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उत्तराखंड में हिमालय की गोद में बसा चारधाम – Char Dham Yatra

चाहे वृद्ध हो, वयस्क हो, या फिर बच्चे, चारधाम की यात्रा (uttarakhand Char Dham Yatra) करना सभी की कामना होती है। सभी की इच्छा रहती है कि जीवन में एक बार उत्तराखंड में स्थित सभी चारों धामों की यात्रा हो जाए बस। यहीं वजह है कि पूरे सालभर में मात्र कुछ ही महीने खुले रहने के बावजूद पर्यटकों को संख्या लगातार बढ़ती ही गई है। हर व्यक्ति इनको अपनी जीवन की बकेट लिस्ट में जरूर रखना चाहता है।

हिमालय की गोद में बसे हुए चारों धाम (गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ) की मनोरम छटा इतनी निराली और दिव्य है कि इसकी यात्रा करना आपके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा और एक मीठी याद बन सकती है। इस लेख में मैं सभी धामों से जुड़ी किवदंतियां सहित यह भी बताऊंगा कि आप यहां कैसे पहुंच सकते हैं।

uttarakhand Char Dham Yatra

1- गंगोत्री धाम

गंगोत्री धाम देवी गंगा को समर्पित है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे मानव जाति के पापों को मिटाने के लिए धरती पर अवतरित हुईं। गंगा नदी गंगोत्री ग्लेशियर से गोमुख में निकलती है जो गंगोत्री शहर से लगभग 18 किमी दूर है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित, गंगोत्री के मूल मंदिर का निर्माण अमर सिंह थापा द्वारा किया गया था, जो 19 वीं शताब्दी की शुरुआत में एक गोरखा जनरल थे। गोमुख तक पहुंचने के लिए आपको पथरीले रास्तों से ट्रेक्किंग करके जाना पड़ेगा। लेकिन यकीन मानिए यह हर तरह से जाने लायक है।

uttarakhand Char Dham Yatra
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संबंधित किवदंतियां

गंगी जी को धरती पर लाने के लिए राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। इंद्र देव (बारिश के देवता) ने भव्य यज्ञ को देखकर और राजा सगर द्वारा अपने सिंहासन को खोने के डर से कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञ घोड़ा ले गए और बांध दिया। राजा सगर के 60000 बेटे घोड़े के साथ थे और जब उन्होंने घोड़े को लापता पाया तो उसे खोजना शुरू कर दिया।

जब उन्हें कपिल मुनि के आश्रम में घोड़ा मिला तो उन्हें बहुत गुस्सा आया और उन्होंने मुनि के खिलाफ झूठे शब्दों का इस्तेमाल किया। कपिल मुनि उस समय गहरे ध्यान में थे और गलत शब्दों को सुनकर वे उग्र हो गए और राजा सगर के सभी 60000 पुत्रों को राख में बदल दिया। उन्होंने उन्हें शाप दिया कि जब तक राख गंगा के पानी में बह नहीं जाएगी, उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी।

अपने पूर्वजों के लिए मोक्ष पाने के लिए राजा भगीरथ (सगर के पोते) ने गंगा को पृथ्वी पर उतारने के लिए सदियों तक ध्यान किया और आखिरकार सफल हुए। तब से लोग अपने मृत रिश्तेदारों की राख को गंगा नदी के पवित्र जल में विसर्जित कर रहे हैं।

कैसे पहुंचे

हवाई जहाज द्वारा

गंगोत्री से निकटतम हवाई अड्डा देहरादून स्थित जॉली ग्रांट एयरपोर्ट है, जो ऋषिकेश से सिर्फ 26 किमी दूर स्थित है। हवाई अड्डे से, यात्रियों को गंगोत्री पहुंचने के लिए या तो टैक्सी या लग्जरी बस लेनी होगी।

रेल द्वारा

निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है जो गंगोत्री से लगभग 249 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां से गंगोत्री पहुँचने के लिए आप एक टैक्सी या लग्जरी बस की सहायता ले सकते हैं।

चूंकि ऋषिकेश एक छोटा स्टेशन है और बहुत ज्यादा ट्रेनों से नहीं जुड़ा है इसलिए यदि आप ट्रेन से गंगोत्री जा रहे हैं तो हरिद्वार सबसे अच्छे और सुलभ रेलवे स्टेशन है। हरिद्वार, भारत के सभी भागों से कई ट्रेनों द्वारा जुड़ा हुआ है।

सड़क द्वारा

गंगोत्री उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अधिकांश प्रमुख शहरों के साथ सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। यह दिल्ली से 452 किलोमीटर और ऋषिकेश से 229 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। परिवहन निगम कि बसें लगातार अंतराल पर चलती है जो आपकी यात्रा को और भी सुगम बना सकती हैं।

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2- यमुनोत्री धाम

इस कड़ी में दूसरा नाम यमुनोत्री का आता है। यमुनोत्री वहीं स्थान है जहां भारत की दूसरी सबसे पवित्र नदी, यमुना नदी जन्म लेती है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित, यमुनोत्री धाम तीर्थ यात्रा का पहला पड़ाव है। ऐसा माना जाता है कि इसके पानी में स्नान करने से सभी पापों की सफाई होती है और असामयिक और दर्दनाक मौत से रक्षा होती है।

माना जाता है कि यमुनोत्री का मंदिर 1839 में टिहरी के राजा नरेश सुदर्शन शाह द्वारा बनवाया गया था। यमुना देवी (देवी) के अलावा, गंगा देवी की मूर्ति भी श्रद्धेय मंदिर में रखी गई है। मंदिर के पास कई गर्म पानी के झरने हैं; सूर्य कुंड उनमें से सबसे महत्वपूर्ण है। भक्त कुंड में चावल और आलू उबालते हैं और इसे देवी का प्रसाद मानते हैं।

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संबंधित किवदंतियां

एक किंवदंती यमुनोत्री को प्राचीन ऋषि असित मुनि के धर्मोपदेश के रूप में देखती है। मुनि यमुना और गंगा दोनों में स्नान करते थे, लेकिन अपने बुढ़ापे में वे गंगोत्री की यात्रा नहीं कर सकते थे। उसकी समस्या को गंगा जी ने महसूस किया। तब गंगा जी ने अपना एक छोटा सा झरना ऋषि के आश्रम के पास प्रकट कर दिया। वह उज्जवल जटा का झरना आज भी वहां है।

एक अन्य कथा के अनुसार सूर्य की पत्नी छाया से यमुना व यमराज पैदा हुए थे। यमुना नदी के रूप में पृथ्वी पर बहने लगी तथा यम को मृत्यु लोक मिला। कहा जाता है कि यमुना ने अपने भाई यमराज से भाईदूज के अवसर पर वरदान मांगा कि इस दिन जो यमुना में स्नान करे उसे यमलोक न जाना पडे। इसलिए माना जाता है कि जो कोई भी यमुना के पवित्र जल में स्नान करता है। वह अकाल मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है और मोक्ष को प्राप्त करता है। इसी किंदवंती के चलते यहां हजारों की संख्या में श्रृद्धालु यहा आते है।

कैसे पहुंचे

हवाई मार्ग द्वारा

निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट, देहरादून है जहां से बस या टैक्सी के माध्यम से आसानी से पहुंचा जा सकता है।

ट्रेन द्वारा

निकटतम रेलवे स्टेशन हरिद्वार, देहरादून, कोटद्वार और काठगोदाम हैं। पर सबसे सुगम और आरामदायक हरिद्वार रहेगा। वहां से बस या टैक्सी के माध्यम से आसानी से पहुंचा जा सकता है। आप चाहें तो टैक्सी साझा भी कर सकते हैं जो आपकी जेब पर ज्यादा बोझ नहीं डालेगा।

सड़क मार्ग द्वारा

सड़क मार्ग से यमुनोत्री जाने के लिए सबसे अच्छा मार्ग देहरादून और बरकोट है। अगर आप हरिद्वार-ऋषिकेश से आ रहे हैं तो धरासू द्विभाजन बिंदु से यमुनोत्री के लिए रास्ता लें। यमुनोत्री हरिद्वार, देहरादून, चंबा, टिहरी, बरकोट, हनुमान चट्टी और जानकी चट्टी से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।

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3- बद्रीनाथ धाम

बद्रीनाथ मंदिर हर साल कई आगंतुकों को आकर्षित करता है, और यह भारत के सबसे अधिक देखे जाने वाले तीर्थस्थलों में से एक है। यहाँ मनाया जाने वाला सबसे प्रमुख त्यौहार माता मूर्ति का मेलाविच है जो माँ पृथ्वी पर गंगा नदी के वंश को याद करता है।

कहा जाता है कि आदिगुरु शंकराचार्य जी भी भ्रमण करते हुए यहां आए और एक मंदिर की स्थापना की, जो आज बद्रीनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पास में निकट जोशीमठ भी आदि गुरु शंकराचार्य जी द्वारा ही स्थापित किया गया था।

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संबंधित किवदंतियां

बद्रीनाथ मंदिर के पीछे दो किंवदंतियां हैं, एक, हिंदू कथा के अनुसार, विष्णु ठंड के मौसम से अनजान स्थान पर ध्यान में बैठे थे। उनकी पत्नी लक्ष्मी ने उन्हें बद्री वृक्ष के रूप में कठोर मौसम से बचाया और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्होंने उस स्थान का नाम बद्री का आश्रम रखा जो बाद में बद्रीनाथ के नाम से जाना जाने लगा।

विष्णु पुराण द्वारा वर्णित एक अन्य कथा में कहा गया है कि धर्म के दोनों पुत्रों नर और नारायण ने अपने धर्म के प्रसार और एक धर्मशाला स्थापित करने के लिए जगह की तलाश कर रहे थे। वे पंच बद्री के अन्य चार बद्री, जैसे कि ध्यान बद्री, ब्रिधा बद्री, भविष्य बद्री और योग बद्री आए। अलकनंदा नदी के पीछे गर्म और ठंडे झरने को खोजने के बाद उन्होंने इसका नाम विशाल बद्री रखा।

कैसे पहुंचे

हवाईजहाज द्वारा

बद्रीनाथ से निकटतम हवाई अड्डा देहरादून के पास जॉली ग्रांट हवाई अड्डा है, जो बद्रीनाथ से लगभग 317 किमी दूर है।

हेलीकाप्टर द्वारा

एक हेलीकॉप्टर यात्रा की दूरी मुश्किल से 100 किमी है। देहरादून से बद्रीनाथ तक हेलीकाप्टर सेवा के कई प्रदाता हैं।

ट्रेन द्वारा

बद्रीनाथ से निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश (297 किलोमीटर), हरिद्वार (324 किलोमीटर) और कोटद्वार (327 किलोमीटर) हैं।

बस द्वारा

बद्रीनाथ सड़क मार्ग से आसानी से पहुँचा जा सकता है। यह दिल्ली से 525 किलोमीटर और ऋषिकेश से 296 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दिल्ली, हरिद्वार और ऋषिकेश से बद्रीनाथ के लिए नियमित बसें चलती रहती हैं।

मुख्य बिंदु: ऋषिकेश बस स्टेशन से बद्रीनाथ के लिए नियमित बसें चलती हैं और सुबह होने से पहले शुरू होती हैं। जोशीमठ के बाद सड़क संकीर्ण है और सूर्यास्त के बाद सड़क पर यात्रा की अनुमति नहीं है। इसलिए यदि कोई ऋषिकेश बस स्टेशन पर बद्रीनाथ के लिए बस से चूक जाता है, तो उसे केवल रुद्रप्रयाग, चमोली या जोशीमठ तक जाना पड़ता है और उस शहर से बद्रीनाथ के लिए सुबह की बस लेने के लिए रात बितानी पड़ती है।

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4- केदारनाथ धाम

केदारनाथ धाम चारों धामों में सबसे लोकप्रिय धाम है, खासकर युवाओं में। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल होने के साथ साथ पंच केदार में से एक है। इस स्थान पर भगवान शिव एक बैल के रूप में विराजे थे। इस स्थान पर बैल के पिछले भाग की पूजा होती है। संपूर्ण स्थान तीन तरफ से पहाड़ी से घिरा है।

इस मंदिर के स्थापना के बारे में कोई सही जानकारी नहीं है पर माना जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने यहां मंदिर की स्थापना की। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार यह मंदिर 12वीं सदी के आसपास की है। लोगों का मानना है कि यदि आप सिर्फ बद्रीनाथ की यात्रा करते है और केदारनाथ नहीं जाते है तो आपकी यात्रा अधूरी मानी जाती है।

uttarakhand Char Dham Yatra
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संबंधित किंवदंती

पांडव महाभारत के युद्ध के मैदान में अपने पापों से खुद को मुक्त करने के लिए भगवान शिव को खोज रहे थे। भगवान शिव इतनी आसानी से उन्हें माफ करने के मूड में नहीं थे, इसलिए उन्होंने खुद को एक बैल में बदल लिया और उत्तराखंड के गढ़वाल की ओर चले गए। पांडवों द्वारा पाए जाने पर, वो भूमि के अंदर समाहित हो गए और पांडवो को दर्शन दिया।

भगवान के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग हिस्सों में आए – केदारनाथ में पीठ (कूबड़), तुंगनाथ में भुजाएं, मध्य-महेश्वर में नाभि, रुद्रनाथ में मुख और कल्पेश्वर में जटा के साथ निकले। केदारनाथ सहित इन पांच स्थलों को पंच-केदार के रूप में जाना जाता है। पांडवों को पाँच स्थानों में से प्रत्येक पर बने मंदिर मिले।

कैसे पहुंचे:

हवाई जहाज द्वारा

निकटतम घरेलू हवाई अड्डा देहरादून में जॉली ग्रांट हवाई अड्डा है, जो केदारनाथ से लगभग 239 किमी दूर है और दिल्ली के लिए दैनिक उड़ानें संचालित करता है। देहरादून हवाई अड्डे से केदारनाथ के लिए टैक्सी उपलब्ध हैं। निकटतम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा दिल्ली है।

ट्रेन द्वारा

निकटतम रेलवे स्टेशन हरिद्वार और ऋषिकेश है। वहां आप से आप टैक्सी या बस की मदद ले सकते है। सड़क मार्ग से 207 किमी और शेष 16 किमी पैदल यात्रा करके केदारनाथ पहुंचा जा सकता है।

सड़क द्वारा

पर्यटक ऋषिकेश और कोटद्वार से केदारनाथ के लिए नियमित बसों में सवार हो सकते हैं। इन स्थानों से निजी टैक्सी भी ली जा सकती हैं। गौरीकुंड से केदारनाथ पैदल जाना पड़ता है। आप चाहें तो हेलीकॉप्टर या खच्चर की मदद से भी जा सकते हैं। इसके लिए ट्रेक्किंग गौरीकुंड से प्रारंभ होती है।

कब जाएं और कहां ठहरें

चारों धामों के कपाट अप्रैल के महीने में पूजा पाठ के साथ पर्यटकों के लिए खोले जाते है। और दिवाली के आसपास पूजा करके कपाट पुनः बंद कर दिए जाते हैं। इसलिए अप्रैल से लेकर अक्टूबर तक के महीने आदर्श माने जाते हैं।

ठहरने के लिए कई धर्मशाला और गेस्ट हाउस है। गवर्नमेंट द्वारा संचालित गेस्ट हाउस भी आपका विकल्प हो सकता है। खाने में आपको शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलेगा।

समापन

हर किसी को सपना होता है कि जीवनकाल में एक बार जरूर इन चारों धामों की यात्रा कर सके। 2020 में कोरोना के चलते कुछ ही समय के लिए चारधाम यात्रा शुरू की गई। भले ही यह यात्रा कितनी भी कठिन हो, लोगों के आस्था और भक्ति में कोई कमी नहीं देखी जाती। लोगों को उत्साह चरम सीमा पर होता है।

नोट : इस लेख में सभी किवदंतियां और कथाएं धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित है। अगर किसी कारणवश किसी प्रकार की त्रुटि हो गई हो तो उसके लिए, हम क्षमा प्रार्थी है।

reference-
30 जनवरी 2021, uttarakhand Char Dham Yatra, wikipedia

Written by Sakshi Pandey

I am enthusiastic and determinant. I had Completed my schooling from Lucknow itself and done graduation or diploma in mass communication from AAFT university at Noida.
A Journalist by profession and passionate about writing. Hindi content Writer and Blogger like to write on Politics, Travel, Entertainment, Historical events and cultural niche. Also have interest in Soft story writing.

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