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स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर ही रहूंगा….भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का यह एतिहासिक नारा देने वाली मशहूर शख्सियत बाल गंगाधर तिलकअपने मुखर व्यक्तित्व के लिए जाने जाते हैं। तिलक राष्ट्रवादी होने के साथ-साथ पेशे से अध्यापक और समाज सुधारक भी थे, जिनका नाम स्वतंत्रता संग्राम की मशहूर तिकड़ी लाल, बाल, पाल में से एक है।

महात्मा गांधी ने जहां तिलक को आधुनिक भारत का निर्माता करार दिया है, वहीं इतिहास में उन्हें लोकमान्य तिलक की उपाधि से नवाजा गया है।

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तिलक का शुरुआती जीवन | Bal Gangadhar Tilak In Hindi

लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। महाराष्ट्र के मराठी ब्राह्मण परिवार में जन्में तिलक के पिता का नाम गंगाधर तिलक था, जोकि संस्कृत विषय के अध्यापक थे।

हालांकि तिलक महज 17 साल के थे, जब उनके पिता जी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। पिता की मृत्यु के कुछ समय पहले ही 1871 में तिलक का विवाह सत्यभामा बाई से हुआ था।

बाल गंगाधर तिलक ने 1877 में पुणे के दक्कन कॉलेज से गणित विषय में प्रथम श्रेणी से स्नातक पूरा किया। जिसके बाद उन्होंने 1879 में एक सरकारी कॉलेज से कानून की डिग्री हासिल की।

पढ़ाई पूरी करने के बाद तिलक ने एक निजी स्कूल में गणित के अध्यापक के रुप में पढ़ाना शुरु किया। हालांकि कुछ वैचारिक मतभेदों के कारण तिलक ने अध्यापन छोड़ कर पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा।

तिलक का राजनीतिक जीवन | lokmanya tilak political life | bal gangadhar tilak par essay in hindi

तिलक अपने अध्यापन के दौरान देश में चल रही राजनीतिक गतिविधियों से खासा प्रभावित थे। इसी कड़ी में तिलक ने 1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का हाथ थाम लिया।

दरअसल तिलक हमेशा से ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध अपने मुखर व्यक्तित्व के लिए जाने जाते थे, वहीं कांग्रेस से जुड़ने के बाद तिलक का नाम गरम दल के नेताओं की फेहरिस्त में शुमार हो गया। तिलक का मानना था कि-

महान उपलब्धियां कभी आसानी से नहीं मिलती और
आसानी से मिली उपलब्धि कभी महान नहीं होता।

1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन का लोकमान्य तिलक ने जमकर विरोध किया और साथ ही उन्होंने बड़े पैमाने पर स्वदेशी आंदोलन का भी नेतृत्व किया, जिसके तहत तिलक ने सभी लोगों से ब्रिटिश चीजों और सेवाओं का बहिष्कार करने की अपील की।

आप मुश्किल समय में खतरों और असफलताओं के डर से बचने का प्रयास मत कीजिये। वे तो निश्चित रूप से आपके मार्ग में आयेंगे ही। – लोकमान्य तिलक

हालांकि 1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में गरम दल और नरम दल में वैचारिक मतभेद होने का कारण कांग्रेस दो भागों में बंट गयी, जिसे सूरत विभाजन कहा जाता है।

सूरत विभाजन के बाद जहां गरम दल में गोपाल कृष्ण गोखले, दादाभाई नैरोजी जैसे नेता शामिल थे, वहीं महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक, पंजाब में लाला लाजपत राय और बंगाल में बिपिन चन्द्र पाल गरम दल का नेतृत्व कर रहे थे, जिन्हें लाला-बाल-पाल के नाम से जाना जाता था।

कलकत्ता में एक साक्षात्कार के दौरान जब तिलक से आजाद भारत की भोर का जिक्र किया गया, तो उन्होंने बेहद बेबाकी से स्वतंत्रता के बाद देश को संघवाद का आकार देने का पक्ष लिया।

तिलक के शब्दों में –“मराठियों द्वारा देश में मराठा राज्य स्थापित करने की मांग 17वीं और 18वीं शताब्दी की बात है। यह 20वीं शताब्दी है, जहां स्वतंत्र भारत की सुबह संघवाद के रुप में देखना चाहता हूं, जहां सभी को समानाधिकार मिलेगा।“ तिलक कहते थे-

एक बहुत प्राचीन सिद्धांत है कि ईश्वर उनकी ही सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं। आलसी व्यक्तियों के लिए ईश्वर अवतार नहीं लेता। वह उद्योगशील व्यक्तियों के लिए ही अवतरित होता है। इसलिए कार्य करना शुरु कीजिये। – लोकमान्य तिलक

वहीं तिलक पहले ऐसे कांग्रेस नेता थे, जिन्होंने पहली बार हिन्दी भाषा की देवनागरी लिपि को देश की राष्ट्रीय भाषा स्वीकार करने की मांग भी की थी।

Bal Gangadhar Tilak essay in Hindi
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देशद्रोह के आरोप में जेल गए लोकमान्य तिलक | lokmanya bal gangadhar tilak essay in hindi

अपने पूरे जीवनकाल में अंग्रेजी हुकूमत की मुखालफत करने के कारण तिलक कुल तीन बार देशद्रोह के आरोप में जेल भेजे गए थे। पहली बार 1897 में ब्रिटिश सरकार की नीतियों के खिलाफ नाराजगी जाहिर करने के कारण उन्हें 18 महीने की सजा सुनायी गयी थी।

1909 में मार्ले-मिंटो सुधार का विरोध करने के चलते उन्हें 6 साल का कारावास और 1916 में होम रुल लीग के जरिए स्वराज की मांग करने के लिए उन्हें हिरासत में लिया गया था।

लखनऊ समझौता और तिलक की भूमिका | bal gangadhar tilak essay in hindi

सूरत विभाजन के बाद दो धड़ों में बंट चुकी कांग्रेस लगभग एक दशक बाद फिर से एक मंच पर आने वाली थी। दरअसल गरम दल और नरम दल दोनों ने ही अपने-अपने तरीकों और विचारधाराओं से अंग्रेजों को हराने की लगभग हर संभव कोशिशों की, लेकिन सारी कोशिशें नाकाम रहीं और आखिरकार दोनों ने फिर से एक-साथ आने का निर्णय किया।

1916 में लखनऊ में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेश का आगाज किया गया, जिसकी अध्यक्षता ए.सी.मजूमदार कर रहे थे। इसी अधिवेशन के दौरान गरम दल का नेतृत्व कर रहे तिलक ने लखनऊ समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए कांग्रेस के नरमदलीय नेताओं से हाथ मिला लिया।

तिलक और होमरुल लीग आंदोलन | essay on bal gangadhar tilak in Hindi

1916 में आयरलैंड से आई एनी बेसेंट ने भारत में होमरुल लीग की नींव रखी। तिलक बेसेंट के इस विचार से काफी प्रभावित हुए।

दरअसल इस दौरान जहां एक तरफ ब्रिटिश सरकार पहले विश्व युद्ध में व्यस्त थी, तो वहीं तिलक रुस की क्रांति की सफलता और लेनिन की विचारधाराओं से काफी हद तक सरमत थे। तिलक के मुताबिक- भारत की गरीबी पूरी तरह से वर्तमान शासन की वजह से है।

यही कारण था कि उन्होंने कई बार महात्मा गांधी से भी पूरी तरह अंहिसा का पालन न करने का आग्रह किया था। लेकिन गांधी जी ने उनके सुझाव को नकार दिया।

जिसके बाद तिलक ने एनी बेसेंट के साथ मिलकर महाराष्ट्र सहित भारत के कई हिस्सों में होमरुल लीग की शुरुआत करते हुए स्वराज का नारा दिया था।

हालांकि इस आंदोलन की सफलता के पहले ही तिलक को एक पुराने केस की सुनवाई के लिए लंदन बुला लिया गया और एनी बेसेंट को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। जिसके बाद होमरुल लीग आंदोलन ठप पड़ गया।

लोकमान्य तिलक हिंदी निबंध | Lokmanya Tilak Hindi Nibandh

Bal Gangadhar Tilak essay in Hindi

लेखक के रुप में तिलक | lokmanya tilak writings | bal gangadhar tilak par nibandh

 बाल गंगाधर तिलक ने केसरी और मराठा दो अखबारों का प्रकाशन प्रारंभ किया था। जहां केसरी एक साप्ताहिक मराठी अखबार था, वहीं मराठी, अंग्रेजी भाषा में छपने वाला अखबार था। इन दोनों ही प्रकाशनों में तिलक ब्रिटिश सरकार की नीतियों की जमकर आलोचना करते थे।

पने हितों की रक्षा के लिए यदि हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे तो दूसरा कौन होगा ? हमे इस समय सोना नहीं चाहिये, हमें अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिये। – लोकमान्य तिलक

1903 में तिलक ने ‘the arctic home in the vedas’ किताब का प्रकाशित की। जिसमें उन्होंने आर्यों के भारत आगमन का जिक्र किया है। lokmanya tilak books तिलक ने माण्डले जेल में गिरफ्तारी के दौरान ‘श्रीमद् भगवद गीता रहस्य’ नामक पुस्तक लिखी।

तिलक की मृत्यु | lokmanya tilak death | Mera Priya Neta Essay In Hindi

तिलक की मृत्यु 64 साल की उम्र में 1 अगस्त 1920 को महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में हुई। तिलक की अकस्मात मृत्यु से समूचे देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में तिलक के योगदान के चलते गांधी जी ने उन्हें लोकमान्य तिलक की उपाधि दी।

आजादी के बाद 28 जुलाई 1956 को देश की संसद में लोकमान्य तिलक की तस्वीर लगवाई गयी, जिसका उद्घाटन तात्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने किया था।

इसी कड़ी में मुंबई के मशहूर स्टेशन विक्टोरिया टर्मिनल का भी नाम बदलकर लोकमान्य तिलक टर्मिनल कर दिया गया।

reference-
Bal Gangadhar Tilak essay in Hindi

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