बच्चों के लिए रामायण की 17 अनूठी कहानियां | रामायण की सुप्रसिद्ध लघु कथाएं | Short Stories of Ramayana for Kids in Hindi | संपूर्ण रामायण की कहानी

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बच्चों के लिए रामायण की चुनिंदा लघु कथाएं, रामायण काल से जुडी प्रसिद्ध लोक लघुकथाएं, छोटे बच्चों की मजेदार कहानियां, संपूर्ण रामायण की कहानी, short story of ramayan in hindi, short stories from ramayana in hindi, ramayana short story in hindi pdf, Short Stories of Ramayana


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वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण हमारे देश का सबसे प्राचीन महाकाव्य है । रामायण का वास्तविक ग्रंथ संस्कृत में लिखा हुआ है रामायण – बुराई पर अच्छाई की जीत की कहानी है जिसमें श्रीराम ने अपनी पत्नी सीता की रक्षा के लिए अहंकारी राक्षसराज रावण को मारा था। पुरुषोत्तम श्री राम का चरित्र गुणों से भरा हुआ है। त्रेता युग के न्यायप्रिय राजा श्रीराम की कहानियां बालकों के मन में नीति और धर्म के लिए जगह बनाने में मदद कर सकती हैं। यदि आप अपने बच्चे को पौराणिक महाकाव्य से परिचित करवाना चाहते हैं तो यहाँ बच्चों के लिए कुछ लघु कथाएं दी हुई हैं जिन्हें रामायण से लिया गया है।

Short Stories of Ramayana
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1. रामायण की सुप्रसिद्ध लघुकथाएं | श्राप – राजा दशरथ की कहानी

सूर्यवंश के बहुत वीर, योग्य और सफल उत्तराधिकारी थे राजा दशरथ। वह राज्य की राजधानी अयोध्या में रहते थे और उन्होंने अपने राज्य और प्रजा को कौशल बनाए रखते थे। उनकी तीन रानियां थी कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। महाराज दशरथ के पास मान–सम्मान, गौरव, प्रतिष्ठा सब कुछ था किसी भी चीज की कमी नहीं थी। उन्हें बस एक ही दुख था; उनकी कोई संतान नहीं थी।

एक दिन राजा दशरथ अपने सिपाहियों के साथ शिकार करने वन में गए। राजा दशरथ और उनके सिपाही वन में इधर-उधर घूम रहे थे, तभी उन्हें पानी मैं गढ़गढ़ाने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने समझा कि कोई जानवर नदी में पानी पी रहा है। उन्होंने आवाज की दिशा में तीर चला दिया। जब महाराज दशरथ वहां पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वहां एक युवक उनके तीर से बुरी तरह घायल पड़ा हुआ है।

जब महाराज दशरथ उस युवक के पास पहुंचे और उनसे बात की तो जाने की वह युवक श्रवण कुमार था, जो अपने अंधे माता–पिता की एकलौती संतान था। वह अपने प्यासी माता-पिता के लिए पानी लेने आया था। श्रवण कुमार अपने बूढ़े माता पिता को कुंवर में रखकर तीर्थ यात्रा कराने निकला था। जब उसके प्राण निकलने लगे तब भी उसे अपने आशा हे माता पिता की चिंता सता रही थी।

उसने दशरथ को पानी से भरा बर्तन देते हुए उसके माता-पिता को दे आने का अनुरोध किया। श्रवण कुमार के भोले भाले माता पिता ने दशरथ के हाथ से बर्तन लेकर पानी तो पी लिया, लेकिन दशरथ सच्चाई को छिपा नहीं पाया।

महाराज दशरथ ने श्रवण के बूढ़े माता-पिता को बताया दीया की अनजाने में उसने बाण से श्रवण की मृत्यु हो गई है। अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार से वह दोनों अचंभित हो गए। उन्होंने दशरथ को पुत्र अशोक का श्राप दे दिया, जिसका अर्थ था कि वह भी पुत्र के योग में ही अपने प्राण त्यागेगा।

वर्षों बाद, इसी श्राप के कारण राम को वनवास मिला और उसके वियोग में दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए।

2. Short Stories of Ramayana in Hindi | राम का जन्म

राजा दशरथ बहुत दुखी रहते थे क्योंकि उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। एक दिन वशिष्ठ ऋषि ने राजा को अश्वमेध यज्ञ करने की सलाह दी। इस बीच, रावण ने ब्राह्मण से अमर होने का वरदान पा लिया था। और वह स्वर्ग लोक और पृथ्वी पर उत्पात मचाने लगा था। देवताओं ने विष्णु भगवान से सहायता मांगी। जब अश्वमेध यज्ञ हो रहा था, तभी तेजस्वी आकृति प्रकट हुई और उसने दशरथ को देवताओं की ओर से खीर से भरा एक बर्तन दिया।

दशरथ ने वहां की अपनी तीनों पत्नियों –कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को दे दी। कुछ ही महीनों में रानियों ने सुंदर बच्चों को जन्म दिया। कौशल्या ने राम को जन्म दिया जो भगवान विष्णु के अवतार थे। कैकेयी ने भरत को और सुमित्रा ने लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न को जन्म दिया था। बड़े होने के बाद यह चारों बहुत वीर और पराक्रमी बने।

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3. रामायण की कहानियां | राम और लक्ष्मण

वशिष्ठ ऋषि ने राजा दशरथ के चारो पुत्रों को शिक्षा दी थी। चारों राजकुमार होनहार और आज्ञाकारी थे। राम उनमें से सबसे बड़े, श्रेष्ठ और सबसे अधिक सम्माननीय थे। एक दिन विश्वामित्र ऋषि राजा दशरथ के पास आए और उनसे कहने लगे की मारीच और सुबहूं नामक दो असुर दंडकारणय मैं ऋषि-मुनियों को परेशान करते रहते हैं। ऋषि ने दशरथ से राम और लक्ष्मण को असुरों से लड़ने के लिए बेचने का अनुरोध किया ताकि ऋषि मुनि शांतिपूर्वक यज्ञ कर सके। राजा दशरथ ने उनका अनुरोध मानते हुए राम और लक्ष्मण को ऋषि के साथ भेज दिया।

दोनों भाई ऋषि के आश्रम के बाहर खड़े चौकीदारी करते रहते और अंदर यज्ञ तथा पूजा-पाठ आदि कार्य शांतिपूर्वक चलते रहता था। इसी तरह छे दिन बीत गए और छठे दिन एक जोरदार गर्जना सुनाई दी। सब ने देखा कि असुरों की विशाल सेना उनकी ओर चली आ रही है। राम ने मारीच को लक्ष्य बनाकर बाण छोड़ा और उसे समुद्र में धकेल दिया। अगला बाण सुबाहु पर लगाया और वह वही मर गया। दोनों भाइयों ने आसानी से असुर की सेना को पराजित कर दिया और यज्ञ में विफल नहीं आने दिया।

4. Ramayana Ki Kahaniya | भगवान हनुमान की कहानी

पूजिकस्थला गुरु बृहस्पति की एक सुंदर सेविका थी। एक बार बृहस्पति का अपमान हो गया। उन्होंने पूजिकस्थला को बंदरिया बन जाने का श्राप दे डाला। बृहस्पति ने कहा कि अगर वह शिव के अवतार को जन्म देगी तो शराब से मुक्त हो सकती है।

पूजिकस्थला ने गौतम ऋषि की पुत्री अंजना के रूप में जन्म लिया। अंजना शिवजी की भक्त थी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने उसे वरदान दिया कि वह उसके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे और उसे श्राप से मुक्त कराएंगे।

राजा दशरथ के पुत्र प्राप्ति लेकिन के समय जब अग्निदेव खीर का प्याला लेकर प्रकट हुए थे, तभी एक बाज ने झपट कर उस बर्तन में चश्मा कर कुछ भी खा ली थी। उसकी चौथ से खीर का कुछ हिस्सा वही गिरा, जहां अंजना शिव जी की आराधना कर रही थी। पवन देव ने तेज हवा चला दी जिससे खीर सीधा रंजना के पहले हाथों में गिरी।

अंजना ने वह खीर खा ली। जल्दी शिव जी ने बंदर के रूप में अवतार लिया। वह हनुमान कहलाने लगे। पवन देव उनके धर्मपिता हुए। हनुमान का जन्म हवा के कारण ही हो सका था, इसलिए वे पवनपुत्र भी कहलाने लगे।

हनुमान के जन्म के साथ ही अंजना श्राप मुक्त हो गई। उसके स्वर्ग लौटने से पहले हनुमान ने उससे अपने आगे के जीवन के बारे में पूछा। अंजना ने प्यार से उन्हें आश्वासन दिया कि वह हमेशा अमर रहेंगे।

उनका जन्म श्री राम के कार्य के लिए हुआ था। इसलिए वे श्री राम के भक्त थे और जब श्री राम सीता मां की खोज कर रहे थे तभी वह हनुमान से मिले और हनुमान तब से प्रभु श्री राम के साथ रहते हैं और उनके कार्य में सहभागी बनते हैं, हनुमान का जन्म दिवस हनुमान जयंती के रूप में मनाया जाता है।

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5. बच्चों के लिए रामायण की चुनिंदा लघु कथाएं | सीता का स्वयंवर

मिथिला नरेश जनक ने अपनी सुंदर पुत्री सीता के विवाह के लिए भव्य स्वयंवर का आयोजन किया था। स्वयंवर में दूर-दूर से राजा राजकुमार पधारे। इन्हीं में से सर्वश्रेष्ठ का चयन होना था। जनक ने एक मजबूत धनुष दिखाते हुए घोषणा की कि जो कोई इस मजबूत शिव धनुष पर प्रत्यंचा छोड़ने में सफल होगा, उसी के साथ सीता का विवाह किया जाएगा।

कई राजकुमारों ने प्रयत्न किया लेकिन सब असफल रहे। कोई उस धनुष को हिला तक नहीं पाया। रावण ने भी प्रयास किया था लेकिन वह भी असमर्थ रहा। राम और लक्ष्मण भी वहीं उपस्थित थे। सबकी निगाहें अब राम पर ही गई। राम की बारी आई तो उन्होंने बड़ी आसानी से शिव धनुष उठाया और उसे तोड़ डाला।

सीता ने राम के गले में जयमाला डाल दी। दोनों का विवाह धूमधाम से हो गया।

6. रामायण काल से जुडी प्रसिद्ध लोक लघु कथाएं | राम ने अयोध्या छोड़ी

पेड़ों की छाल के वस्त्र पहनकर राम,  लक्ष्मण और सीता ने अयोध्या छोड़ दी। अयोध्या के प्रजा जन उन के रथ के पीछे दौड़ पड़े। राजा दशरथ जी उनके पीछे भागे लेकिन कुछ ही देर में वे अचेत होकर गिर पड़े। तमस नदी के तट पर पहुंचे तो उन्होंने रात्रि विश्राम करने का निश्चय किया। प्रजा जन भी थक गए थे, इसलिए जल्दी ही सब सो गए। राम ने अपने सारथी सुमंत्र से आग्रह किया कि प्रजा जनों के जागने से पहले ही वह उन्हें जंगल में छोड़ आए। उन्होंने अपनी यात्रा फिर से शुरू कर दी और गंगा तट पर पहुंच गए। वहां उनका सामना निषादराज गुह उसे हुआ। गुह ने राम से उसका अतिथि बनने का अनुरोध किया।

राम ने विनम्रता से जवाब दिया कि मैं अब सन्यासी का जीवन जीने जा रहे हैं इसलिए वे किसी भी तरह की सुख सुविधा स्वीकार नहीं कर सकते। राम ने सुमंत्र से अयोध्या लौट जाने को कहा। सुमंत ने उन्हीं के साथ चलने का अनुरोध किया लेकिन राम ने उसे वापस जाने और दुखी राजा की सेवा करने को कहा। निषादराज गुह ने राम, लक्ष्मण और सीता को गंगा पार करा दी। सुमंत्र जब अयोध्या लौटे तो उसने पाया कि राम के वियोग में दशरथ अपने प्राण त्याग चुके हैं।

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7. Short Stories of Ramayana for the childrens in Hindi | राम का वनवास

राम ने अपने वनवास के समाचार को प्रसन्न मन से स्वीकार कर लिया था। वे अपनी माता कौशल्या से मिलने पहुंचे।

अपने बेटे को देखकर कौशल्या जोर जोर से रो पड़ी, ” तुम जंगल में 14 साल कैसे बिता पाओगे?”

राम मुस्कुराए और अपनी मां को समझाने लगे कि 14 वर्ष तो शुद्धता से व्यतीत हो जाएंगे। राम ने जाने की तैयारी शुरू कर दी तो सीता भी उनके साथ आ गई। सीता ने उसे अपने साथ ले चलने का अनुरोध किया लेकिन राम ने इंकार कर दिया। सीता कहने लगी, ” मेरे लिए आपके बिना 14 वर्ष बताना कठिन होगा। मेरा कर्तव्य आपके साथ रहना है।”

सीता की तरह, लक्ष्मण ने भी राम के साथ बनने जाने का निश्चय किया। “मैं अपने प्रिय भाई को कष्ट के क्षणों में कैसे छोड़ सकता हूं?” लक्ष्मण ने तर्क दिया। सीता और लक्ष्मण का संकल्प देखकर राम को उनकी बात माननी पड़ी।

8. short stories from ramayana in hindi | आदर्श भाई भरत

भरत अपने साथ हाथी घोड़े की पूरी सेना और पुरोहितों को लेकर राम को ढूंढने दंडक वन की ओर चल दिए। जब उन्होंने राम को देखा तो वे दौड़ कर उनके पास पहुंचे और अपनी माता के व्यवहार के लिए क्षमा मांगने लगे।

भारत ने राम को दशरथ की मृत्यु की भी सूचना दी। यह सूचना पाकर राम, लक्ष्मण और सीता बहुत दुखी हुए।

भरत ने अनुरोध किया, “मैं अयोध्या की प्रजा की ओर से आया हूं। आपके लिए अयोध्या का सिंहासन खाली पड़ा है। कृपया चलकर उस पर विराजमान होए।” राम ने उत्तर दिया, ” मैं अपने माता पिता की ही इच्छा पूरी कर रहा हूं।” भरत समझ गए कि राम अयोध्या नहीं लौटेंगे। उन्होंने कहा कि जब तक राम अयोध्या नहीं आते तब तक वे उनकी चरण पादुका आएं सिहासन पर रखकर उनकी ओर से राज्य चलाएंगे। राम ने अपनी चरण पादुका भरत को दे दी। भरत वापस अयोध्या लौट आए और राम की चरण पादुका सिंहासन पर रख दी।

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9. short story of ramayan in hindi | भरत की अयोध्या वापसी

अयोध्या लौटते समय भरत और शत्रुघ्न नगर के द्वार पर रुक गए। वहां ना तो किसी प्रकार का संगीत था और ना ही कोई स्वागत करने के लिए खड़ा था। पूरा नगर निर्जीव लग रहा था। किसी दुर्भाग्य की आशंका से ग्रस्त दोनों महल की ओर दौड़े। भरत राजा दशरथ के कक्ष में घुसे लेकिन वह कक्ष तो खाली था। चिंतित होकर कैकई के कक्ष में पहुंचे। अपनी माता को देख कर वे बहुत प्रसन्न हुए और अपने पिता तथा भाई राम के बारे में पूछने लगे। कैकई ने उसके प्रश्न डालने का प्रयास किया लेकिन उनकी बेचैनी देखकर उसे बताना पड़ा कि दशरथ की मृत्यु हो चुकी है और राम वनवास में है।

अब भारत को राजाaबनना था। जब भरत को पूरी कहानी मालूम चली तो बे बहुत गुस्सा हुए। उन्होंने माता के कई से कह दिया कि राजा बनने का अधिकार राम का ही है। भरत माता कौशल्या के पैरों पर गिर पड़े और माता के कई के कृत्य के लिए क्षमा मांगने लगे। इसके बाद भरत ने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया और राम को वापस लाने की तैयारी में जुट गए।

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10. संपूर्ण रामायण की कहानी | शूर्पणखा की कहानी

राम लक्ष्मण और सीता को वन में रहते कई साल हो गए थे। ऋषि-मुनियों से वेट करते-करते और असुरों से लड़ते हुए दिन बीत रहे थे। अंततः वे पंचवटी पहुंचे। उन्होंने वहां एक कुटिया बनाई और रहने लगे।

 1 दिन रावण की बहन शूर्पणखा वहां पर आई। उसकी निगाह कुटिया के बाहर खड़े सुंदर राम पर पड़ी। राम से उसे तुरंत प्रेम हो गया। शूर्पणखा बहुत कुरूप थी। राम को आकर्षित करने के लिए उसने अपने आपको एक सुंदरी के रूप में बदल लिया। उसने राम के विवाह की इच्छा जताई। राम ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वह तो पहले से विवाहित है। 

तभी शूर्पणखा की निगाह लक्ष्मण पर पड़ी। लक्ष्मण को देखकर उसकी भावनाएं फिर से जागृत हो गई। उसने लक्ष्मण के सामने भी विवाह का प्रस्ताव रखा। लक्ष्मण ने भी अस्वीकार कर दिया। शूर्पणखा यह अपमान नहीं सह सके। उसने सीता पर आक्रमण कर दिया। लक्ष्मण को क्रोध आ गया। उसने तलवार से शूर्पणखा के नाक काट दिए।

11. संपूर्ण रामायण कथा | अंकपन पहुंचा रावण के पास

राम ने जब खर को मारा तो अंकपन किसी तरह से बचकर भागा और रावण के पास जा पहुंचा। उसने जब रावण को पूरी बात बताई तो रावण क्रोध से भर गया। उसने पूछा कि वह कौन है जिसने उसके भाई को मार डाला और बहन शूर्पणखा के नाक काट दिए।

 भयभीत अंक पन्ने उसे राम और उनकी शक्ति के बारे में बताया। रावण राम को तुरंत मार डालना चाहता था, अंकपन ने उसे समझाया। उसने कहा कि राम बहुत शक्तिशाली है इसीलिए उसे सोच समझकर किसी योजना के तहत मारना चाहिए।

उस ने रावण को राम की सुंदर पत्नी सीता के बारे में बताया। उसने यह भी कहा कि राम और सीता एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं और अगर सीता को कोई नुकसान पहुंचाया जाए तो उसे बचाने राम अवश्य आएगा। रावण को अंकपन की योजना बहुत पसंद आई। उसने सीता का अपहरण करने का निश्चय किया।

12. Ramayana Ki Kahaniya | राम ने खर को मारा

घायल शूर्पणखा अपने भाइयों खर और दूषण के पास पहुंची उसने दोनों को पूरी घटना बताई और उनसे बदला लेने को कहा। खर और दूषण असुर राजा थे। शूर्पणखा की दशा देखकर उन्हें बहुत गुस्सा आया। 

राम को भी संकट की आशंका हुई तो उन्होंने लक्ष्मण से सीता को किसी सुरक्षित जगह ले जाने को कहा। राम स्वयं धनुष और बाण लेकर तैयार हो गए। खर और दूषण हाथियों रथ और सैनिकों की बड़ी भारी सेना लेकर आ पहुंचे। 

युद्ध शुरू हो गया। शत्रु सेना ने चारों ओर से आक्रमण कर दिया। राम ने अपने बड़ों से उनका सामना किया और सारी सेना का नाश कर दिया। सबसे अंत में एक तीर से उन्होंने खर, दूषण और उनके मित्र तृसर को मार डाला। इस बीच एक और असुर था अंकपन, जो किसी तरह से बच गया। वेरावल को सूचना देने लंका की ओर चल दिया।

13. रामायण काल से जुडी प्रसिद्ध लोक लघुकथाएं | रावण की कहानी

असुरराज रावण लंका पर राज करते थे। उसके दस सिर और बीस हाथ थे। वह शिव जी के महान भक्त थे। शिव जी ने उसे कई वरदान दिए थे। ब्रह्मा ने भी उसे वरदान दिया था कि कोई देवता या असुर उसे नहीं मार सकेगा। हालांकि, दानव मनुष्य अथवा जानवरों से भी ना मारे जाने का वरदान लेना भूल गया।

रावन को कई तरह की सिद्धियां मिली हुई थी। वह उड़ सकता था और चाहे तो अदृश्य भी हो सकता था। इस कारण वहां घमंडी भी हो गया था। वह अपनी शक्तियों का दुरुपयोग भी करने लगा था। उसे कोई मनुष्य ही मार सकता था। इसलिए जब उसका अत्याचार हद से ज्यादा बढ़ गया तो भगवान विष्णु ने मनुष्य बनकर अयोध्या के राजकुमार राम के रूप में जन्म लिया। और उसने मूर्खता में राम की पत्नी सीता का हारन भी कर लिया तो प्रभु राम ने वानरों की सेना की सहायता से रावण की लंका जाकर उसका वध किया। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।

14. Ramayana Ki Kahaniya | दो वरदान

दंडकारण्य एक बार देवताओं और असुरों के बीच भीषण युद्ध हुआ। राजा दशरथ भी अपनी रानी कैकई को लेकर इंद्र की सहायता के लिए गए। युद्ध में शक्तिशाली शंभर ने दशरथ को घायल कर दिया और वे अचेत होकर गिर पड़े। कैकई  ने तुरंत रथ  युद्ध स्थल से निकाल लियाऔर उनकी जान बचा दी दशरथ केकई से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे दो वरदान देने का वचन दिया।

 कई सालों बाद, राजा दशरथ ने अयोध्या का राजकाज अपने बेटों को सौंपने का निश्चय किया। वे राम को अगला राजा बनाना चाहते थे। केकई  की दुष्ट दासी मंथरा ने कैकई  को भड़का दिया और उससे बोली कि राजा का निर्णय सही नहीं है क्योंकि भरत तो  राम से अधिक योग्य है,इसलिए राज्याभिषेक भरत का होना चाहिए।

उत्तर दिया कि राम भी उसके बेटे के समान हैं और भरत भी राम का बहुत आदर करता है।  मंथरा ने समझाया कि राम राजा बनने के बाद बहुत शक्तिशाली हो जाएगा और बाकी सब को उसके अधीन रहना पड़ेगा। इस तरह मंथरा ने केकई के मन में विष घोल दिया। उसने के कई को याद दिलाया कि दशरथ ने उसे दो वरदान दिए हैं और उन पर दानों को मांगने का यही सही समय है।

 केकई मंथरा के कुचक्र में फस गई और उसने दशरथ से दो वरदान मांग लिए पहला भरत को राज्य अभिषेक और दूसरा राम को 14 साल का बनवास।

15. Short Stories of Ramayana in Hindi | आज्ञाकारी बेटा

राम के वनवास का समाचार सुनते ही महल में ही नहीं, पूरी अयोध्या नगरी में उदासी छा गई थी। अयोध्या की प्रजा बहुत दुखी हुई। राम भी राजा दशरथ और कैकई से मिलने पहुंच गए। राम ने अपने पिता को थका मांडा और उदास देखा। वे समझ गए कि समस्या का एकमात्र समाधान कैकई की मांग पूरी करते हुए अयोध्या से निकल जाना ही है। राजा दशरथ की प्रतिष्ठा बचाने का यही एक रास्ता उन्हें लगा।

राम ने अपने पिता को समझाया कि भरत उनसे अधिक योग्य है और राजा बनने का अधिकार उसी का है। उन्होंने कहा कि वे तो आध्यात्मिक जीवन बिताना चाहते हैं जो कि सुख-सुविधाओं भरे महल में संभव नहीं है। अंत में राम ने कहा कि अपने माता पिता की आज्ञा पालन उनका धर्म है और वे किसी का ह्रदय दुखी नहीं करना चाहते। इतना कहकर राम ने अपने माता पिता के पैर छुए और चुपचाप कक्ष से निकल गए।

16. short story of ramayan in hindi | विराध और राम की कहानी

राम जब सीता और लक्ष्मण के साथ दंडकारण्य में थे तभी उनका सामना मनुष्य भक्षि देत्ये विराध से हुआ। दैत्य ने सीता को उठा लिया और उन्हें ले जाने लगा राम ने अपना धनुष निकाल लिया। विराध उनके छोटे से धनुष को देखकर हंसने लगा

और उसने पल भर में उनके धनुष को अपनी उंगली से तोड़ डाला। 

राम समझ गए कि विराट के सामने धनुष का इस्तेमाल करना बेकार है। राम और लक्ष्मण ने उसके हाथ अलग कर देने का निश्चय किया। दोनों ने पूरी शक्ति से उसके हाथ खींच दिए, और उसे नीचे पटक दिया।

राम ने फुर्ती से विराध के ऊपर अपना पैर रख दिया उनके ऐसा करते ही चमत्कार हो गया। विराट की आंखों से विनम्रता झलकने लगी।

अपने हाथ जोड़कर वह कहने लगा, “आपके चरणों ने मेरे मन को शुद्ध कर दिया है। मैं देत्ये नहीं गंधर्व हुँ,कृपया मुझे मार डालिए और मुझे श्राप मुक्त कर दीजिए।”

17. संपूर्ण रामायण कथा | कैकई का संकल्प

कैकई चाहती थी कि उसका बेटा भरत अयोध्या पर राज करे। उसने राजा दशरथ को उसे दिए दो वरदान याद दिलाए जो उन्होंने कैकई को दिए थे। दशरथ ने कैकई से मनचाहा वरदान मांगने को कहा। कैकई ने भरत को युवराज बनाने और राम को 14 साल के लिए बनवास की मांग की।

राजा यह सुनकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने कभी कल्पना तक नहीं की थी कि राम को इतना अधिक प्यार करने वाली कैकई ऐसी क्रूर हो सकती है।

दुखी हृदय से दशरथ ने कैकई से इतनी निर्दयता ना दिखाने का अनुरोध किया लेकिन वह अडिग रही।

कैकई ने उन्हें हर हाल में अपना वचन निभाने की पारिवारिक परंपरा की याद भी दिलाई। इस प्रकार कैकई के ही कारण राम को 14 साल का बनवास मिला।

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