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गुरूपूर्णिमा पर्व क्यों मनाया जाता है – Why is Guru Purnima celebrated?

गुरूपूर्णिमा पर्व क्यों मनाया जाता है? भारत विश्वागुरू के पद पर रह चुका है। भारत का विश्व गुरू होना, गुरू की सत्ता, गुरू के महत्व को स्वीकार करना ही है। वेदों में आस्था एवं श्रद्धा रखने वाले लोग मानते हैं कि सभी विद्या अर्थात ज्ञान का मूल वेद है, आज तक संसार में जो भी ज्ञान है, आगे चलकर जो जानकारी हमे मिलने वाली है, वह सारा ज्ञान भारतीय वैदिक ग्रंथों में किसी न किसी रूप में कहा जा चुका है। 

अध्यायत्मिक रूप से वेदों को परम पिता परमात्मा श्री हरि बिष्णु के श्री मुख से निकला हुआ माना गया है वहीं सांसारिक रूप से इन वेदों के रचनाकार भगवान वेदव्यास को माना गया है। वेद सभी विद्याओं का मूल है अत: मूल रूप से वेद ही गुरू हैं जिनके आधार पर गुरू की महानता को प्राप्त करता है और महर्षि वेदव्यास इनके रचनाकार हैं इसी कारण वेदव्यास को गुरू-शिष्य परंपरा के जनक मानकर उनके जन्‍मदिन को ही गुरू पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, ऐसी मान्यता है। प्रतिवर्ष विक्रम संवत के आषाढ़ मास के पूर्णिमा तिथि को यह पर्व पूर्ण अध्यात्मिकता के साथ मनाया जाता है।

गुरूपूर्णिमा पर्व संभवत: सबसे प्राचीन पर्व है जो आदि काल से आज पर्यन्त तक मनाया जा रहा है। संभवत: यह ऐसा प्रथम पर्व भी है जिसे शुद्ध रूप से भारतीय परंपरा के अनुरूप ही मनाया जाता है। इसमें किसी प्रकार का पाश्‍चात्‍यकरण नहीं हुआ है। ये अलग बात है कि नई पीढ़ी के बच्चे या तो इस पर्व को जानते ही नहीं अथवा मानते ही नहीं । लेकिन जो भी मानते हैं भारतीय परंपरा के अनुरूप मानते हैं। 

गुरूपूर्णिमा पर्व Guru Purnima

यह एक ऐसा पर्व भी है जिसमें प्राय: घरों में कलेवे नहीं बनाये जाते न हीं किसी प्रकार का नाच-गान अथवा उत्सव ही मनाये जाते हैं। फिर भी यह पर्व ही नहीं महापर्व है। वास्तव में यह पर्व समर्पण का पर्व है, जिसमें शिष्य अपने गुरू के सम्मुख अपना समर्पण करता है और स्वयं को अज्ञानता से बाहर निकालने के लिए प्रार्थना करता है।

गुरू पूर्णिमा पर्व, हिन्दू धर्म का ही नहीं अपितु भारतीय संस्‍कृति का भी परिचायक है – Guru Purnima Festival is a reflection of not only Hinduism but also Indian Culture

भारत को विभिन्नताओं का देश स्वततंत्रा के पश्चांत ही माना जाता है ऐसा नहीं है भारत आदि काल से ही विभिन्नतताओं का देश रहा है। यहां कि परम्परायें कुछ मान्यतायें प्रारंभ से भिन्न‍ रही हैं किन्तु आध्यात्मिक रूप से इसमें एका रहा है इस कारण भिन्नता में भी एकता अपनी संस्कृति के उदय काल से रही है। यहां किसी धर्म, मान्यता का कोई विरोध नहीं होता। यही कारण है कि हिन्दू धर्म के विभिन्‍न पंथों, समप्रदायाओं के साथ-साथ कई-कई धर्म यहां पुष्पित एवं पल्लंवित हुये हैं।

गुरू सत्ता को हिन्दू धर्म ही स्वीकार नहीं करता अपितु बौद्ध, जैन, सिख धर्म के साथ-साथ विभिन्न पंथ संप्रदाय स्वीकार करते हैं, मानते हैं यही कारण है कि गुरूपूर्णिमा पर्व हिन्दू धर्म के विभिन्न पंथों, संप्रदायों के साथ-साथ सिख, बौद्ध, जैन धर्मावलंबी भी मनाते हैं। बौद्ध धर्म की मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान गौतम बुद्ध ने पहली बार उपदेश देते हुये गुरू-शिष्य परंपरा का प्रारंभ किया था इसलिये इस स्वर्णिम अवसर को जीवित बनाये रखने के लिये इसे महापर्व गुरूपूर्णिमा पर्व के रूप में मनाने की मान्यता है । 

हमारे देश में गुरू परंपरा का निर्वहन करने वाले सैकड़ों मत, संप्रदाय प्रचलित हैं । कबीर पंथी, राधा स्वामी, मुक्तामनुचर जैसे बहुत से पंथ है जो गुरू को सर्वव्‍यापक स्वीकार करते हैं। इन कारणों से गुरूपूर्णिमा पर्व का महत्व हमारे देश में बहुत अधिक है। इस प्रकार गुरूपूर्णिमा पर्व केवल हिन्दू धर्म का नहीं भारतीय संस्कृति का परिचायक है।

गुरू को सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्वीकार करना – Accepting Guru as Supreme Power

गुरू किसे कहते हैं? इसे इस श्लोक में सहज रूप से परिभाषित किया गया है-

‘‘गुकारस्त्वन्धकारस्तु रुकार स्तेज उच्यते ।अंधकार निरोधत्वात् गुरुरित्यभिधीयते ।।‘‘

गुरू, गुकार एवं रूकार का संधि है। गुकार का अर्थ अंधकार और रूकार का अर्थ तेज अथवा प्रकाश होता है। जो अंधकार का विरोध करता हो, जो अंधकार को दूर करता हो, उसे गुरू कहते हैं।

बृहदारण्य के उपनिषद के प्रसिद्ध पवमान मंत्र का कथन है- 

‘’असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योर्तिगमय’’ इसमें लोगों से अव्हान किया गया है असत्य से सत्य की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर चलें। वास्तव में यहां इसका निहितार्थ सत्य ही ईश्वर है, प्रकाश अथवा ज्योति ही ईश्वर है जो अंधकार या अज्ञानता को दूर करता है।

चूँकि अंधकार अज्ञानता को दूर करने वाले को ही गुरू कहा गया है और इसे ही ईश्वर, इसलिये गुरू ही ईश्वर तुल्य है। गुरू को केवल ईश्वर तुल्य ही नहीं माना गया अपितु वैदिक ग्रंथों में गुरू को सृष्टि के त्रीशक्ति से बड़ा साक्षात परब्रम्ह परमेश्वर के रूप में भी स्वीकार किया गया है- 

‘’गुरूर ब्रम्हाब गुरूर बिष्णु् गुरूर देवो महेश्वमरा ।गुरूर साक्षात परम ब्रम्ह् तस्मैर श्री गुरूवै नम: ।

गुरू के महत्व‍ को केवल पौराणिक ग्रन्थों ने ही स्वीकार नहीं किया अपितु हिन्दी के  साहित्य के स्वूर्णिम काल के भक्तों साहित्य कारों ने भी स्वीकार किया है । तुलसी दास जी अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ रामचरित मानस के वंदना प्रकरण में कहते हैं-

बंदउँ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नररूप हरि।

महामोह तम पुंज, जासु बचन रबिकर निकर।।

इसी ग्रंथ के उत्तांरार्ध में यह कहकर गुरू की महत्‍ता को प्रति पादित करते हैं कि बिना गुरू के भव सागर से कोई पार नहीं पा सकता चाहे वह स्वयं ब्रम्हा, बिष्णु अथवा महेश ही क्यों न हो-

 ‘’गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई। जों बिरंचि संकर सम होई।।‘’

तुलसीदासजी के समकालीन संत कवि कबीरदास जिनके अनुयायी कबीरजी को स्वयं साक्षात परब्रम्ह के रूप में स्वीकार करते है कहते हैं- 

गुरू गोविंद दोउ खड़े, काके लागूँ पाय।बलिहारी गुरू आपने, गोविंद दियो बताय।

ऐसा भी नहीं है कि वर्तमान के साहित्यकार गुरू महिमा को स्वीकार नहीं करते, अभी-अभी के साहित्यकार कवि रमेश चौहान लिखते हैं-

गुरू गुरूता गंभीर है, गुरू सा कौन महान।सद्गुरू के हर बात को, माने मंत्र समान।

इस प्रकार साहित्यिक दृष्टिकोण से गुरू महिमा से सभी भाषाओं का साहित्य अटा पड़ा है, चाहे संस्कृत साहित्य हो, हिन्दी साहित्य हो और चाहे किसी भी भारतीय भाषा का साहित्य। सभी साहित्यों ने गुरू महिमा को आत्मसात किया हुआ है।

हमारे देश के संत परंपरा, गुरू-शिष्य परंपरा, संप्रदाय परंपरा, पंथ परंपरा सभी ने गुरू को ईश्वर तुल्य ही स्वीकार किया है। गुरू को सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है।

गुरूपूर्णिमा श्रद्धा एवं समर्पण का पर्व – Guru Purnima is a festival of reverance and dedication

गुरूपूर्णिमा पर्व Guru Purnima

सनातन काल से गुरू को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा गया है । आध्यात्मिक रूप से मनुष्य जीवन, जीवन-मृत्यु के क्रम से मुक्त होने के लिये प्राप्त हुआ है। इसलिये मनुष्यों को अपने मुक्ति का उपाय करना चाहिये। यह मुक्ति बिना आध्यात्मिक गुरू के संभव नहीं है। इसी सिद्धांत के आधार पर लोग गुरू की शरण में जाते हैं। इसका अर्थ ही है अपने मानसिक, बौद्धिक, सांसारिक संपदा को गुरू को समर्पित करना। जिसे बोल-चाल में अपने अहंकार को त्याग कर गुरू के शरण में जाना कहते हैं। गुरू के आदेश का ही नहीं अपितु उनके संकेत मात्र को आदेश मानकर पालन करना शिष्य का परम धर्म होता है।

जब शिष्य अपने गुरू को अपना सर्वस्व समर्पित करने का भाव रखता है तो यही उनकी श्रद्धा है। श्रद्धा विश्वास के धरातल पर ही खड़ा रह सकता है। श्रद्धा ही संपूर्ण समर्पण को प्रेरणा देती है। ऐसे तो यह भाव शिष्य के हृदय में गुरू के प्रति प्रतिक्षण रहना चाहिये किन्तु व्यवहारिक में अनेक बाधाओं के कारण नहीं हो पाता तो गुरू के प्रति अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करने का दिन गुरूपूर्णिमा ही होता है। इस प्रकार गुरूपूर्णिमा का पर्व श्रद्धा एवं समर्पण का पर्व होता है।

गुरूपूर्णिमा पर्व का आज का व्यरवहारिक पक्ष- Today’s practical side of Gurupurnima

गुरू का अर्थ जब व्यापक रूप में लिया जाता है तो वह प्रत्येक प्राणी गुरू हो जाता है जो हमें किसी न किसी रूप में किसी न किसी बात का ज्ञान कराता है। गुरू-शिष्य परंपरा मूलत: आध्यात्मिक, धार्मिक आस्था है किन्तु व्यवहारिक रूप में यह कई भिन्न रूपों में हमारे समक्ष प्रकट होता है। नृत्य या गायन कला में गुरू-शिष्य परंपरा प्रचलित है। यह इस बात को सिद्ध करता है गुरू-शिष्य परंपरा अब आध्यात्मिक, धार्मिक, दार्शनिक क्षेत्र से निकल हर उस कला तक व्याप्त हो गया है जिसे सीखा-सिखाया जाता है । 

यही कारण है कि आजकल गुरूपूर्णिमा पर्व का केवल आध्यात्मिक मूल्य ही नहीं अपितु व्यावहारिक मूल्य भी है। आजकल केवल आश्रम में गुरू-शिष्य परंपरा के धारक ही इस पर्व को नहीं मनाते अपितु जन साधारण भी अपने ट्रेनर, मेंटर, शिक्षक, प्रशिक्षक आदि को गुरू संज्ञा देकर आज के दिन उनका सम्मान करते हैं, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं ।

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Reference

Guru Purnima Wikipedia

गुरूपूर्णिमा पर्व Wikipedia

Written by Ramesh Chauhan

A Hindi content writer. Article writer, scriptwriter, lyrics or songwriter, Hindi poet and Hindi editor. Specially Indian Chand navgeet rhyming and non-rhyming poem in poetry. Articles on various topics especially on Ayurveda astrology and Indian culture. Educated best on Guru shishya tradition on Ayurveda astrology and Indian culture.

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