवी ने पूछा कि यह व्रत किस ईष्ट देव अथवा देवी का है ? इस व्रत का नाम क्या है ? और इसे कब और कैसे किया जाता है ? इसके उत्तर में भगवान ने कहा कि देवी यह व्रत वरदान देने वाली लक्ष्मीजी का व्रत है इस व्रत को श्रावन मास के पूर्णिमा के पहले आने वाले शुक्रवार के दिन किया जाता है । फिर इस संबंध में भोले नाथ ने एक कथा सुनाई-
‘’मगध राज्य में कुंडी नाम का नगर था । यह नगर सोने की लंका के समान सोने से बना हुआ था । इस नगर में चारूमति नाम की एक सद्चरित्र ब्राह्मणी रहती थी । वह पूरे कर्तव्यनिष्ठ भाव से अपने पति के साथ-साथ अपने सास-ससुर की सेवा किया करती थी । साथ-साथ ही वह नित्य माँ लक्ष्मीजी की पूजा अर्चना करती थी ।
एक बार रात्रि में चारूमति के स्वप्न में माँ लक्ष्मी प्रकट होकर बोलीं- हे चारूमति मैं वरलक्ष्मी हूँ । मैं तुम्हारे कर्तव्यनिष्ठा और नित्य मेरी पूजा अर्चना करने से प्रसन्न हूँ । यदि तुम आने वाले श्रावण मास के अंतिम शुक्रवार को मेरे निमित्त व्रत रखते हुये मेरी पूजा करोगी तो आपको सुख-समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होगी । साथ ही साथ आप अन्य दूसरों से भी यह व्रत करवाएंगी तो उन्हें भी इसका लाभ होगा ।
अगली सुबह चारूमति ने अपने स्वप्न की बातें अपने सास-ससुर और परिजन से कहीं । सभी ने सलाह दी कि स्वप्न की बातों को मानना चाहिये । इस प्रकार सबके संमती से चारूपति नगर की अन्य महिलाओं को भी इस व्रत के बारे में बताने लगी । सभी को श्रावण मास की प्रतिक्षा थी ।
समयानुसार श्रावण मास आ ही गया । अब प्रतिक्षा थी अंतिम शुक्रवार की । वह दिन भी आ गया। कुंडीनगर की सभी महिलाओ ने चारूमती के नेतृत्व में श्रीवरलक्ष्मीव्रत का अनुष्ठान किया । सुबह-सुबह उठ कर स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर सुंदर स्वच्छ पोशाक पहन कर सभी महिलाओं ने मिलकर एक मण्डप सजाया और उसमें गणपति सहित वरमुद्रा में मॉं लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करके कलश सजा कर षोडशोपचार विधि से पूजन करने लगी पूजन के अंत में जब सभी महिलायें परिक्रमा करने लगीं तो आश्चर्यजनक रूप से देखते ही देखते सभी महिलाओं के अंग आभूषणों से सजने लगे। सभी महिलाओं के सोलहवों अंग स्वर्ण आभूषणों से भर गया ।
सभी महिलाओं के घर धन-धान्य से भर गये । सभी के यहाँ पशुधन गाय, घोड़े, हाथी आदि आ गये । नगर सोने का हो गया । नगर के सभी लोग चारूमती की भूरी-भूरी प्रशंसा करने लगे और सभी श्रीवरलक्ष्मी का जय-जयकार करने लगे ।‘’
भगवान भोलेनाथ ने कहा इसलिये हे देवी इस व्रत को सभी सुहागन महिलाओं को करना चाहिये । इस व्रत के करने से निर्धनता और कष्ट दूर होता है । यदि पत्नी अपने पति के साथ यह व्रत करे तो उसे संतान सुख की निश्चित रूप से प्राप्ति होती है ।
इस प्रकार श्रीवरलक्ष्मी व्रत एक पुण्समयी व्रत है इसके करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। परिवार मे समृद्धि होने पर शांति बनी रहती है । परिवार को संतान सुख की प्राप्ति होती है ।
भारत देश आस्थाओं और मान्यताओं को अपने आप में समेट कर रखा है। हमारे देश को तीज-त्योहारों के नाम से जाना जाता है, व्रत-उपासना आदि के लिये जाना जाता है। हमारे देश में 33 कोटि देवताओं की मान्यताएँ हैं। सप्ताह के सातों दिन किसी न किसी देवी-देवताओं की उपासना या व्रत करने का विधान है। जैसे सोमवार को भोलेनाथ का, मंगलवार को हनुमानजी का आदि। इसी प्रकार हिन्दी महीने की हर तिथि भी किसी न किसी रूप में व्रत से जुड़ी है। जैसे एकादशी का व्रत, प्रदोषव्रत, पूर्णिमा व्रत आदि।
इसी प्रकार कुछ व्रत वर्ष में एक बार होते हैं जो किसी महीने के निश्चित तिथि से जुड़े होते हैं। जैसे जन्माष्टमी व्रत प्रति वर्ष भाद्र माह के कृष्ण पक्ष के अष्टमी को मनाया जाता है। किन्तु एक ऐसा व्रत है जिसे वर्ष में केवल एक बार रखा जाता हैं किन्तु यह किसी तिथि में न होकर दिन में होता है। जी हां, प्रति वर्ष सावन माह के अंतिम शुक्रवार को इस व्रत को रखा जाता है। इस व्रत को श्रीवरलक्ष्मी व्रत या श्रीवरदलक्ष्मी व्रत कहते हैं ।
धन-धान्य, सुख-संपत्ती किस व्यक्ति को नहीं चाहिये। हर व्यक्ति इसके लिये प्रयास करता रहता है। कोई कड़ी मेहनत करके, कोई योजना बना के, तो कोई और किसी प्रकार से। आस्थावान व्यक्ति पूजा-पाठ, व्रत-उपवास करके अपने भाग्य को अपने कर्मो के साथ जोड़कर विशेष सफलता प्राप्त करने का प्रयास करता है ।
आज के समय धन से सुख की पूर्ति संभव है। धन से ही भौतिक सुख सुविधाओं का विकास होता है। यही कारण है कि हर व्यक्ति किसी न किसी रूप मे धन अर्जन का उपाय करता है। फिर कहा गया है- ‘किसी को भाग्य से पहले और भाग्य से ज्यादा न कभी कुछ मिला है न कभी कुछ मिलेगा।‘ इसी कारण प्राय: व्यक्ति अपने कर्म, पुरूषार्थ करने के साथ-साथ भाग्य का साथ भी चाहता है। वास्तव में कर्म से ही भाग्य बनता है और कर्मफल के रूप में प्राप्त होता है।

भारतीय चिंतन के अनुसार यद्यपि प्रत्येक महिला, पुरूष का भाग्य अपना स्वयं का होता है, अपना कर्म अपना स्वयं का होता है। फिर भी किसी दम्पत्ती के लिये पुरूष को कर्म एवं महिला को भाग्य का प्रतिक माना गया है। इसी आधार आप अपने चारों ओर देख सकते हैं पुरूष धन अर्जन के प्रयास में लगातार मेहनत करता फिरता रहता है, वहीं महिला अपने पति के स्वास्थ्य, लंबी आयु, सफल व्यवसाय की कामना करते हुये नाना प्रकार के व्रत-उपवास आदि रखती है। यही कारण अधिकांश व्रत ज्यादातर महिलाएं रखती हैं।
पुरूष भी व्रत रखते हैं किन्तु महिलाओं की तुलना में कम रखते हैं। कुछ विशेष व्रत पति-पत्नी एक साथ रखते हैं। इसी प्रकार एक व्रत है ‘श्रीवरलक्ष्मी व्रत’ जिसके करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है । महिलायें सौभग्यवती होती हैं, संतान सुख प्राप्त होता है ।
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Reference
श्रीवरलक्ष्मी व्रत Wikipedia
Shri Varlaxmi Vrat Wikipedia