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धन तेरस पर्व क्यों मनाया जाता है – Why is Dhanteras Celebrated ?

मनुष्‍य जीवन का लक्ष्‍य ही है धन अर्जित करना । धन के बिना जीना बहुत कठिन हो जाता है । धन के लिये ही हम जीवन भर कुछ न कुछ प्रयास करते रहते हैं । लेकिन धन क्‍या है ? इसको व्‍यापक अर्थ में लेने चाहिये ।धन के दो अर्थ होते हैं एक धन-धान्‍य और दूसरा स्‍वास्‍थ्‍य धन । धन-धान्‍य हमारे भौतिक संपदा को दिखाता है वहीं स्‍वास्‍थ्‍य धन हमारे शारीरिक क्षमता को दिखाता है । 

वास्‍तव में स्‍वास्‍थ्‍य धन होने पर ही लोग शारीरिक एवं मानसिक रूप से सबल होकर परिश्रम करके धन-धान्‍य अर्जित कर सकते  है ।  इन दोनों प्रकार के धन में वृद्धि की कामना करने के लिये हमारे भारतीय संस्‍कृति में ‘धन तेरस पर्व’ का प्रचलन है

Dhanteras पर्व दीपावली त्‍यौहार का पहला पर्व है । दीपावली भारत का सबसे बड़ा त्‍यौहार है । दीपावली को प्रकाश, दीप और खुशी का पर्व कहते हैं । यह पॉंच दिनों तक मनाये जाना वाला उत्‍सव है । इस उत्‍सव के पहले दिन मनाये जाने वाले पर्व को ही ‘धनतेरस पर्व’ कहते हैं ।

धनतेरस कब मनाते हैं – When is Dhanteras Celebrated ?

भारतीय पर्व या त्‍यौहार हिन्‍दी पंचाग के आधार पर मनाया जाता है । ‘धनतेरस’ शब्‍द में ही इसकी तिथि तेरस जुड़ा हुआ है अर्थात इसे तेरस यनी तेरहवी तिथि को मनाया जाता है । हिन्‍दी पंचाग विक्रम संवत के कार्तिक महिना के कृष्‍ण पक्ष के तेरहवी तिथि को धनतेरस का पर्व पूरे देश में हँसी-खुशी से मनाया जाता है । यह महिना अंग्रेजी महिना के अक्‍टूबर-नवम्‍बर के बीच पड़ता है ।

धनतेरस क्‍यों मनाया जाता है ? WHy is Dhanteras Celebrarated

धनतेरस का पर्व अपने नाम में ही मनाये जाने का कारण ध्‍वनित कर रहा है – ‘धनतेरस’ मतलब धन के लिये तेरस को मनाये जाने वाला पर्व । लेकिन यहां एक बात ध्‍यान देने योग्‍य है कि धन का अर्थ केवल धन-धान्‍य या भौतिक संपदा, पूँजी ही नहीं है । आयुर्वेद में धन का अर्थ स्‍वास्‍थ्‍य होता है । स्‍वास्‍थ्‍य के रक्षा के लिये निरोगी काया की कामना से भी इस पर्व को मनाया जाता है । धनतेरस पर्व मनाये जाने के पीछे कुछ पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं । इसमें प्रमुख इस प्रकार है-

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1. भगवान धवंतरी जयंती- श्रीमद्भागवत सहित कई पौराणिक ग्रन्‍थों में समुद्र मंथन का वर्णन आता है । समुद्र मंथन से अनेक बहुमूल्‍य धातुएं प्राप्‍त हुये साथ ही इसी समुद्र मंथन से एक ओर विष निकल%B तो दूसरी %4र अ%Aृत भी %4 इसी समुद्र मंथन में धन-धा%8्‍य की देवी लक्ष्‍मी प्रकट हुई A4ो इसी समुद्र मंथन में स्‍वास्‍थ्‍य धन के देवता भगवान ‘धनवंतरी’ भी प्रकट हुये । भगवान धनवंतरी, माता लक्ष्‍मी से पहले प्रकट हुये हैं ।

कार्तिक कृष्‍ण तेरस को भगवान धनवंतरी चतुर्भुज रूप में हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुये । भगवान धनवंतरी को स्‍वास्‍थ्‍य का देवता कहते हैं । भगवान धनवंतरी को सर्वशक्तिमान भगवान बिष्‍णु का अंशावतार माना जाता है । मान्‍यता के अनुसार भगवान बिष्‍णु ही स्‍वयं मानव के स्‍वास्‍थ्‍य के रक्षा के लिये धनवंतरी के रूप में प्रकट हुये । पुरातन भारतीय चिकित्‍सा पद्यति आयुर्वेद है । इसी आयुर्वेद के जनक हैं भगवान धनवंतरी । 

भगवान धनवंतरी के इस अवतरण से मानव जीवन को निरोग बनाने में मदद मिली । आयुर्वेद के अनेक चमत्‍कारों का वर्णन हमारे अनेक पौराणिक ग्रंथों में मिलते हैं जिसमें ऋषि च्‍वन का वृद्धा अवस्‍था से नवयुवक बनने का वर्णन भी है। 

यह चमत्‍कार आजकल आधुनिक चिकित्‍सा पद्यति में भी संभव नहीं है कि किसी बुढ़े को जवान बना दिया जाये । ऐसे आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी के अवतरण दिवस को आज के दिन भगवान धनवंतरी जयंती के रूप में मनाते हैं । भगवान धनवंतरी के नाम में जुड़ा ‘धन’ शब्‍द का अर्थ भौतिक संपदा न होकर स्‍वास्‍थ्‍य धन है । इसलिये स्‍वास्‍थ्‍य की कामना के लिये इस पर्व को मनाया जाता है ।

माता लक्ष्‍मी जो धन-धान्‍य की देवी है से पहले धनवंतरी का प्रकट होना इस बात को इंगित करता है कि धन-धान्‍य से बड़ा धन, स्‍वास्‍थ्‍य धन है । हमारे भारतीय संस्‍कृति में भी धन संपदा से अधिक स्‍वास्‍थ्‍य को महत्‍व दिया गया है । 

इसलिये हम धन-धान्‍य की देवी लक्ष्‍मी के पर्व लक्ष्‍मी पूजा जिसे दीपावली कहते हैं, से पहले धनतेरस मनाया जाता है । दीपावली पर्व के ठीक दो दिन पहले धनतेरस मनाया जाता है । यह स्‍वास्‍थ्‍य का पर्व है इसलिये भारत सरकार द्वारा धनतेरस को ‘राष्‍ट्रीय आयुर्वेदिक दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है । इस प्रकार इस पर्व का महत्‍व स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति जागरूकता पैदा करना है ।

Dhanteras

2. अकाल मृत्‍यु से छुटकारा की मान्‍यता-  एक लोककथा के अनुसार हिम नामक एक राजा थे । उनके यहां जब एक पुत्र का जन्‍म हुआ तो उसकी जन्‍मकुण्‍डली बनवाई गई, उस जन्‍म कुण्‍डली के अनुसार उस लड़के की मृत्‍यु उसके विवाह के ठीक चार दिन बाद होना बताया गया ।  इसी भय के कारण राजा हिम अपने राजकुमार के बड़े होने पर शादी करने से बचते रहे । किन्‍तु होनी प्रबल होती है । काल की प्रेरणा से उसकी महारानी ने राजा को राजकुमार के विवाह के लिये मना लिया ।

 विवाह संबंध लेकर आने वाले राजाओं को स्‍पष्‍ट रूप से बता दिया जाता था कि इसकी कुण्‍डली में विवाह के चार दिन बाद मृत्‍यु लिखी है । सब मना कर देते थें किन्‍तु एक राजकुमारी यह जानकर भी विवाह करने के लिये तैयार हो गई । दोनों का विवाह हुआ और सचमुच विवाह के चौथे दिन उस राजकुमार की मृत्‍यु हो गई । 

उसके मृत्‍यु पर राजकुमारी बहुत दुखी होकर क्रंदन करने लगी । उसके क्रंदन से यमदूत का पत्‍थर हृदय भी पसीज गया । लेकिन उसके हाथ में उस राजकुमार को जिंदा रखना संभव नहीं था । जब वह उस जीव को लेकर यमराज के पास पहुँचा तो उसने विनित भाव से यमराज से पूछा महाराज अकाल मृत्‍यु से बचने का क्‍या कोई उपाय नहीं है ?

 इस पर यमराज ने प्रसन्‍न होकर कहा कि यदि कोई व्‍यक्ति कार्तिक कृष्‍ण त्रयोदशी को मेरी पूजा करेगा तो उसकी अकाल मृत्‍यु नहीं होगी । तभी से अकाल मृत्‍यु से बचने के लिये धनतेरस को यमराज की दीपक जला कर पूजा किया जाता है ।

इस प्रकार दोनों मान्‍यतायें स्‍वास्‍थ्‍य धन की रक्षा है । मृत्‍यु से बचते हुये जीवन को दीर्घायु करने की प्रेरणा देता है ।

कैसे मनाया जाता है – How is Dhanteras Celebrated ?

धनतेरस दीपावली पर्व जो पॉंच दिनों तक मनाया जाता है, का पहले दिन का पर्व है । इसी दिन से दीपावली का खुमारी लोगों में चढ़ने लगता है । धनतेरस को ज्‍यादातर लोग धन का पर्व मानकर भौतिक संपदा रूपी धन के वृद्धि के रूप मनाते हैं । 

लोग धनतेरस के दिन अपने सामार्थ्‍य अनुसार नये सामाग्री धन-धान्‍य भौतिक संपदा भड़वा-बर्तन, सोना-चांदी, मोटर-गाड़ी आदि खरीदते हैं । इसी दिन दीपावली में लक्ष्‍मीपूजा के लिये मूर्ति, प्रतिमाएं अथवा सोने-चॉंदी के सिक्‍के भी खरीदे जाते हैं ।  लोगों की मान्‍यता है इस दिन ख़रीददारी करने से धन में तेरह गुना की बढ़ोतरी होती है । धन तेरह पर इतनी खरीदी होता है कि  देखकर लगता है यह पर्व खरीदी करने का पर्व है । हर व्‍यक्ति कुछ न कुछ नया खरीदना चाहते हैं ।

ज्‍यादातर लोग बर्तन खरीदना पसंद करते हैं । बर्तन खरीद कर उसमें दूध छिड़ककर उस बर्तन का उपयोग करते हैं । इसके पीछे का तर्क यह है कि भगवान धनवंतरी कलश पात्र लेकर प्रकट हुये थे । लोगों का मानना है इस दिन बर्तन लेने से भगवान धनवंतरी का आर्शीवाद प्राप्‍त होता है ।

किन्‍तु वास्‍तव में यह त्‍यौहार स्‍वास्‍थ्‍य धन के लिये किया जाता है और किया जाना चाहिये । आयुर्वेद में स्‍वर्ण भस्‍म एवं रजत भस्‍म का विशेष महत्‍व है। ये स्‍वास्‍थ्‍य के लिये बहुत ही उपयोगी होते हैं इसी उद्देश्‍य को लेकर धनतेरस के दिन सोने-चॉंदी के नये पात्र लेकर उसमें भोजन ग्रहण करने की पहले परम्‍परा थी

लोग अपने सामर्थ्‍य अनुसार सोने, चॉंदी अथवा तांबे का पात्र लेकर उसमें भोजन करें और उससे स्‍वर्ण तत्‍व, रजत तत्‍व, एवं ताम्र तत्‍व को ग्रहण करें । किन्‍तु यही परम्‍परा कालांतर में बदलते हुये आज नये बर्तन खरीदने की परम्‍परा के रूप में चल पड़ा है । अधिकांश लोगों की मान्‍यताएं बदल गई है । अब लोग यह मानने लगे हैं कि इस दिन नये बर्तन खरीदने से धन तेरह गुना बढ़ता है जबकि इसका वास्तविक प्रचलन यह था कि इस दिन नये पात्र से भोजन करने से स्‍वास्‍थ्‍य धन में तेरह गुना का लाभ होता है

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भारत सरकार द्वारा आज के दिन को ‘राष्‍ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है । इसके अंतर्गत मानव समाज के लिये भारतीय आयुर्वेद के योगदान को याद किया जाता है ।

आयुर्वेद अनुयायियों, आयुर्वेद चिकित्‍सक, वैद्यों द्वारा आज भगवान धनवंतरी की विशेष पूजा अर्चना करके मानव कल्‍याण के लिये आयुर्वेद उपयोगी हो इस बात की कामना करते हैं ।

संध्‍या के समय मातायें घर के मुख्‍य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके 13 की संख्‍या में दीपक जलाते हैं । नाना-प्रकार से रंगोली सजाये जाते हैं । बच्‍चों द्वारा इसी दिन से फुलझड़ी, पटाके जलाना प्रारंभ कर दिया जाता है । इसी दिन से ही दीपावली का रंग बच्‍चों से लेकर बुजुर्गो तक चढ़ने लगता है ।

आधुनिकता के दौर में पारम्‍परिक बातों को भूलना और भौतिक संपदा के चकाचौंध के फेर में पड़कर केवल और केवल धन संचय करने की प्रवृति ने इस पर्व के वास्‍तविक अर्थ को ही भुला दिया है । इस पर्व का वास्‍तविक अर्थ आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी के जयंती के रूप मनाना है

इस अर्थ में हमें आयुर्वेद के सिद्धांतों का आकलन करना चाहिये, योग-प्रणायाम, पथ्‍य–अपथ्‍य, औषधि और प्रकृति के साथ संतुलन को स्‍मरण करने का दिन के रूप में मनाना चाहिये । भगवान धनवतंतरी और आयुर्वेद की पूजा की जानी चाहिये । धन-धान्‍य रूपी धन की पूजा के लिये विशेष तौर पर स्‍वयं दीपावली का पर्व तो है ही, जिसे लक्ष्‍मी पूजा के रूप में मनाया जाता है

वर्तमान प्रचलन के अनुसार इस पर्व को ज्‍यादातर लोग धन-धान्‍य रूपी धन की पूजा के रूप में मनाते हैं कुछ लोग स्‍वास्‍थ्‍य रूपी धन के रूप में भी मनाते हैं । कुल मिलाकर यह पर्व हमें स्‍वास्‍थ्‍य रूपी धन और धन-धान्‍य रूपी धन दोनों के प्रति सचेत रहने, सामर्थ्‍यवान रहने, प्रयासरत रहने का संदेश देता है।

Reference

Written by Ramesh Chauhan

A Hindi content writer. Article writer, scriptwriter, lyrics or songwriter, Hindi poet and Hindi editor. Specially Indian Chand navgeet rhyming and non-rhyming poem in poetry. Articles on various topics especially on Ayurveda astrology and Indian culture. Educated best on Guru shishya tradition on Ayurveda astrology and Indian culture.

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