सद्गति – प्रेमचंद की कहानी | sadgati Munshi Premchand ki kahani in Hindi |

दोस्तों आपने हिंदी साहित्य के स्तंभ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानियों के बारे में ज़रुर सुना होगा, उन्होने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज की कुरुतियों को उजागर करने का प्रयास किया। इनमे से ही एक प्रसिद्ध कहानी – सद्गति के बारे मे आप इस लेख मे पढ़ेंगे।

सद्गति – मुंशी प्रेमचंद की कहानी (मानसरोवर) || Sadgati by Munshi Premchand || RED PAPERS

sadgati Munshi Premchand ki kahani

सद्गति – प्रेमचंद की कहानी | sadgati Munshi Premchand ki kahani in Hindi |

दुखी चमार द्वार पर झाड़ू लगा रहा था और उसकी पत्नी जूरिया, घर को गोबर से लीप रही थी। दोनों अपने अपने काम से फुरसत पा चूके थे, तो चमारिन ने कहा- जाके पंडित बाबा से कहा आओ ना। ऐसा न हो कही चले जाए।

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दुखी- हाँ जाता हूँ, लेकिन यहाँ तो सोच, बैठेंगे किस चीज़ पर?

जूरिया-कहीं से खाट मिल जाएगी? ठाकुर से मांग लाना।

दुखी- तू तो कभी कभी ऐसी बात कह देती है कि देह जल जाती है। ठाकुर मुझे खाटदेंगे! आग तक तो घर से निकलती नहीं, हमारे उपले, भूसा, लकड़ी थोड़े ही है जो चाहे उठा ले जाएं। लें अपनी खटोली धोकर रख दे। गर्मी के तो दिन है। उसके आते आते सूख जाएगी।

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जूरिया- वहाँ हमारी खटोली पर बैठेंगे नहीं देखते नहीं कितने नेम धर्म से रहते हैं।

दुखी नेजरा चिंतित होकर कहा- हाँ, यह बात तो है। महुए के पत्ते तोड़कर एक पत्थर बना लूँ तो ठीक हो जाए। पत्तल में बड़े बड़े आदमी खाते हैं। वहपवित्र है। लाडंडा, पत्ते तोड़ लें।

जूरिया- पत्तल में बना लुंगी, तुम जाओ। लेकिन हाँ, उन्हें सीधा भी तो देना होगा। अपनी थाली में रख दूं?

दुखी- नहीं ऐसा गजब ऑन करना, नहीं तो सीधा भी जाए और थाली भी फूटे! बाबा थाली उठाकर पटक देंगे। उनको बड़ी जल्दी क्रोध चढ़ जाता है। क्रोध में पंडिताइन तक को छोड़ते नहीं, लड़के को तो ऐसा पीटा कि आज तक टूटा हाथ लिए फिरता है। पत्तल में सीधा भी देना, हाँ। बल्कि तू छूना मत। जूरी गोडकी लड़की को लेकर साह की दुकान से सब चीजे ले आना।

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सीधा भरपूर हो। सेर भर आटा, आधा सेर चावल, पांव भर दाल, गाय का घी, हल्दी और पत्तल में एक किनारे चार आने पैसे रख देना। गोंड की लड़की ना मिलेतो बुरजिन के हाथ पैर जोड़कर ले जाना। तू कुछ मत छूना, नहीं तो गजब हो जाएगा।

इन बातों की ताकीद करके दुखी ने लकड़ी उठाई और घास का एक बड़ा सा गठा लेकर पंडितजी से अर्ज करने चला। खाली हाथ बाबाजी की सेवा में कैसे जाता नजराने के उसके पास घास के सिवाय और क्या था। उसे खाली देखकर तो बाबा दूर से ही दुत्कार लगाते।

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पंडित घासीराम ईश्वर के परम भक्त थे। नींद खुलते ही ईश्वर उपासना में लग जाते हैं। मुँह हाथ धोते आठ बजते, तब असली पूजा शुरू होती जिसका पहला भाग भांग की तैयारी थी। उसके बाद आधा घंटा तक चंदन रगड़ते कमा फिर आईने के सामने 1 दिन कैसे माथे पर तिलक लगाते।

चंदन की दो रेखाओं के बीच में लाल रंग की बिंदी होती थी। फिर छाती पर, बाहों पर चंदन की गोल गोल मुद्राएं बनाते। फिर ठाकुर जी की मूर्ति निकालकर उसे नहलाते, चंदन लगाते, फूल चढ़ाते, आरती करते, गलती बजाते। 10 बजते बजते वह पूजन से उठते और भांग छानकर बाहर आते। तब तक दो चार जजमान द्वार पर आ जाते! ईश्वर उपासना का तत्काल फल मिल जाता। वही उनकी खेती थी।

आज वह पूजन गृह से निकले, तो देखा दुखी चमार घास का एक गड्ढा लिए बैठा था। दुखी उन्हें देखते ही उठ खड़ा हुआ और उन्हें शास्त्रांग दंडवत करके हाथ बांधकर खड़ा हो गया। यहाँ तेजस्वी मूर्ति देखकर उसका हृदय श्रद्धा से परिपूर्ण हो गया! कितनी दिव्य मूर्ति थी। छोटा सा गोल मटोल आदमी, चिकना सिर, फूले गाल, ब्रह्मतेज प्रदीप आँखें। रोरी और चन्दन देवताओं की प्रतिभा प्रदान कर रही थी। दुखी को देखकर श्रीमुख से बोले- आज कैसे चला रहे दुखिया?

दुखी ने सिर झुकाकर कहा- बिटिया की सगाई कर रहा हूँ महाराज! कुछ सगुन विचारना है। कब मर्जी होगी?

घासीराम- आज मुझे छुट्टी नहीं। हाँ सांझ तक आ जाऊंगा।

दुखी- नहीं महाराज, जल्दी मर्जी हो जाए। सब सामान ठीक कर आया हूँ। यह घास कहा रख दूँ?

घासीराम- इस गाय के सामने डाल दे और ज़रा झाड़ू लेकर द्वार तो साफ करदे। यह बैठक भी कई दिन से लिपी नहीं है। उसे भी गोबर से लीप दे। तब तक मैं भोजन कर लू। फिर ज़रा आराम करके चलूँगा। हाँ, यह लकड़ी भी चीर देना। खलिहान में चार खांची भूसा पड़ा है। उसे भी उठा लाना।

दुखी फौरन हुक्म की तामील करने लगा। द्वार पर झाड़ू लगाई, बैठक को गोबर से लीपा। तब 12:00 बज गए। पंडितजी भोजन करने चले गए। दुखी ने सुबह से कुछ नहीं खाया था। उसे भी ज़ोर से भूख लगी! पर वहाँ खाने को क्या धरा था। घर यहाँ से मिल भर था। वहाँ खाने चला जाए, तो पंडितजी बिगड़ जाए। बेचारे ने भूख दबाई और लकड़ी फाड़ने लगा। लकड़ी की मोटी सी गांठ थी; जिसपर पहले कितने ही भक्तों ने अपना ज़ोर आजमा लिया था। वह उसी दमखम के साथ लोहा लेने को तैयार थी। दुखी घास छीलकर बाजार ले जाता था।

लकड़ी चीरने का उसे अभ्यास न था। घास उसके खुरपे के सामने सिर झुका देती थी। यहाँ कसकर कुल्हाड़ी का भरपूर हाथ लगता; पर उस गांठ पर निशान तक न पड़ता था। कुल्हाड़ी उचट जाती। पसीने में तर था, हफ्ता था, थककर बैठ जाता था, फिर उठता था। हाथ उठाए न उठते थे, पांव कांप रहे थे, कमर न सीधी होती थी, आँखों तले अंधेरा हो रहा था, सिर मेँ चक्कर आ रहे थे, फिर भी अपना काम किए जाता था।

अगर एक चिलम तमाकू पीने को मिल जाती, तो शायद कुछ ताकत आती। उसने सोचा, यहाँ चिल्लम और तमाकू कहाँ मिलेंगे। ब्राह्मण लोग हम नीचे जातो की तरह तमाकू थोड़े ही पीते हैं। सहसा उसे याद आया कि गांव में एक गोड भी रहता है उसके यहाँ जरूर चिल्लम तमाकू होगी तुरंत उसके घर दौड़ा। खैर मेहनत सफल हुई उसने तमाकू भी दी और चिल्लम भी दी; पर आग वहाँ ना थी।

दुखी ने कहा- आग की चिंता ना करो भाई। मैं जाता हूँ, पंडितजी के घर से आग मांग दूंगा। वहाँ तो अभी रसोई बन रही थी।

यह कहता हुआ वह दोनों चीजें लेकर चला आया और पंडितजी के घर के दरवाजे पर खड़ा होकर बोला- मालिक ज़रा आगमिल जाएगी, तो चिल्लम पीले।

पंडितजी भोजन कर रहे थे। पंडिताइन ने पूछा- यह कौन आदमी आग मांग रहा है?

पंडित- अरे वही ससुरा दुखिया चमार है। कहाँ है थोड़ी सी लकड़ी चीज़ दे। आगतो है दे दो।

पंडिताई ने तैश में आकर कहा- तुम्हें तो जैसे पोथी पतरे के फेर में धर्म कर्म किसी बात की सुधी ही नहीं रही। चमार हो, धोबी हो, मुँह उठाए घर में चला आए। हिन्दू का घर नहीं हुआ, कोई सराय हुई।

पंडित जी ने उन्हें समझाकर कहा- भीतर आ गया, तो क्या हुआ। तुम्हारी कोई चीज़ तो नहीं छुई। धरती पवित्र है। ज़रा सी आग दे क्यों नहीं देती, काम तो हमारा ही कर रहा है। कोई और यही लकड़ी फाड़ता तो कम से कम चार आने लेता।

पंडिताइन ने गरजकर कहा- वह घर आया क्यों!

पंडित ने हारकर कहा- ससुरे का अभाग्य था और क्या!

पंडिताई- अच्छा, इस वक्त तो आग दिए देती हूँ, लेकिन फिर जो इस तरह घर में आएगा, तो उसका मुँह जला दूंगी।

दुखी के कानों में इन बातों की भनक पड़ रही थी। पछताता रहता था, बेकार ही आया। सच तो कहती है। पंडित के घर में चमार कैसे चला जाये। बड़े पवित्र होते हैं यह लोग, तभी तो संसार पूजा करता है, तभी तो इतना मान है। इसी गांव में बूढ़ा हो गया; मगर मुझे इसकी अक्लना आई।

इसलिए जब पंडिताइन आग लेकर निकली, तो वह मानो स्वर्ग का वरदान पा गया। दोनों हाथ जोड़कर जमीन पर माथा टेकता हुआ बोला- पंडिताइन माता, मुझसे बड़ी भूल हुई कि घर में चला आया। चमार की अकल ही तो ठहरी। इतने मूर्ख ना होते, तो लात क्यों खाते।

पंडिताइन चिमटे से पकड़कर आग लगाई थी। पांच हाथ की दूरी से घूंघट की आड़ से दुखी की तरफ आग फेंकी। आग की बड़ी सी चिंगारी दुखी के सिर पर पड़ गई। जल्दी से पीछे हटकर सिर से चिंगारी हटाने लगा। उसने मन में कहा- यह एक पवित्र ब्राह्मण के घर को अपवित्र करने का फल है। भगवान ने कितनी जल्दी फल दे दिया। इसी से तो संसार पंडितों से डरता है। और सबके रुपए तो मारे जाते हैं ब्राह्मण के रूप में भला कोई मार तो ले! घर भर का सत्यानाश हो जाए, पांव गल गल कर गिरने लगे।

बाहर आकर उसने चंपई और फिर कुल्हाड़ी लेकर जुट गया। खटखट की आवाजें आने लगी।

उसपर आग पड़ गई, तो पंडिताइन को उस पर कुछ दया आ गई।

पंडितजी भोजन करके उठे, तो बोली- इस चमार को भी कुछ खाने को दे दो, बेचारा कब से काम कर रहा है। भूखा होगा

पंडित जी ने इस प्रस्ताव को व्यावहारिक क्षेत्र से दूर समझकर पूछा- रोटियां है?

पंडिताइन- दो-चार बच जाएगी।

पंडित- इतनी रोटियो में क्या होगा? चमार है कम से कम सेर भर चढ़ा जाएगा।

पंडिताइन कानों पर हाथ रखकर बोली- अरे बाप रे! तो फिर रहने दो।

पंडित जी ने अब शेर बनकर कहा- कुछ भूसी चौकर हो तो आटे में मिला कर दो ठो लिटा ठोक दो। साले का पेट भर जाएगा।

पतली रोगियों से इन नीचे का पेट नहीं भरता।

पंडिताइन ने कहा- अब जाने भी दो, धूप में कौन मरे।

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दुखी ने चिलम पीकर फिर कुल्हाड़ी संभाली। दम लेने से ज़रा हाथों में ताकत आ गई थी। कोई आधा घंटे तक फिर कुल्हाड़ी चलता रहा। फिर वे दम होकर वहीं सिर पकड़कर बैठ गया।

इतने में वही गोड़ आ गया। बोला- क्यों जान देते हो बूढ़े दादा, तुम्हारे फाड़े या घटना फटेगी।

दुखी ने माथे पर पसीना पोछकर कहा- अभी गाडी भूषण होना है भाई

गोड़- कुछ खाने को मिला कि काम ही कराना जानते हैं। जाकर मांगते क्यों नहीं?

दुखी- कैसी बात करते हो, ब्राह्मण की रोटी हमको पचेगी!

गोड़- पहले मिले तो। मूंछों पर ताव देकर भोजन किया और आराम से सोए, तुम्हें लकड़ी फाड़ने का हुक्म लगा दिया। जमीदार भी कुछ खाने को देता है। हाकिम भी बेगार लेता है, तो थोड़ी मंजूरी देता है। यहाँ उनसे भी बढ़ गए, उस पर धर्मात्मा बनते हैं।

दुखी- धीरे धीरे बोलो भाई, कहीं सुन ले तो आफत आ जाए।

यह कहकर दुखी फिर संभल पड़ा और कुल्हाड़ी की चोट मारने लगा। चिखुरी को उस पर दया आयी। आकर कुल्हाड़ी उसके हाथ से छीन ली और कोई आधे घंटे खूब कसकर कुल्हाड़ी चलाई; पर गांठ में एक दरार भी न पड़ी। तब उसने कुल्हाड़ी फेंक दी और यह कहकर चला गया- तुम्हारे फाड़े ना फटेगी, जान भले निकल जाए।

दुखी सोचने लगा, बाबा ने यह गांठ कहा रख छोड़ी थी की फाड़े नहीं पड़ती। कहीं दरार तक तो नहीं पड़ती। मैं कब तक इसे चीरता रहूंगा। अभी घर पर 100 काम पड़े हैं। कार- करोजनका घर है, एक ना एक चीज़ घटी ही रहती है; पर इन्हें इसकी क्या चिंता। चलू जब तक भूसा ही उठा लाओ। कह दूंगा, बाबा, आज तो लकड़ी नहीं फटी, कल आकर फाड़ दूंगा।

जाकर भूसा ढोने लगा। खलियान यहाँ से दो फलांग से कम न था। अगरछोवा खूब भरकर लाता तोकाम जल्द खत्म हो जाता। भूसा ढोते ढोते 4:00 बज चूके थे। पंडित जी की नींद भी खुली। मुँह धोया, पान खाया और बाहर निकलें। देखा, तो दुखी छोवा सिर पर रखे सो रहा है। ज़ोर से बोलें- अरे, दुखिया तू तो सो रहा है? लकड़ी तो अभी ज्यों की त्यों पड़ी हुई है।

इतनी देर तू करता क्या रहा? मुट्ठीभर भूसा ढोने में सांझ कर दी! उस पर सो रहा है। उठा ले कुल्हाड़ी और लकड़ी फाड़ डाल, तो जिससे ज़रा सी लकड़ी नहीं फटती। फिर सगुन भी वैसे ही निकलेगी, मुझे दोष मत देना! इसी से कहा है कि नीचे के घर में खाने को हुआ और उसकी आंखें बदली।

दुखी ने फिर कुल्हाड़ी उठाई। जो बातें पहले सोच रखी थी वह सब भूल गई। पेट पीठ में धंसा जाता था, आज सवेरे जलपान तक ना किया था। अवकाश ही न मिला।उठ पाना ही पहाड़ मालूम होता था। जी डूबा जाता था, दिल को समझकर उठा। पंडित है, कहीं साहित्य ठीक ना विचारे तो सत्यानाश हो जाए। जभी तो संसार में इतना मान है। पंडितजी गांठ के पास आकर खड़े हो गए और बढ़ावा देने लगे- हाँ, मारकसके, और मारकसके मार अबे ज़ोर से मार– तेरे हाथ में तो जैसे दम ही नहीं है- लगा कसके, खड़ा सोचने क्या लगता है- हाँ बस फटा ही चाहती है! दे उसी दरार में!

दुखी अपने होश में आ था। ना जाने कौन सी गुप्त शक्ति उसके हाथों को चला रही थी। वो थकान, भूख, कमजोरी सब मानव भाग गयी। उसे अपने बाहुबल पर स्वयं आश्चर्य हो रहा था। एक एक चोट लोहे की तरह पड़ती थी। आधे घंटे तक वह इसी तरह हाथ चलाता रहा यहाँ तक की लकड़ी बीच से फट गयी और दुखी के हाथ से कुल्हाड़ी छूटकर गिर पड़ी। इसके साथ वह भी चक्कर खाकर गिर पड़ा। भूका, प्यासा, थका हुआ शरीर जवाब दे गया।

पंडित जी ने पुकारा- उसके हाथ और लगा दे।

दुखी ना उठा। पंडित जी ने अब उसे दिककरना उचित न समझा। भीतर जाकर बूटी छानी, स्नान किया और पंडिताई बना पहनकर बाहर निकलें! दुखी अभी तक वहीं पड़ा हुआ था। ज़ोर से पुकारा- अरे क्या पढ़े ही रहोगे दुखी, चलो तुम्हारे ही घर चल रहा हूँ। सब सामान ठीक ठीक है ना?

दुखी फिर भी ना उठा। अब पंडित जी को कुछ शंका हुई। पास जाकर देखा, तो दुखी अकड़ा पड़ा हुआ था। बदहवाश होकर भागे और पंडिताइन से बोले- दुखिया तो जैसे मर गया।

पंडिताइन हकबका कर बोली- वह तो अभी लकड़ी चीररहा था न?

पंडित- हाँ लकड़ी चीरते मर गया। अब क्या होगा?

पंडिताइन ने शांत होकर कहा- होगा क्या, चम्रोने मैं खबर कर दोलाश उठा ले जाएं।

एक क्षण में गांव भर में खबर हो गयी। पूरे में ब्राह्मणों की ही बसती थी। केवल एक घर गौड़ का था। लोगों ने इधर का रास्ता छोड़ दिया। कुएँ का रास्ता उधर से ही था, पानी कैसे भरा जाए! चमार की लाश के पास से होकर पानी भरने कौन जाए। एक बुढ़िया ने पंडित जिससे कहा- अब लाश फेंकवाते क्यों नहीं? कोई गांव में पानी पिएगा या नहीं।

इधर गौड़ ने जाकर सबसे कह दिया- खबरदार, लाश उठाने मत जाना। अभी पुलिस की तहकीकात होगी। दिल्लगी है कि एक गरीब की जान ले ली। पंडितजी होंगे, तो अपने घर के होंगे। लाश उठाओगे तो तुम भी पकड़े जाओगे।

इसके बाद ही पंडितजी पहुंचे; पर कोई आदमी लाश उठाने को तैयार नहीं हुआ, हाँ दुखी की स्त्री और कन्या दोनों रोते बिलखते वहाँ चली और पंडितजी के द्वार पर आकर सिर पीटकर रोने लगी। उनके साथ 5-10 औरतें और थी। कोई रोती थी, कोई समझती थी, पर चमार एक भी ना था। पंडित जी ने सबको बहुत धमकाया, समझाया मिन्नतें की; पर चमारों के दिल पर पुलिस का रौब छाया हुआ था एक भी नमाना। आखिर निराश होकर लौट आए

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आधीरात तक रोना पीटना जारी रहा। देवताओं का सोना मुश्किल हो गया। पर लाश उठाने कोई चमारन आया और ब्राह्मण चमार की लाश कैसे उठाते! भला ऐसा किसी शास्त्र पुराण में लिखा है? कहीं कोई दिखा दे।

पंडिताई ने झुंझलाकर कहा-इन डायनों ने तो खोपड़ी चाट डाली। किसी का गला भी नहीं पकता।

पंडित ने कहा- रोने दो चुड़ैलों को, कब तक रहेंगी। जीता था तो कोई बात न पूछता था। मर गया, तो कोलाहल मचाने के लिए सबकी सब आ पहुँची।

पंडिताइन- चमार का रोना मनहूस है।

पंडित- हाँ, बहुत मनहूस।

पंडिताइन- अभी से दुर्गंध उठने लगी।

पंडित- चमार था ससुर की नहीं। साथ असाद किसी का विचार है इन सबों को।

पंडिताइन- इन सबों को दुर्गन्ध भी नहीं लगती।

पंडित- भ्रष्ट हैं सब।

रात तो किसी तरह कटी; मगर सवेरे भी कोई चमारन आया। औरतें भी रोरो कर चली गयी। दुर्गन्ध कुछ कुछ फैलने लगी।

पंडित जी ने एक रस्सी निकाली। उसका फंदा बनाकर लाश के पैर में डाला और फंदे को खींचकर कस दिया। अभी कुछ कुछ धुंधला था। पंडित जी ने रस्सी पकड़ कर लाश को घसीटना शुरू किया और गांव के बाहर घसीट ले गए। वहाँ से आकर तुरंत स्नान किया, दुर्गा पाठ किया और घर में गंगाजल छिड़का।

उधर दुखी की लाश को खेत में गीदड़ और गिद्ध, कुत्ते और कौवे नोच रहे थे। यही जीवन पर्यंत की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।

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