उद्धार – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | uddhar Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों आपने हिंदी साहित्य के स्तंभ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानियों के बारे में ज़रुर सुना होगा, इनमे से ही एक प्रसिद्ध कहानी – उद्धार के बारे मे आप इस लेख मे पढ़ेंगे।

उद्धार – मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी | Uddhar – A Story written by Munshi Premchand

uddhar Munshi Premchand ki kahani

उद्धार – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | uddhar Munshi Premchand ki kahani in Hindi

हिन्दू समाज की वैवाहिक प्रथा इतनी दूषित, इतनी चिंता जनक, इतनी भयंकर हो गई है कि कुछ समझ में नहीं आता उसका सुधार कैसे हो। बिरले ही ऐसे माता पिता होंगे जिनके साथ पुत्रों के बाद एक भी कन्या उत्पन्न हो जाए तो वह सहर्ष उसका स्वागत करें। कन्या का जन्म होते ही उसके विवाह की चिंता सिर पर सवार हो जाती है और आदमी उसी में दुखिया खाने लगता है।

अवस्था इतनी निराश समय और भयानक हो गई है कि ऐसे माता पिता की कमी नहीं है जो कन्या की मृत्यु पर हृदय से प्रसन्न होते हैं, मानो सिर से बाधा चल गयी। इसका कारण केवल यह है कि दहेज की दर, दिन दूनी रात चौगुनी, पावस काल के जल गुजरीं की एक या ₹2000 दहेज तक नौबत पहुँच गई है। अभी बहुत दिन नहीं गुजरेगी एक या ₹2000 केवल बड़े घरों की बात थी, छोटी छोटी शादियों 500 से 1000 तक तय हो जाती थी; अब मामूली मामूली विवाह भी 3-4000 के नीचे तय नहीं होते।

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खर्च का तो यह हाल है और शिक्षित समाज की निर्धनता और दरिद्रता दिन ब दिन बढ़ती जाती है। इसका अंत क्या होगा ईश्वर ही जाने। बेटे एक दर्जन भी हो तो माता पिता को कोई चिंता नहीं होती हे। यह उनके लिए कंपलसरी विषय नहीं ऑप्शनल विषय है। होगा तो कर देंगे; नहीं तो कह देंगे—बेटा, खाओ कमाओ, कमाई हो तो विवाह कर लेना।

बेटों की कुछ चरित्र ता कलंक की बात नहीं समझी जाती; लेकिन कन्या का विवाह तो करना ही पड़ेगा, उससे बात कर कहाँ जाएंगे? अगर विवाह में विलंब हुआ तो कन्याओं के पांव कहीं ऊंचे नीचे बढ़ गए तो फिर कुटम्ब की नाक कट जाएगी; वह प्रतीत हो गया, ताट बाहर कर दिया गया अगर वह इस दुर्घटना को सफलता के साथ गुप्त रख सका तब तो कोई बात नहीं; उसको कलंकित करने का किसी का साहस नहीं है, लेकिन अभाग्य से यदि वह इसे छिपा ना सका, भंडाफोड़ हो गया तो फिर माता पिता के लिए, भाई बंधुओ के लिए संसार मेँ मुँह दिखाने को नहीं रहता।

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कोई अपमान, कोई समस्या इससे भीषण नहीं। किसी भी व्याधि कि इससे भयंकर कल्पना नहीं की जा सकती।  मज़े की बात यह है कि जो लोग बेटियों के विवाह की कठिनाई को भूल चूके होते हैं वही अपने बेटों के विवाह के अवसर पर बिल्कुल भूल जाते हैं कि हमें कितनी ठोकरें खानी पड़ी थी, ज़रा भी सहानुभूति नहीं प्रकट करते, बल्कि कन्या के विवाह में जो कर्ज उठाया था उसे चक्रबर्ती है ब्याज के साथ बेटे के विवाह में वसूल करने पर कटिबद्ध हो जाते। कितने ही माता पिता इसी चिंता में ग्रहण कर लेता है, कोई बूढ़े के गले कन्या को बांध देता है, सै पात्र कुपात्र के विचार करने का मौका कहा।

मुंशी गुलजारीलाल ऐसे ही हदभागे पिताओं में थे। यू उनकी स्थिती बुरी न थी। दो ₹250 महीने वकालत बना लेते थे है, पर खानदानी आदमी थे, उदार हृदय, बहुत किफायत करने पर भी माकूल बचत न हो सकती थी। संबंधियों का आदर सत्कार न करें तो नहीं बनता, मित्रों की खातिरदारी न करें तो नहीं बनता। फिर ईश्वर के दिए हुए दो पुत्र थे, उनका पालन पोषण, शिक्षण का भार था, क्या करते! पहली कन्या का विवाह टेढ़ी खीर हो रहा था।

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यह आवश्यक था कि विवाह अच्छे घराने में हो, अन्यथा लोग हसेंगे और अच्छे घराने के लिए कम से कम 5000 का तकमीना था। उधर उत्तरी सयानी होती जाती थी। वह अनाज जो लड़के खाते थे, वहाँ भी खाती थी; लेकिन लड़कों को देखो तो जैसे सुखों का रोक लगा हो और लड़की शुक्ल पक्ष का चाँद हो रही थी। बहुत दौड़ धूप करने पर बेचारे को एक लड़का मिला। बाप आबकारी के विभाग में ₹400 का नौकर था, लड़का सुरक्षित था।

पत्नी से आकर बोले, लड़का तो मिला और घर बार काटने योग नहीं होंगे; पर कठिनाई यह है कि लड़का कहता है, मैं अपना विवाह न करूँगा। बाप ने समझाया, मैने कितना समझाया, ओने भी कितना समझाया पर वह टस से मस नहीं होता। कहता है मैं कभी विवाह न करूँगा। समझ में नहीं आता विवाह से क्यों इतनी घृणा करता है। कोई कारण नहीं बदला था बस यही कहता है मेरी इच्छा नहीं। माँ बाप का एकलौता लड़का है।

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उनकी परम इच्छा है कि उसका विवाह हो जाए, पर क्या करें? यू उन्होंने फलदान तो रख लिया है मुझसे कह दिया है कि लड़का सौभाव का हटीला है, अगर ना मानेगा तो फलदान आपको लौटा दिया जाएगा।

पत्नी ने कहा-तुमने लड़के को एकांत में बुलाकर पूछा नहीं?

गुलजारीलाल-बुलाया था। बैठा रोता रहा, फिर उठकर चला गया। तुमसे क्या कहूं उसके पैरों पर गिर पड़ा; लेकिन बिना कुछ कहे उठकर चला गया।

पत्नी-देखो, इस लड़की के पीछे क्या क्या झेलना पड़ता है?

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गुलजारीलाल-कुछ नहीं, आजकल के लड़के सैलानी होते हैं। अंग्रेजी पुस्तकों में पड़ते है कि विलायक में कितने ही लोग अविवाहित रहना ही पसंद करते हैं। बस यही सनक सवार हो जाती है कि अविवाहित रहने में ही जीवन की सुख और शांति है। जीना मुसीबतें हैं वह सब विवाह ही में है। मैं भी कॉलेज में था तब सोचता था कि अकेला रहूँगा और मज़े से सैर सपाटा करूँगा।

पत्नी-है तो वास्तव में ये बात यही है। विवाह ही तो सारी मुसीबतों की जड़ है। तुमने विवाह न किया होता तो क्यों ये चिंताएँ होती है? मैं भी कंवारी रहती तो चैन करती।

इसके एक महीने बाद मुंशी गुलजारीलाल के पास वर ने यह पत्र लिखा—

सादर प्रणाम।

मैं आज बहुत असमंजस में पढ़कर यह पत्र लिखने का साहस कर रहा हूँ इस दृष्टता को क्षमा कीजियेगा।

आपके जाने के बाद से मेरे पिताजी और माताजी दोनों मुझ पर विवाह करने के लिए नाना प्रकार के दबाव डाल रहे हैं। माताजी रोती है पिताजी नाराज होते हैं। वह समझते हैं कि मैं अपनी जिद के कारण विवाह से भागता हूँ।

कदाचित उन्हें यह भी संदेह हो रहा है कि मेरा चरित्र भ्रष्ट हो गया है। मैं वास्तविक कारण बताते हुए डरता हूँ कि इन लोगों को दुख होगा और आश्चर्य नहीं कि शोक में उनके प्राण भी चले जाए। इसलिए अब तक मैने जो बात गुप्त रखी थी, वहाँ आज विवश होकर आपके सामने प्रकट करता हूँ और आपसे निवेदन करता हूँ कि आप इसे गोपनीय रखेंगे और किसी दशा में भी उन लोगों के कानों में इसकी भनक न पड़ने देंगे। जो होना है वहाँ तो होगा ही पहले ही से क्यों उन्हें शोक में डूब आओ। मुझे पांच छह महीनों से यह अनुभव हो रहा है कि मैं छह रोग से ग्रसित हूँ। उसके सभी लक्षण प्रकट होते जाते है।

डाक्टरों के भी यही राय है। जहाँ सबसे अनुभवी जो दो डॉक्टर हैं उन दोनों ही से मैने अपनी आरोग्य परीक्षा कराई और दोनों ही ने स्पष्ट कहा कि तुम्हारी शंका सही है। अगर माता पिता से यह कह दूं तो वह रो रोकर मर जाएंगे। जब यह निश्चय है कि मैं संसार में थोड़े ही दिनों का मेहमान हूँ तो मेरे लिए विवाह की कल्पना करना ही पाप है।

संभव है कि मैं विशेष प्रयत्न करके साल 2 साल जीवित रहे पर वह दशा और भी भयंकर होगी, क्योंकि अगर कोई संतान हुई तो वह भी मेरे संस्कार से अकाल मृत्यु पाएगी और कदाचित पत्नी को भी इसी रोग राक्षस का भक्ष बनना पड़े। मेरे अविवाहित रहने से जो बीतेगी मुझ पर बीतेगी।

विवाहित हो जाने से मेरे साथ और कोई जी का नाश न होगा। इसलिए आपसे मेरी प्रार्थना है कि मुझे इस बंधन में डालने के लिए आग्रह ऑन कीजिये, अन्यथा आपको पछताना पड़ेगा।

‘हजारीलाल।‘

पत्र पढ़कर गुलजारीलाल ने पत्नी की ओर देखा और बोले-इस पत्र के विषय में तुम्हारा क्या विचार है।

पत्नी-मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि उसने बहाना रचा है।

गुलजारीलाल-बस बस, ठीक यही मेरा विचार भी है। उसने समझा है कि बीमारी का बहाना कर दूंगा तो आप ही हट जाएंगे। असल में बीमारी कुछ नहीं। मैने तो देखा ही था, चेहरा चमक रहा था स्टॉक बीमार का मुँह छिपा नहीं रहता।

पत्नी-रामनाम ले के विवाह करो, कोई किसी का भाग्य थोड़ी ही पढ़े बैठा है।

गुलजारीलाल-यही तो मैं सोच रहा हूँ।

पत्नी-ना हो किसी डॉक्टर से लड़के को दिखाओ। कहीं सचमुच यह बीमारी हो तो बेचारी अंबा कही की ना रहे।

गुलजारीलाल-तुम भी पागल हो क्या? इन छात्रों के दिल का हाल मैं खूब जानता हूँ। सोचता होगा अभी सैर सपाटे कर रहा हूँ विवाह हो जाएगा तो यह गुलछर्रे कैसे उड़ेंगे।

पत्नी-तो शुभ मुहूर्त देखकर लगन भिजवाने की तैयारी करो।

हजारीलाल बड़े धर्म संकट मेँ था। उसके पैरों में जबरदस्ती विवाह की बेड़ी डाली जा रही थी और वह कुछ न कर सकता था। उसने ससुर का अपना कच्चा चिट्ठा कह सुनाया; मगर किसी ने उसकी बातों पर विश्वास न किया। माँ बाप से अपनी बीमारी का हाल कहने का उसे साहस न होता था। ना जाने उनके दिल पर क्या गुजरे, न जाने क्या कर बैठे? कभी सोचता किसी डॉक्टर की शहादत लेकर ससुर के पास भेज दू, मगर फिर ध्यान आता यदि उन लोगों को उसपर भी विश्वास न आया तो? आजकल डॉक्टरी से सनत ले लेना कौन सा मुश्किल काम है।

सोचेंगे किसी डॉक्टर को कुछ देर दिलाकर लिखा लिया होगा। शादी के लिए तो इतना आग्रह हो रहा था, उधर डॉक्टरों ने स्पष्ट कह दिया था कि अगर तुमने शादी की तो तुम्हारा जीवन सूत्र और भी निर्बल हो जाएगा। महीनों की जगह दिनों में वारा-न्यारा हो जाने की संभावना है।

लगुन आ चुकी थी। विवाह की तैयारी हो रही थी मेहमान आज आते जाते थे और हजारीलाल घर से भागा भागा फिरता था। कहाँ चला जाऊं? विवाह की कल्पना ही से उसके प्राण सूख जाते थे। उस अबला की क्या गति होगी? जब उसे यह बात मालूम होगी तो वह मुझे अपने मन में क्या कहेगी? कौन इस पाप का प्रायश्चित करेगा? नहीं, उस अबला पर घोर अत्याचार न करूँगा। मेरी जिंदगी ही क्या आज नमरा कल मरूंगा कल नहीं तो परसों तो क्यों ना आज ही मर जाऊं।

आज ही जीवन का और उसके साथ सारी चिंताओं को सारी विपत्तियों का अंत कर दूँ। पिताजी रोएंगे अम्मा प्राण त्याग देंगी; लेकिन एक बालिका का जीवन तो सफल हो जाएगा मेरे बाद कोई अभागा अनाथ तो ना रोएगा।

क्यों न चलकर पिताजी से कह दूं? वहाँ एक 2 दिन दुखी रहेंगे रामाजी दो एक रो ज शोक से निराहार रह जाएगी; कोई चिंता नहीं। अगर माता पिता के इतने कष्ट से एक युवती की प्राण रक्षा हो जाए तो क्या छोटी बात है?

यह सोचकर वह धीरे से उठा और आकर पिता के सामने खड़ा हो गया।

रात के 10:00 बज गए थे। बाबू दरबारी लाल चारपाई पर लेटे हुए हुक्का पी रहे थे। आज उन्हें सारा दिन दौड़ते गुजरा था। शामियाना तय किया; बाजे वालों को बयान दिया। आतिशबाजी, फुलवारी आदि का प्रबंध किया। गंटे ब्राह्मणों के साथ महूरत का समय निकलवाया, इस वक्त ज़रा कमर सीधा कर रहे थे कि सहसा हजारीलाल को सामने देखकर चौंक पड़े। उसका उतरा हुआ चेहरा सज्जन आंखें और कुंठित मुक देखा तो कुछ चिंतित होकर बोले-क्यों लालू तबियत तो अच्छी है न? कुछ उदास मालूम होते हो।

हजारी लाल-मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ; पर भय होता है कि आप अप्रसन्न हो जाएंगे।

दरबारीलाल-समझ गया, वही पुरानी बात है न? उसके सिवा कोई दूसरी बात को शौक से कहो।

हजारी लाल-खेद है कि मैं उसी विषय में कुछ कहना चाहता हूँ।

दरबारीलाल-यही कहना चाहते हो न कि मुझे इस बंधन में न डालिए, मैं इसके आयोग के हूँ, मैं यह भार सह नहीं सकता बेडी मेरी गर्दन को तोड़ देगी आदि या और कोई नई बात?

हजारी लाल-जी नहीं नहीं बात है स्टॉप मैं आपकी आज्ञा पालन करने के लिए सब प्रकार तैयार हूँ सेमी कॉलर पर एक ऐसी बात है जिसे मैने अब तक छिपाया था, उसे भी प्रकट कर देना चाहता हूँ। इसके बाद आपको जो कुछ निश्चय करेंगे उसे मैं शिरोधार्य करूँगा।

हजारीलाल ने बड़े विनीत शब्दों में अपना आशय कहा डॉक्टरों की राय भी बयान की और अंत में बोले-ऐसी दशा में मुझे पूरी आशा है कि आप मुझे विवाह के लिए बाते ना करेंगे।

दरबारीलाल ने पुत्र के मुख्य की ओर गौर से देखा, कहे जल्दी का नाम न था, इस कथन पर विश्वास न आया; पर अपना अविश्वास छिपाने और अपना हार्दिक शोक प्रकट करने के लिए वह कई मिनट तक गहरी चिंता मेँ मग्न रहे। इसके बाद पीड़ित कंठ से बोले-बेटा, इस दशा में तो विवाह करना और भी आवश्यक है। ईश्वर न करे कि हम वह बुरा दिन देखने के लिए जीते रहे पर विवाह हो जाने से तुम्हारी कोई निशानी तो रह जाएगी।

ईश्वर ने की संतान देदी तो वही हमारे बुढ़ापे की लाठी होगी, उसी का मुँह देख देख कर दिल को समझाएंगे, जीवन का कुछ आधार तो रहेगा। फिर आगे क्या होगा यह कौन कह सकता है? डॉक्टर किसी भी कमरे खातों नहीं पढ़ते ईश्वर की लीला अपरम्पार है, डॉक्टर उसे नहीं समझ सकते। तुम निश्चित होकर बैठो, हम जो कुछ करते हैं, करने दो। भगवान चाहेंगे तो सब कल्याण ही होगा।

हजारीलाल ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया स्टॉप आखिर दबदबा आई, कंठ अवरोध के कारण मुँह तकना खोल सका। चुपके से आकर अपने कमरे में लेट गया।

3 दिन और गुजर गए पर हजारीलाल कुछ निश्चय न कर सका। सारी पूजा हो चुकी थी और द्वार पर बाजू का शोर मचा हुआ था। मोहल्ले के लड़के जमा होकर बाजार सुनते थे और उल्लास से इधर उधर दौड़ते थे।

संध्या हो गई थी। बारात आज रात की गाड़ी से जाने वाली थी। बारातियों ने अपने वस्त्र आभूषण पहनने शुरू किए। कोई नाई से बाल बनवाता था और चाहता था कि खत ऐसा साफ हो जाए मानो वह कभी बाल थे ही नहीं, बूढ़े अपने पके बालों को उखड़वाकर जवान बनने की चेष्टा कर रहे थे तेल साबुन उप्टन की लूट मची हुई थी और हजारीलाल बगीचे में एक वृक्ष के नीचे उदास बैठा हुआ सोच रहा था क्या करूँ?

अंतिम निश्चय की गाड़ी सिर पर खड़ी थी। अब एक क्षण भी विलंब करने का मौका न था अपनी वेदना किस्से कहे कोई सुनने वाला न था।

उसने सोचा हमारे माता पिता कितने अदूरदर्शी हे, अपनी उम्र में इन्हें इतना भी नहीं सोचता कि वधू पर क्या गुजरेगी। वधु के माता पिता कितने अदूरदर्शी है अपनी उम्र में भी इतने अंधे हो रहे हैं कि देखकर भी नहीं देखते जानकर भी नहीं जानते।

क्या यह विवाह है? कदापि नहीं यह तो लड़की का कुएं में डालना है, कुंद छुरे से रखना है। यह लड़की के शत्रु हैं, कसाई है हत्यारे है। क्या इनके लिए कोई दंड नहीं? जो जानबूझकर अपनी प्रिय संतान के खून से अपने हाथ रंगते है, उसके लिए कोई दंड नहीं है? समाज भी उन्हें दंड नहीं देता, कोई कुछ नहीं कहता।

यह सोचकर हजारीलाल उठा और एक और चुपचाप चल दिया। उसके मुख पर तेज छाया हुआ था। उसने आत्म बलिदान से इस कष्ट का निवारण करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था। उसे मृत्यु का लेशमात्र भी भय बना था। वह उस वक्त शाह को पहुँच गया था जब सारी आशाएं मृत्यु पर ही अवलम्बित हो जाती है।

उस दिन से फिर किसी नए हजारीलाल की सूरत नहीं देखी। मालूम नहीं जमीन खा गई या आसमान। नदियों में जाल डाले गए, कुआं में बांस पड़ गए पुलिस को बुलाया गया समाचार पत्रों में विज्ञप्ति निकाली गई, पर कहीं पता न चला।

कई हफ्तों के बाद छावनी रेलवे से एक मील पश्चिम की ओर सड़क पर कुछ हड्डियाँ मिली लोगों को अनुमान हुआ कि हजारीलाल ने गाड़ी के नीचे दबकर जान दी, पर निश्चित रूप से कुछ ना मालूम हुआ।

भादो का महीना था और तेज का दिन था। घरों में सफाई हो रही थी। सौभाग्यवती स्त्रियों 16 शृंगार किए गंगा स्नान करने जा रही थी। अम्बा स्नान करके लौट आई थी और तुलसी के कच्चे चबूतरे के सामने खड़ी वंदना कर रही थी। पतिगृह में उसे यह पहली ही तीज थी, बड़ी उमंगों से व्रत रखा था। ऐसा उसके पति ने अंदर आकर उसे साहस नेत्रों से देखा और बोले-मुंशी दरबारीलाल तुम्हारे कौन होते हैं, यह उनके यहाँ से तुम्हारे लिए तीज पठौनी आई है। अभी डाकिया ये दे गया है।

यह कहकर उसने एक पार्सल चारपाई पर रख दिया। दरबारीलाल का नाम सुनते ही अम्बा की आंखें सजल हो गईं। वह लकी हुई आई और पार्सल स्मृतियाँ जीवित हो गई, हृदय में हजारीलाल के प्रति श्रद्धा का एक उद्गार सा उठ पड़ा। यह उसी देव आत्मा के आत्म बलिदान का पुनीत फल है कि मुझे यह दिन देखना नसीब हुआ। ईश्वर उन्हें सद्गति दे संत। वह आदमी नहीं देवता थे, जिसने अपने कल्याण के नियमित अपने प्राण तक समर्पण कर दिए।

पति ने पूछा-दरबारीलाल तुम्हारा चाचा है।

अंबा-हाँ।

पति-इस पत्र में हजारीलाल का नाम लिखा है, यह कौन है?

अंबा-यह मुंशी दरबारीलाल के बेटे हैं।

पति-तुम्हारे चचेरे भाई?

अंबा-नहीं, मेरे परम दयालु उद्धारक, जीवनदाता, मुझे अतः जल में डूबने से बचाने वाले, मुझे सौभाग्य का वरदान देने वाले।

पति ने इस भाव कहा मानो कोई भूली हुई बात याद आ गई-मैं समझ गया। वास्तव में वह मनुष्य नहीं देवता थे।

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