कौशल – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | kaushal Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों आपने हिंदी साहित्य के स्तंभ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानियों के बारे में ज़रुर सुना होगा, इनमे से ही एक प्रसिद्ध कहानी – कौशल के बारे मे आप इस लेख मे पढ़ेंगे।

कौशल – मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी | Kaushal – A Story written by Munshi Premchand

kaushal Munshi Premchand ki kahani

कौशल – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | kaushal Munshi Premchand ki kahani in Hindi

पंडित बलराम शास्त्री की धर्म पत्नी माया को बहुत दिनों से एक हार की लालसा थी और वहाँ सैकड़ों बार पंडित जी से उसके लिए आग्रह कर चुकी थी, किंतु पंडित जी हीलाहवाला करते रहते थे। यह तो साफ साफ ना कहते थे कि मेरे पास रुपए नहीं है-इनसे उनके पराक्रम में बट्टा लगता था-तर्कों की शरण लिया करते थे। कहने से कुछ लाभ नहीं एक तो धातु अच्छी नहीं मीलती, उसपर सोनार रुपये के आठ आठ आने कर देता है, और सबसे बड़ी बात यह कि घर में गहने रखना चोरों को नेवता देना है।

घड़ी भर शृंगार के लिए इतनी विपत्ति सिर पर लेना मूर्खों का काम है। बेचारी माया तर्कशास्त्र न पढ़ी थी, इन युक्तियों के सामने निरुत्तर हो जाती थी। पड़ोसिनों को देख देखकर उसका जी ललचाता था, पर दुख किसे कहें। यदि पंडितजी ज्यादा मेहनत करने की योग्य होते तो यह मुश्किल आसान हो जाती। पर वे आलसी जीव थे, अधिकांश समय भोजन और विश्राम में व्यतीत किया करते थे। पत्नी के कटु वचन सुनने मंजूर थे, लेकिन निद्रा में कमी न कर सकते थे।

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1 दिन पंडितजी पाठशाला से आए तो देखा कि माया के गले में सोने का हार विराज रहा है। हार की चमक से उनकी मुख ज्योति चमक उठी थी। उन्होंने उसे कभी इतनी सुन्दर न समझा था। पूछा-यह हार किसका है?

माया बोलीं-पड़ोस में जो बाबूजी रहते हैं उन्हीं की स्त्री का है।

आज उनसे मिलने गई थी, यह हार देखा, बहुत पसंद आया। तुम्हें दिखाने के लिए पहन कर चली आई। बस, ऐसा ही एक हार मुझे बनवा दो।

पंडित-दूसरों की चीज़ नाहक मांग लाई। कहीं चोरी हो जाए तो हार तो बनवाना ही पड़े, ऊपर से बदनामी भी हो।

माया-मैं तो ऐसा ही हार लुंगी, 20 तोलें का है।

पंडित-फिर वही जिद।

माया-जब सभी पहनती हैं तो मैं ही क्यों ना पहनू?

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पंडित-सब कुएं में गिर पडे़ तो तुम भी कुएं में गिर पड़ेगी। सोचो तो, इस वक्त इस हार के बनवाने में ₹600 लगेंगे। अगर ₹1 प्रति सैकड़ा ब्याज रख लिया जाए तो-वर्ष में ₹600 के लगभग ₹1000 हो जाएंगे। लेकिन पांच वर्ष में तुम्हारा हार मुश्किल से ₹300 का रह जाएगा। इतना बड़ा नुकसान उठाकर हार पहनने से क्या सुख? यह हार वापस कर दो, भोजन करो और आराम से पड़ी रहो। यह कहते हुए पंडितजी बाहर चले गए।

रात को एकाएक माया ने शोर मचाकर कहा-चोर, चोर, घर में चोर, मुझे घसीट लिए जाते हैं।

पंडितजी हकबका कर उठे और बोले-कहाँ है कहाँ है? दौड़ो दौड़ो।

माया-मेरी कोठरी में गया है, मैने उसकी परछाई देखी।

पंडित-लालटेन लाओ, ज़रा मेरी लकड़ी उठा लेना।

माया-मुझसे तो डर के मारे उठा नहीं जाता।

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कुछ आदमी बाहर से बोले-कहाँ है पंडितजी, कोई सेंध पड़ी है क्या?

माया-नहीं नहीं, खपरैल पर से उतरे हैं। मेरी नींद खुली तो कोई मेरे ऊपर झुका हुआ था। हे भगवान यह तो हार ही ले गया, पहने पहने सो गई थी। बदमाश ने गले से निकाल लिया।

पंडित-तुमने हार उतार क्यों न दिया था?

माया-मैं क्या जानती थी कि आज ही यह मुसीबत सिर पडने वाली है।

पंडित-अब हे भगवान, भगवान करने से क्या होगा? अपने कर्मों कोरो। इसलिए कहा करता था कि सब घड़ी बराबर नहीं जाती, ना जाने कब क्या हो जाए। अब आई समझ मेरी बात, देखो और तो कुछ ना ले गया?

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पड़ोसी लालटेन लिए आ पहुंचे। घर में कोना कोना देखा कही चोर का पता न था।

एक पड़ोसी-किसी जानकार आदमी का काम है।

दूसरा पड़ोसी-बिना घर के भेदियों कि कभी चोरी नहीं होती। और कुछ तो नहीं ले गया?

माया-और तो कुछ नहीं ले गया। बर्तन सब रखे हुए है, संदूक भी बंद है। निगोड़े को लेही जाना था तो मेरी चीज़ ले जाता। पराई चीज़ ठहरी। भगवान उन्हीं क्या मुँह दिखाऊंगी।

पंडित-अब कहने का मज़ा मिल गया न?

माया-हे भगवान, यह अपजस लिखा था।

पंडित-कितना समझा के हार गया, तुम ना मानी, ना मानी। बात ही बात में ₹600 निकल गए, अब देखो भगवान कैसे लाज रखते हैं।

माया-निगोड़े मेरे घर का 1 दिन का चुन ले जाते तो मुझे इतना दुख ना होता। अभी बेचारी ने नया ही बनवाया था।

पंडित-खूब मालूम है, 20 तोले का था?

माया-20 ही तोले का तो कहती थी।

पंडित-बधीया बैठ गयी और क्या?

माया-कह दूंगी घर में चोरी हो गयी। क्या लेगी? अब उनके लिए कोई चोरी थोड़े ही करने जाएंगे।

पंडित-तुम्हारे घर से चीज़ गयी, तुम को ही देनी पड़ेगी। उन्हें इससे क्या प्रयोजन कि चोर ले गया या तुमने उठाकर रख लिया।

माया-तो इतने रुपये कहाँ से आयेंगे?

पंडित-कही ना कही से तो आयेंगे ही, नहीं तो लाज कैसे रहेंगी; मगर की तुमने बड़ी भूल।

माया-भगवान से मंगनी की चीज़ भी ना देखी गई। मुझे काल नहीं घेरा था, नहीं तो इस घड़ी भर गले में डाल देने से ऐसा कौन सा बड़ा सुख मिल गया? मैं ही हूँ अभागिनी।

पंडित-अब पछताने और अपने को कोसने से क्या फायदा? चुप होकर बैठो, पड़ोसन से कह देना, घबराओ नहीं, तुम्हारी चीज़ जब तक लौटाना देंगे, तब तक हमें चैन ना आएगा।

पंडित बलराम को अब नित्य ही चिंता रहने लगी कि किसी तरह हार बने। यू अगर टाट उलट देते तो कोई बात न थी। पड़ोसिन को संतोष करना पड़ता, ब्राह्मण से दंड कौन लेता, किंतु पंडित जी ब्राह्मणत्व की गौरव को इतने सस्ते दामों में न बेचना चाहते थे। आलस्य छोड़कर धन उपार्जन में दत्तचित्त हो गए। छह महीने तक उन्होंने दिन को दिन और रात को रात नहीं जाना। दोपहर को सोना छोड़ दिया, रात को भी बहुत देर तक जाग करते। पहले केवल एक पाठशाला में पढ़ाया करते थे।

इसके सिवा वह ब्राह्मण के लिए खुले हुए 101 व्यवसायों में सभी को निंदनीय समझते थे। अब पाठशाला से आकर संध्या एक जगह भागवत की कथा कहने जाते वहाँ से लौटकर 11-12 बजे तक जन्म कुंडलियां, वर्षफल आदि बनाया करते। प्रातःकाल मंदिर में दुर्गा जी का पाठ करते। माया पंडित जी को इस तरह देखकर कभी कभी पछताती कि कहाँ से मैने यह विपत्ति सर पर ली, कहीं बीमार पड़ जाए तो लेने के देने पड़े। उनका शरीर क्षीण होते देख उसे अब यह चिंता व्यतीत करने लगी। यहाँ तक कि पांच महीने गुजर गए।

1 दिन संध्या समय वह दिया लगाने करने जा रही थी कि पंडित जी आई, जेब से पुड़िया निकालकर उसके सामने फेंक दी और बोले-लो आज तुम्हारे ऋण से मुक्ति मिल गई।

माया ने पुड़िया खोली तो उसमें सोने का हार था, उसकी चमक दमक, उसकी सुंदर बनावट देखकर उसके अंतःस्थल मेँ गुदगुदी होने लगी। मुख पर आनंद की आभा दौड़ गई। उसने कातर नेत्रों से देखकर पूछा-खुश होकर दे रहे हो या नाराज होकर।

पंडित-इससे क्या मतलब? ऋण तो चुकाना ही पड़ेगा, चाहे खुशी हो या ना हो।

माया-यह ऋण नहीं है।

पंडित-और क्या है, बदला सही।

माया-बदला भी नहीं है।

पंडित-फिर क्या है?

माया-तुम्हारी निशानी है।

पंडित-तो क्या ऋण के लिए कोई दूसरा हार बनवाना पड़ेगा?

माया-नहीं नहीं वह हार चोरी नहीं गया था। मैने झूठ मूठ शोर मचाया था।

पंडित-सच?

माया-हाँ, सच कहती हूँ।

पंडित-मेरी कसम?

माया-तुम्हारे चरण छूकर कहती हूँ।

पंडित-तो तुमने मुझसे कौशल किया था?

माया-हाँ!

पंडित-तुम्हें मालूम है, तुम्हारे कौशल का मुझे क्या मूल्य देना पड़ा।

माया-क्या ₹600 से ऊपर है?

पंडित-बहुत ऊपर, इसके लिए मुझे अपने आत्म स्वतंत्र को बलिदान करना पड़ा।

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