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Holika Dahan celebrates the victory of Good over Evil- बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता होलिका दहन का पर्व

भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। वैसे तो देश में पूरा साल ही त्योहारों की रौनक से गुलजार रहता है लेकिन होली और दीपावली दो ऐसे त्योहार हैं जिन्हें पूरे देश में काफी हर्षोल्लास और धूम-धाम से मनाया जाता है।

होली और दिवाली अमूमन एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं। होली फाल्गुन के महीने (फरवरी) में आती है तो दीपावली कार्तिक के महीने (अक्टूबर – नवंबर) में पड़ती है। एक रंगों का त्योहार है तो दूसरा रोशनी का। वहीं होली वसंत ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु के दस्तक देने की सूचक है तो दीपावली सर्दियों के आगमन का पर्व।

बावजूद इसके एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न इन त्योहारों में अगर कुछ समानता है, तो वो इन्हें मनाने का उद्देश्य और इनका महत्व। होली और दीपावली दोनों ही त्योहार बुराई पर अच्छाई के जीत का संदेश देते हैं।

बेशक होली रंगों का त्योहार है लेकिन इसके ठीक एक दिन पहले होलिका दहन की प्रथा बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनायी जाती है। होलिका दहन को देश के कुछ क्षेत्रों में छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है।

वहीं देश के कई क्षेत्रों में रंगों की होली को धुलंडी कहा जाता है और इनमें होलिका दहन को ही होली का असली उत्सव माना जाता है।

The practice of making Holi for Holika Dahan- होलिका दहन के लिए होली बनाने का प्रचलन

फाल्गुन माह की पूर्णिमा को होने वाली रंगों की होली से ठीक एक दिन पहले होलिका दहन का पर्व पूरे देश में काफी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है लेकिन इसकी की तैयारी देश में लगभग एक महीने पहले से ही शुरू हो जाती है।

दरअसल होलिका दहन से पहले होली बनाई जाती है, जिसकी प्रक्रिया एक महीने पहले यानी माघ पूर्णिमा के दिन से ही शुरु हो जाती है। देश की ज्यादातर जगहों पर इस दिन गुलर वृक्ष की टहनी को गांव या मोहल्ले में किसी खुली जगह पर गाड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया को होली का डंडा गाड़ने का नाम दिया जाता है।

होली काडंडा गाड़ने के बाद इसके आस-पास कंटीली झाड़ियां या लकड़ियाँ रख दी जाती हैं। ये होलिका गाँवो और शहरों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बनाई जाती हैं। होलिका के दिन कई जगहों पर प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है, जिसका निर्धारण प्रतियोगी क्षेत्रों की होलिका की लंबाई से आँकी जाती है।

अमूमन होलिका पूजन देश भर में अलग-अलग रीति-रिवाजों और हर समुदाय की अपनी परंपराओं के अनुसार होता है। होलिका पूजन के लिए महिलाएँ भी विशेष तैयारियाँ करती हैं। सात दिन पहले से गाय के गोबर से ढाल, बिड़कले औरगोबर से ही कई तरह के खिलौने भी बनने शुरू हो जाते हैं। होलिका दहन के पहले इन खिलौनों की कई मालाएँ बनाई जाती हैं, जिन्हें होलिका पूजन के बाद होलिका में डाल दिया जाता है।

Holika Pujan – होलिका पूजन

देश की कई जगहों पर होलिका दहन से पहले होलिका का पूजन किया जाता है। गली-मोहल्लों के सभी लोग परिवार के सभी सदस्यों के साथ पूरे विधि-विधान से होली का पूजन करते हुए धूप, रोली, अगरबत्ती और फूल चढ़ाते हैं, साथ ही गुड़, कच्चे सूत का धागा, साबूत हल्दी, मूंग, बताशे, नारियल, चना एवं नई फसलों के अनाज जैसे- गेंहू और जौ की बालियाँ आदि कई सारी चीजें होलिका को अर्पित करते हैं।

पूजा समाप्त होने के बाद गोबर के खिलौने से बनी मालाएँ भी होलिका पर चढ़ायी जाती हैं। इसमें प्रत्येक परिवार चार मालाएँ चढ़ाता है, जिसमें एक माला पितरों के लिए, दूसरी हनुमान जी के लिये, तीसरी शीतला माता के लिएऔर चौथी माला घर परिवार के सदस्यों के नाम से चढ़ाई जाती हैं।

होलिका जलाने के पहले लोग होलिका की तीन से सात बार परिक्रमा करते हुए इसे कच्चे सूत के धागे से लपेटा जाता है। जिसके बाद पंचोपचार विधि से होलिका को जल का अर्घ्य दिया जाता है।

होलिका दहन के बाद होलिका में कच्चे आम, नारियल, सतनाज (गेहूं, उड़द, मूंग, चना, चावल जौ और मसूड़ मिलाकर),चीनी के खिलौने, नई फसल आदि की आहुति देने की प्रथा होती है।

होलिका दहन और इसके पूजन का जिक्र नारद पुराण में भी मिलता है। नारद पुराण के अनुसार होलिका दहन के अगले दिन यानी रंग वाली होली के दिन सूर्योदय पहलेस्नान के बाद होलिका की राख में जौ और गेहूँ की बलियों को पकाया जाता है। साथ ही होलिका की राख को माथे पर भी लगाया जाता है।

The tale of Holika Dahan- होलिका दहन की कथा

होलिका दहन की पौराणिक कथा का जिक्र प्रह्लाद कथा के नाम से भागवत पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार हिरण्यकश्यप नामक एक राजा पाताल लोक में रहता था। बाकी असुरों की तरह उसकी भी कामना थी कि, उसे कभी कोई न मार सके और वो हमेशा के लिए अमर हो जाए। हिरण्यकश्यप ने अपनी इच्छा पूरी करने के लिए ब्रह्म देव की कठोर तपस्या की। आखिरकार उसकी तपस्या सफल हुई और ब्रह्मा ने स्वयं प्रकट होकर उससे वरदान माँगने को कहा। हिरण्यकश्यप ने बड़ी ही चालाकी से अपनी इच्छा ब्रह्मा के सामने रख दी। उसने ब्रह्मा से वर माँगा कि उसकी मृत्यु न इंसान के द्वारा हो और न ही जानवर के द्वारा, न दिन में हो और न रात में, न जमीन पर और न ही पानी में तथा दुनिया के किसी शस्त्र और अस्त्र से उनकी मृत्यु न हो सके। ब्रह्मा ने उसे इच्छानुसार वर दे दिया।

यह वरदान पाने के बाद हिरण्यकश्यप ने खुद को अमर मानते हुए खुद को तीनों लोकों का देवता घोषित कर दिया और सभी से अपनी पूजा करवाने लगा। जो भी हिरण्यकश्यप की बात नहीं मानता, वह उसका वध करवा देता था।

हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद ने उसके आदेश को मानने से मना कर दिया। प्रह्लाद भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था और हमेशा नारायण का ही नाम जपता रहता था। हिरण्यकश्यप को प्रह्लाद की नारायण के प्रति अटूट श्रद्धा बिल्कुल रास नहीं आयी और उसने प्रह्लाद का वध करवाने का निर्णय किया।

हिरण्यकश्प की बहन होलिका को ब्रह्म देव से वरदान प्राप्त था कि आग उसे कभी जला नहीं सकती। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद का वध करने के लिए अपनी बहन होलिका का आह्वाहन  किया और होलिका को आदेश दिया कि वो प्रह्लाद को लेकर आग पर बैठ जाए, जिससे प्रह्लाद की मृत्यु हो जाएगी और वरदान के कारण होलिका सुरक्षित रहेगी।

होलिका हिरण्यकश्यप के आदेश को स्वीकार करते हुए प्रह्लाद को अपनी गोंद में लेकर आग्नि पर बैठ गई। होलिका की गोंद में बैठा प्रह्लाद बेहद शांत और निडर मन से नारायण के ध्यान में संलग्न था। आखिरकार अग्नि पर बैठते ही आग के लपटें होलिका को अपनी चपेट में लेनें लगीं और प्रह्लाद को आग ने छुआ भी नहीं। यह नजारा देखकर सभी असुर आश्चर्यचकित रह गए।

होलिका के जलने के बाद से ही बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में होलिका दहन का पर्व मनाया जाने लगा। वर्तमान में पाकिस्तान के मुल्तान में प्रह्लाद का एक मंदिर भी स्थित हैं, जहाँ प्रह्लाद और उनके आराध्य देव नारायण की उपासना की जाती है।

कथा के अनुसार अपनी बहन होलिका के दहन के बाद हिरण्यकश्यप क्रोधित हो उठा और उसने खुद प्रह्लाद का वध करने का निश्चय किया। तभी भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार (मानव का शरीर और शेर का मस्तक) धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया। वरदान के मुताबिक हिरण्यकश्यप का वध न किसी इंसान और न ही जानवर के द्वारा हुआ। भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध सध्यां के समय (न दिन और न रात), दरवाजे की चौखट पर (न जमीन और न पानी), शेर के पंजो ( न अस्त्र और न ही शस्त्र) वाले हाथों से किया।

होलिका दहन की यह कथा अच्छाई की बुराई पर जीत का संदेश देती है, जिसके उपलक्ष्य में होली के एक दिन पहले होलिका दहन का पर्व समूचे देश में पूरी श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है।

The secret behind Holika Dahan- होलिका दहन का रहस्य

होलिका दहन की प्रह्लाद कथा को ज्यादातर लोग संशय की दृष्टि से देखते हैं। आग से न जलने के वरदान के बावजूद होलिका का दहन कई सवाल खड़े करता है।

हिन्दू पुराणों में होलिका दहन का विस्तार से वर्णन करते हुए होलिका दहन के कारणों का उल्लेख मिलता है। जिनके अनुसार होलिका दहन के पीछे कुछ कारण विद्यमान हैं।

 1 – ब्रह्म देव द्वारा दिया गए वरदान का होलिका ने दुर्पयोग करते हुए उससे प्रह्लाद को हानि पहुँचाने का प्रयास, जिसके कारण होलिका को मिला वरदान निष्प्रभावी हो गया।

2- माना जाता है कि आग में न जलने की शक्ति होलिका के कपड़ों में थी। होलिका प्रह्लाद से बेहद प्यार करती थी लेकिन वो अपने भाई हिरण्यकश्यप के आदेश को टाल भी नहीं सकती थी। इसलिए होलिका ने प्रह्लाद की रक्षा के लिए अपने वस्त्र प्रह्लाद को पहना दिए और खुद आग्नि में जल गई।

3- एक मत यह भी है कि होलिका ने अग्नि पर बैठते समय एक चादर ओढ़ रखी थी, जोअग्नि से उसकी रक्षा करती लेकिन प्रह्लाद भगवान विष्णु के नाम का जप कर रहा था, जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए होलिका की चादर को हवा के झोंके से उड़ा कर प्रह्लाद के ऊपर जाल दिया। जिसके कारण प्रह्लाद बच गया और होलिका आग्नि की लपटों की भेंट चढ़ गई।

The slaughter of Pootna- पूतना का वध

होलिका दहन के संदर्भ में एक और कहानी प्रचलित है, जिसके अनुसार भगवान विष्णु ने जब कृष्ण अवतार में धरती पर जन्म लिया तो उनके मामा कंस ने उन्हें मारने के लिए पूतना नामक राक्षसी को भेजा।

पूतना एक विशालकाय और शक्तिशाली राक्षसी थी, जिसके स्तन में जहर था। कंस के आदेश अनुसार पूतना अपने स्तनपान से कृष्ण का वध करने गोकुल पहुँची। उसने जैसे ही कृष्ण को अपना दूध पिलाना की केशिश की कृष्ण ने पूतना का वध कर दिया। इस कथा में पूतना को होलिका और रंग वाली होली को फगवा की संज्ञा दी जाती है।

मान्यता है कि पूतना का विषैला दूध पीने के कारण कृष्ण का शरीर नीला पड़ गया था, जिसके बाद कृष्ण का रंग सांवला हो गया और पूतना के वध की खुशी में अगले दिन पूरे बृज में होली खेली गई। माना जाता है कि इसी होली के अवसर पर पहली बार राधा और कृष्ण का मिलन हुआ था और राधा ने कृष्ण को गुलाल लगाया था। जिसके साथ राधा कृष्ण की अमर प्रेम कहानी का आरंभ हुआ।

The festival of Holika Dahan- होलिका दहन का पर्व

होलिका दहन का पर्व न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी मनाया जाता है। जहाँ देश में होलिका दहन पर्व उत्तर और दक्षिण भारत में बेहद धूम-धाम से मनाया जाता है, वहीं पड़ोसी देश नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी भारतीय मूल का हिन्दु समुदाय होलिका दहन का पर्व पूरे रीति-रिवाज और स्थानीय परंपराओं के अनुसार मनाता है।

इसके अलावा दक्षिण पूर्व एशिया और कई पश्चिमि देशों में भी होली के एक दिन पहले होलिका का उत्सव काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, जिसमें न सिर्फ हिन्दू बल्कि कई समुदायों के लोग भी शिरकत करते हैं।

References

Written by Ramesh Chauhan

A Hindi content writer. Article writer, scriptwriter, lyrics or songwriter, Hindi poet and Hindi editor. Specially Indian Chand navgeet rhyming and non-rhyming poem in poetry. Articles on various topics especially on Ayurveda astrology and Indian culture. Educated best on Guru shishya tradition on Ayurveda astrology and Indian culture.

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