महाभारत की कहानियाँ हिन्दी में | Mahabharat Stories in Hindi | महाभारत से जुड़ी 11 रोचक कहानियां | Mahabharat Ki Kahaniya

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1. भीष्म प्रतिज्ञा | महाभारत से जुड़ी रोचक कहानियां

हस्तिनापुर नरेश शांतनु एक बार शिकार करने गए, अचानक उन्हें कहीं से तो सुगंध आती महसूस हुई। उन्होंने पाया कि सुगंध एक सुंदर युवती से आ रही है उसका नाम सत्यवती था। शांतनु को सत्यवती से प्यार हो गया। उन्होंने सत्यवती के मछुआरे पिता से उससे विवाह करने की इच्छा जताई।

सत्यवती के पिता एक शर्त पर मान गए कि सत्यवती के बेटे को ही युवराज घोषित किया जाएगा।

शांतनु का एक बेटा पहले से था जिसका नाम देवव्रत था शांतनु मछुआरे की बात सुनकर उदास हो गए और लौट आए। जब देवव्रत ने अपने पिता को मायूस देखा तो वह मछुआरे के पास गया। देवव्रत ने उसे वचन दिया की सत्यवती का बेटा ही युवराज बनेगा। मछुआरे ने चतुराई दिखाते हुए कहां, “ लेकिन अगर तुम्हारे बेटे ने राज हथियाने की कोशिश की तो क्या होगा? मछुआरे को संतुष्ट करने के लिए देवव्रत ने वहीं पर आजीवन अविवाहित रहने की भीष्म प्रतिज्ञा कर ली। इसके बाद में सत्यवती को लेकर महल आ गए और शांतनु के साथ सत्यवती का विवाह हो गया। भीष्म प्रतिज्ञा करने के कारण देवव्रत भीष्म कहलाने लगे।

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2. 3 राजकुमारियां अंबा, अंबिका और अंबालिका | महाभारत की प्रेरणादायक कहानियाँ

हस्तिनापुर नरेश शांतनु और उनकी पत्नी सत्यवती के दो बेटे थे चित्रांगद और विचित्रवीर्य शांतनु का एक और पुत्र भीष्म, चित्रांगद और विचित्रवीर्य का संरक्षक था। जब शांतनु की मृत्यु हुई तो चित्रांगद को राजा बनाया गया, लेकिन वह भी एक युद्ध में मारा गया। इसके बाद विचित्रवीर्य को राजा बनाया गया।

एक दिन सत्यवती ने भीष्म से विचित्रवीर्य के लिए वधू तलाश करने को कहा। भीष्म काशी नरेश के दरबार में गए।

वहां काशी नरेश अपनी तीन बेटियों के लिए स्वयंबर रचा रहे थे। जब वहां उपस्थित राजकुमारों ने भीष्म को देखा तो वे कहकर उनका उपहास करने लगे कि एक बूढ़ा आदमी युवा राजकुमारियों से विवाह करने आया है। इस पर भीष्म को क्रोध आ गया। वे तीनों राजकुमारियों का हरण करके हस्तिनापुर ले आए।

पहली राजकुमारी अंबा ने उनसे कहा कि वह तो शाल्व राजकुमार से विवाह करना चाहती है। भीष्म ने यह सुनकर उसे शाल्व राजकुमार के पास भेज दिया।

अंबिका और अंबालिका का विवाह विचित्रवीर्य से कर दिया गया। एक दिन अंबिका और अंबालिका अपनी दासी के साथ व्यास ऋषि से मिलने गई। व्यास ऋषि बहुत ही कुरूप थे। अंबिका ने उनका चेहरा देखा तो डर के मारे आंखें बंद कर ली। व्यास ने उन्हें श्राप दिया कि उसका बेटा अंधा पैदा होगा। जब अंबालिका ने व्यास ऋषि को देखा तो डर के मारे वह पीली पड़ गई। व्यास ऋषि ने कहा कि उसे पीला और दुर्बल पुत्र होगा। दासी निर्भय होकर व्यास ऋषि से मिली। व्यास ने उसे आशीर्वाद दिया कि उसका पुत्र बहुत बुद्धिमान होगा।

समय बीतने के साथ ही अंबिका ने राजकुमार धृतराष्ट्र को जन्म दिया जो शक्तिशाली तो था पर अंधा था। अंबालिका ने पांडु को जन्म दिया जो महान धनुर्धर था लेकिन दुर्बल और पीला था। धृतराष्ट्र बड़ा था लेकिन अंधा होने के कारण उसे राजा नहीं बनाया गया। राज्याभिषेक पांडु का हुआ। दासी का बेटा विदुर बहुत बुद्धिमान था। उसे मंत्री बनाया गया।

Mahabharat Stories in Hindi
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3. पांडवों और कौरवों का जन्म | Mahabharat Stories in Hindi

भीष्म चाहते थे कि हस्तिनापुर नरेश पांडु का विवाह हो जाए। राजा कुंती भोज की दत्तक पुत्री कुंती ने पांडू को अपना वर चुना और दोनों का विवाह हो गया। मद्र देश की राजकुमारी माद्री भी पांडू से विवाह करना चाहती थी। वह पांडू की दूसरी पत्नी बन गई।

गंधार नरेश की राजकुमारी गांधारी को धृतराष्ट्र की पत्नी के रूप में चुना गया। धृतराष्ट्र अंधे थे और गांधारी अपने पति से किसी भी रूप में बेहतर नहीं होना चाहती थी। उसने अपनी आंखों पर हमेशा के लिए पट्टी बांध ली। हस्तिनापुर के मंत्री विदुर का लालन-पालन भी पांडु और धृतराष्ट्र के भाई के रूप में हुआ था। उनके लिए भी सुयोग्य कन्या तलाश की गई।

समय आने पर कुंती ने तीन पुत्रों को जन्म दिया युधिष्ठिर, भीष्म और अर्जुन। माद्री ने दो जुड़वा बेटों को जन्म दिया जिनके नाम नकुल और सहदेव रखें गए। इनके पिता का नाम पांडु था, इसलिए यह पांचों पुत्र पांडव कहलाने लगे। गांधारी 100 संताने चाहती थी। उसने व्यास ऋषि से प्रार्थना की जो उन्होंने स्वीकार कर ली। समय बीतने पर गांधारी ने मांस के एक लोथड़े को जन्म दिया। व्यास ऋषि ने उस लोथड़े को 100 टुकड़ों में काट दिया, जो सो लड़के और एक लड़की में बदल गए। 

धृतराष्ट्र की यह संताने कौरव कहलाए क्योंकि यह कुरु वंश से संबंधित है। कौरवों में सबसे बड़े भाई का नाम दुर्योधन रखा गया।

4. पांडवों की कहानी | महाभारत की कहानियां

पांडव हस्तिनापुर के राजकुमार से। हस्तिनापुर नरेश पांडु के पुत्र होने के कारण वे पांडव कहलाते थे। पहले तीन पांडव युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन कुंती के पुत्र थे और छोटे पांडव नकुल और सहदेव पांडू की दूसरी पत्नी माद्री के पुत्र थे। राजा पांडु और माद्री की मृत्यु के पश्चात कुंती ने पांचों का लालन-पालन किया। पांचो भाइयों में अनेक गुण थे। वे बहुत वीर और बुद्धिमान थे। उन्होंने कई कलाए सीखी और युद्ध कौशल में महारत हासिल की थी।

सबसे बड़ा युधिष्ठिर सच्चाई और सिद्धांतों के लिए जाना जाता था। भीम बहुत शक्तिशाली था और उसे भोजन का बहुत शौक था। अर्जुन महान धनुर्धर था और अपने बड़ों का बहुत चाहता था। पांचों भाइयों ने आपस में बहुत प्रेम था।

5. विश ही विश को मारता है | Mahabharat Ki Kahaniya

कौरवो में सबसे बड़ा भाई दुर्योधन जब बड़ा हुआ तो उसके मन में हस्तिनापुर का राजा बनने की इच्छा पैदा हुई। वह सदैव अपने चचेरे भाई पांडवों को हानि पहुंचाने के रास्ते ढूंढा करता था। पांडवों का भी सिहासन पर बराबर का अधिकार था। एक दिन अपने मामा शकुनि की सहायता से उसने सबसे शक्तिशाली पांडव भीम को मारने का षड्यंत्र किया।

उसने पांडवों को गंगा नदी के तट पर भोज के लिए आमंत्रित किया। उसने लड्डुओं में विश मिला दिया। उसने वह लड्डू भीम को खिला दिए। लड्डू खाकर भीम बेहोश हो गया। दुर्योधन ने उसे नदी में फेंक दिया। नदी में कई विषैले सांपों ने भीम को काट लिया। कहा जाता है कि विष ही विष को मारता है। सांपों के विष के असर से भीम के शरीर का विष समाप्त हो गया। भीम की जान बच गई और वह तैर कर बाहर निकल आया।

6. महान गुरु आचार्य द्रोण | महाभारत की कहानियाँ हिन्दी में

एक बार हस्तिनापुर के राजकुमार एक कुएं के पास गेंद खेल रहे थे। अचानक उनकी गेंद कुएं में गिर गई। एक अंगूठी भी कुएं में गिर गई। राजकुमारों ने कुएं के अंदर झांका लेकिन उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि गेंद और अंगूठी कैसे बाहर निकाले। आचार्य द्रोण पास में खड़े यह सब देख रहे थे। वह कहने लगे, “कितनी लज्जा की बात है तुम लोग इतना मामूली सा काम नहीं कर पा रहे हो।”

उन्होंने घास का एक तिनका उठाया और कुएं मे, गेंद की तरफ फेंक दिया। तिनका गेंद से चिपक गया। उसके बाद उन्होंने एक एक करके कई तिनके कुएं मैं फेंके ।

तारे तिनके के एक दूसरे से चिपक के गए। आचार्य द्रोण ने आखिरी तिनके को पकड़ कर खींचा तो उसके साथ गेंद भी खींची चली आई।

इसके बाद उन्होंने अंगूठी को निशाना बनाकर एक छोड़ दिया। बाढ़ कुएं में जाकर वापस आ गया उसके साथ अंगूठी भी बाहर आ गई थी राजकुमार बहुत प्रसन्न हुए। ने यह सब सुना तो वे समझ जाएगी आचार्य द्रोण ही राजकुमारों को धनुर्विद्या और युद्ध कला सिखाने योग्य है। उन्होंने द्रोण को राजगुरु बना दिया।

7. आज्ञाकारी शिष्य एकलव्य की कहानी | महाभारत की पूरी कहानी

एकलव्य एक निषाद बालक था जो धनुर्धर बनना चाहता था। राज गुरु द्रोण ने उसे शिक्षा देने से इनकार कर दिया था। एकलव्य ने द्रोण की मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसी के सामने प्रतिदिन धनुर्विद्या का अभ्यास शुरू कर दिया।

 एक दिन, जब एकलव्य अभ्यास कर रहा था तभी एक कुत्ता वहां आकर भौंकने लगा। एकलव्य ने बहुत सारे तीर कुत्ते के मुंह में इस प्रकार छोड़ दिए उसका मुंह तो बंद हो गया लेकिन उसके मुंह से एक बूंद खून नहीं गिरा। 

द्रोण यह सब देख रहे थे। दे एकलव्य से बहुत प्रभावित हुए। वे समझ गए कि कोई महान धनुर्धर ही यह कर सकता है वे एकलव्य के पास गए और उससे पूछने लगे हैं, “तुम्हारा गुरु कौन है? “एकलव्य ने उनकी मिट्टी की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए उत्तर दिया, “आप ही मेरे गुरु हैं।” 

ड्रोन बोले, “तब तो मुझे गुरु दक्षिणा चाहिए। अपने दाहिने हाथ का अंगूठा मुझे गुरु दक्षिणा के रूप में दो।” एकलव्य जानता था कि बिना दाहिने अंगूठे के वह धनुष नहीं चला पाएगा लेकिन फिर भी उसने तुरंत अपना अंगूठा काट कर गुरु को दे दिया।

Mahabharat Stories in Hindi
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8. द्रोण की परीक्षा | महाभारत से जुड़ी रोचक कहानियां

आचार्य द्रोण हस्तिनापुर के राजकुमारों के गुरु थे। अर्जुन उनका सबसे प्रिय शिष्य था। शेष राजकुमार अर्जुन से इस बात से जलते थे। अर्जुन की श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए द्रोण ने सब की परीक्षा लेने का निश्चय किया। 

उन्होंने एक लकड़ी की चिड़िया पेड़ पर लटका दी और हर राजकुमार से उस चिड़िया की आंख पर निशाना लगाने को कहा। सबसे पहले सबसे जेस्ट राजकुमार युधिष्ठिर को अवसर दिया गया। द्रोण ने उससे पूछा, “तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है? “

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “मुझे एक पेड़ दिख रहा है जिस पर चिड़िया लटक रही है। “

यह सुनकर द्रोण ने उसे वापस जाने को कह दिया। इसके बाद यही प्रशन उन्होंने एक-एक करके सभी राजकुमारों से किया।

अर्जुन की भी बारी आई तो द्रोण ने उससे भी यही प्रश्न किया। अर्जुन ने उत्तर दिया, ” मुझे तो सिर्फ चिड़िया की आंख दिख रही है।”

द्रोण इस उत्तर से बेहद खुश हुए। उन्होंने अर्जुन से निशाना लगाने को कहा। अर्जुन ने बिल्कुल सही निशाना लगाया। द्रोण ने सभी शिष्यों से कहा कि सर्वश्रेष्ठ तीरंदाज वही है जिसकी निगाहों सिर्फ अपने लक्ष्य पर रहती है, और किसी चीज पर नहीं।

9. राजसी प्रतियोगिता | महाभारत की प्रेरणादायक कहानियाँ

एक दिन द्रोण ने कौरवों और पांडवों का कौशल दिखाने के लिए उनके बीच प्रतियोगिता कराने का निश्चय किया। राजकुमारों ने अपने अपने पसंदीदा अस्त्र -शस्त्र के करतब दिखाए। किसी ने धनुष बाण” तो किसी ने तलवार, किसी ने भाला और किसी ने गदा के करतब दिखाए। भीम और दुर्योधन के बीच भीषण गदा युद्ध हुआ। 

अर्जुन ने आंख बंद करके निशाना लगाया और बालों से ही अग्नि और बारिश पैदा करके सबको प्रभावित किया। 

द्रोण ने प्रसन्न होकर घोषणा कर दी कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ है। 

तभी कर्ण नाम का एक युवक सामने आया और उसने भी वही सारे करतब दिखा दिए जो अर्जुन ने किए थे। उस ने अर्जुन को चुनौती दे डाली। द्रोण ने कहा कि किसी सामान्य व्यक्ति को राजकुमार से प्रतियोगिता करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। दुर्योधन को अर्जुन से जलता ही था। उसने तुरंत कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया। हालांकि, सूर्यास्त हो जाने के कारण अर्जुन और कर्ण का मुकाबला नहीं हो पाया। कर्ण वास्तव में पांडवों की माता कुंती का ही पुत्र था।

10. शांतनु की कहानी | Mahabharat Stories in Hindi

हस्तिनापुर नरेश शांतनु गंगा नदी के तट पर एक सुंदर युवती से मिले जिसका नाम गंगा था। शांतनु उससे विवाह करना चाहते थे। गंगा इस शर्त पर विवाह के लिए मान गई की शांतनु कभी उससे कोई प्रश्न नहीं करेंगे। 

जल्दी ही गंगा ने एक बेटे को जन्म दिया लेकिन उसे नदी में बहा दिया। शांतनु यह देखकर दंग रह जाए। एक के बाद एक गंगा ने अपनी छह और संतानों को नदी में डुबो दिया।

जब वह अपनी आठवीं संतान को डुबोने जा रही थी डुबोने जा रही थी तो शांतनु से नहीं रहा गया। उन्होंने गंगा से पूछ लिया कि वह अपनी संतानों को नदी में क्यों डूबा रही है।

उसने बताया कि वह देवी गंगा है और एक शाप के कारण मनुष्य के रूप में पैदा हुई है। उसके बेटे वसु है। और उन्हें वह नदी में डुबोकर श्राप से मुक्त कर रही है। हालांकि शांतनु के रोकने के कारण आठवें पुत्र को मनुष्य का जीवन जीना ही पड़ेगा इतना कहकर गंगा चली गई। आठवां बालक बड़ा होकर महान योद्धा भीष्म कहलाया।

11. कौरव | महाभारत से जुड़ी रोचक कहानियां

कौरव हस्तिनापुर के राजकुमार थे। वे गांधारी और धृतराष्ट्र के बेटे थे धृतराष्ट्र और पांडू भाई थे। पांडू छोटे थे लेकिन धृतराष्ट्र के अंधे होने के कारण राजा पांडु को ही बनाया गया। पांडू की मौत के बाद धृतराष्ट्र को ऐनापुर का सिंहासन मिला। गांधारी 100 पुत्र चाहती थी। व्यास ऋषि ने उसकी इच्छा पूरी होने का वरदान दिया था। गांधारी ने एक मां के लोड़े को जन्म दिया। व्यास ने उस लोड़े को काटकर उसके एक सौ टुकड़े कर दिए। दे टुकडे सौ पुत्रों और एक पुत्री में बदल गए यह सारे लोग कौरव कहलाए। सबसे बड़े का नाम दुर्योधन था। उससे छोटा दुशासन था। और कौरव पांडवों से जलते थे और उनसे हमेशा झगड़ते रहते थे

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