दुर्गा का मंदिर – प्रेमचंद की कहानी | durga ka mandir Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों आपने हिंदी साहित्य के स्तंभ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानियों के बारे में ज़रुर सुना होगा, इनमे से ही एक प्रसिद्ध कहानी – दुर्गा का मंदिर के बारे मे आप इस लेख मे पढ़ेंगे।

दुर्गा का मंदिर – प्रेमचंद की कहानी || Durga ka Mandir – Munshi Premchand Audio Stories – RED PAPERS

दुर्गा का मंदिर – प्रेमचंद की कहानी | durga ka mandir Munshi Premchand ki kahani in Hindi

बाबू ब्रिजनाथ कानून पढ़ने में मगन थे और उनके दोनों बच्चे लड़ाई करने, श्यामा चिलाती, मुन्नू मेरी गुड़िया नहीं देता। मुन्नू रोता था कि श्यामा ने मेरी मिठाई खा ली।

ब्रिजनाथ ने क्रोध में आकर भामा से कहा– तुम इन दोस्तों को यहाँ से हटाती हो की नहीं? नहीं तो मैं एक एक की खबर लेता हूँ।

भामा चूल्हे में आग जला रही थी, बोली– अरे तो अब क्या संध्या को भी पढ़ते रहोगे? ज़रा दम तो ले लो।

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ब्रिजनाथ– उठा तो ना जाएगा; बैठी बैठी वही से कानून बघारोगी! अभी एकाध को पटक दूंगा तो वही से गरजती हुई आओगी कि हाय मेरे बच्चे को मार डाला।

भामा– तो मैं कुछ बैठी या सोई तो नहीं हूँ। ज़रा एक घड़ी तुम ही लड़कों को बनाओंगे, तो क्या होगा! कोई मैने ही तो उनकी नौकरी नहीं लिखाई।

ब्रिजनाथ से कोई जवाब न देते बना। क्रोध पानी के समान बहाव का मार्ग ना पाकर और भी प्रबल हो जाता है। यद्यपि ब्रजनाथ नैतिक सिद्धांतों के ज्ञाता थे; पर उनके पालन में इस समय कुशल न दिखाई दीं। और दोनों को रोते चिल्लाते छोड़ कानून का ग्रंथ बगल में दबा कॉलेज पार्क की राह ली।

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सावन का महीना था। आज की दिन बाद बादल हटे थे। हरे भरे वृक्ष सुनहरी चादर ओड़े खड़े थे। मधु समीर सावन का राग गाता था, और बगुले डालियों पर बैठे हिंडोली झूल रहे थे। ब्रजनाथ एक बेंच पर आ बैठे और किताब खोली। लेकिन इस ग्रंथ की अपेक्षा प्राकृतिक ग्रन्थ का अवलोकन अधिक चित्ताकर्षक था। कभी आसमान को पढ़ते थे, कभी पत्तियों को कभी छविमी हरियाली को और कभी सामने मैदान में खेलते हुए लड़कों को।

एकाएक उन्हें सामने घास पर कागज की एक पैकेट दिखाई दिया माया ने जिज्ञासा की- आड़ में चलो, देखिए इसमें क्या है।

बुद्धि ने कहा– तुमसे मतलब? पड़ी रहने दो।

लेकिन जिज्ञासा रूपी माया की जीत हुई। ब्रजनाथ ने उठकर उसे उठा लिया। कदाचित किसीके पैसे पैकेट में लपटे गिर पडे़ हैं। खोलकर देखा; सावरीन थे। गिना तो पूरे आठ निकले। कौतुहल कि सीमा ना रही।

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ब्रिजनाथ की छाती धड़कने लगी। उनको हाथों में लिए सोचने लगे इनका क्या करूँ? अगर यही रख दूँ तो न जाने किसकी नजर पड़े; ना मालूम कौन उठा ले जाएं! नहीं यहाँ रखना उचित नहीं। चलता हूँ थाने में इत्तला कर देता हूँ और ये थानेदार को सौंप दूंगा। जिसके होंगे वहाँ आप ले जाएगा या अगर उसको ना भी मिले, तो मुझ पर कोई दोष न रहेगा मैं तो अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाऊंगा।

माया ने पर्दे की आड़ से मंत्र मारना शुरू किया। वह थानेदार के पास नहीं गए, सोचा- चलकर भामा से दिल्लगी की जाए। भोजन तैयार होगा। कल इत्मीनान से थाने जाऊंगा।

भामा ने सावरैन देखें, तो हृदय मेँ गुदगुदी से हुई। पूछा किसके हैं?

ब्रिजनाथ– मेरी।

भामा– चलो, बातें न बनाओ!

ब्रिजनाथ– पड़ी मिली है।

भामा– झूठ बात। ऐसे भाग्य के बली हो, तो सच बात बताओ कहाँ मिली? किसकी है?

ब्रिजनाथ– सच कहता हूँ, पड़ी मिली है।

भामा– मेरी कसम?

ब्रिजनाथ– तुम्हारी कसम।

भामा सावरैन को पति के हाथ से छुड़ाने की कोशीश करने लगी।

ब्रिजनाथ ने कहा– क्यों लेती हो?

भामा– लाओ मैं अपने पास रख लू।

ब्रिजनाथ– रहने दो, मैं इसकी इत्तला करने थाने जाता हूँ।

भामा का मुख मलीन हो गया। बोली- पढ़े हुए धन की क्या इत्तला करना?

ब्रिजनाथ– हाँ और क्या, इन आठ सावरैन के लिए ईमान बिगाड़ दूंगा?

भामा– अच्छा तो सवेरे चले जाना। इस समय जाओगे तो आने में देर हो जाएगी।

ब्रजनाथ ने भी सोचा यही अच्छा है। थानेदार रात को तो कोई कार्रवाई करेंगे नहीं। जब अशर्फियों को पढ़ा रहना है तो जैसे था ना वैसे मेरा घर।

अशर्फियाँ सन्दूक में रख दी। खा पी कर लेते, तो भामा ने हंसकर कहा- आया हुआ धन क्यों छोड़ते हो? लव मैं अपने लिए एक गुलबंद बनवा लेती हूँ, बहुत दिनों से जी तरस रहा है।

मायने इस समय हास्य का रूप धारण किया।

ब्रिजनाथ ने तिरस्कार करके कहा- गुलबंद की लालसा में गले में फांसी लगाना चाहती हो क्या?

प्रातःकाल ब्रजनाथ थाने के लिए तैयार हुए। कानून का एक लेक्चर छूट जाएगा, कोई बात नहीं। वह इलाहाबाद के हाईकोर्ट में अनुवादक थे। नौकरी में उन्नति की आशा न देखकर सालभर से वकालत की तैयारी में मग्न थे; लेकिन अभी कपड़े पहन ही रहे थे कि उनके एक मित्र मुंशी गोरे वाला आकर बैठ गए, और अपनी पारिवारिक दुश्चिंताओं की विस्मृत राम कहानी सुनाकर अत्यन्त विनीत भाव से बोले- भाई साहब, इस समय मैं इन झंझटों में ऐसा फंस गया हूँ कि बुद्धि कुछ काम नहीं करती।

तुम बड़े आदमी हो। इस समय कुछ सहायता करो। ज्यादा नहीं ₹30 दे दो। किसी न किसी तरह काम चला लूँगा, आज 30 तारीख है। कल शाम को तुम्हे रुपये मिल जाएंगे।

ब्रिजनाथ बड़े आदमी तो ना थे; किंतु बड़प्पन की हवा बांध रखी थी। यह मिथ्याभिमान उनके स्वभाव की एक दुर्बलता थी। केवल अपने वैभव का प्रभाव डालने के लिए ही वह बहुदा मित्रों की छोटी मोटी आवश्यकताओं पर अपनी वास्तविक आवश्यकताओं को निछावर कर दिया करते थे, लेकिन भामा को इस विषय में उनसे सहानुभूति न थी, इसलिए जब ब्रिजनाथ पर इस प्रकार का संकट आ पड़ता था, तब थोड़ी देर के लिए उनकी पारिवारिक शांति अवश्य नष्ट हो जाती थी। उनमें इंकार करने या टालने की हिम्मत न थी।

वह सकुचाते हुए भामा के पास गए और बोले- तुम्हारे पास ₹30 तो होंगे? मुंशी गोरेलाल मांग रहे हैं।

भामा रुखाई से बोली– मेरे पास तो रुपए नहीं है।

ब्रिजनाथ– होंगे तो जरूर बहाना करती हो।

भामा– अच्छा बहाना ही सही।

ब्रिजनाथ– तो मैं उनसे क्या कह दूं।

भामा– कह दो घर में रुपए नहीं है, तुमसे कहते ना बने तो मैं पर्दे की आड़ से कह दूं।

ब्रिजनाथ– कहने को तो मैं कह दूं, लेकिन उन्हें विश्वास न आएगा। समझेंगे बहाना कर रहे हैं।

भामा– समझेंगे तो समझेंगे।

ब्रिजनाथ मुझसे ऐसी बेरुखी नहीं हो सकती। दिन रात का साथ ठहरा, कैसे इनकार करूँ?

भामा– अच्छा तो जो मन में आए सो करो। मैं एक बार कह चुकी हूँ मेरे पास पैसे नहीं है।

ब्रिजनाथ मनमे बहुत खिन्न हुए। उन्हें विश्वास था कि भामा के पास रुपए हैं; लेकिन केवल मुझे लज्जित करने के लिए इनकार कर रही है। संदूक से दो अशर्फियाँ निकाली और गोरेलाल को देकर बोले- भाई, कल शाम को कचहरी से आते ही रुपए दे जाना। ये एक आदमी की अमानत है, मैं इसी समय देने जा रहा था यदि कल रुपये न पहुंचती तो मुझे बहुत लज्जित होना पड़ेगा; कहीं मुँह दिखाने योग्य न रहूंगा।

गोरेलाल ने मनमे कहा– अमानत स्त्री के सिवा और किसकी होगी, और असरफियाँ जेब में रखकर घर की राह ली।

आज पहली तारीख की संध्या है। ब्रिजनाथ दरवाजे पर बैठे गोरेलाल का इंतजार कर रहे हैं।

5:00 बज गए, गोरेलाल अभी तक नहीं आए। ब्रिजनाथ की आंखें रास्ते की तरफ लगी हुई थी। हाथ में एक पत्र था; लेकिन पढ़ने में जी नहीं लगता था। हर दूसरे मिनट रास्ते की ओर देखने लगते थे; लेकिन सोचते थे आज वेतन मिलने का दिन है। इसी कारण आने में देर हो रही है।

आते ही होंगे। 6:00 बजे गोरेलाल का पता नहीं। कचहरी के कर्मचारी एक एक करके चले आ रहे थे। ब्रिजनाथ को कई बार धोखा हुआ। वह आ रहे हैं। जरूर वही है। वैसे ही अचकन है। वैसे ही टोपी है। चाल भी वही है। हाँ वही है। इसी तरफ आ रहे हैं। अपने हृदय से एक बोझ सा उतरा मालूम हुआ; लेकिन निकट आने पर ज्ञात हुआ कि कोई और है। आशा की कल्पित मूर्ति दुराशा में बदल गयी।

ब्रिजनाथ काचित खेल होने लगा। वहाँ एक बार कुर्सी से उठे। बरामदे की चौखट पर खड़े हो, सड़क पर दोनों तरफ निगाह दौड़ाई। कहीं पता नहीं। दो तीन बार दूर से आते हुए लोगों को देखकर गोरेलाल का भ्रम हुआ। आकांक्षा की प्रबलता!

7:00 बजे; चिराग जल गए। सड़क पर अंधेरा छाने लगा। ब्रिजनाथ सड़क पर उद्विग्न भाव से टहलने लगे। इरादा हुआ गोरेलाल के घर चलूँ, उधर कदम बढ़ाएं; लेकिन हृदय काँप रहा था कि कहीं वह रास्ते में आते हुए न मिल जाए, तो समझे कि थोड़े से रुपयों के लिए इतने व्याकुल हो गए। थोड़ी ही दूर गए कि किसी वो आते देखा। भ्रम हुआ, गोरेलाल है, मुड़ें और सीधे बरामदे में आकर दम लिया, लेकिन फिर वही धोखा! फिर वही भांति! तब सोचने लगे कि इतनी देर क्यों हो रही है? क्या अभी तक वह कचहरी से ना आए होंगे! ऐसा कदापि नहीं हो सकता। उनके दफ्तर वाले मुद्दत हुई निकल गए।

बस दो बातें हो सकती है, या तो उन्होंने कल आने का निश्चय कर लिया, समझे होंगे रात को कौन जाए, यह जानबूझकर बैठे होंगे, देना चाहते होंगे, उस समय उनको गरज थी, इस समय मुझे गरज है। मैं ही किसी को क्यों न भेज दू? लेकिन किसे भेजूं? मन्नू जा सकता है। सड़क ही पर मकान है।

यह सोचकर कमरे मेँ गए, लैंप जलाया और पत्र लिखने बैठे, मगर आँखें द्वार ही की ओर लगी हुई थी। आकस्मात किसी के पैरों की आहट सुनाई दी। तुरंत पत्र को एक किताब के नीचे दबा लिया और बरामदे में चले आए। देखा, पड़ोस का एक पड़ोसी तार पढ़वाने आया है। उससे बोले- भाई इस समय फुर्सत नहीं है; थोड़ी देर में आना।

उसने कहा- बाबूजी- घर भर के आदमी घबराए हैं ज़रा एक निगाह देख लीजिए। निदान ब्रिजनाथ ने झुंझलाकर उसके हाथ से तार ले लिया, और सरसरी नजर से देखकर बोले- कलकत्ता से आया है। माल नहीं पहुंचा। पड़ोसी ने डरते डरते कहा- बाबूजी इतना और देख लीजिए किसने भेजा है। इस पर ब्रिजनाथ ने तार फेंक दिया और बोले- मुझे इस वक्त फुर्सत नहीं है।

8:00 बज गए। ब्रिजनाथ को निराशा होने लगी- मुन्नू इतनी रात बीते नहीं जा सकता।, आज ही जाना चाहिए बला से बुरा मानेंगे। इसकी कहाँ तक चिंता करूँ स्पष्ट कह दूंगा मेरे रुपए दे दो।

भल मानसी भले मानसों से निभाई जा सकती है। ऐसे दुष्टों के साथ भलमानसी का व्यवहार करना मुर्खता है अचकन पहनी; घर में जाकर भामा से कहा- ज़रा एक काम से बाहर जाता हूँ किवाड़ें बंद कर लो।

चलने को तो चले; लेकिन बारबार रुकते जाते थे। गोरेलाल का घर दूर से दिखाई दिया; लैब जल रहा था। झटक गए और सोचने लगे चलकर क्या कहूंगा? कही उन्होंने जाते जाते रुपये निकालकर दे दिए और देर के लिए क्षमा मांगी तो मुझे बड़ी शर्म होगी। वह मुझे धैर्यहीन समझेंगे। नहीं, रुपयों की बातचीत नहीं करूँगा, कहूंगा- भाई घर में बड़ी देर से पेट दर्द कर रहा है। तुम्हारे पास पुराना तेज सिरका तो है न मगर नहीं, यह बहाना कुछ भद्दा सा प्रतीत होता है। साफ कलई खुल जाएगी। इस झंझट की जरूरत ही क्या है।

वाह मुझे देखकर आप समझ जाएंगे। इस विषय में बातचीत की तो नौबत ही न आएगी। ब्रिजनाथ इसी उधेड़बुन में आगे बढ़ते चले जाते थे जैसे नदी की लहरें चाहे किसी और चले धारा अपना मार्ग नहीं छोड़ती।

गोरेलाल का घर आ गया। द्वार बंद था। ब्रिजनाथ को उन्हें पुकारने का साहस नहीं हुआ, समझे खाना खा रहे होंगे। दरवाजे के सामने से निकले और धीरे धीरे टहलते हुए 1 मिल तक चले गए। नौ बजने की आवाज कान में आयी। गोरेलाल भोजन कर चूके होंगे, यह सोचकर लौट पड़े, लेकिन द्वार पर पहुंचे तो, अँधेरा था। वह आशा रूपी दीपक बूझ गया था। 1 मिनट तक दुविधा में खड़े रहे। क्या करूँ? अभी ज्यादा देर नहीं हुई। इतनी जल्दी थोड़ी ही सो गए होंगे? दबे पांव बरामदे पर चढ़े।

द्वार पर कान लगाकर सुना, चारों ओर ताक रहे थे कि कहीं कोई देखना लें। कुछ बातचीत की भनक कान में पड़ी। ध्यान से सुना! स्त्री कह रही थी- रुपए तो सब उठ गए, ब्रिजनाथ को कहा से दोगे? गोरेलाल ने उत्तर दिया- ऐसी कौन सी जल्दी है, दे देंगे। और दरख्वास्त दे दी है कल मंजूरी हो जाएगी। तीन महीने के बाद लौटेंगे तब देखा जाएगा।

ब्रिजनाथ को ऐसा जान पड़ा मानों मुँह पर किसी ने तमाचा मार दिया हो। क्रोध और आवेश से भरे हुए बरामदे से उतर आए। घर चले तो सीधे कदम न पढ़ते थे, जैसे कोई दिनभर का थका मांदा पथिक हो।

ब्रिजनाथ रात भर करवटें बदलते रहे। कभी गोरेलाल की दुष्टता पर क्रोध आता, कभी अपनी सरलता पर; मालूम नहीं; किस गरीब के रुपय है। उस पर क्या बीतती होगी! लेकिन अब क्रोध करके क्या लाभ? सोचने लगे- रुपये कहाँ से आयेंगे? भामा पहले ही इनकार कर चुकी है, वेतन में इतनी गुंजाइश नहीं है। 10 ₹5 की बात होती तो कोशीश कर सकते थे।

तो अब क्या करूँ? किसी से उधार ले लू? मगर मुझे कौन देगा। आज तक किसी से मांगने का जरूरत नहीं पड़ी, और अपना कोई ऐसा मित्र भी नहीं। जो लोग हैं, वह मुझे ही सताया करते हैं, मुझे क्या देंगे। हाँ यदि कुछ दिन कानून छोड़कर अनुवाद करने में परिश्रम करूँ तो रुपये मिल सकते हैं। कम से कम एक मास का कठिन परिश्रम है। सस्ते अनुवादकों के मारे दर भी तो गिर गयी है! हाँ निर्दयी! तुने बड़ा धोखा किया। ना जाने किस जन्म का बैर चुकाया है। कहीं का ना रखा!

दूसरे दिन ब्रिजनाथ को रुपये की धुन सवार हुई। सवेरे कानून के लेक्चर में सम्मिलित होते, संध्या को कचहरी से फ़ाइलों का पुलिंदा घर लाते और आधीरात बैठे अनुवाद किया करते। सर उठाने की मोहलत न मिलतीं! कभी दो भी बज जाते। जब मस्तिष्क बिल्कुल शिथिल हो जाता तब विवश होकर चारपाई पर पड़े रहते।

लेकिन इतने परिश्रम का अभ्यास न होने के कारण कभी कभी सिर में दर्द होने लगता। कभी पाचन क्रिया में विघ्न पड़ जाता, कभी बुखार चढ़ा था। उसके बाद भी वह मशीन की तरह काम में लगे रहते। भामा कभी कभी झुंझलाकर कहती-अजी लेट भी रहो; बड़े धर्मात्मा बने हो। तुम्हारे जैसे 5-10 आदमी और होते तो संसार का काम ही बंद हो जाता। ब्रिजनाथ इस बाधाकारी व्यंग का उत्तर नहीं देते दिन निकलते ही फिर वही चरखा ले बैठते।

यहाँ तक कि तीन हफ्ते बीत गए और ₹50 हाथ आ गए। ब्रिजनाथ सोचते थे कुछ दिन में बेड़ा पार हो जाएगा; लेकिन 21 वें दिन उन्हें तेज बुखार चढ़ आया और 3 दिन तक न उतरा। छुट्टी लेनी पड़ी। भादो का महीना था। भामा ने समझा पित का प्रकोप है; लेकिन जब एक हफ्ते तक डॉक्टर की औषधि सेवन करने पर भी बुखार न उतरा तब घबराई। ब्रिजनाथ पराया बुखार में बड़बड़ाने भी लगे।

भामा सुनकर डर के मारे कमरे में से भाग जाती। बच्चों को पकड़ कर दूसरे कमरे में बंद कर देते। अब उसे शंका होने लगी थी कि कही यह कष्ट उन्हीं रुपयों के कारण तो नहीं भोगना पड़ रहा है! कौन जाने रुपये वाले ने कुछ करधर दिया हो! जरूर यही बात है, नहीं तो औषधि से लाभ क्यों नहीं होता?

संकट पड़ने पर हम धर्मभीरू हो जाते हैं, औषधियों से निराश होकर देवताओं की शरण लेते हैं। भामा ने भी देवताओं की शरण ली। वह जन्माष्टमी, शिवरात्रि का कठिन व्रत शुरू किया।

8 दिन पूरे हो गए। अंतिम दिन आया। प्रभात का समय था। भामा ने ब्रिजनाथ को दवा पिलाई और दोनों बालकों को लेकर दुर्गा जी की पूजा करने के लिए चली गई। उसका हृदय आराध्य देवी के प्रति श्रद्धा से परिपूर्ण था। मंदिर के आंगन में पहुंची। उपासक आसनों पर बैठे हुए दुर्गा पाठ कर रहे थे। दूप अगर की सुगंध हो रही थी। उसने मंदिर में प्रवेश किया। सामने दुर्गा की विशाल प्रतिमा शोभायमान थी।

उनके मुखारविंद पर एक विलक्षण दीप्ति झलक रही थी। बड़े बड़े उज्ज्वल नेत्रों से प्रभा की किरणे छिटक रही थी। पवित्रता का एक समावेश छाया हुआ था। भामा इस दीपतवर्ण मूर्ति के सम्मुख सीधी आँखों से ताक ना सके। उसके अंतकरण में एक निर्मल, विशुद्ध भावपूर्ण भय का उदय हो आया। उसने आँखें बंद कर लीं। घुटने ने केबल बैठ गयी, और हाथ जोड़कर करुण स्वर से बोली- माता, मुझ पर दया करो।

उसे ऐसा ज्ञात हुआ, मानो देवी मुस्कुराई। उसे उन दिव्य नेत्रों से एक ज्योतिषी निकलकर अपने हृदय की ओर आती हुई मालूम हुई। उसके कानों में देवी के मुँह से निकले ये शब्द सुनाई दिए- पराया धन लौटा दे कमा तेरा भला होगा।

भामा उठ बैठी। उसकी आँखों में निर्मल भक्ति का आभास झलक रहा था। मुखमंडल से पवित्र प्रेम बरस पड़ता था। देवी ने कदाचित उसे अपनी प्रभा के रंग में डूबा दिया था।

इतने में दूसरी एक स्त्री आई। उसके उज्वल केश बिखरें और मुरझाए हुए चेहरे के दोनों और लटक रहे थे कॉल स्टॉक शरीर पर केवल एक श्वेत साड़ी थी। हाथों में चूड़ियों के सिवा और कोई आभूषण न था। शोक और निराशा की साक्षात मूर्ति मालूम होती थी। उसने भी देवी के सामने सिर झुकाया और दोनों हाथों से आंचल फैलाकर बोली- देवी, जिसने मेरा धन लिया हो, उसका सर्वनाश करो।

जैसे सितार मिज़राब कि चोट खाकर थर्रा उठता है उसी प्रकार भामा का हृदय अनिष्ट के भय से थर्रा उठा। ये शब्द तीव्र रस के समान उसके कलेजे में चुप गए। उसने देवी की ओर कातर नेत्रों से देखा। उनका ज्योतिर्मय स्वरूप भयंकर था, नेत्रों से भीषण ज्वाला निकल रही थी। भामा के अंतःकरण में स्वतः आकाश से मंदिर के सामने वाले वृक्षों से मंदिर के स्तंभों से, सिंहासन के ऊपर जलते हुए दीपक से और देवी के विकराल मुँह से ये शब्द निकलकर गूंजने लगे- पराया धन लौटा दे, नहीं तो तेरा सर्वनाश हो जाएगा।

भामा खड़ी हो गयी और उस वृद्धा से बोली- क्यों माता, तुम्हारा धन किसने लेलिया है?

वृद्धा ने इस प्रकार उसकी ओर देखा, मानव डूबते को तिनके का सहारा मिला। बोली- हाँ बेटी!

भामा– कितने दिन हुए?

वृद्धा– कोई डेढ़ महीना।

भामा– कितने रुपए थे?

वृद्धा– पूरे 120।

भामा– कहाँ गए?

वृद्धा– क्या जानें कहीं गिर गयी। मेरे स्वामी पलटन में नौकर थे। आज की बस हुए, उन्हें स्वर्ग सिधारे। अब मुझे सरकार से ₹8 साल पेंशन मीलती है। इस बार 2 साल की पेंशन एक साथ ही मिली थी। खजाने से रुपये लेकर आ रही थी। मालूम नहीं, कब और कहाँ गिर पड़े।  8 अशर्फियाँ थी।

भामा– अगर वे तुम्हें मिल जाए तो क्या दोगी।

वृद्धा– अधिक नहीं, उसमें से 50 दे दूंगी।

भामा– रुपए नहीं कोई उसे अच्छी चीजों।

वृद्धा– बेटी और क्या दूं जब तक जिऊंगी तुम्हारा यशगान करूँगी।

भामा– नहीं इसकी मुझे आवश्यकता नहीं!

वृद्धा– बेटी इसके सिवा मेरे पास क्या है?

भामा– मुझे आशीर्वाद दो मेरे पति बीमार है, वो अच्छे होजाए।

वृद्धा -क्या उन्हीं को रुपए मिले हैं?

भामा– हाँ वह उसी दिन से तुम्हे खोज रहे हैं।

वृद्धा घुटनों के बल बैठ गई और आंचल फैलाकर कंपित स्वर से बोली- देवी! इसका कल्याण करो।

भामा ने फिर देवी को देखा। उनके दिव्य रूप में प्रेम का प्रकाश था। आँखों में दया की आनंददायिनी झलक थी उस समय भामा के अंत करण में की स्वर्ग लोग से यह ध्वनि सुनाई दी-जा तेरा कल्याण होगा।

संध्या का समय है। भामा ब्रजनाथ के साथ रिक्शे पर बैठी तुलसी के घर उसकी संपत्ति लौटाने जा रही है। ब्रिजनाथ के बड़े परिश्रम की कमाई जो डॉक्टर की भेंट हो चुकी है, लेकिन भामा ने एक पड़ोसी के हाथ अपने कानों के झुमके बेचकर रुपये जुटाए हैं। जिससमय झुमके बनकर आए थे, भामा बहुत प्रसन्न हुई थी। आज उन्हें बेचकर वह उससे भी अधिक प्रसन्न है।

जब ब्रिजनाथ ने आठों अशर्फियाँ उसे दिखाई थी उसके हृदय में एक गुदगुदी से हुई थी; लेकिन यह हर्ष मुख्य पर आने का साहस न कर सका था। आज अशर्फियों को हाथ से जाते समय उसका हार्दिक आनंद आँखों में चमक रहा है।

तुलसी का आशीर्वाद सफल हुआ। आज पूरे तीन हफ्ते के बाद ब्रजनाथ तकिये के सहारे बैठे थे। वह बार बार बामाको प्रेमपूर्ण नेत्रों से देखते थे। देवी मालूम होती थी। अब तक उन्होंने उसके बाहरी सौंदर्य को ही देखा था आज वह उसका आत्मिक सौंदर्य देख रहे हैं।

तुलसी का घर एक गली में था। रिक्शा सड़क पर जाकर ठहर गया। ब्रिजनाथ रिकसे पर से उतरे और अपनी छड़ी देखते हुए भामा के हाथों के सहारे तुलसी के घर पहुंचे। तो उसी ने रुपये लिए और दोनों हाथ फैलाकर आशीर्वाद दिया-दुर्गाजी तुम्हारा कल्याण करें।

तुलसी का मुख वैसे ही खिल गया, जैसे वर्षा के बाद वृक्षों की पत्तियाँ खिल जाती है। सिमटा हुआ ना फैल गया, गालों की झुर्रियां मिटती दिख पड़ी। ऐसा मालूम होता था उसका कायाकल्प हो गया।

वहाँ से आकर ब्रिजनाथ अपने दरवाजे पर बैठे हुए थे गोरेलाल आकर बैठ गए। ब्रिजनाथ ने मुँह फेर लिया।

गोरेलाल बोले– भाई साहब! कैसी तबियत है?

ब्रिजनाथ– बहुत अच्छी तरह हूँ।

गोरेलाल– मुझे माफ़ कीजिएगा। मुझे इसका बहुत खेद है कि आपके रुपये देने में इतना विलंब हुआ। पहली तारीख ही को घर से एक आवश्यक पत्र आ गया, और मैं किसी तरह तीन महीने की छुट्टी लेकर घर भागा। वहाँ की विपत्ति कथा कहूँ, तो समाप्त ना हो; लेकिन आपकी बीमारी का शोक समाचार सुनकर आज भागा चला आ रहा हूँ। ये लीजिए रुपए हाजिर हैं। इस विलंब के लिए अत्यंत लज्जित हूँ।

ब्रिजनाथ का क्रोध शांत हो गया। विनय में कितनी शक्ति है! बोले जी हाँ बीमार तो था; लेकिन अब अच्छा हो गया हूँ, आपको मेरे कारण व्यर्थ कष्ट उठाना पड़ा। यदि इस समय आपको असुविधा हो, तो रुपये फिर दे दीजिएगा। मुझ पर अब कोई ऋण नहीं। कोई जल्दी नहीं है।

गोरेलाल विदा हो गए, तो ब्रिजनाथ रुपये लिए हुए भीतर आए और भामा से बोले- ये लोग अपने रुपये; गोरेलाल दे गए।

बाबा ने कहा– ये मेरे रुपए नहीं तुलसी के हैं; एक बार पराया धन लेकर सीख गई।

ब्रिजनाथ– लेकिन तुलसी के रुपए तो दे दिए गए!

भामा– दे दिए तो क्या हुआ? ये उसके आशीर्वाद की न्योछावर है।

ब्रिजनाथ -कान के झुमके कहा से आयेंगे?

भामा– झुमके न रहेंगे न सही; सदा के लिए कान तो हो गए।

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