मेरा प्रिय नेता सुभाषचन्द्र बोस पर निबन्ध | Subhash Chandra Bose Essay in Hindi | Essay in Hindi | Hindi Nibandh | हिंदी निबंध | निबंध लेखन

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मेरे प्रिय नेता सुभाषचन्द्र बोस पर निबन्ध | Subhash Chandra Bose Essay in Hindi | Netaji Subhas Chandra Bose par nibandh

तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा….यह शब्द थे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाले नेती सुभाषचन्द्र बोस के। netaji bose biography in hindi

उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में हुआ था, जोकि उस समय बंगाल राज्य का हिस्सा था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती बोस था। नेताजी अपने नौ भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। वहीं उनके पिता पेशे से वकील थे, जो ब्रिटिश सरकार के प्रति बेहद वफादार भी थे। netaji bose family

1934 में जर्मनी की राजधानी बर्लिन में बोस की मुलाकात एमली से हुई। जिसके बाद बोस ने एमली से विवाह कर लिया। नवम्बर 1942 को एमली बोस ने एक बेटी को जन्म दिया। netaji bose wife

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नेताजी की शिक्षा netaji bose education | essay on Subhash Chandra Bose in Hindi

नेताजी को बचपन से ही पढ़ने-लिखने का बेहद शौक था। लिहाज उनके पिता ने नेताजी का दाखिला कटक के एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल में करा दिया, ताकि नेताजी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने लगे।

हालांकि एक बंगाली परिवार में जन्में बोस ने बचपन से ही दुर्गा पूजा का लुत्फ उठाया था और अपनी मां से महाभारत और रामायण की कहानियां सुनी थी, ऐसे में स्कूल में अंग्रेजी भाषा और बाइबल के पाठ बोस के बस की बात नहीं थी।

कुछ समय तक यहां पढ़ने के बाद 1909 में उन्होंने अपने बाकि भाईयों के स्कूल में दाखिला ले लिया, जहां बंगाली और संस्कृत विषय भी पढ़ाया जाता था। इस दौरान बोस ने वेदों और उपनिषदों सहित कई हिन्दू ग्रंथों का अध्ययन किया। वहीं बाद में स्वामी विवेकानन्द का जीवनपरिचय जानने के बाद बोस उनसे खासा प्रभावित भी हुए।

कुछ ही समय में बोस शानदार अंग्रेजी भी सीख गए और 1918 में उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी से स्नातक की डिग्री हासिल की।

Subhas Chandra Bose Essay in Hindi
Subhas Chandra Bose Essay in Hindi

सिविल सेवक बने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस | netaji bose indian civil servant

बचपन से ही पढ़ाई में काफी तेज होने के कारण बोस के पिता जी ने उन्हें सिविल सेवा की परीक्षा देने का सुझाव दिया। उस दौरान भारतीय सिविल सेवा लंदन में हुआ करती थी। हालांकि बोस की इस परीक्षा में बिल्कुल रुचि नहीं थी, लेकिन पिताजी की आज्ञा पर उन्होंने लंदन जाने का फैसला किया।

पूरे एक साल तक लंदन में रहकर पढ़ाई करने के बाद बोस ने 1920 में सिविल सेवा की परीक्षा दी और उन्होंने उस दौर की सबसे कठिन परीक्षा को पहले ही प्रयास में न सिर्फ उत्तीर्ण किया बल्कि चौथी रैंक भी हासिल की।

बोस की इस उपलब्धि की चर्चा देश-विदेश में होने लगी। हालांकि भारत लौटने के बाद भी बोस के मन में परीक्षा उत्तीर्ण करने का कोई उत्साह नजर नहीं आ रहा था। ब्रिटिश हुकूमत के अधीन काम करना बोस के स्वाभीमान को मंजूर नहीं था।

लिहाजा अखबारों के पन्नों पर अभी बोस का बरकरार ही था, कि वो एक बार फिर से सूर्खियों में आ गए। दरअसल बोस ने बतौर सिविल सेवक अपना पद ग्रहण करने से पहले ही 1921 में भारत के तात्कालीन राज्य सचिव लॉर्ड मॉन्टेग्यू को अपना इस्तीफा भेज दिया।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की गांधी जी से पहली मुलाकात | netaji bose and gandhi ji

लंदन से वापस आने के बाद बोस की देश की राजनीति में दिलचस्पी बढ़ने लगी। यह वही दौर था, जब गांधी जी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था और समूचे देश ने एकजुट होकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था।

नेताजी भी गांधी के व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित थे। तभी बोस की मुलाकात मशहूर वकील सी.आर.दास से हुई। बोस ने दास से गांधी जी से मिलने की इच्छा जतायी।आखिरकार 16 जुलाई 1921 की सुबह 24 साल के बोस की मुलाकात पहली बार 51 साल के गांधी जी से हुई।

बोस ने जैसे ही गांधी जी को अपना परिचय देना चाहा, गांधी जी ने बोस का नाम लेकर उन्हें अपने बगल में बैठने का इशारा किया। यह देखकर बोस आश्चर्य में पड़ गए। तभी गांधी जी ने उनसे कहा कि, “देश के लिए सिविल सेवक जैसे पद को छोड़ना हर किसी के बस की बात नहीं है। आप वाकई बहुत बहादुर हैं।“

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का राजनीतिक करियर | netaji bose political life story

गांधी जी से मुलाकात के बाद बोस ने पूरी तरह से राजनीति में एंट्री करने का मन बना लिया था। इसी कड़ी में बोस स्वराज अखबार की शुरुआत की। 1923 में बोस ऑल इंडिया यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए ।

1924 में बाद बोस को कलकत्ता का मेयर चुना गया। इस दौरान कुछ राष्ट्रवादी गतिविधियों ते तहत 1925 में बोस को हिरासत में लेकर मांडला जेल भेज दिया गया।

1927 में जेल से रिहा होने के बाद बोस ने दिसम्बर 1928 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में शिरकत की। हालांकि कुछ ही समय बाद सविनय अविज्ञा आंदोलन (नमक सत्याग्रह) में हिस्सा लेने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

नेताजी ने किया गांधी का विरोध | netaji bose against gandhi ji

अंग्रेजों से आजादी की गुहार लगाने के सिलसिले में नेताजी के सब्र ने जवाब देना शुरु कर दिया था। गांधीवाद की विचारधारा रखने वाले नेताजी अब आजादी छीनने में यकीन करने लगे थे।

ऐसे में जाहिर है, बोस सत्य और अंहिसा की राह पर चलने वाले गांधी जी से कई मुद्दों पर सहमत नहीं होते थे। इसका एक उदाहरण 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में देखने को मिला, जब दूसरी बार बोस अध्यक्ष पद के लिए आगे आए थे।

गांधी जी ने बोस को अध्यक्ष बनाने का विरोध करते हुए पट्टाभीसीतारम्य्या का नाम सामने रख दिया। गांधी जी के इस बर्ताव से बोस बेहद दुखी हुए और उन्होंने अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने के बावजूद अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

22 जून 1939 को बोस ने ऑल इंडिया फॉवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। इसी दौरान दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हो गयी। ब्रिटिश सरकार की कमजोरी का फायदा उठाते हुए बोस ने उन्हें देश से खदेड़ने का मन बनाया।

इसी कड़ी में बोस हिटलर की नाजी विचारधारा से प्रभावित होकर जर्मनी के लिए रवाना हो गए। यहां उन्होंने आजाद हिन्द रेडियो की स्थापना की। 1943 में बोस जापाना चले गए। बोस ने रास बिहारी बोस की मदद से अंग्रेजों के खिलाफ आजाद हिन्द फौज का गठन किया।

आजाद हिन्द फौज में महिलाओं ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। महिलाओं को लक्ष्मी स्वामीनाथन के नेतृत्व में रानी झांसी रेजिमेन्ट का हिस्सा बनाया गया।

4 जुलाई 1944 को बोस ने बर्मा में तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा का मशहूर नारा देकर फौज को आक्रमण के लिए रवाना किया था।

हालांकि बोस नाकामयाब रहे और अंग्रेजों ने आजाद हिन्द फौज के वीरों को हरा कर बंदी बना लिया।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर निबंध | Netaji Subhas Chandra Bose par nibandh

Subhas Chandra Bose Essay in Hindi

नेताजी की रहस्यमयी मृत्यु | netaji bose death secrete

आजाद हिन्द फौज के नाकामयाब होने के बाद बोस फिर से जापाना चले गए और एक बार फिर देश को गुलामी की बेड़ियों से आजाद करने का खाका तैयार करने लगे।

वहीं 18 अगस्त 1945 की सुबह आई एक खबर ने समूचे देश को झकझोर कर रख दिया। हर अखबार के पहले पन्ने बस एक ही शब्द बयां कर रहे थे कि- नेताजी नही रहे…

औपचारिक सूचनाओं के अनुसार ताइवान में एक प्लेन क्रैश में नेताजी की मृत्य हो गयी। लेकिन उनका शव न मिलने के कारण उनकी मृत्यु आज भी सभी के लिए राज बनी हुई है।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की यादें | netaji bose legacy

नेताजी भले ही हमारे बीच में नहीं रहे, लेकिन देश की आजादी में उनका योगदान हमेशा के लिए भारतीय इतिहास के सुनहरे पन्नों पर दर्ज हो गया है।

आजादी के बाद भारत सरकार कई बार नेताजी के नाम से स्टॉम्प पेपर जारी कर चुकी है। वहीं कलकत्ता हवाई अड्डे का नाम बदलकर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कर दिया गया। netaji shubhash chandra bose international airport

भारत सरकार ने अंडमान निकोबार के रोजी द्वीप पर आजाद हिन्द फौज का मुख्यालय स्थित होने के कारण इस द्वीप का नाम भी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस रख दिया है। netaji shubhash chandra bose island

इसी के साथ 2007 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे से भारत आगमन के दौरान कलकत्ता में स्थित नेताजी सुभाषचन्द्र बोस मेमोरियल का दौर कर बोस की शख्सियत को अद्भुत करार दिया था।

reference-
Subhas Chandra Bose Essay in Hindi

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