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Holi: The festival of colors- होलीः गुलाल से गुलजार रंगो का त्योहार

फाल्गुन की पूर्णिमा और बसंत की बयार, गर्मी की दस्तक और होली का त्योहार होली। होली एक ऐसा त्योहार, जिसके दस्तक देते ही समूचा देश गुलाल से गुलजार हो उठता है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक देश का हर कोना रंगों में सराबोर हो खुशियों के इस पर्व को पूरी मौज-मस्ती के साथ मनाता है। मशहूर शायरनज़ीर अकबराबादीने होली को कुछ तरह बयां करते हुए कहा है-

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।।
बाज़ार, गली और कूचों में ग़ुल शोर मचाया होली ने।
दिल शाद किया और मोह लिया ये जौबन पाया होली ने।।

रंग और गुलाल ही होली के प्रमुख अंग हैं। प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहा जाता है। फाल्गुन मास (मार्च महीना) की पूर्णिमा को मनायी जाने वाली होली को बसंत का त्योहार, रंगों का त्योहार और प्यार के त्योहार के रूप में भी जाना जाता है। वैसे तो होली का पर्व देश की शान है लेकिन साथ ही होली उन त्योहारों में से एक है, जिन्हें पूरे एशिया सहित कई पश्चिमि देशों में भी बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है।

होली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होने के साथ ही यह अनेकता में एकता का त्योहार भी है। होली के दिन सभी लोग आपसी गिले-शिकवे भूल कर एक-दूसरे से गले मिलते हैं और सब साथ मिल कर होली खेलते हैं। जिसके कारण इसे प्यार का पर्व भी कहा जाता है।

होली के एक दिन पहले होलिका दहन का रिवाज होता है, जिसे कई जगहों पर छोटी होली के नाम से जाना जाता है। इसके अगले दिन बड़ी होली खेली जाती है, जिसे देश के हर कोनों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कई जगहों पर इसे रंग वाली होली, तो कहीं धुलेटी, धलांडी और फाग्वाह भी कहा जाता है।

यहाँ पढ़ें : होलिका दहन का पर्व

The start of Spring- वसंत से आगाज

Holi

वैसे तो होली का त्योहार फाल्गुन माह की पूर्णिमा को ही मना गया है लेकिन वास्तव में होली का पर्व वसंत पंचमी के दिन से ही शुरू हो जाता है।

वसंत पंचमी के पर्व से ही खेतों में लहलहाती सरसों और इठलाती गेहूँ की बलियाँ…बाग-बगीचों में फूलों की चादर बिछ जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी खुशी से परिपूर्ण हो उठते हैं। वसंत की बयार के साथ हीचारों तरफ रंगों की फुहार फूट पड़ती है और सभी लोग पहली बार रंग – गुलाल उड़ा कर होली के आगमन का शंखनाद कर देते हैं।

The Victory of the Good over the Evil- अच्छाई पर बुराई की जीत का पर्व

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नारद पुराण और भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथो में भी होली के पर्व का उल्लेख मिलता है। हिन्दु धर्म में मनाए जाने वाले हर त्योहार की तरह होली की भी एक पौराणिक कथा है, जिसके साक्ष्य भागवत पुराण में मिलते हैं। इस कथा के अनुसार प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के अहंकार में आकर वह खुद को ही भगवान मानने लगा था।

इसी कारण उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर भी पाबंदी लगा दी थी। मगर, हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था और हमेशा विष्णु का ही ध्यान करता रहता था।

प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद के लेकर आग में बैठ जाए। दरअसल होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती।

हिरण्यकश्यप का आदेश मान कर होलिका प्रह्लाद को अपनी गोंद में लेकर आग में बैठ गई। आग में बैठते ही अग्नि की लपटें होलिका को अपने चपेट में लेने लगीं लेकिन प्रह्लाद को एक आंच भी नहीं आई। इस प्रकार होलिका तो जल गई, मगर प्रह्लाद सुरक्षित बच गया।

इस घटना को अच्छाई की बुराई पर जीत के रूप में देखा जाता है। जहाँ होलिका को समाज में व्याप्त बैर और बुराई का प्रतीक जाना  माना जाता है, वहीं प्रह्लाद को प्रेम तथा आनंद का रूप माना जाता है।

होली के संदर्भ में एक और कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार इसी दिन भगवान कृष्ण ने कंस द्वारा भेजी पूतना नाम की राक्षसी का वध किया था। पूतना के वध के पश्चात अगले दिन पूरे ब्रज में होली खेल कर खुशियाँ मनायी गईं थी। यही वो दिन था जब राधा-कृष्ण पहली बार मिले थे। इसीलिए पूतना वध को बुराई पर अच्छाई की जीत और राध-कृष्ण के मिलन को प्यार के पर्व के रूप में मनाया जाता है।

Holi in the pages of history- इतिहास के पन्नों में होली का जिक्र

पौराणिक त्योहार होने के साथ ही होली एतिहासिक त्योहार भी है, जिसका जिक्र इतिहास के पन्नों में कई जगहों पर मिलता है। वसंत ऋतु में मनाए जाने के कारण इतिहास में होली का उल्लेख वसंतोत्सव और कामहोत्सव के रूप में किया गया है।

इतिहासकारों के अनुसार सबसे पहले होली का उत्सव मनाने का प्रचलन आर्यों में था, साथ ही इस त्योहार को ज्यादातर पूर्वी भारत में मनाया जाता था। होली के त्योहार का वर्णन जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र सहित अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इसके अतिरिक्त प्रसिद्ध अरबी यात्री अल-बरुनी ने भी अपने यात्रावृतांत ‘किताब-उल-हिंद’ में भी ‘होलिकोत्सव’ के नाम से होली के त्योहार का उल्लेख किया है।

मध्यकाल में भी देश में होली खेलने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। मुगलकालीन ग्रंथ अकबरनामा में मुगल बादशाह अकबर और उनकी बेगम जोधाबाई के होली खेलने का जिक्र मिलता है। वहीं अलवर संग्रहालय में संग्रहित एक मुगलकालीन चित्र में जहाँगीर और नूरजहाँ को होली खेलते हुए दिखाया गया है।

मुगल बादशाह शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। उनके ज़माने में होली का जिक्र ‘ईद-ए-गुलाबी’ या ‘आब-ए-पाशी’ (रंगों की बौछार) के रूप में किया गया है। इसके अलावा मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।

मध्यकालीन भारतीय मंदिरों पर बनी आकृतियों में भी होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। जहाँ एक ओर विजयनगर की राजधानी हंपी मेंबने एक चित्रफलक पर होली का बेहद खूबसूरत चित्र उकेरा गया है।तो वहीं एक कलाकृति में मेवाड़ के राजा महाराणा को अपने दरबारियों के साथ होली का जश्न मनाते हुए दिखाया गया है।

इसके अलावा सहित्य के कई ग्रंथो मसलन हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली, कालिदास की कुमारसंभवम्, चंद बरदाई द्वारा रचित पृथ्वीराज रासो सहित भक्ति काल में कबीर, मीराबाई, सूरदास से लेकर आदिकाल में विद्यापति तक की रचनाओं में होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।

Colorful Country- रंगो से सराबोर देश

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देश के विभिन्न कोनों में होली का त्योहार अनेक तरह से मनाया जाता है। सभी समुदाय अपनी-अपनी परंपराओं के आधार पर होली का जश्न मनाते हैं। लेकिन होलिका दहन और रंगों की होली अमूमन पूरे देश में एक समान ही मनायई जाती है।

होली के सात दिन पहले से ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। गली, मोहल्लों और नुक्कड़ों तथा चौपालों पर बाँस, लकड़ी और गोबर के उपलों से होलिका लगाई जाती है। छोटी होली के दिन दोपहर से ही होलिका का विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। जिसके बाद रात को पूर्णिमा के आरंभ के साथ होलिका दहन होता है।

होलिका दहन के अगले दिन को धूलिवंदन कहा जाता है। इस दिन लोग रंगों और गुलाल से होली खलते हैं। सूरज की पहली किरण के साथ ही लोग अपने चाहने वालों के साथ तो होली खेलते ही हैं, साथ ही सभी लोग आपसी कड़वाहटों पर भी गुलाल छिड़क कर हर रिश्ता गुलजार कर लेते हैं।

शहरों, मोहल्लों और गाँवों में जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। वहीं बच्चे भी पिचकारियों और पानी भरे गुब्बारों के साथ होली का भरपूर आनन्द लेते हैं। मौज-मस्ती का ये सिलसिला दोपहर तक चलता रहता है, जिसके बाद सभी नए कपड़े पहनकर शाम को एक-दूसरे के साथ मिलकर स्वादिष्ट पकवानों के जायकों का लुत्फ उठाते हैं।

Braj Holi- ब्रज की होली

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होली का पर्व अमूमन पूरे देश में बेहद धूम-धाम और उतने ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है लेकिन जमकर होली खेलने की फेहरिस्त में मथुरा का नाम शुमार है। मथुरा की होली न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी खासी मशहूर है, जिसका लुत्फ उठाने के लिए देश-विदेश से कई पयर्टक आते हैं। मथुरा की होली अपने आप में बेहद खास है। अमूमन पूरे देश में जहाँ एक या दो दिन तक होली का जश्न मनाया जाता है वहीं मथुरा नगरी पूरे 15 दिनों तक होली के रंग में सराबोर रहती है। 15 दिनों तक चलने वाली इस होली में हर दिन अलग और अनोखा होता है।

मथुरा की होली में सबसे मशहूर लठमार होली है। ब्रज के बरसाना गाँव में खेली जाने वाली लठमार होली बेहद अनोखी होती हैं। इस होली को कृष्ण और राधा के प्रेम से जोड़ कर देखा जाता है।

माना जाता है कि कृष्ण का रंग सांवला था इसलिए वोराधा के गोरे रूप को देखकर चिढ़ते थे। जिसके कारण कृष्ण अपने दोस्तों के साथ राधा को रंग लगाने बरसाने जाते थे। तब राधा और उनकी सखियाँ कृष्ण और उनके सखाओं पर जमकर डंडे बरसाती थीं। तब से ये होली लठमार होली के नाम से मशहूर हो गई। होली के दिन जहाँ पूरे देश में रंगों से होली खेली जाती है, वहीं ब्रिज में लठमार होली खेलने का रिवाज है।

होली के पर्व पर मथुरानगरी का नजारा सीधा लोगों के दिलों पर दस्तक देता है। 15 दिवसीय होली पर मथुरा में नन्दगाँव की होली, बरसाने की होली, फूलों की होली, लड्डुओं की होली भी खासी दिलचस्प होती है।

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Holi in India and across the Globe- देश-विदेश में होली के रंग

होली के दिन पूरा भारत गुलाल से गुलजार हो उठता है। पूर्वी भारत में भी होली का त्योहार काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यहाँ होली को फगुआ कहा जाता है। वहीं मणिपुर में होली का पर्व छह दिनों तक मनाया जाता है।

उत्तर प्रदेश और बिहार में होली के दिन रंग खेलने के अलावा लोक गीतों और नृत्यों का आयोजन किया जाता है। होली के दिन यहाँ ठंडाई पीने का रिवाज भी है।

गुजरात स्थित द्वारकाधीश मंदिर में होली का भव्य आयोजन किया जाता है। इस दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु भगवान कृष्ण के दर्शन करने द्वारका आते हैं।

जम्मू-कश्मीर में भी होली के त्योहार को गर्मियों की फसल कटाई के आरंभ के रूप में मनाया जाता है। बड़ी सख्यां में लोग होली समारोह में हिस्सा लेते हैं और पूरे धूम-धाम से परंपराओं के साथ होली का जश्न का मनाते हैं।

महाराष्ट्र में होली की तैयारियाँ लगभग एक हफ्ते पहले ही शुरू हो जाती है। छोटी होली के दिन होलिका दहन के बाद पारंपरिक मिष्ठान पुरान पोली खाई जाती है। बच्चों में ‘होली रे होली पुरान्ची पोली’ कहकर चिल्लाते हुए पुरान पोली का स्वाद चखते हैं।

उत्तराखंड में भी होली पूरे धम-धाम से मनाई जाती है लेकिन यहाँ के कुमाऊँ क्षेत्र में होली का विशेष महत्व है। यहाँ होली को मुख्य रूप से तीन तरह से मनाया जाता है – बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली। बैठकी होली में स्थानीय नृत्य और लोकगीत गाते हुए पारंपरिक रूप में होली मनाई जाती है, वहीं खड़ी होली मनाने का प्रचलन ज्यादातर कुमाऊँ क्षेत्र के गाँवों में है।

होली की धूम न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी खासी दिलचस्प होती है। इस दिन नेपाल, पाकिस्तान, अमेरिका, फिजी, मॉरिशस, इंडोनेशिया, गुयाना सहित कई देश होली के रंग में रंग जाते हैं।

Reference –
2020, holi festival of colours, wikipedia
2020, होली, विकिपीडिया

Written by Ramesh Chauhan

A Hindi content writer. Article writer, scriptwriter, lyrics or songwriter, Hindi poet and Hindi editor. Specially Indian Chand navgeet rhyming and non-rhyming poem in poetry. Articles on various topics especially on Ayurveda astrology and Indian culture. Educated best on Guru shishya tradition on Ayurveda astrology and Indian culture.

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