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Makarsankranti: First festival of beliefs in a Country of diversities- मकरसंक्रान्ति : विविधताओं के देश में मान्यताओं का पहला पर्व

हिंदुस्तान को त्योहारों का देश कहा जाता है। नए साल के आगाज के साथ ही यहाँ त्योहारों का सिलसिला शुरू हो जाता है और फिर पूरे साल देश किसी न किसी त्योहार के जश्न में सराबोर रहता है। वैसे तो साल की शुरूआत के साथ त्योहारों की यह फेहरिस्त खासी लम्बी है लेकिन इस फेहरिस्त में पहला नाम आता है मकसंक्रान्ति का।

नए साल के जश्न के बाद मकरसंक्रान्ति के रूप में देश का पहला त्योहार मनाया जाता है। मकरसंक्रान्ति का अर्थ है सूर्य का मकर राशि में प्रवेश। इस त्योहार के पीछे मान्यता है कि मकरसंकान्ति के दिन सूर्यधनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है और इसी के साथ सर्दियां खत्म होने लगती हैं।

जॉर्जियन कैलेंडर में जहाँ 25 दिसम्बर यानी क्रिसमस डे को बड़ा दिन माना जाता है, वहीं हिन्दू कैलेंडर में मंकरसंक्रान्ति से बड़े दिन का आगाज होता है।  माघ महीने (जनवरी महीना) की पंचमी तिथि को मानाया जाने वाला यह त्योहार भगवान सूर्य देव को समर्पित है।

Bath: Tradition of Charity- स्नान : दान की परंपरा

हिंदू मान्यताओं में मकरसंक्रान्ति के दिन स्नान-दान की परंपरा है। इसी क्रम में तीर्थराज प्रयाग में माघ मेला भी शामिल है। माघ के महीने में संगमतट पर लगने वाले इस मेले में देश-विदेश से लाखों की तदाद में श्रद्धालुओं का आगमन होता है। मकरसंक्रान्ति के दिन यहां स्नान करने वालों की संख्या दोगुना हो जाती है।

इसके अलावा देश में कई जगहों पर मेले का आयोजन के साथ यह त्योहार बेहद धूम-धाम से मनाया जाता है। इस दिन सूर्योदय के साथ स्नान करने के बाद दान करने की परंपरा है। साथ ही मकसंक्रान्ति के दिन खिचड़ी और तिल के लड्डू खाना बेहद शुभ माना गया है।

मकरसंक्रान्ति के दिन बनने वाली खिचड़ी चावल, काली दाल, नमक, हल्दी, मटर और सब्जियां खासतौर पर फूलगोभी डालकर बनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि खिचड़ी का ग्रहों से सीधा नाता होता है। इसमें इस्तेमाल किए जाने वाले सफेद चावलों को चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है, तो काली उड़द की दाल को शनि का। खिचड़ी में डलने वाली हरी सब्जियां बुध से संबंध रखती हैं। तो वहीं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार खिचड़ी की गर्मी मंगल और सूर्य से जोड़ती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन खिचड़ी के सेवन से राशि में ग्रहों की स्थिती मजबूत बनती है।

Importance of Makarsankranti- मकरसंक्रान्ति का महत्व

माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

निम्न श्लोक के रूप में शास्त्रों में अंकित ये पंक्तियां मकरसंक्रान्ति के महत्व को बखूबी दर्शाती हैं। इनका अर्थ है – “जो भी व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन शुद्ध घी और कंबल का दान करता है, वह अपनी मृत्यु पश्चात जीवन-मरण के इस बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति करता है”।

दरअसल शास्त्रों में दक्षिणायण को अशुभ मानते हुए देवों की रात्री की संज्ञा दी गई है, वहीं उत्तरायण को देवों के दिन की संज्ञा देते हुए सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है।

मकरसंक्रान्ति के दिन का महत्व धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से अलग-अलग है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मकरसंक्रान्ति के दिन किया गया दान सौ गुना बड़ा तथा इस दिन संगम और गंगासागर में स्नान को महास्नान माना गया है। अमूमन सूर्य का प्रभाव सभी राशियों पर एक समान पड़ता है लेकिन सूर्य के कर्क और मकर राशि में प्रवेश को ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मकरसंक्रान्ति अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर रहने का संदेश देती है। दरअसल भारत धरती के उत्तरी गोलार्ध में स्थित हैं लेकिन संर्दियों में सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में यानी भारत से थोड़ी दूरी पर होता है। जिसके कारण यहाँ दिन छोटा और रात बड़ी होती है। वहीं मकरसंक्रान्ति के आगाज के साथ सूर्य उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता है। यही कारण है कि मकरसंक्रान्ति को अंधेरे से उजाले की तरफ जाने का प्रतीक माना गया है।

यही नहीं भारतीय पंचांग पद्धति की ज्यादातर तिथियां को चन्द्रमा की गति के आधार पर निर्धारित किया जाती है, मगर मकरसंक्रान्ति ही एकमात्र ऐसी तिथि है, जिसे सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। जिसके कारण हिन्दू धर्म में इस पर्व का अधिक महत्व होता है।

Makarsankranti in Mythology- पौराणिक कथाओं में मकरसंक्रान्ति का जिक्र

हिन्दू धर्म में सदियों से मनाए जाने वाले इस त्योहार का जिक्र पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। इस दिन पौराणिक ग्रंथो में मकरसंक्रान्ति से संबंधित तीन धार्मिक मान्यताएं हैं-

पहली मान्यता यह है कि मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं और मकरसंक्रान्ति के दिन दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं यानी मकर राशि में जाते हैं।

दूसरी मान्यता के अनुसार मकरसंक्रान्ति का जिक्र प्राचीन महाकाव्य महाभारत में मिलता है। दरअसल महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद भीष्म पितामह ने मकरसंक्रान्ति के दिन ही इच्छा मृत्यु प्राप्त की थी।

मकरसंक्रान्ति से संबंधित तीसरी मान्यता के अनुसार भागीरथी की घोर तपस्या के बाद मकरसंक्रान्ति के ही दिन बैकुंठधाम से धरती पर उतरी थीं और भागीरथी के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में जाकर मिली थीं। इस स्थान को वर्तमान में गंगा सागर के नाम से जाना जाता है, जोकि एक मशहूर तीर्थ स्थल है। 

Numerous Names- त्योहार एक नाम अनेक

‘कोस-कोस पर पानी बदले सवा कोस पर वाणी….’ भारत जैसे विविधताओं से परिपूर्ण देश पर यह कहावत बिल्कुल सटीक है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक यहाँ तरह-तरह की जाति, नस्ल व समुदाए के लोग मिलेंगे, जिनकी अपनी मान्यताएँ एंव परंपराएं हैं। बावजूद इसके अनेकता में एकता (Unity in Diversity) इस देश की पहचान है और त्योहार भी देश की इस खूबी से अछूते नहीं हैं।

इसी कड़ी में मकरसंक्रान्ति भी शामिल है। माघ महीने की एक ही तारीख को पड़ने वाले इस त्योहार को पूरे देश में न सिर्फ अलग-अलग नामों से जाना जाता है बल्कि प्रत्येक समुदाय द्वारा अपनी परंपराओं के अनुसार मनाया भी जाता है।

Festival of Harvest यानी फसल काटने के त्योहार के नाम से मशहूर मकरसंक्रान्ति को जहाँ असम में भोगाली बिहू के नाम से जानते हैं, तो वहीं पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। इसके अलावा बंगाल में पौष संक्रान्ति, गुजरात और उत्तराखण्ड में उत्तरायण, दक्षिण भारत में थाई पोंगल तथा बिहार और उत्तर प्रदेश में खिचड़ी के रूप में मकरसंक्रान्ति का त्योहार मनाया जाता है।

Festival which signifies Unity in Diversity- अनेकता में एकता का पर्व

वैसे तो मकर संक्रान्ति का जश्न पूरे देश में मनाया जाता है। मगर यह देश के हर राज्य में एक जैसा नहीं मनाया जाता। हर राज्य और समुदाय के लोग इसे अपनी अलग-अलग परंपराओं के अनुसार मनाते हैं।

हरियाणा और पंजाब में मकरसंक्रान्ति को लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। लोहड़ी मकरसंक्रान्ति के एक दिन पहले 14 जनवरी की रात में मनाई जाती है। 14 जनवरी की रात अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिलचौली (तिल, गुड़, चावल और भुने हुआ मक्का) की आहुति दी जाती है। लोहड़ी के दिन लोग मूंगफली, तिल की गजक और रेवड़ियां एक-दूसरे को खिलाते हुए जश्न मनाते हैं। इसके साथ पंजाब के पारम्परिक खाने मक्के की रोटी और सरसों के साग का जमकर लुत्फ उठाया जाता है।

उत्तर प्रदेश और बिहार में मकरसंक्रान्ति को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। यूपी में संगम नगरी के नाम से मशहूर प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती नदी के संगम पर माघ मेला लगता है। यहीं पर कुछ सालों के अंतराल पर कुंभ मेला और महाकुंभ मेले का भी आयोजन किया जाता है। इन दोनों राज्यों के लोग स्नान-दान के बाद खिचड़ी और तिल के लड्डू का सेवन करते हैं। इसके अलावा मकसंक्रान्ति के दिन यहाँपंतग उड़ाने की कवायद भी काफी पुरानी है।

दक्षिण भारत में पोंगल के रूप में मकरसंक्रान्ति का पर्व खासा मशहूर है। पोंगल दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। दक्षिण भारत में यह त्योहार चार दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन भोगी-पोंगल के रूप में मनाया जाता है, जिसमें लोग अपने आस-पास का सारा कूड़ा-कचरा जलाते हैं। दूसरे दिन सूर्य-पोंगल होता है, जिसमें लक्ष्मी की पूजा की जाती है। तीसरे दिन मट्टू पोंगल में पशु धन की पूजा की जाती है और चौथे दिन केनू-पोंगल पर स्नान करने के बाद मिट्टी बर्तन में खीर बनाकर सूर्यदेव और नैवैद्य को चढ़ाया जाता है और फिर यही भोग प्रसादम के रूप में ग्रहण किया जाता है।

महाराष्ट्र में भी मकरसंक्रान्ति का पर्व काफी धूम-धाम से मनाया जाता है। इस दिन यहाँ तिल-गुड़ का हलवा बाँटा जाता है। इस पारंपरिक मिष्ठान कोलोग एक-दूसरे को खिलाते समय “तिळ गूळ घ्या आणि गोड़ गोड़ बोला” ( तिल गुड़ खाओ और मीठा-मीठा बोलो) कहकर मकसंक्रान्ति की बधाई देते हैं।

बंगाल में मकरसंक्रान्ति के दिन गंगासागर में स्नान की परंपरा है। यहां मकरसंक्रान्ति के दिन गंगा स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई है। इसका महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि गंगा सागर का द्वार साल में एक बार सिर्फ मंकरसंक्रान्ति के दिन ही खुलता है। इसके संदर्भ में कहा जाता है – सब तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार…यही वजह है कि मकरसंक्रान्ति के दिन हर साल देश-विदेश से ढ़ेरों श्रद्धालु गंगासागर में आस्था की डुबकियां लगाने आते हैं और स्नान के बाद तिल का दान करते हैं।

पूर्वी भारत में स्थित असम में मकरसंक्रान्ति को भोगाली बिहू के नाम से मनाया जाता है। अन्य राज्यों की अपेक्षा असम में भोगाली बिहू का त्योहार माघ माह के बजाए पौष माह के अंत में ही शुरू हो जाता है। इस दौरान यहां स्वादिष्ट पकवान बनते हैं। साथ ही इस पर्व को शुभ मानते हुए मकरसंक्रान्ति के दिन असम में कई शादियों का आयोजन भी होता है। असम में इस दिन स्थानीय खेल भी खेले जाते हैं, जिनमें टिकेली भोंगा (घड़ों में निशाना लगाना) और भैंसों की लड़ाई जैसे खेल काफी मशहूर है। असम में भोगाली बिहू की धूम 14 जनवरी की रात तक रहती है और अगले दिन स्नान-दान के साथ यह सिलसिला खत्म हो जाता है।

उत्तराखंड में मकरसंक्रान्ति का त्योहार घुगुती के नाम से जाना जाता है। देवों की भूमि के नाम से मशहूर उत्तराखंड में इस दिन गंगा किनारे कई मेलों और समारोह का आयोजन होता है। इस दौरान यहाँ स्नान-दान के बाद लोकगीत गाने का रिवाज है। जिनमें सबसे मशहूर लोकगीत “काले कव्वे काले, घुगुती माला खा ले” है।

सूर्य के प्रदेश उड़ीसा में मकरसंक्रान्ति का पर्व बेहद धूम-धाम से मनाया जाता है। यहां स्थित कोनार्क सूर्य मंदिर में इस पर्व का खासा महत्व है। इसके अलावा जगन्नाथ पुरी मंदिर में भी श्रद्धालुओं की काफी भीड़ लगती है। इस दौरान यहां जगह-जगह लोकगीत और लोकनृत्य का आयोजन होता है। उड़ीसा के जनजातीय लोगों के लिए महा विष्णु संक्रान्ति ( हिन्दू कैलेंडर में चैत्र महीने में पड़ने वाला नया साल) के बाद मकसंक्रान्ति दूसरा सबसे लोकप्रिय त्योहार है।

Makarsankranti is celebrated in many Countries- कई देशों में मनाई जाती है मकरसंक्रान्ति

मकसंक्रान्ति का त्योहार महज देश के भीतर ही नहीं बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में मनाया जाता है। भारत के पड़ोसी देश नेपाल में यह मकरसंक्रान्ति ‘माघी संक्रान्ति’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन नेपाल में सार्वजनिक छुट्टी होती है और लोग मान्यता अनुसार स्नान-दान की परंपरा का बखूबी निर्वाहन करते हैं।

नेपाल के अलावा यह त्योहार बांग्लादेश में पौष संक्रान्ति, थाईलैंड में सोंगकरन, म्यांमार में थियान, कम्बोडिया में मोहा संगक्रान और श्रीलंका में पोंगल के रूप में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

References

Written by Ramesh Chauhan

A Hindi content writer. Article writer, scriptwriter, lyrics or songwriter, Hindi poet and Hindi editor. Specially Indian Chand navgeet rhyming and non-rhyming poem in poetry. Articles on various topics especially on Ayurveda astrology and Indian culture. Educated best on Guru shishya tradition on Ayurveda astrology and Indian culture.

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