विश्वास – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | vishvaas Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों आपने हिंदी साहित्य के स्तंभ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानियों के बारे में ज़रुर सुना होगा, इनमे से ही एक प्रसिद्ध कहानी – विश्वास के बारे मे आप इस लेख मे पढ़ेंगे।

विश्वास – मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी | Vishwas – A Story written by Munshi Premchand

vishvaas Munshi Premchand ki kahani

विश्वास – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | vishvaas Munshi Premchand ki kahani in Hindi

उन दिनों मिस जोशी बम्बई सभ्य समाज की राधिका थी। थी तो वह एक छोटी सी कन्या पाठशाला की अध्यापिका पर उनका ठाट बात मान सम्मान बड़ी बड़ी धन रानियों को भी लज्जित करता था। एक बड़े महल मेँ रहती थी, जो किसी जमाने में सतारा के महाराज का निवास स्थान था। सारे दिन नगर के रईसों, राजाओं, राज कर्मचारियों का तांता लगा रहता था।

वह सारे प्रांत के धन और कीर्ति के उपासकों की देवी थी। अगर किसी को किताब का खब्त था तो वह मिस जोशी की खुश मत करता था। किसी को अपने या संबंधी के लिए कोई अच्छा सौदा दिलाने की धुन थी तो वह मिस जोशी की आराधना करता था। सरकारी इमारतों के ठेके; नमक, शराब, अफीम आदि सरकारी चीजों के ठेके; लोहे लकड़ी, हे कलपुर्जे, आदि के ठेके सब मिस जोशी के ही हाथों में थे। जो कुछ करती थी वही करती थी, हें जो कुछ होता था उसी के हाथों होता था।

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जब इस वक्त वह अपनी अरबी गुणों की फिटन पर सैर करने निकलती तो रईसों की सवारियां आप ही रास्ते से हट जाती थी, बड़े दुकानदार खड़े होकर सलाम करने लगते थे। वह रूपवती थी, लेकिन नगर मेँ उससे बढ़कर रूपवती रमणीय भी थी। वह सुशिक्षित थी, वाक्चतुर थी, गाने में निपुण, हस्ती तो अनोखी छवि से, बोलती तो निराली घटा से, ताकि तो बाकी चितवन से; लेकिन इन गुणो मेँ उसका एकाधिपत्य न था। उसकी प्रतिष्ठा, शक्ति और कीर्ति का कुछ और ही रहस्य था।

सारा नगर ही नहीं; सारे प्रांत का बच्चा जानता था कि बम्बई के गवर्नर मिस्टर जौहरी मिस जोशी बिना दामो के गुलाम हैं। मिस जोशी की आंखो का इशारा उनके लिए नादिरशाही हुक्म था। वह सिनेमाघरों में दावतों में, जलसों में मिस जोशी के साथ साए की भांति रहते हैं। और कभी कभी उनकी मोटर रात के सन्नाटे में मिस जोशी के मकान से निकलती हुई लोगों को दिखाई देती है। इस प्रेम में  वासना की मात्रा अधिक है या भक्ति की, यह कोई नहीं जानता। लेकिन मिस्टर जौहरी विवाहित हैं और मिस जोशी विधवा इसलिए जो लोग उनके प्रेम को कलुषित कहते हैं वे उन पर कोई अत्याचार नहीं करते।

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मुंबई की व्यवस्थापिका सभा नए अनाज पर कर लगा दिया था और जनता की ओर से उसका विरोध करने के लिए एक विराट सभा हो रही थी। सभी नगरों से प्रजा के प्रतिनिधि उसमें सम्मिलित होने के लिए हजारों की संख्या में आए थे। मिस जोशी के विशाल भवन के सामने, चौड़े मैदान में हरी भरी घास पर बम्बई की जनता अपनी फरियाद सुनाने के लिए जमा थी।

अभी तक सभापति ना आए थे, इसलिए लोग बैठे गपशप कर रहे थे। कोई कर्मचारी पर आपेक्ष करता था, कोई देश की स्थिती पर, कोई अपनी दीनता पर-अगर हम लोगो में ज़रा भी सामर्थ्य होता तो मजाल थी कि यह कर लगा दिया जाता, अधिकारियों का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता। हमारी जरूरत से ज्यादा सीधापन हमें अधिकारियों के हाथों का खिलौना बनाए हुए है। है जानते हैं कि इन्हें जितना दबाते जाओ, उतना दबते जाएंगे, सिर नहीं उठा सकते।

सरकार ने भी उपद्रव की आशंका मे सशस्त्र पुलिस बुला ली। हे उस मैदान के चारों कोनों पर सिपाहियों के दल डेरा डाले पड़े थे। उनके अफसर, घोड़ों पर सवार, हाथ मैं हंटर लिए, जनता के बीच में निशंक भाव से घोड़े दौड़ते फिरते थे, मानो साफ मैदान है। मिस जोशी के ऊंचे बरामदे में नगर के सभी बड़े बड़े रईस और राज्य अधिकारी तमाशा देखने के लिए बैठे हुए थे। मिस जोशी मेहमानों का आदर सत्कार कर रही थी और मिस्टर जौहरी, आराम कुर्सी पर लेटे, इस जन्म समूह को घृणा और भय की दृष्टि से देख रहे थे।

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सहसा सभापति महाशय आपके एक किराये के तांगे पर आते दिखाई दिए। चारों तरफ हलचल मच गई, लोग उठकर उनका स्वागत करने दौड़ें और उन्हें लाकर मंच पर बैठा दिया। आपटे की अवस्था 30 से 35 वर्ष से अधिक न थी; दुबले पतले आदमी थे, मुख्य चिंता का गाढ़ा रंग चढ़ा हुआ था। बाल भी पक चूके थे, मुख पर सरल हास्य की रेखा झलक रही थी।

वह एक सफेद मोटा कुर्ता पहने थे, ना पाओं में जूते थे, ना सिर पर टोपी। इस अर्धनग्न, दुर्बल, निस्तेज प्राणी में जाने कौन सा जादू था कि समस्त जनता उसकी पूजा करती थी, उसके पैरों में जाने कौन सा जादू था कि समस्त जनता उसकी पूजा करती थी, उसके पैरों पर सिर रगड़ती थी। इस एक प्राणी के हाथों में इतनी शक्ति थी कि वह क्षण मात्र में सारी मिलों को बंद करा सकता था, शहर का सारा कारोबार मिटा सकता था। अधिकारियों को उसके भय से नींद ना आती थी, रात को सोते सोते चौक पढ़ते थे।

उससे ज्यादा भयंकर जंतु अधिकारियों की दृष्टि में दूसरा न था। ये प्रचंड शासन शक्ति उस एक हड्डी के आदमी से थर थर काँपती थी, क्योंकि उस हड्डी में एक पवित्र, निष्कलंक, बलवान और दिव्य आत्मा का निवास था।

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आपटे ने मंच पर खड़े होकर पहले जनता को शांत रहने और अहिंसा व्रत पालन करने का आदेश दिया। फिर देश में राजनीतिक स्थिती का वर्णन करने लगे। ऐसा उनकी दृष्टि सामने मिस जोशी के बरामदे की ओर गई तो उनका प्रजा दुख पीड़ित हृदय तिलमिला उठा। यह अगणित प्राणी अपनी विपत्ति की फरियाद सुनने के लिए जमा थे और वहाँ मेजों पर चाय और बिस्कुट, मेवे और फल, बर्फ़ और शराब की रेल पेल थी। वे लोग इन भावों को देख देख हँसते और तालियां बजाते थे। जीवन में पहली बार आपटे की  जुबान काबू से बाहर हो गईं। मेघ की भांति गरजकर बोले-

‘इधर तो हमारे भाई दाने दाने को मोहताज हो रहे हैं, उधर अनाज पर कर लगाया जा रहा है, केवल इसलिए कि राज्य कर्मचारियों के हलवे पूरी में कमी न हो। हम जो देश के राजा है, जो छाती फाड़कर धरती से धन निकालते हैं, भूखों मरते हैं; और वे लोग, जिन्हें हमने अपने सुख और शांति की व्यवस्था करने के लिए रखा है, हमारे स्वामी बने हुए शराबों की बोतलें उड़ाते है।

कितनी अनोखी बात है कि स्वामी भूखों मरे और सेवक शराब उठाएं, मेवे खाएं और इटली और स्पेन की मिठाइयां चले! यह किसका अपराध है? क्या सेवकों का? नहीं, कदापि नहीं, हमारा ही अपराध है कि हमने अपने सेवकों को इतना अधिकार दे रखा है। आज हम उच्च स्वर से कह देना चाहते हैं कि हम यह क्रूर और कुटिल व्यवहार नहीं सह सकते।

vishvaas Munshi Premchand ki kahani
vishvaas Munshi Premchand ki kahani

यह हमारे लिए असहनीय है कि हम और हमारे बाल बच्चे दानों को तरसे और कर्मचारी लोग विलास में डूबे हुए हमारे करुण क्रंदन की ज़रा भी परवाह न करते हुए बिहार करें। यह असहनीय है कि हमारे घरों में चूल्हे नजले और कर्मचारी लोग सिनेमाघरों में ऐश करे, नाच रंग की महफ़िलें सजाएं, दावते उड़ाए, वेश्याओं पर कंचन की वर्षा करें। संसार में और ऐसा कौन ऐसा देश होगा, जहाँ प्रजा तो भूखी मरती है और प्रधान कर्मचारी अपने प्रेम क्रीड़ा में मग्न हो, जहाँ स्त्रियों गलियों में ठोकरें खाती फिरती हो और अध्यापिकाओं का वेश धारण करने वाली वैश्याएं आमोद प्रमोद के नशे में चूर हो—-

एकाएक सशस्त्र सिपाहियों के दल मेँ हलचल पड़ गई। उनका अवसर हुक्म दे रहा था-सभा भंग कर दो, नेताओं को पकड़ लो, कोई न जाने पाए। यह विद्रोहात्मक व्याख्यान है।

मिस्टर जौहरी ने पुलिस के अवसर को इशारे में बुलाकर कहा-और किसी को गिरफ्तार करने की जरूरत नहीं। आपटे ही को पकड़ो। वही हमारा शत्रु है।

पुलिस के डंडे चलने शुरू किए। और कई सिपाहियों के साथ जाकर अफसर ने आपटे को गिरफ्तार कर लिया।

अपने प्यारे नेता को यू गिरफ्तार होते देखकर उनका धैर्य हाथ से जाता रहा। लेकिन उसी वक्त आपटे की ललकार सुनाई दी-तुमने अहिंसा व्रत लिया है और अगर किसी ने उस व्रत को तोड़ा तो उसका दोष मेरे सिर पर होगा। मैं तुमसे सविनय अनुरोध करता हूँ कि अपने अपने घर जाओ। अधिकारियों ने वही किया जो हम समझते थे इस सभा से हमारा जो उद्देश्य था वह पूरा हो गया। हम यहाँ बवाल करने नहीं, केवल संसार की नैतिक सहानुभूति प्राप्त करने के लिए जमा हुए थे, और हमारा उद्देश्य पूरा हो गया।

एक क्षण में सभा भंग हो गई और आप्टे पुलिस की हवालात में भेज दिए गए

मिस्टर जौहरी ने कहा-बच्चा बहुत दिनों के बाद पंजे में आया है, राजद्रोह का मुकदमा चलाकर कम से कम 10 साल के लिए अंडमान भेजूंगा।

मिस जोशी-इससे क्या फायदा?

‘क्यों? उसको अपने किए की सजा मिल जाएगी।‘

‘लेकिन सोचिए, हमें उसका कितना मूल्य देना पड़ेगा। अभी ज इस बात को गिने गिनाए लोग जानते हैं, वह सारे संसार में फैलेगी और हम कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। आप अखबारों में संवाददाताओं की जुबान तो नहीं बंद कर सकते।‘

‘कुछ भी हो मैं इसे जेल में सडाना चाहता हूँ। कुछ दिनों के लिए तो चैन की नींद नसीब होगी। बदनामी से डरना ही व्यर्थ है। हम प्रांत के सारे समाचार पत्रों को अपने सदाचार का राग अलापने के लिए मोल ले सकते हैं। हम प्रत्येक लांछन को झूठ साबित कर सकते हैं, आपटे पर मिथ्या दोषारोपण का अपराध लगा सकते हैं।‘

‘मैं इससे सहज उपाय बता सकती हूँ। आप आपटे को मेरे हाथ में छोड़ दीजिए। मैं उससे मिलूँगी और उन यंत्रों से, जिनका प्रयोग करने में हमारी जाती सिद्धहस्त हैं, उसके आंतरिक भावों और विचारों की था लेकर आपके सामने रख दूंगी। मैं ऐसे प्रमाण खोज निकालना चाहती हूँ जिनके उत्तर में उसे मुँह खोलने का साहस न हो, और संचार की सहानुभूति उसके बदले हमारे साथ हो। चारों ओर से यही आवाज आए कि यह कपटी और धुत था और सरकार ने उसके साथ यही व्यवहार किया है जो होना चाहिए।

मुझे विश्वास है कि वह षड्यंत्रकारियों का मुखिया है और मैं इसे सिद्ध कर देना चाहता हूँ। मैं उसे जनता की दृष्टि में देवता नहीं बनाना चाहता हूँ, उसको राक्षस के रूप में दिखाना चाहती हूँ।

‘ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जिसपर युवती अपनी मोहिनी न डाल सकें।‘

‘अगर तुम्हें विश्वास है कि तुम यह काम पूरा कर दिखाऊंगी, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैं तो केवल उसे दंड देना चाहता हूँ।‘

‘तो हुकुम दे दीजिए कि वह इसी वक्त छोड़ दिया जाए।‘

‘जनता कहीं यह तो न समझें गई सरकार डर गई?’

‘नहीं, मेरे खयाल में तो जनता पर इस व्यवहार का बहुत अच्छा असर पड़ेगा लोग समझेंगे कि सरकार ने जनमत का सम्मान किया है।‘

‘लेकिन तुम्हें उसके घर जाते लोग देखेंगे तो मन में क्या कहेंगे?’

‘नकाब डालकर जाउंगी, किसी को कानों कान खबर न होगी।‘

‘मुझे तो अब भी भय है कि वह तुम्हें संदेह की दृष्टि से देखेगा और तुम्हारे पंजे में आएगा, लेकिन तुम्हारी इच्छा है तो अजमा के देखो।‘

यह कह कर मिस्टर जौहरी ने मिस जोशी को प्रेममय नेत्रों से देखा, हाथ मिलाया और चले गए।

आकाश पर तारे निकले हुए थे, चैत की शीतल, सुखद वायु चल रही थी, सामने के चौड़े मैदान मेँ सन्नाटा छाया हुआ था लेकिन मिस जोशी को ऐसा मालूम हुआ मानव आपके मंच पर खड़ा बोल रहा है। उसका शांत, सौम्य, विषादमय स्वरूप उसकी आंखो में समाया हुआ था।

सुबह मिस जोशी अपने भवन से निकली, लेकिन उसके वस्त्र बहुत साधारण थे और आभूषण के नाम पर शरीर पर एक धागा भी न था। अलंकारविहीन होकर उसकी छवि स्वच्छ, जल की भांति और भी निखर गई। उसने सड़क पर आकर एक ताँगा दिया और चली।

आप्टे का मकान गरीबों के एक दूर के मोहल्ला में था। तांगे वाला मकान का पता जानता था। कोई दिक्कत नहीं हुई, मिस जोशी जब मकान के द्वार पर पहुंची तो न जाने क्यों उसका दिल धड़क रहा था फ़ोन स्टार्ट उसने काँपते हुए हाथों से कुंडी खटखटाई। एक अधेड़ औरत निकलकर द्वार खोल दिया। मिस जोशी उस घर की सादगी देख दंग रह गई।

एक किनारे चारपाई पड़ी हुई थी, एक टूटी अलमारी मेँ कुछ किताबें चुनी हुई थी, फर्श पर लिखने का डेस्क था और एक रस्सी की अलगनी पर कपड़े लटक रहे थे। कमरे के दूसरे हिस्से मेँ एक लोहे का चूल्हा था और खाने के बर्तन पड़े हुए थे। एक लम्बा तगड़ा आदमी, जो उसी अधेड़ औरत का पति था, बैठा एक टूटे हुए ताले की मरम्मत कर रहा था और 5-6 वर्ष का तेजस्वी बालक आपटे की पीठ पर चढ़ने के लिए उनके गले में हाथ डाल रहा था। आपके इसी लोहार के साथ उसी घर में रहते थे।

समाचार पत्रों के लेख लिखकर जो कुछ मिलता उसे दे देते और इस भाँति गृह प्रबंधन की चिंताओं से छुट्टी पाकर जीवन व्यतीत करते थे।

मिस जोशी को देखकर आप्टे ज़रा चौके, फिर खड़े होकर उनका स्वागत किया और सोचने लगे कि कहाँ बैठे। अपनी दरिद्रता पर आज उन्हें जितनी लाज आई उतनी और कभी ना आई थी। मिस जोशी उनका असमंजस देखकर चारपाई पर बैठ गई और ज़रा रुखाई से बोली-मैं बिना बुलाए आपके यहाँ आने के लिए क्षमा मांगती है किंतु काम ऐसा जरूरी था कि मेरे आय बिना पुरा ना हो सकता था, क्या मैं 1 मिनट के लिए आपसे एकांत में मिल सकती हूँ।

आपटे ने जगन्नाथ की ओर देखकर कमरे से बाहर चले जाने का इशारा किया। उसकी स्त्री भी बाहर चली गई। केवल बालक रह गया। मिस जोशी की ओर बार बार उच्च आँखों से देखता था। मानो पूछ रहा हो कि तुम दादा की कौन हो?

मिस जोशी ने चारपाई से उतर कर जमीन पर बैठे हुए कहा-आप कुछ अनुमान कर सकते हैं कि इस वक्त क्यों आई हूँ।

आपटे ने शर्माते हुए कहा-आपकी कृपा के सिवा और क्या कारण हो सकता है?

मिस जोशी-नहीं, संसार इतना उदार नहीं हुआ कि आप जिसे गालियां दे, वहाँ आपको धन्यवाद दे। आपको याद है कि कल आपने अपने व्याख्यान में मुझ पर क्या क्या आक्षेप किए थे? मैं आपसे ज़ोर देकर कहती हूँ कि वे आक्षेप करके आपने मुझ पर घोर अत्याचार किया है। आप जैसे सहृदय, शीलवान, विद्वान आदमी से मुझे ऐसी आशा न थी। मैं अबला हूँ, मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं है? क्या आपको उचित था कि एक अबला पर मिथ्या रोपण करें? अगर मैं पुरुष होती तो आपसे ड्यूल खेलने का आग्रह करती।

अबला हूँ, इसलिए आपकी सज्जनता को स्पर्श करना ही मेरे हाथ में है। आपने मुझ पर जो लांछन लगाए हैं, वे सर्वथा निर्मूल हैं।

आपटे ने दृढ़ता से कहा-अनुमान तो बाहरी परमाणु से ही किया जाता है।

मिस जोशी-बाहरी परमाणु से आप किसी के अंतःस्थल की बात नहीं चल सकते।

आपटे जिसका भीतर बाहर एक न हो, उसे देखकर भ्रम में पड़ जाना स्वाभाविक है।

मिस जोशी-हाँ, तो वह आपका भ्रम है और मैं चाहती हूँ कि आप उस कलंक को मिटा दें जो आपने मुझ पर लगाया है। आप इसके लिए प्राश्चित करेंगे?

आपटे-अगर न करूँ तो मुझ से बड़ा दुरात्मा संसार मेँ न होगा।

मिस जोशी-आप मुझ पर विश्वास करते हैं।

आपटे-मैने आज तक किसी रमणी पर विश्वास नहीं किया।

मिस जोशी-क्या आपको यह संदेह हो रहा है कि मैं आपके साथ कौशल कर रही हूँ?

आपटे ने मिस जोशी की ओर अपने सहृदय, सजल, सरल नेत्रों से देखकर कहा-बाई जी, मैं गवार और अशिष्ट प्राणी हूँ। लेकिन नारी जाति के लिए मेरे हृदय में जो आदर है, वह श्रद्धा से कम नहीं है, जो मुझे देवताओं पर है। मैने अपनी माता का मुख नहीं देखा, यह भी नहीं जानता कि मेरा पिता कौन था; किंतु जीस देवी के दया वृक्ष की छाया में मेरा पालन पोषण हुआ उनकी प्रेम मूर्ति आज तक मेरी आँखों के सामने है और नारी के प्रति मेरी भक्ति को सजीव रखे हुए है।

मैं उन शब्दों को मुहं से निकालने के लिए अत्यंत दुखी और लज्जित हूँ जो आवेश में निकल गए, और मैं आज ही समाचार पत्रों में खेद प्रकट करके आपसे क्षमा की प्रार्थना करूँगा।

मिस जोशी का अब तक अधिकांश स्वार्थी आदमियों ही से पाला पड़ा था, जिनकी चिकने चुपड़े शब्दों में मतलब छुपा हुआ था। आप टेके सरल विश्वास पर उसका चित्र आनंद से गदगद हो गया। शायद वह गंगा में खड़ी होकर अपने अन्य मित्रों से यह कहती तो उसके फैशनेबल मिलने वालों में से किसी को उस पर विश्वास न होता। सब मुँह के सामने तो हाँ हाँ करते, पर बाहर निकलते ही उसका मजाक उड़ाना शुरू कर दें। उन कपटी मित्रों के सम्मुख यहाँ आदमी था जिसके एक एक शब्द में सच्चाई झलक रही थी, जिसके शब्द अंत स्थल से निकलते हुए मालूम होते थे।

आप्टे उसे चुप देखकर किसी और ही चिंता में पड़े हुए थे। उन्हें भय हो रहा था कि अब मैं चाहे कितना क्षमा मांगो, मिस जोशी के सामने कितनी सफाई पेश करूँ, मेरे आक्षेपों का असर कभी न मिटेगा।

इस भाव ने अज्ञात रूप से उन्हें अपने विषय कई गुप्त बातें कहने की प्रेरणा की जो उन्हें उसकी दृष्टि में लघु बना दे, जिससे वह भी उन्हें नीच समझने लगे, उसको संतोष हो जाए कि यह भी कलुषित आत्मा है। बोले-मैं जन्म से अभागा हूँ। माता पिता का तो मुँह देखना नसीब नहीं हुआ, ज इस दया शील महिला ने मुझे आश्रय दिया था, वह भी मुझे तेरा वर्ष की अवस्था में अनाथ छोड़कर परलोक सिधार गईं। उस समय मेरे सिर पर जो कुछ बीती उसे याद करके इतनी लज्जा आती है कि किसी को मुँह न दिखाऊं।

मैने धोबी का काम किया; मोची का काम किया; घोड़ों की रखवाली की; एक होटल में बर्तन मांजते रहा; यहाँ तक कि कितनी ही बार सुधा से व्याकुल होकर भीख मांगी। मजदूरी करने को बुरा नहीं समझता, आज भी मज़दूरी ही करता हूँ। भीख माँगनी भी किसी किसी दशा मेँ क्षम्य है, लेकिन मैने उस अवस्था में ऐसे ऐसे कर्म किए, जिन्हें कहते लज्जा आती है-चोरी की, विश्वासघात किया, यहाँ तक कि चोरी के अपराध मेँ कैद की सजा भी पाई।

मिस जोशी ने सजल नेत्रों से कहा-आज यह सब बातें मुझसे क्यों कर रहे हैं? मैं इनका उल्लेख करके आपको कितना बदनाम कर सकती हूँ, इसका आपको भय नहीं है?

आपटे ने हंसकर कहा-नहीं, आपसे मुझे भय नहीं है।

मिस जोशी-अगर मैं आपसे बदला लेना चाहूँ तो?

आपटे ने कहा-जब मैं अपने अपराध पर लज्जित होकर आपसे क्षमा मांग रहा हूँ, तो मेरा अपराध राह ही कहा, जिसका आप मुझसे बदला लेंगी। इससे तो मुझे भय होता है कि आपने मुझे क्षमा नहीं किया। लेकिन यदि मैने आपसे क्षमा न मांगी तो मुझसे तो बदलाव न ले सकती। बदला लेने वालों की आँखें यूँ सजल नहीं हो जाया करती। मैं आपको कपट करने के लिए अयोग्य समझता हूँ। आप यदि कपट करना चाहती तो यहाँ कभी न आती।

मिस जोशी-मैं आपका भेद लेने ही के लिए आई हूँ।

आपटे ने कहा-तो शौक से ले जाइए। मैं बता चुका हूँ की मैने चोरी के अपराध मेँ कैद की सजा पाई थी। नासिक के जेल में रखा गया था। मेरा शरीर दुर्बल था, जेल की कड़ी मेहनत ना हो सकती थी और अधिकारी लोग मुझे कामचोर समझकर बेतों से मारते थे। आखिर 1 दिन मैं रात को जेल से भाग खड़ा हुआ।

मिस जोशी-आप तो छुपे रुस्तम निकले!

आपटे ने कहा-ऐसा भागा किसी को खबर नहीं हुई। आज तक मेरे नाम वारंट जारी है और ₹500 का इनाम भी है।

मिस जोशी-तब तो मैं आपको जरूर पकड़ा दूंगी।

आपटे ने कहा-तो फिर मैं आपको अपना असल नाम भी बता देता हूँ। मेरा नाम दामोदर मोदी है। यह नाम तो पुलिस से बचने के लिए रख छोड़ा है।

बालक अब तक तो चुपचाप बैठा हुआ था। मिस जोशी के मुँह से पकड़ाने की बात सुनकर वह सजग हो गया। उन्हें डांटकर बोला-हमारे दादा को कौन पकड़ेगा?

मिस जोशी-सिपाही और कौन?

बालक-हम सिपाही को मारेंगे।

यह कहकर वह एक कोने में अपने खेलने वाला डंडा उठाया और आपके पास खड़ा हो गया, मानो सिपाहियों से उनकी रक्षा कर रहा है।

मिस जोशी-आपका रक्षक तो बहुत बहादुर मालूम होता है।

आपटे ने कहा-इसकी भी एक कथा है। साल भर हो गया, यह लड़का खो गया था। मुझे रास्ते में मिला। मैं पूछता पूछता इसे यहाँ लाया। उसी दिन से इन लोगों से मेरा इतना प्रेम हो गया कि मैं उनके साथ रहने लगा।

मिस जोशी-आप अनुमान कर सकते हैं कि आपका वृतांत सुनकर मैं आपको क्या समझ रहे हूँ।

आपटे ने कहा-वही, जो मैं वास्तव में हूँ-नीच, कमीना………

मिस जोशी-नहीं, आप मुझ पर फिर अन्याय कर रहे हैं। पहला अन्याय तो क्षमा कर सकती हूँ, यह अन्याय क्षमा नहीं कर सकतीं। इतनी प्रतिकूल दशाओं में पढ़कर भी जिसका हृदय इतना पवित्र इतना निष्कपट इतना सहृदय हो वह आदमी नहीं देता है। भगवान, आपने मुझ पर जो आक्षेपक किए वह सत्य हैं। मैं आपके अनुमान से कहीं भ्रष्ट हूँ। मैं इस योग्य भी नहीं हूँ कि आपकी और ताक सकूँ। आपने अपने हृदय की विशालता दिखाकर मेरा असली स्वरूप मेरे सामने प्रकट कर दिया। मुझे क्षमा कीजिए, मुझ पर दया कीजिए।

यह कहते कहते वह उनके पैरों में गिर पड़ी। आपटे ने उसे उठा लिया और बोले-ईश्वर के लिए मुझे लज्जित न करो।

मिस जोशी ने गदगद कंठ से कहा-आप इन दुष्टों के हाथ से मेरा उद्धार कीजिए। मुझे इस योग्य बनाइए कि आपकी विश्वासपात्री बन सकू। इशवर साक्षी है कि मुझे कभी कभी अपनी दशा पर कितना दुख होता है। मैं बार बार चेष्टा करती हूँ कि अपनी दशा सुधारुँ सैनी कॉलर इस विलासिता के जाल को तोड़ दूं, जो मेरी आत्मा को चारों तरफ से जकड़े हुए हैं, पर दुर्बल आत्मा अपने निश्चय पर स्थित नहीं है। मेरा लालन पोषण जिसे ढंग से हुआ, उसका यह परिणाम होना स्वाभाविक था मालूम होता है।

मेरे उच्च शिक्षा ने गृहिणी जीवन सेव मेरे मन में घृणा पैदा कर दी फोर स्टार मुझे किसी पुरुष के अधीन रहने का विचार अस्वाभाविक जान पड़ता था। मैं गृहिणी की जिम्मेदारियां और चिंताओं को अपनी मानसिक स्वाधीनता के लिए अड़चन समझती थी। मैं तर्क बुद्धि से अपने त्रिस्वरूप को मिटा देना चाहती थी, मैं पुरुषों की भाँति स्वतंत्र रहना चाहती थी। क्यों किसी की पाबंद होकर रहूँ? क्यों अपनी इच्छाओं को किसी व्यक्ति के साँचे में डालू? क्यों किसी को यह अधिकार दूं कि तुमने यह क्यों किया, वह क्यों किया? दम्पत्ति मेरी निगाह में तुच्छ वस्तु थी।

अपने माता पिता की आलोचना करना मेरे लिए बुरा नहीं, ईश्वर उन्हें सद्गति दे, उनकी राय किसी बात पर न मिलतीं थी। पिता विद्वान थे, माता के लिए काला अक्षर भैस बराबर था। उनमें रात दिन बाद विवाद होता रहता था। पिताजी ऐसी स्त्री से विवाह विवाह हो जाना अपने जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य समझते थे। वह यह कहते कभी न थकते थे कि तुम मेरे पांव की बेड़ी बन गई हो, नहीं तो मैं नजाने कहाँ उड़ कर पहुँच गया होता उनके विचार में सदा दोष माता की अशिक्षा के सिर था।

वो अपनी एकमात्र पुत्री को मूर्खा माता से दूर रखना चाहते थे। माता कभी मुझसे कुछ कहती तो पिता उन पर टूट पड़ते-तुमसे कितनी बार कह चुका हूँ कि लड़की को डाटो मत, अभी क्या है वह स्वयं अपना भला बुरा सोच सकती है, तुम्हारे डांटने से उसके आत्मसम्मान को कितना धक्का लगेगा, यहाँ तुम नहीं जा सकती। आखिर माता ने निराश होकर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया और कदाचित इसी शोक में चल बसी। अपने घर की अशांति देखकर मुझे विवाह से और भी घृणा हो गई।

सबसे बड़ा असर मुझ पर मेरी कॉलेज की लेडी प्रिंसिपल का हुआ जो स्वयं अविवाहित थी। मेरा तो अब यह विचार है कि युवकों की शिक्षा का भार केवल आदर्श चरित्रों पर रखना चाहिए। विलास मे रत, संकर कॉलेजों के शौकीन प्रोफेसर विद्यार्थियों पर कोई अच्छा असर नहीं डाल सकते। मैं इस वक्त ऐसी बात आपसे कह रही हूँ पर अभी घर जाकर या सब भूल जाऊंगी। मैं जीस संसार मेँ हूँ, उसकी जलवायु ही दूषित है। वहाँ सभी मुझे कीचड़ में लथपथ देखना चाहते हैं। मेरे विलासक्त रहने में ही उनका स्वार्थ है।

आप वह पहले आदमी है जिसने मुझ पर विश्वास किया है, जिसने मुझे निष्कपट व्यवहार किया है। के लिए अब मुझे भूल ना जाइएगा।

आपटे ने मिस जोशी की ओर वेदन पूर्ण दृष्टि से देखकर कहा-अगर मैं आपकी कुछ सेवा कर सकूँ तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी। मिस जोशी! हम सब मिट्टी के पुतले हैं, कोई निर्दोष नहीं। मनुष्य बिगड़ता है तो परिस्थितियों से या पूर्व संस्कारों से। परिस्थितियों का त्याग करने से ही बच सकता है, संस्कारों से गिरने वाले मनुष्य का मार्ग इससे कहीं कठिन है संस्था आपकी आत्मा सुंदर और पवित्र है, केवल परिस्थितियों ने उसे ल कोहरे की भांति ढक लिया। अब विवेक का सूर्य उदय हो गया है, ईश्वर ने चाहा तो कोहरा भी हट जायेंगे। लेकिन सबसे पहले उन परिस्थितियों का त्याग करने को तैयार हो जाइए।

मिस जोशी-यही आपको करना होगा।

आपटे ने चुभती हुई निगाहों से देख कर कहा-वेत रोगी को जबरदस्ती दवा पिलाता है।

मिस जोशी-मैं सब कुछ करुँगी। मैं कड़वी से कड़वी दवा पियूंगी यदि आप पिलाएंगे। कल आप मेरे घर आने की कृपा करेंगे, शाम को?

आपटे ने कहा-अवश्य आऊंगा

मिस जोशी ने विदा देते हुए कहा-भूलिए गा नहीं, मैं आपकी राह देखती रहूंगी। की रक्षक को भी लाएगा

यह कहकर उसने बालक को गोद में उठाया और उसे गले से लगाकर बाहर निकल आई।

गर्व के मारे उसके पांव जमीन पर न पढ़ते थे। मालूम होता था, हवा में उड़ी जा रही है, प्याज सिर्फ तड़पते हुए मनुष्य को नदी का तट नजर आने लगा था। दूसरे दिन सुबह मिस जोशी ने मेहमानों के नाम दावती कार्ड भेजें और उत्सव मनाने की तैयारी करने लगी। मिस्टर आपटे के सम्मान में पार्टी दी जा रही थी। मिस्टर जौहरी ने कार्ड देखा तो मुस्कुराए।

अब महाशय इस जाल से बचकर कहाँ जाएंगे। मिस जोशी ने उन्हें फंसाने के लिए यह अच्छी तरकीब निकाली। इस काम में निपुण मालूम होती है। मैने समझा था, आपके चालक आदमी होगा मगर इन आंदोलनकारी विद्रोहियों को बकवास करने के सिवा और क्या सोच सकती है।

चार ही बजे मेहमान लोग आने लगे। नगर के बडे़ बडे़ अधिकारी बड़े बड़े व्यापारी बड़े बड़े विद्वान समाचार पत्रों के संपादक अपनी अपनी महिलाओं के साथ आने लगे। मिस जोशी ने आज अपने अच्छे से अच्छे वस्त्र और आभूषण निकाले थे, जब निकल जाती थी मालूम होता था अरुण प्रकाश की छटा चली आ रही है। भवन में चारों ओर सुगंध की लपटें आ रही थी और मधुर संगीत की ध्वनि हवा में गूंज रही थी।

पांच बजते बजते मिस्टर जौहरी आ पहुंचे और मिस जोशी से हाथ मिलाते हुए मुस्कुराकर बोले-जी चाहता है तुम्हारे हाथ चूम लूँ। अब मुझे विश्वास हो गया कि यह महाशय तुम्हारे पंजे से नहीं निकल सकते।

मिस जोशी दिलों का शिकार करने के लिए ही बनाई गई है।

मिस्टर सौरभ जी-मैने सुना है, आपके बिल्कुल गवाह सा आदमी है।

मिस्टर भरूचा-किसी यूनिवर्सिटी में शिक्षा ही नहीं पाई, सभ्यता कहाँ से आती है?

मिस्टर भरूचा-आज उसे खूब बनाना चाहिए।

महंत वीरभद्र दाढ़ी के भीतर से बोले-मैने सुना है नास्तिक है। वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं करता।

मिस जोशी-नास्तिक तो मैं भी हूँ। इश्वरपुर मेरा भी विश्वास नहीं है।

महनत-आप नास्तिक हो, पर आप कितने ही नास्तिकों को आर्थिक बना देती है।

मिस्टर जौहरी-आपने लाख की बात की कही है महंत जी!।

मिसेस भरूचा-क्यों महनत जी, आपको मिस जोशी ही ने आस्तिक बनाया है क्या?

सहसा आप्टे लोहार के बालक की ऊंगली पकड़े हुए भवन में दाखिल हुए। वह पूरे फैशनेबल रईस बने हुए थे। बालक भी किसी रईस का लड़का मालूम होता था। आज आपटे को देखकर लोगों को वितरित हुआ कि वह कितना सुंदर, सजीला आदमी है। मुख से शौर्य निकल रहा था, बोर बोर सेल शिष्टता झलकती थी, मालूम होता था वह इसी समाज में पला है। लोग देख रहे थे कि वह कहीं चूके और तालियां बजाएं, कहीं कदम फैसले और कहकहे लगाएं पर आपके मंजे हुए खिलाड़ी की भाँति, जो कदम उठाता था वह सदा हुआ, जो हाथ दिखाता था वह जमा हुआ।

लोग उसे पहले कुछ समझते थे, अब उससे ईशा करने लगे। लेकिन आपने इस कला मैं भी एक ही निकला। बात मुँह से निकली और उसने जवाब दिया, पर उसके जवाब में कटुता का लेश भी न होता था। उसका एक एक शब्द सरल, स्वच्छ, चित्त को प्रसन्न करने वाले भावों में डूबा हुआ था। मिस जोशी उस की जी वाक्चातुरी पर फूल उठी थी?

सौरव जी-आपने किस यूनिवर्सिटी से शिक्षा पाई थी?

आपटे ने कहा-यूनिवर्सिटी में शिक्षा पाई होती तो आज मैं भी शिक्षा विभाग का अध्यक्ष होता।

मिस भरूचा-मैं तो आपको भयंकर जंतु समझती थी?

आपटे ने मुस्कुराकर कहा-आपने मुझे महिलाओं के सामने न देखा होगा।

सहसा मिस जोशी अपने सोने के कमरे में कई और अपने सारे वक्त वस्त्राभूषण उतार फेंके उसके मुख से शुभ संकल्प का तेज निकल रहा था। नेत्रों से दबी ज्योति प्रस्फुटित हो रही थी, मानों किसी देवता ने उसे वरदान दिया हो। उसने सजे हुए कमरे को घृणा से देखा, अपने आभूषणों को पैरों से ठुकरा दिया और एक मोटी साफ साड़ी पहन कर बाहर निकली। आज सुबह ही उसने यह साड़ी मंगवा ली थी।

उसे इस नए वेश में देखकर सब लोग चकित हो गए। कायापलट कैसी? सहसा किसी की आंखो को विश्वास न आया; किंतु मिस्टर जौहरी बगलें बजाने लगे। मिस जोशी ने इसे फंसाने के लिए यह कोई नया स्वांग रचा है।

मित्रों! आपको याद है, परसों महाशय आपटे ने मुझे कितनी गालियां दी थी। महाशय खड़े हैं। आज मैं इन्हें उस दुर्व्यवहार का दंड देना चाहती हूँ। मैं कल इनके मकान पर जाकर इनके जीवन के सारे गुप्त रहस्यों को जान आई। यह जो जनता की भीड़ मैं गरजते फिरते हैं, मेरे एक ही निशाने पर गिर पड़े। मैं उन रहस्यों के खोलने में अब विलंब न करूँगी, आप लोग अधीर हो रहे होंगे। मैने जो कुछ देखा, वह इतना भयंकर है कि उसका बरतन सुनकर शायद आपलोगों को मोर्चा आ जाएगी। अब मुझे लेशमात्र भी संदेह नहीं है कि यह महाशय पक्के देशद्रोही हैं…….

मिस्टर जौहरी ने तालियां बजाई और तालियों से हाल गूंज उठा।

मिस जोशी-लेकिन राज्य के द्रोही नहीं, अन्याय के द्रोही, दमन के द्रोही, अभिमान के द्रोही—-

चारों ओर सन्नाटा छा गया। लोग विस्मित होकर एक दूसरे को देख रहे थे।

मिस जोशी-गुप्त रूप से शस्त्र जमा किए हैं और गुप्त रूप से हत्याएं की हैं………..

मिस्टर जौहरी ने तालियां बजाई।

मिस जोशी-लेकिन किसकी हत्या? दुख की, दरिद्रता की, प्रजा के कष्टों की, हठधर्मी की और अपने सर्च की।

चारों ओर फिर सन्नाटा छा गया और लोग चकित होकर एक दूसरे को देखने लगे, मानो उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं है।

मिस जोशी-महाराज आपटे ने डकैतियां की ओर कर रहे हैं—-

अब किसी ने ताली न बजायी, लोग सुनना चाहते थे कि देखिए आगे क्या कहती है।

उन्होंने मुझ पर भी हाथ साफ किया है, मेरा सब कुछ अपहरण कर लिया है, यहाँ तक कि अब मैं निराधार हूँ और उनके चरणों के सिवा मेरे लिए कोई आश्रय नहीं है। प्राणाधार! इस अमला को अपने चरणों में स्थान दो, उसे डूबने से बचाओ। मैं जानती हूँ तो मुझे निराश न करोगे।

यह कहते कहते हुए जाकर आपटे के चरणों में गिर पड़ी। सारी मण्डली स्तम्भित रह गई।

एक सप्ताह गुजर चुका था। आपटे पुलिस की हिरासत मेँ थे। चार अभियोग चलाने की तैयारियां चल रही थी। सारे प्रांत में हलचल मची हुई थी। नगर में रो़ज सभाएं होती थीं, पुलिस रोज़ 10 पांच आदमियों को पकड़ती थी। समाचार पत्रों में जोरों के साथ वाद विवाद हो रहा था।

रात के 9:00 बज गए थे। मिस्टर जौहरी राजभवन में मेज पर बैठे हुए सोच रहे थे कि मिस जोशी को क्या कर वापस लाएँ? उसी दिन से उनकी छाती पर सांप लौट रहा था। उसकी सूरत एक क्षण के लिए आँखों से न उतरती थी।

वह सोच रहे थे, इसने मेरे साथ ऐसे दागा कि! मैने इसके लिए क्या कुछ नहीं किया? इसकी कौनसी इच्छा थी, जो मैने पूरी नहीं की किसी ने मुझसे बेवफाई की। नहीं कभी नहीं, मैं इसके बगैर जिंदा नहीं रह सकता। दुनिया चाहे मुझे बदनाम करें, हत्यारा कहें, चाहे मुझे पद से हाथ धोना पड़े लेकिन आपटे को नहीं छोडूंगा। इस रोडे को रास्ते से हटा दूंगा, इसका टेको पहलू से निकाल बाहर करूँगा।

सहसा कमरे का दरवाजा खुला और मिस जोशी ने प्रवेश किया। मिस जौहरी हकबका कर कुर्सी पर से उठ खड़े हुए, यह सोच रहे थे कि शायद मिस जोशी ने निराश होकर मेरे पास आई है, कुछ रूखे, लेकिन नम्र भाव से बोले-आओ बाला, तुम्हारी याद में बैठा था। तुम कितनी ही बेवफाई करो, पर तुम्हारी याद मेरे दिल से नहीं निकल सकतीं।

मिस जोशी-आप केवल जुबान से कहते हैं।

मिस्टर जौहरी-क्या दिल चीर कर दिखा दू?

मिस जोशी-प्रेम प्रतिकार नहीं करता प्रेम में दौर आग्रह नहीं होता। आप मेरे खून के प्यासे हो रहे हैं, उस पर भी आप कहते हैं मैं तुम्हारी याद करता हूँ। आपने मेरे स्वामी को हिरासत में डाल रखा है यह प्रेम है! आखिर आप मुझसे क्या चाहते हैं? अगर आप समझ रहे हो कि इन सख्तियों से डरकर मैं आपकी शरण में आ जाऊंगी तो आपका भ्रम है। आपको अख्तियार है कि आपटे को काले पानी भेज दे फांसी चढ़ा दें लेकिन इसका मुझ पर कोई असर न होगा। वह मेरे स्वामी हैं मैं उनको अपना स्वामी समझती हूँ।

उन्होंने अपनी विशाल उदारता से मेरा उद्धार किया। आप मुझे विषय के पदों में फंसाते थे मेरी आत्मा को कलुषित करते थे। कभी आपको यह खयाल आया कि इसकी आत्मा पर क्या बीत रही होगी? आप मुझे आत्म शून्य समझते थे। इस देव पुरुष ने अपनी निर्मल स्वच्छ आत्मा के आकर्षण से मुझे पहली ही मुलाकात में खींच लिया। मैं उसकी हो गई और मरते दम तक उसी की रहूंगी। उस मार्ग से अब आप हटा नहीं सकते। मुझे एक सच्ची आत्मा की जरूरत थी, वो मुझे मिल गयी। उसे पाकर अब तीनों लोगों की संपदा मेरी आंखो में तुच्छ है। मैं उनके उपयोग में चाहे प्राण दे दू पर आपके काम नहीं आ सकती।

मिस्टर जौहरी-मिस जोशी। प्रेम उदार नहीं होता, क्षमाशील नहीं होता। मेरे लिए तुम सर्वशय हो, जब तक मैं समझता हूँ की तुम मेरी हो अगर तुम मेरी नहीं हो सकती तो मुझे इसकी क्या चिंता हो सकती है कि तुम किस दिशा में हो?

मिस जोशी-यहाँ आपका अंतिम निर्णय है?

मिस्टर जौहरी-अगर मैं कह दूं कि हाँ, तो?

मिस जोशी ने सीने से पिस्तौल निकालकर कहा-तो पहले आप की लाश जमीन पर फटती होगी और आपके बाद मेरी, बोलिए। यह आपका अंतिम निर्णय है?

यह कहकर मिस जोशी ने जौहरी की तरफ पिस्तौल सीधा किया। जौहरी कुर्सी से उठ खड़े हुए और मुस्कुराकर बोले-क्या तुम मेरे लिए कभी इतना साहस कर सकती थी? जाओ, तुम्हारा आप्टे तुम्हें मुबारक हो। उस पर से अभियोग उठा लिया जाएगा। पवित्र प्रेम ही में यह साहस है।

अब मुझे विश्वास हो गया कि तुम्हारा प्रेम पवित्र है। अगर कोई पुराना पापी भविष्यवाणी कर सकता है तो मैं कहता हूँ, वह दिन दूर नहीं, जब तुम इस भवन की स्वामिनी होगी। आपटे ने मुझे प्रेम के क्षेत्र में नहीं, राजनीति के क्षेत्र में भी परास्त कर दिया। सच्चा आदमी एक मुलाकात में ही जीवन बदल सकता है, आत्मा को जगा सकता है और अज्ञान को मिटाकर प्रकाश की ज्योति फैला सकता है, यह आज से तो हो गया।

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