भगवान विष्णु की कहानी | BEST 13 VISHNU BHAGWAN STORY IN HINDI | भगवान विष्णु के अवतार की कहानी | विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी की कहानी

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1.प्रहलाद की कहानी | VISHNU BHAGWAN STORY IN HINDI

दैत्यराज हिर‌ण्यकश्यप पूरी दुनिया पर राज करना चाहता था। वह चाहता था कि हर कोई उसी की पूजा करें। हिना कश्यप का बेटा प्रहलाद विष्णु का भक्त था। हिर‌ण्यकश्यप को यह पसंद नहीं था लेकिन प्रहलाद नहीं मानता था। हिर‌ण्यकश्यप ने प्रहलाद को मार डालने का निश्चय किया। प्रहलाद ने विष्णु से प्रार्थना की और बच गया। इसके बाद हिर‌ण्यकश्यप ने उसे पहाड़ से फेकने का प्रयास किया लेकिन प्रहलाद फिर से बच गया। इसके बाद, आखिरकार हिर‌ण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को वरदान मैं एक ऐसी चादर थी जिससे वह आग में ना चल सके। उसने हिर‌ण्यकश्यप के कहने पर पहलाद को अपनी गोद में लिया और जलती आग मैं बैठ गई।

जब आग की लपटों ने घेर लिया तो पहलाद ने विष्णु से सहायता मांगी। तो अचानक एक हवा का झोंका आया जिससे वह चमत्कारी चादर पहलाद पर आ गई और आग ने होलीका को ही जला दिया और प्रहलाद बज गया। सब उसे सुरक्षित बचा देखकर चकित रह गए। इसी तरह लोग हर साल होलिका दहन करके अपने अंदर की सारी बुराइयों को जला देते हैं।

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2.भगवान विष्णु की कहानी | भगवान विष्णु के अवतार की कहानी

विष्णु ब्रह्मांड के रक्षक मानी जाती है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव, मिलकर त्रिदेव कहलाते हैं। भगवान विष्णु को चार भुजाओं वाला और गुलाब कमल पर आसीन दिखाया जाता है। उनके एक हाथ में शंख रहता है जो पवित्र ध्वनि ‘ओम’का प्रतीक है। उनके दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र रहता है, जो समय के चक्र तथा नेक जीवन जीने की याद दिलाता है। तीसरे हाथ में कमल रहता है, जो गौरवशाली अस्तित्व का सूचक है। उनके चौथे हाथ में गदा रहती है।

बहुत तेज गति से उड़ने वाला गरुड़ उनका वाहन है। उन्हें अधिकतर अपने निवास क्षीरसागर मैं कुंडली मारे शेषनाग पर आराम करते दिखाया जाता है। देवी लक्ष्मी उनकी पत्नी है।

माना जाता है कि विष्णु के दस अवतार हैं, जिनमें सबसे अधिक लोकप्रिय राम और कृष्ण हुए हैं। विष्णु को अपना दसवां अवतार अभी लेना है। उनका दसवां अवतार तब होगा, जब दुनिया में अधर्म पूरी तरह से बढ़ जाएगा।

3.मत्स्य अवतार की कहानी | VISHNU BHAGWAN STORIES IN HINDI

एक बार भगवान विष्णु ने घोषणा की कि जब पृथ्वी पर संकट आएगा, तब वे किसी ना किसी रूप में पृथ्वी पर जाकर वहां के लोगों को बचाएंगे।

एक दिन जब ब्रह्मा सो रहे थे, तभी घोड़े के सिर वाले हयग्रीव नामक अश्वनी उसके सिरहाने से पवित्र वेद चुरा लिया। इसके बाद उसने भास्कर उन्हें गहरे समुद्र में छिपा दिया। ब्रह्मा को ब्रह्मांड की रचना करने के लिए वेदों का अध्ययन करना था। वे बहुत परेशान हो गए और सहायता मांगने विष्णु भगवान के पास पहुंचे।

विष्णु भगवान ने मछली का रूप धारण किया और समुद्र में डुबकी लगाकर वेद वापस ले आए। उन्होंने हयग्रीव से भीषण लड़ाई भी लड़नी पड़ी, लेकिन उन्होंने असुर को मार दिया और ब्रह्मा के वेद वापस ले आए। ब्रह्मा ने उनके प्रति बहुत आभार जताया और वेदों को पढ़ना शुरू कर दिया। विष्णु भगवान के मछली रोग को ही मत्स्य अवतार कहते हैं।

VISHNU BHAGWAN STORY IN HINDI
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4. मूर्ख भस्मासुर की कहानी | विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी की कहानी

भस्मासुर बहुत शक्तिशाली असुर था। वह बहुत विशाल और मजबूत तो था लेकिन बहुत मूर्ख भी था।

भस्मासुर ने शिव की तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव उसके सामने प्रकट हुए और उससे वरदान मांगने को बोले। भस्मासुर बोला, “हे भगवान, मुझे ऐसा वर दीजिए कि मैं जिस व्यक्ति के सिर पर हाथ रखो वह तुरंत भस्म हो जाए।” शिव ने वरदान दे दिया। भस्मासुर बहुत प्रसन्न हुआ।

वरदान पाकर दुष्ट भस्मासुर ने सबसे पहले शिव पर ही उसे आजमाने का निश्चय किया। शिव उससे बचकर भागने लगे। उनकी दशा देखकर भगवान विष्णु उनकी सहायता के लिए आगे आए। उन्होंने सुंदर युवती मोहिनी का रूप धारण कर लिया। भस्मासुर उस युवती पर मोहित हो गया। वह शिव जी के बारे में भूल गया और मोहिनी के पीछे भागने लगा। मोहिनी से विवाह करना चाहता था। मोहिनी एक शर्त पर उसके साथ विवाह करने को तैयार हो गई। उसने भस्मासुर से कहा कि वह अपने सिर पर हाथ रखकर वचन दे कि वह उसके बाद किसी और से विवाह नहीं करेगा। भस्मासुर मान गया।

जैसे ही उस मूर्ख अशोक ने अपने सिर पर हाथ रखा, वह भस्मा हो गया। इस प्रकार से शिवजी बच गए।

5. कूर्म अवतार की कहानी | भगवान विष्णु के अवतार की कहानी

विष्णु इस सृष्टि के सबसे बड़े संरक्षक माने जाते हैं। वे सभी जीवो की रक्षा करते हैं।एक बार  जब देवता और असुर मिलकर समुंद्र मंथन कर रहे थे तो विष्णु ने अपने आप को कछुए के रूप में बदल कर समुद्र मंथन में सहायता की थी। समुद्र मंथन से अमृत निकलने वाला था  जिसे पीने वाला अमर हो जाता। विशाल पर्वत मंदराचल को समुद्र मंथन के लिए मथनी बनाया गया।

 जब मंथन शुरू हुआ तो मंदराचल धीरे धीरे समुद्र के पानी में डूबने लगा। देवताओं ने घबराकर विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु ने स्व को एक विशाल कछुए के रूप में बदला और मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर रख लिया। इसके पास आसानी से होता रहा। 

6. समुंद्र मंथन की कहानी | भगवान विष्णु की कहानी

एक बार दुर्वासा ऋषि ने इंद्र को हार भेंट किया।  इंद्र ने हार पर  विशेष ध्यान नहीं दिया। और अपने हाथी एरावत के दांत पर उसे रख दिया। एरावत ने उसे नीचे गिरा दिया। यह देख कर दुर्वासा क्रोधित हो गए। दुर्वासा ने इंद्र और सभी देवताओं को सारी शक्ति को देने का श्राप दे दिया।

  श्राप के कारण इंद्र और अन्य देवता अपनी शक्ति खो बैठे और असुरों के साथ युद्ध में हारने लगे। बाली के नेतृत्व में असुरों ने पूरे ब्रह्मांड पर अधिकार कर लिया। जब कोई रास्ता नहीं बचा तो इंद्र ने विष्णु से सहायता मांगी।

 विष्णु ने  देवताओं को उनकी शक्ति वापस दिलाने की एक योजना बनाई।  उन्होंने देवताओं से समुद्र मंथन करके अमृत निकालने को कहा, जिसे पीकर में अमर हो सकते थे और अपनी शक्ति वापस पा सकते थे।

 देवता तो शक्तिहीन हो चुके थे,  इसलिए समुद्र मंथन के लिए उन्होंने असुरों से सहायता मांगी। देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन शुरू किया। विशाल पर्वत मंदराचल को मछली बना कर मंथन किया जाने लगा, लेकिन भारी पर्वत समुद्र में डूबने लगा। पर्वत को डूबने से बचाने के लिए विष्णु ने कछुए का रूप रख लिया और पर्वत को अपनी पीठ पर रख लिया।   विष्णु के कछुए के रूप में आने को ही उनका दूसरा अवतार “कूर्म अवतार” कहां जाता है।

मंदराचल को थामने के लिए सहारा मिल गया तो विशाल नाम वासुकी को रस्सी की तरह लपेट कर मंथन शुरू किया गया। एक और से देवता और दूसरी ओर से असुर नाक को खींचने लगे।

समुंद्र मंथन शुरू हुआ तो भारी लहरें उठने लगी। उससे बहुत तीव्र विश “हलाहल” भी निकला। 

देवता डर गए क्योंकि नीला विश पूरे विश्व को नष्ट कर सकता था।

वे सब मिलकर शिव जी भगवान से रक्षा की विनती करने लगे। शिव जी ने प्रकट होकर सारे विश को पीलिया। इस विश  को उन्होंने गले से नीचे नहीं उतारा, बल्कि गले में ही रोक लिया। तभी से उनका गला नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाने लगे।

 मंथन शुरू हुआ तो समुद्र से बहुत सारे रतन, आभूषण और उपहार निकलने लगे। इच्छा पूरी करने वाली गाय कामधेनु; धन की देवी लक्ष्मी;  इच्छा पूरी करने वाला पेड़ कल्पवृक्ष; और अंत में हाथों में अमृत कलश और आयुर्वेद लिए धनवंतरी निकले।

अमृत बाहर आते ही असुरों ने कलर्स छीन लिया। देवता और असुरों के बीच भीषण युद्ध हुआ। अंत में, विष्णु ने सुंदर युवती मोहिनी का रूप धारण करके असुरों को ललचाया और उनसे अमृत छीन लिया। असुरों से अमृतसर विष्णु ने अपने पंखों वाले सारथी गरुड़ को दे दिया। गरुड़ ने जब कलश थामा तो कुछ अमृत छलक पड़ा। इससे अमृत की कुछ बूंदें उज्जैन, नासिक, इलाहाबाद और हरिद्वार में गिरी। कहते हैं कि इन बूंदों से भूमि पवित्र हो गई और हर साल कुंभ मेले में श्रद्धालु इन शहरों में आकर अपने पाप धोते हैं।

 देवता अमृत पाकर अमर हो गए। हालाकी कुछ  अतुल भी अमृत की बूंदें  चखने में सफल हो गए थे, इसलिए  वे  भी अमर हो गए। दो असुर, राहु और केतु अपना वेश बदलकर देवताओं के बीच बैठ गए। सूर्य और चंद्रमा ने उन्हें पहचान लिया और विष्णु से उनकी शिकायत कर दी। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके सिर काट दिए। तब तक  अमृत उनके गले के नीचे नहीं उतर पाया था।  इसलिए  उनके सिर तो अमर हो गए लेकिन शेष धर मर गया। इसी का बदला लेने के लिए राहु और केतु हर साल सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के दौरान सूर्य और चंद्रमा को निकल लेते हैं।

VISHNU BHAGWAN STORY IN HINDI
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7. वराह अवतार की कहानी | भक्त और भगवान की कहानी

बहुत समय पहले की बात है। हिरण्याक्ष नाम का एक असुर था, जो हिरण्यकश्यप का भाई था। उसे ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मिला हुआ था। कोई देवता, असुर, जानवर या मनुष्य उसे नहीं मार सकता था। हिरण्याक्ष की शक्ति दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। 1 दिन वह पृथ्वी को खींच कर अपने साथ समुंदर में ले गया। सारे देवता घबरा गए और सहायता के लिए विष्णु के पास पहुंचे।

विष्णु को याद आया कि ब्रह्मा हिरण्याक्ष को दो दांतो वाले जंगली सूअर वराह से अमरता का वरदान देना भूल गए थे। विष्णु ने अपने आप को वराह के रूप में बदला और समुद्र में छलांग लगा दी। वहां जाकर उन्होंने हिरण्याक्ष को लड़ने की चुनौती दी। कुछ ही देर में विष्णु ने हिरण्याक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया और पृथ्वी को वापस खींच लाए।

8. परशुराम की कहानी | VISHNU BHAGWAN STORY IN HINDI

विष्णु के छठे अवतार परशुराम बहुत क्रोधी स्वभाव के थे। जब उन्हें पता चला कि सीता के स्वयंवर में राम ने धनुष तोड़ दिया है, तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। 

परशुराम बहुत निपुण धनुर्धर भी थे। शिव के शिष्य होने के कारण वे राम की विजय का समाचार सहन ना कर पाए। अहंकारी ब्राह्मण होने के कारण वे क्षत्रिय से भी घृणा करते थे। 

उन्होंने राम से मिलकर उन्हें चुनौती देने का निर्णय किया। राम, लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या जा रहे थे, तभी परशुराम अपना प्रसिद्ध फरसा लेकर उनके रास्ते में आ गए और उन्होंने राम पर हमला कर दिया।

राम ने भी अपना धनुष निकाला और दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध के दौरान जब दोनों की निगाहें एक दूसरे से मिली तो एकदम से सब कुछ बदल गया। क्रोध की जगह प्रेम और घृणा की जगह आधार के भाव उभर आए। दोनों ने पहचान लिया कि देश को विष्णु के ही अलग-अलग रूप हैं। दोनों ने अपने अस्त्र-शस्त्र फेंक दिए और गले लग गए।

9. गजेंद्र की कहानी | विष्णु भगवान और माता लक्ष्मी की कहानी

गजेंद्र हाथियों का राजा था। वह अपने परिवार समेत एक पहाड़ पर रहता था। गर्मी के दिनों में एक बार मैं अपने परिवार समेत पहाड़ से उतरा और झील के ठंडे पानी में नहाने लगा। पानी में सूंड से पानी उछाल उछाल कर वह खेलने लगा। उस झील में एक मगरमच्छ भी रहता था। पानी में अधिक उछल कूद हुई तो मगरमच्छ परेशान हो गया। गुस्से में आकर उसने गजेंद्र पर हमला कर दिया और उसकी सूंड अपने दांतों से दबा ली।

कुछ ही देर में गरुड पर सवार एक चमत्कारी आकृति प्रकट हुई। दर्द से कर हाथे हुए गजेंद्र ने कमल पर आसीन विष्णु का स्वागत किया। विष्णु झील में कूद पड़े और उन्होंने मगरमच्छ के जबड़े फाड़ कर उसे मार डाला। इस तरह से गजेंद्र की जान बच गई।

10. नरसिंह अवतार की कहानी | विष्णु भगवान् की कथा

हिरण्यकश्यप बहुत राजा था। उसने अमर होने के लिए ब्रह्मा की तपस्या की थी। उसने ब्रह्मा से ऐसा वरदान मांगा कि ना तो दिन में और ना रात में,  ना ही कोई मनुष्य ना ही कोई दैत्य, ना ही कोई पशु और ना ही कोई देवता उसे मार सके। उसने यह भी वरदान मांगा कि कोई उपकरण और अस्त्र शास्त्र उसका नाच ना कर सके। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया।

हिरण्यकश्यप ने इसके बाद अपने राज्य में देवताओं की पूजा पर रोक लगा दी। हालांकि उसका बेटा प्रहलाद खुद भी विष्णु का भक्त था। इस बात से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मार डालने का निश्चय किया।

जब से मारने के कई प्रयास निष्फल हुए तो उसने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को एक खंभे से बांधकर उसका सिर धड़ से अलग कर दें। तभी विष्णु नरसिंह के अवतार में प्रकट हुए, उसका आधा शरीर मनुष्य का और आधा सिंह का था। नरसिंह अवतार ने अपने नुकीले नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीर दिया और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

11. वामन अवतार की कहानी | विष्णु भगवान् की कथा

विष्णु ने अपना पांचवा अवतार वामन अवतार अर्थात बोने के रूप में लिया। प्रहलाद का पोता बली बहुत प्रसिद्ध असुर था। कठोरता करते उसने पूरी पृथ्वी पर अधिकार करने की शक्ति हासिल कर ली थी। इंद्र और अन्य देवताओं को डर लगने लगा था कि कहीं बली उन्हें भी पराजित ना कर दे। उन्होंने विष्णु से मदद मांगी।

विष्णु ने एक निर्धन ब्राह्मण के घर जन्म लेने का निश्चय किया था। एक दिन वह बलि के पास पहुंचे और उस से भिक्षा मांगने लगे। उस छोटे से बालक को देखकर बली हर इच्छा पूरी करने को तैयार हो गया। वामन ने उससे तीन कदम भूमि मांग ली। बली मान गया। बामन ने अपना आकार बढ़ाना शुरू कर दिया और दो कदमों से पृथ्वी और आकाश को नाप लिया। तीसरा कदम रखने के लिए जगह नहीं बची तो बली ने अपना सिर आगे कर दिया। बामन ने बली को कुचल दिया और उसे मार डाला।

12. पद्मावती की कहानी | VISHNU BHAGWAN STORY IN HINDI

एक बार भृगु ऋषि वर्ग पहुंचे तो उन्होंने विष्णु को सोते पाया। भृगु को गुस्सा आ गया और उन्होंने विष्णु की छाती पर लात मार दी। विष्णु उठ गए थे और भृगु का स्वागत करने लगे।

भृगु विष्णु से बोले, “शमा करें भगवान। आपको चोट तो नहीं आई? “

विष्णु को क्रोध ना करते देख भृगु प्रसन्न हो गए। उन्होंने विष्णु को आशीर्वाद दिया और लौट आए विष्णु की पत्नी पार्वती को जब यह पता लगा कि जिस ह्रदय मे वे वास करती हैं, उसका भृगु ने अपमान किया है तो वे क्रोधित हुई। उन्होंने विष्णु को छोड़ दिया और पृथ्वी पर चली गई।

विष्णु, बहुत दुखी हुए और वेंकटेश के रूप में जन्म लेकर वे भी धरती पर पहुंच गए। दिन राजा अक्षराज, पुत्र प्राप्ति यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ की रस्म के रूप में वह खेत में हेल चला रहे थे अचानक धरती से एक कमल प्रकट हुआ, जिस की पंखुड़ियों पर एक कन्या लेटी हुई थी। राजा ने उस कन्या का नाम पद्मावती रख दिया और उसे अपनी बेटी की तरह पालने लगे। यही कन्या पार्वती थी जब वह बड़ी हुई तो उसका विवाह वेंकटेश के साथ हुआ।

13. पद्मनाभ की कहानी | भगवान विष्णु की कहानी

विष्णु भक्त पद्मनाथ चक्र पुष्कारिणी नगर के एक ब्राह्मण परिवार का सदस्य था। वह निर्धन था लेकिन दयालु इमानदार और सज्जन था। उसकी सर्वशक्तिमान ईश्वर के दर्शन करना चाहता था मैं जानता था कि भगवान सबको दर्शन नहीं देते। पद्मनाभ ने तपस्या शुरू कर दी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु उसके सामने प्रकट हुए और उसे कई युगों तक जीवित रहने का वरदान दिया।

हालांकि एक दिन एक असुर ने पद्मनाभ पर हमला कर दिया। मृत्यु के भय से उसने विष्णु का नाम जपना शुरू कर दिया। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से असुर को मार डाला। यह असुर सुंदर यक्ष था जो वशिष्ठ के श्राप से असुर बन गया था। उसे तभी मुक्ति मिलनी थी जब विष्णु का सुदर्शन चक्र उसका सिर काटते।

पद्मनाभ ने सुदर्शन चक्र के आगे शीश झुकाते हुए उस से अनुरोध किया कि वह मानव जाति की रक्षा करें। चक्र पुष्कारिणी गांव में पहुंच गया और तभी से उस गांव का नाम चक्र पुष्कारिणी पड़ गया।

भगवान विष्णु के भक्त की कहानी – विष्णु जी की कहानी – Vishnu ji Ki Kahani – Bhagwan Vishnu Ki Kahani

VISHNU BHAGWAN STORY IN HINDI

भगवान विष्णु ने अपने भक्त सेठ और सेठानी पर कृपा करी – देखिये एक सच्ची कहानी

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