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Vat Savitri Vrat Pooja is a confluence of unwavering Faith and Trust- अटूट श्रद्धा और विश्वास का समागम है वट सावित्रि व्रत पूजा

हिंदुस्तान को अलौकिकता का देश कहा जाता है। जहाँ सदियों पहले दुनिया के कई क्षेत्रों में पनपी सभ्यताएँ अपना अस्तित्व खो चुकी हैं, वहीं  वैदिक काल से चली आ रही भारतीय संस्कृति आधुनिक काल में भी न सिर्फ अविरल बनी हुई हैं बल्कि धार्मिक मान्यताओं ने भी अपनी महत्ता बरकरार रखी है। देश में सभी धार्मिक त्योहार आज भी उतनी ही श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है, जितने उत्साह से आधुनिक पर्व का जश्न। पौराणिक मान्यताओं पर श्रद्धा और विश्वास के इसी समागम का एक उदाहरण है वट सावित्रि पूजा।

वट सावित्रि व्रत कथा का उल्लेख स्कन्द पुराण और भविष्योत्तर पुराण में मिलता है। हालांकि वट सावित्रि का व्रत रखने की तिथि को लेकर संशय बना हुआ है। स्कन्द पुराण और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ माह (अप्रैल-मई का महीना) में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन वट सावित्रि का व्रत रखा जाता है, वहीं कुछ जगहों पर ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की अमावस्या को यह व्रत रखने का विधान है।

वट सावित्रि व्रत की तिथियों में भिन्नता होने के बावजूद यह व्रत हिंदू सुहागन महिलाओं द्वारा पूरे भक्ति-भाव के साथ मनाया जाता है। वट सावित्रि व्रत विवाहित मिलाओं द्वारा पति और बच्चों की लम्बी उम्र के लिए रखा जाता है। हिंदू धर्म में इस व्रत का बहुत महत्व है।

Special importance of Vat Tree- वट वृक्ष का विशेष महत्व

वट सावित्रि का व्रत तीन दिनों तक चलता है। वैष्णव समुदाय के ज्यादातर श्रद्धालु यह व्रत ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को रखते हैं, वहीं कुछ श्रद्धालु यह व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस को रखते हैं।

वट सावित्री व्रत शब्द’वट’ और ‘सावित्री’ दो शब्दों को मिलाकर बना है। इस व्रत में वट वृक्ष (बरगद का पेड़) का विशेष महत्व होता है। वट वृक्ष के महत्व को दर्शाते हुए पाराशर मुनि ने इसके संदर्भ में कहा था- ‘वट मूले तोपवासा’।

पौराणिक ग्रंथो के अनुसार वट वृक्ष में त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास रहता है। मान्यता है कि वट सावित्रि व्रत के दिन बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होती है।

वट वृक्ष का एतिहासिक महत्व भी है। कुछ जानकारों का मानना है कि बरगद का पेड़काफी बड़ा होता है, जिसकी जड़े दूर-दूर तक फैली होती हैं औरज्येष्ठ की तपती धूप में वट वृक्ष की छाया में राहगीर आराम करते थे। ऐसे में मुमकिन है कि प्राचीन काल में जब लोग मीलों दूर का सफर पैदल ही तय करते थे, तो रास्ते में आराम के लिए ज्यादातर वट वृक्ष का ही चुनाव करते थे और तभी से वट वृक्ष की महत्ता को दर्शाने के लिए ज्येष्ठ के महीने में बरगद की पेड़ की पूजा की जाती थी। जिसके बाद वट सावित्रि व्रत कथा के मौके पर बरगद के पेड़ की पूजा एक धार्मिक परंपरा बन गयी और सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और आस्था के साथ मनायी जाती है।

वट वृक्ष का एतिहासिक महत्व होने के अलावा इसका दार्शनिक महत्व भी है।ऐसा माना जाता है कि बरगद का पेड़ जितना पुराना होता है, उतना ही विशाल होता जाता है। इसीलिए बरगद का पेड़ लम्बी उम्र और अमरत्व-बोध (कभी न मरने वाला) के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। साथ ही बौद्ध धर्म में वट वृक्ष को ज्ञान और निर्वाण का प्रतीक भी माना जाता है।मान्यता है कि बिहार के बोध गया में स्थित वट वृक्ष के नीचे ही भगवान बुद्ध को निर्वाण(ज्ञान) प्राप्त हुआ था। इसलिए न सिर्फ हिंदू धर्म में बल्कि बौद्ध धर्म में भी वट वृक्ष का काफी खास महत्व है।

Vat Savitri Tale- वट सावित्रि कथा

स्कन्द पुराण और भविष्योत्तर पुराण में वट सावित्रि व्रत की कथा और पूजन विधि का विस्तार में उल्लख मिलता है। यह व्रत कथा सावित्रि और सत्यवान पर आधारित है। भारतीय संस्कृति में सावित्री का किरदार एक ऐतिहासिक चरित्र माना जाता है। सावित्री के नाम का अर्थ गायत्री और सरस्वती होता है।

पौराणिक कथा के अनुसार सावित्री का जन्म भी काफी विचित्र परिस्थितियों में हुआ था। भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी। राजा अश्वपति ने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ रोज एक लाख आहुतियाँ देने का निर्णय किया। यह सिलसिला अठारह साल तक चलता रहा। राजा अश्वपति की भक्ति से खुश होकर देवी सावित्रि ने उन्हें एक तेजस्वी कन्या का वरदान दिया। कुछ ही महीने बाद राजा अश्वपति के घर में एक कन्या ने जन्म लिया। चूँकि यह कन्या देवीसावित्री का प्रसाद थी, इसीलिए राजा ने इसका नाम भी सावित्रि रखा दिया।

सावित्रि जितनी बुद्धिमान थी उतनी ही रूपवान भी। उसके रूप की चर्चा दूर-दूर तक थी। उसकी बढ़ती उम्र के साथ ही राजा अश्वपति ने सावित्रि के लिए योग्य वर की तलाश शुरू कर दी। लेकिन राजा को अपनी पुत्री के अनुसार कोई वर नहीं मिला। आखिरकार हार मान कर उन्होंने सावित्रि को स्वयं अपना वर तलाश करने के लिए भेजा।

पिता का आदेश मानकर सावित्रि वर की तलाश में तपोवन में भटकने लगी। उसी वन में साल्व देश (वर्तमान के राजस्थान में) के राजा द्युमत्सेन भी रहते थे। राजा द्युमत्सेन ने अपना राज्य हारने के बाद तपोवन में ही शरण ले लिया था। आखिरकार सावित्री की खोज पूरी हुई। सावित्रि ने राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया।

सावित्रि की तरह ही सत्यवान भी रूप वान होने के साथ-साथ वेदवक्ता भी थे। लेकिन सत्यवान के अल्पायु होने के कारण नारद मुनि ने सावित्री को सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी। सावित्रि ने नारद मुनि की बात को नकार दिया और सत्यवान के साथ सात फेरे ले लिए।

विवाह के बाद सत्यवान और सावित्रि एक-दूसरे के साथ काफी खुश थे। लेकिन पति की मृत्यु की समय नजदीक आता देखकर सावित्रि ने तपस्या करने का निर्णय लिया। सत्यावान की मृत्यु में कुछ ही दिन शेष थे कि सावित्रि ने घोर तपस्या आरंभ कर दी, जिसके फलस्वरूप सावित्रि की तपस्या सफल हो गई।

कथा के अनुसार सत्यवान का जीवन काल पूरा होने के बाद जब यमराज सत्यावान को अपने साथ ले जाने के लिए प्रकट हुए, तो सावित्रि भी यमराज के पीछे-पीछे चल दीं। यमराज ने उन्हें काफी समझाया लेकिन वो नहीं मानी और अपने पति के प्राण वापस पाने की जिद लिए सावित्रि तीन दिन तक यमराज के पीछे काफी दूर तक चलती रही। आखिरकार सावित्रि के पतिव्रता धर्म से खुश होकर यमराज ने सत्यवान को जीवन दान दे दिया और उसके प्राण सावित्रि को सौंप दिए। सत्यवान के प्राण लेकर लौटी सावित्रि ने देखा कि सत्यवान का शरीर एक वट वृक्ष के नीचे पड़ा है। तभी सावित्रि ने सत्यवान के शरीर में प्राण डालने के बाद वट वृक्ष की विधिवत पूजा की। पूजा समाप्त होने के बाद सावित्रि द्वारा वट वृक्ष की परिक्रमा आरंभ करते ही सत्यवान उठ खड़ा हुआ और सावित्रि की वट वृक्ष पूजा सफल हुई।

इस तरह सावित्रि ने अपनी तपस्या और व्रत के आधार पर सदा सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद हासिल लिया। मान्यता है कि तब से वट सावित्रि व्रत सभी महिलाओं के लिए सौभाग्यवती होने के वरदान के साथ नारीत्व का प्रतीक बन गया है। यह पर्व देश में ज्यादातर क्षेत्रों में पूरी निष्ठा और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।

Vat Savitri Poojan- वट सावित्रि व्रत पूजन

पुराणों और प्राचीन अध्यात्मिक सहित्य में सावित्रि व्रत को बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है। माना जाता है कि इस दिन वट सावित्रि का व्रत रखने वाली महिलाओं की  सौभाग्य सहित सभी मुरादें पूरी होती हैं। इसीलिए वट सावित्रि व्रत पूजा को महिलाओं का दिन कहा जाता है।

अमूमन वट सावित्रि की पूजा पूरे देश में विधि-विधान के साथ होती है, लेकिन खासकर उत्तर भारत में इस पूजा को काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन के उपलक्ष्य में महिलाएँ पूजा स्थलों और वट वृक्ष के नीचे रंगोली बनाती हैं। जिसके बाद उसी रंगोली के पास पूजा की सारी सामाग्री एकत्रित कर ली जाती है।

वट सावित्रि व्रत पूजा के दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और शिव-पार्वती की अराधना की जाती है। महिलाएँ पूजा स्थल पर लाल रंग के कपड़े से एक चौकी सजाती हैं, जिसपर लक्ष्मी-नारायण और शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करती हैं। साथ ही पूजा स्थल पर तुलसी का पौधा भी रखा जाता है। इस दिन तुलसी की पूजा को बहुतशुभ माना गया है।

पूजा आरंभ करने के साथ ही सबसे पहले प्रथम पूज्य गणेश और माता पार्वती की उपासना की जाती है, जिसके बाद वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की विधि-विधान के साथ पूजा होती है। वट सावित्रि की पूजा पारंपरिक हिंदू धार्मिक रिवाजके साथ होती है, जिसमें वट वृक्ष और स्थापित देवी-देवताओं को फूल, धूप, दीप, रोली औरकच्चा सूत चढ़ाया जाता है। साथ ही व्रत करने वाली महिलाएँ अपनी सास को भिगोया चना, नए वस्त्र और दक्षिणा दे कर उनसे सदा सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।

विधिवत पूजन के बाद वट सावित्रि व्रत कथा यानी सावित्री और सत्यवान की कथा पढ़ने का रिवाज है। यह कथा व्रती महिलाओं द्वारा पढ़ी जाती है, जिसे परिवार सहित आस-पास के लोग बैठकर सुनते हैं। पूजा सम्पन्न होने के साथ ही महिलाएँ कच्चे सूत से वट वृक्ष को लपेटते हुए बरगद के पेड़ के चीरों तरफ पाँच या सात बार परिक्रमा करती हैं।

पूजा खत्म होने के साथ हीकिसी गरीब महिला को सुहाग की सामाग्री, जिसमें नए वस्त्र, सुहाग को जोड़ा जैसे चूड़ी, बिंदी, सिंदूर आदि शामिल होते हैं, दान करती हैं। मान्यता है कि इस दिन गरीब स्त्री को सुहाग की सामाग्री दान करते हुए उनसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त करने के साथ ही वट सावित्रि व्रत कथा सफल होती है।

Reference

Written by Ramesh Chauhan

A Hindi content writer. Article writer, scriptwriter, lyrics or songwriter, Hindi poet and Hindi editor. Specially Indian Chand navgeet rhyming and non-rhyming poem in poetry. Articles on various topics especially on Ayurveda astrology and Indian culture. Educated best on Guru shishya tradition on Ayurveda astrology and Indian culture.

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