नाग पूजा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Naag pooja Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों आपने हिंदी साहित्य के स्तंभ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानियों के बारे में ज़रुर सुना होगा, इनमे से ही एक प्रसिद्ध कहानी – नाग पूजा के बारे मे आप इस लेख मे पढ़ेंगे।

नाग पूजा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी || Naag Pooja – Munshi Premchand ki Kahaniyan || RED PAPERS

Naag pooja Munshi Premchand ki kahani

नाग पूजा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Naag pooja Munshi Premchand ki kahani in Hindi

सुबह का समय था। आषाढ़ का पहला डोंगड़ा निकल गया था। कीट पतंगे चारों तरफ रेंगते दिखाई देते थे। तिलोत्मा ने वाटिका की ओर देखा तो वृक्ष और पौधे ऐसे हे निखर गए थे जैसे साबुन से मैले कपड़े निखर जाते हैं। उनपर एक विचित्र अध्यात्मिक शोभा छाई हुई थी मानो योगी आनंद मेँ मग्न पढ़े हो। चिड़ियों मैं असाधारण चंचलता थी।

डाल डाल, पात पात चेक करती फिरती थी। तिलोत्मा बाग में निकल आई। वह भी इन्हीं पक्षियों की भांति चंचल हो गई थी। कभी किसी पौधे को देखते, कभी किसी फूल पर पड़ी हुई जल की बूंदों को हिलाकर अपने मुँह पर उनके शीतल छींटे डालती। लाल वीरबोटियाँ रैंक रही थी। वह उन्हें चुनकर हथेली पर रखने लगे सहसा उसे एक काला सांप रेंगता दिखाई दिया। उसने चिल्लाकर कहा-अम्मा, नागजी जा रहे हैं। लाओ थोड़ा सा दूध उनकी कटोरे में रख दूं।

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अम्मा ने कहा-जाने दो बेटी, हवा खाने निकले होंगे।

तिलोत्मा-गर्मियों में कहा चले जाते हैं? दिखाई नहीं देते।

माँ-कही जाते नहीं बेटी, अपने बिल में पड़े रहते हैं।

तिलोत्मा-और कही नहीं जाते?

माँ-बेटी, हमारे देवता हैं और कही क्यों जायेंगे? तुम्हारे जन्म के साल से ये बराबर यही दिखाई देते हैं। किसी से नहीं बोलते। बच्चा पास से निकल जाए, पर ज़रा भी नहीं ताकतें। आजतक कोई चुहिया भी नहीं पकड़ी।

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तिलोत्मा-तो खाते क्या होंगे?

माँ-बेटी, यह लोग हवा पर रहते हैं। इसी से इनकी आत्मा दिव्य हो जाती है। अपने पूर्व जन्म की बातें उन्हें याद रहती है। आने वाली बातों को भी जानते हैं। कोई बड़ा योगी जब अहंकार करने लगता है, तो उसे दंडस्वरूप इस नाग योन में जन्म लेना पड़ता है। जब तक प्रायश्चित पूरा नहीं होता तब तक वह इसी तरह रहते हैं। कोई कोई तो 100 200 साल तक जीते रहते है।

तिलोत्मा-इसकी पूजा न करें तो क्या करें।

माँ-बेटी, कैसी बच्चों की सी बात करती हो। नाराज हो जाए तो सिर पर न जाने क्या विपत्तियां । तेरी जन्म के साल पहले पहले दिखाई देते थे। तब से साल में 5-10 बार अवश्य दर्शन दे जाते हैं। इनका ऐसा प्रभाव है कि आज तक किसी के सिर में दर्द तक नहीं हुआ।

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कई वर्ष हो गए। तिलोत्मा बालिका से युवती हुई। विवाह का शुभ अवसर आ पहुंचा। बारात आई, विवा हुआ, तिलोत्मा के पति घर जाने का मुहूर्त आ पहुंचा।

नहीं वधू का शृंगार हो रहा था। भीतर बाहर हलचल मची हुई थी, ऐसा जान पड़ता था भगदड़ पड़ी हुई है। तिलोत्मा के हृदय में उपयोग दुख की तरंगें उठ रही थी। वह एकांत में बैठकर रोना चाहती, आज माता पिता, भाई बंधु, सखी सहेलियां सब छूट जाएगी। फिर मालूम नहीं कब मिलने का संयोग हो। नजाने अब कैसे आदमियों से पाला पड़ेगा।

नजाने उनका स्वभाव कैसा होगा, नजाने कैसा बर्ताव करेंगे। अम्मा की आंखें एक क्षण भी न थमेगी। मैं 1 दिन के लिए कहीं चली जाती थी तो वे रो रोकर व्यथित हो जाती थी। अब यह जीवनपर्यंत की दूरी कैसे सहेंगे? उनके सिर में दर्द होता था जब तक मैं धीरे धीरे ना मल्लू, उन्हें किसी तरह का चैन ही ना मिलता था। बाबू जी को पान बनाकर कौन देगा? मैं जब तक उनका भोजन न बनाओ, उन्हें कोई चीज़ अच्छी नहीं लगती थी। अब उनका भोजन कौन बनाएगा? मुझसे इनको देखे बिना कैसे रहा जाएगा? यहाँ ज़रा सिर में दर्द भी होता था तो अम्मा और बाबूजी घबरा जाते थे। तुरंत वैध हकीम आ जाते थे। वहाँ न जाने क्या हाल होगा।

Naag pooja Munshi Premchand ki kahani
Naag pooja Munshi Premchand ki kahani

भगवान बंद घर में कैसे रहा जाएगा? ना चाहे वह खुली छत है या नहीं। होगी भी तो मुझे कौन सोने देगा? भीतर घुट घुटकर मरूंगी। जागने में ज़रा देर हो जाएगी तोता ने मिलेंगे। यहाँ सुबह कोई जगाता था, तो अम्मा कहती थी सोने दो। कच्ची नींद जाग जाएगी तो सिर में पीड़ा होने लगेंगी। वहाँ व्यंग्य सुनने पड़ेंगे, बहुत आलसी हैं, दिन भर खाट पर पड़ी रहती है। वे (पति) तो बहुत सुशील मालूम होते हैं। हाँ, कुछ अभिमान अवश्य हैं। कहीं उनका स्वभाव निठुर हुआ तो……..?

सहसा उनकी माता ने आकर कहा-बेटी, तुमसे एक बात कहने की याद नहीं। वहाँ नाग पूजा अवश्य करती रहना। घर के लोग चाहे जो माने; पर तुम इसे अपना कर्तव्य समझना। अभी मेरी आंख ज़रा ज़रा झप गई थी। नाग बाबा ने सौंप में दर्शन दिए।

तिलोत्मा-अम्मा, मुझे भी उनके दर्शन हुए हैं, पर मुझे तो उन्होंने बड़ा विकराल रूप दिखाया। बड़ा भयंकर स्वपन था।

माँ-देखना, तुम्हारे घर में कोई सांप न मारने पाए। यह मंत्र हमेशा पास रखना।

तिलोत्मा अभी कुछ जवाब न देने पाई थी कि अचानक बारात की ओर से रोने के शब्द सुनाई दिए, एक क्षण में हाहाकार मच गया। भयंकर शोक घटना हो गई। वर को सांप ने काट लिया। वह बहू को विदा कराने आ रहा था। पालकी में मसनद के नीचे एक काला सांप छिपा हुआ था। वर जैसे ही पालकी में बैठा, साँप ने काट लिया।

चारों ओर कोहराम मच गया। तिलोत्मा पर तो मानो वज्रपात हो गया। उसकी माँ सिर पीठ रोने लगी। उसके पिता बाबू जगदीश चन्द्र मूर्छित होकर गिर पड़े। हृदय रोग से पहले ही से ग्रस्त थे। झाड़फूंक करने वाले आए, डॉक्टर बुलाए गए, पर विश घातक था। ज़रा देर में वर के होंठ नीले पड़ गए, नाखून काले हो गए, मूर्छा आने लगी। देखते देखते शरीर ठंडा पड़ गया। इधर उषा की लालिमा ने प्रकृति को आलोकित किया, उधर टिमटिमाता हुआ दीपक बूझ गया।

जैसे कोई मनुष्य बोरों से लदी हुई नाव पर बैठा हुआ मन में झुंझलाता है कि यह और तेज क्यों नहीं चलती, कही आराम से बैठने की जगह नहीं, रहा इतनी हिल क्यों रही है, मैं व्यर्थ ही इसमें बैठा; पर अचानक नाव को भँवर में पढ़ते देखकर उसके मस्तूल से चिपक जाता है, वही दशा तिलोत्मा की हुई। अभी तक वह दुख में ही मग्न थी, ससुराल की कष्टों और दुर्व्यवस्थाओं की चिंताओं में पड़ी हुई थी। पर, अब उसे होश आया कि इस नाव के साथ मैं भी डूब रही है।

एक क्षण पहले वह कदाचित जिसे पुरुष पर झुंझला रही थी, जिसे लुटेरा और डाकू समझ रही थी, वह अब कितना प्यारा था। उसके बिना अब जीवन एक दीपक था; बुझा हुआ। एक वृक्ष था; फल फूल विहिन। अभी एक्शन पहले वह दूसरों की ईशा का कारण थी, अब दया और करुणा की।

थोड़े ही देर में उसे ज्ञात हो गया कि मैं पति होकर संसार के सब सुखों से वंचित हो गई।

एक वर्ष बीत गया। जगदीश चन्द्र पक्के धर्मावलंबी आदमी थे, पर तिलोत्मा का वैधव्य उनसे न सह गया। उन्होंने तिलोत्तमा के पुनर्विवाह का निश्चय कर लिया। हंसने वालों ने तालियां बजाईं पर जगदीश बाबू ने हृदय से काम लिया। तिलोत्मा पर सारा घर जान देता था। उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई बात न होने पाती यहाँ तक कि वह घर की मालकिन बना दी गई थी। सभी ध्यान रखते की उसकी रंज ताजा न होने पाए। लेकिन उसके चेहरे पर उदासी छाई रहती थी, जिसे देखकर लोगों को दुख होता था।

पहले तो माँ भी इस सामाजिक अत्याचार पर सहमत नहीं हुई; लेकिन बिरादरी वालों का विरोध जैसे जैसे बढ़ता गया इसका विरोध ढीला पड़ गया। सिद्धांत रूप से तो प्रायः किसी को आपत्ति न थी किंतु उसे व्यवहार में लाने का साहस किसी में न था। कई महीनों के लगातार प्रयास के बाद एक कुलीन सिद्धांतवादी, सुशिक्षित वर मिला। उसके घर वाले भी राजी हो गए। तिलोत्मा को समाज में अपना नाम बिकते देखकर दुख होता था। वह मन में दुखी होती थी हे कि पिताजी नाहक मेरे लिए समाज में नक्को बन रहे हैं।

अगर मेरे भाग्य में सुहाग लिखा होता तो यह वज्र ही क्यों गिरता। तो उसे कभी कभी ऐसी शंका होती थी कि मैं फिर विधवा हो जाऊंगी। जब विवाह निश्चित हो गया और वर्ग की तस्वीर उसके सामने आई तो उसकी आँखों में आंसू भर आए। चेहरे से कितनी सज्जनता, कितनी दृढ़ता, कितनी विचारशीलता टपकती थी। वह चित्र को लिए हुए माता के पास गईं और शर्म से सिर झुकाकर बोली-अम्मा, मुझे कुछ कहना तो नहीं चाहिए, पर अवस्था ऐसी आ पड़ी है कि बिना मुँह खोले रहा नहीं जाता। आप बाबूजी को मना कर दे। मैच इस दशा में हूँ संतुष्ट हूँ। मुझे ऐसा भय हो रहा है कि अबकी फिर वही शोक घटना……..

माँ ने सहमी हुई आँखों से देखकर कहा-बेटी कैसी अपशगुन की बात मुँह से निकाल रही हूँ। तुम्हारे मन में भय समा गया है, इसी से यह भ्रम होता है। जो होनी थी, वह हो चुकी है। अब क्या ईश्वर तुम्हारे पीछे पड़े ही रहेंगे?

तिलोत्तमा-हाँ मुझे तो ऐसा मालूम होता है।

माँ-क्यों तुम्हें ऐसी शंका क्यों होती है?

तिलोत्मा-न जाने क्यों? कोई मेरे मन में बैठा हुआ कह रहा है कि फिर अनिष्ट होगा मैं प्रायः नित्य डरावने स्वप्न देखा करती हूँ। रात को मुझे ऐसा जान पड़ता है कि कोई प्राणी जिसकी सूरत सांप से बहुत मीलती जुलती है मेरी चारपाई के चारों ओर घूमता है। मैं भाई के मारे चुप्पी साध लेती हूँ। किसी से कुछ नहीं कहती।

माँ ने समझा यह सब भ्रम है। विवाह की तिथि सी नीयत को गई। यह केवल तिलोत्मा काम पुनर संस्कार न था, बल्कि समाज सुधार का एक क्रियात्मक उदाहरण था। समाज सुधारकों के दल दूर से विवाह मैं सम्मिलित होने के लिए आने लगे, विवाह वैदिक रीती से हुआ। मेहमानों ने खूब व्याख्यान दिए। पत्रों ने खूब आलोचनाएँ की। बाबू जगदीशचंद्र के नैतिक साहस की सराहना होने लगी। तीसरे दिन बहू के विदा होने का मुहूर्त था।

जनवासे में यथासाध्य रक्षा के सभी साधनों से काम लिया गया था। बिजली की रौशनी से सारा जनवासा दिन सा हो गया था। भूमि पर एंट्री हुई चींटी भी दिखाई न देती थी, केशो में न कहीं शिकन थी, न सिलवट और न झोल। शामियाने के चारों तरफ कनाते खड़ी कर दी गई थी। किसी तरह से कीड़े मकोड़े के आने की संभावना न थी; पर भावी प्रबल होती है। प्रातःकाल के 4:00 बजे थे तारागणों की बारात विदा हो रही थी। बहू की विदाई की तैयारी हो रही थी। एक तरफ शहनाइयां बज रही थी।

दूसरी तरफ विलआप की अंतर्ध्वनि उठ रही थी। पर तिलोत्मा की आँखों में आंसू न थे, समय नाजुक था। वह किसी तरह घर से बाहर निकल जाना चाहती थी। उसके सिर पर तलवार लटक रही थी। रोने और सहेलियों से गले मिलने में कोई आनंद था ज इस प्राणी का फोड़ा चिलक रहा हो उसे ज़रा का घर बाद में सैर करने से ज्यादा अच्छा लगे, तो क्या आश्चर्य है।

वर को लोगों ने जगाया। बाजा बजने लगा। पालकी में बैठने को चला कि वधू को विदा करा लाए। पर जूते में पैर डाला नहीं था कि चीख मारकर पैर खींच लिया। मालूम हुआ, पांव जानकारीयों पर पड़ गया। देखा तो एक काला सांप जूते में से निकलकर रेंगता चला जाता था। देखते देखते गायब हो गया। वरने एक सर्द हाँ भरी और बैठ गया। आँखों में अंधेरा छा गया।

एक क्षण में सारे जनवासे में खबर फैल गई, लोग दौड़ें पड़े। औषधि पहले ही रख ली गई थी। सांप का मंत्र जानने वाला की आदमी बुला लिए गए थे। सभी ने दवाइयां दी। झाड़फूंक शुरू हुई। औषधि भी दी गई, पर कॉल के सामने किसी का वश न चला। शायद मौत सांप का वेश धरकर आई थी तिलोत्मा ने सुना तो सिर पीठ लिया। वह विकल होकर जनवासे की तरफ दौड़ी। चादर ओढ़ने की भी सुदीना रही फोर स्टार वह अपने पति के चरणों को माथे से लगाकर अपना जन्म सफल करना चाहती थी। गर की स्त्रियों ने रोका। माता भी रो रोकर समझ आने लगी।

लेकिन बाबू जगदीश चंद्र ने कहा-कोई हर्ज नहीं, जाने दो। पति का दर्शन तो करले। यह अभिलाषा क्यों रह जाए। उसी दशा में तिलोत्मा जनवासे में पहुंची, पर वहाँ उसकी तस्कीन के लिए मरने वाले की उल्टी सांसें थी। उन अधखुले नेत्रों में असहया आत्म वेदना और दारुण नैराश्य।

इस अद्भुत घटना का समाचार दूर दूर तक फैल गया। जनवासे गण चकित थे, यह क्या माजरा है। आत्मवाद के भक्त ज्ञात भाव से सिर हिलाते थे मानो वे चित्रकार दर्शी है। जगदीश चंद्र ने नसीब ठोक लिया। निश्चय हो गया कि कन्या के भाग्य में विधवा रहना ही लिखा है। नाग की पूजा साल में दो बार होने लगी। तिलोत्मा के चरित्र में भी एक विशेष अंतर दिखने लगा। भोग और बिहार के दिन भक्ति और देव आराधना में कटने लगे। मिराश प्राणियों का यही अवलम् है।

3 साल बीत गए थे कि ढाका विश्वविद्यालय के अध्यापक ने इस किस्सा फिर ताजा किया। वे पशु शास्त्र के ज्ञाता थे उन्होंने सांपों के आचार व्यवहार का विशेष रीती से अध्ययन किया। वे इस रहस्य को खोलना चाहते थे। जगदीश चंद्र को विवाह का संदेश भेजा। उन्होंने टालमटोल किया। दयाराम ने और भी आग्रह किया। लिखा, मैने वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए यह निश्चय किया है। मैं इस विषधर नाग से लड़ना चाहता हूँ। वह अगर सौगात लेकर आए तो भी मुझे कोई हानि नहीं पहुंचा सकता, वह मुझे काटकर आप ही मर जाएगा।

अगर वह मुझे काट भी ले तो मेरे पास ऐसे मंत्र और औषधि है कि मैं एक क्षण में उसके विश को उतार सकता हूँ। आप इस विषय में कुछ चिंता न कीजिए। मैं विश के लिए अजय हूँ। जगदीश चंद्र को अब कोई ऊर्ज न सूझा। हाँ, उन्होंने एक विशेष प्रयत्न यह किया कि ढाके में ही विवाह हो। इसलिए वे अपने कुटुम्बियों को साथ लेकर विवाह के एक सप्ताह पहले गए।

चलते समय अपने संदूक बिस्तर आदि खूब देखभाल कर रखें कि साफ कहीं उनमें छिपकर ना बैठ जाए। शुभ लग्न में विवाह संस्कार हो गया। तिलोत्मा विकल्प हो रही थी। मुख्य पर एक रंग आता था, एक रंग जाता था, पर संस्कार में कोई विघ्न बाधा न पड़ी। तिलोत्तमा रो धोकर ससुराल गई। जगदीश चन्द्र घर लौट आए, पर चिंतित थे जैसे कोई आदमी सराय में खुला हुआ सन्दूक छोड़कर बाजार चला गया।

तिलोत्मा उसके स्वभाव मेँ अब एक विचित्र रूपांतर हुआ। वह औरों से हस्ती बोलती आराम से खाती पीती सैर करने जाती, सिनेमा हॉल और अन्य सामाजिक सम्मेलन में शरीक होती। इन अवसरों पर प्रोफेसर दयाराम से भी बड़े प्रेम का व्यवहार करती, उनकी आराम का भी ध्यान रखती। कोई काम उनकी इच्छा के विरुद्ध न करती। कोई अजनबी आदमी उसे देखकर कह सकता था, गृहिणी हो तो ऐसी हो। दूसरों की दृष्टि में इस दंपति का जीवन आदर्श था, किंतु अन्तर्दशा कुछ और ही थी।

उनके साथ कमरे मेँ जाते ही उसका मुख विकृत हो जाता, माथे पर बल पड़ जाते, शरीर अग्नि की भांति जलने लगता, पलकें खुली रह जाती, नेत्रों से ज्वाला से निकलने लगती और उसमें से झूलती हुई लपटें निकलती मुख्य पर कालिमा छा जाती और यद्यपि स्वरूप में कोई विशेष अंतर ना दिखाई देता; पर ना जाने क्यों भ्रम होने लगता, यह कोई नागिन है। कभी कभी वह फुंकार ने भी लगती। इस स्थिती में दयाराम को उनके समीप जाने या उससे कुछ बोलने की हिम्मत न पड़ती। भी उसके रूप लावण्य पर आकर्षित थे, किंतु अवस्था में उन्हें उससे घृणा होती। उसे इसी उन्माद के आवेग में छोड़कर बाहर निकल आते।

डाक्टरों से सलाह ली, स्वयं इस विषय की कितनी ही किताबों का अध्ययन किया; पर रहस्य कुछ समझ में आ आया, उन्हें भौतिक विज्ञान में अपनी अल्पज्ञात स्वीकार करनी पड़ी। उन्हें अब अपना जीवन असहाय जान पड़ता। अपनी दुस्साहस पर पछताते। नाहक इस विपत्ति मेँ अपनी जान फंसाई। उन्हें शंका होने लगी कि अवश्य कोई प्रेत लीला है! मिथ्यावादी न थे, और जहाँ बुद्धि और तर्क का कुछ वश नहीं चलता, वहाँ मनुष्य विवश होकर मिथ्यावादी हो जाता है।

धीरे धीरे उनकी यह हालत हो गई कि वह सदैव तिलोत्मा से दूर रहते। डर लगता है कि कहीं वह मुझे मार न डाले। ना जाने कब उन्माद का अवैध हो। यह चिंता हृदय को व्यतीत किया करती। हिप्नोटिज्म, विद्युत शक्ति और कई नए आरोग्य विधानों की परीक्षा की गई। उन्हें हिप्नोटिज्म पर बहुत भरोसा था; लेकिन जब यह योग भी निष्फल हो गया तो वे निराश हो गए।

1 दिन प्रोफेसर दयाराम किसी वैज्ञानिक सम्मेलन में गए हुए थे। लौटे तो 12:00 बज चूके थे। वर्षा के दिन थे। नौकर चाकर सो रहे थे। वे तिलोत्मा के शयनगृह मैं यह पूछने गए कि मेरा भोजन कहाँ रखा है। अंदर कदम रखा ही था कि तिलोत्मा कैसे रहने की और उन्हें एक अति भीमकाय काला सांप बैठा हुआ दिखाई दिया। प्रोफेसर साहब चुकी से लौट आए। अपने कमरे में जाकर किसी औषधि की एक खुराक भी और पिस्तौल तथा सांगा लेकर फिर तिलोत्मा के कमरे में पहुंचे।

विश्वास हो गया कि वह वही पुराना शत्रु है। इतने दिनों मैं राह देखता हुआ यहाँ आ पहुंचा। पर इसे तिलोत्मा से क्यों इतना प्रेम है। उसके सिरहाने यू बैठा हुआ है मानों कोई रस्सी का टुकड़ा है। यह क्या रहस्य है! उन्होंने सांपों के विषय में बड़ी अद्भुत कथाएँ पढी और सुनी थी, पर ऐसी कौतूहलजनक घटना का उल्लेख कहीं न देखा था। हाँ, तिलोत्मा के सिर पर भूत सवार हो गया था। उसके नैनो से ज्वाला निकल रही थी जिसकी लपटे दो गज तक लगती। इस समय उन्माद अतिशय प्रचंड था।

दयाराम को देखते ही बिजली की तरह उन पर टूट पड़ी और हाथों से आघात करने के बदले उन्हें दांतों से काटने की चेष्टा करने लगी। इसके साथ ही अपने दोनों हाथ उसकी गर्दन पर डाल दिए। दयाराम ने बहुत चाहा, एड़ी चोटी तक का ज़ोर लगाया कि अपना गला छुड़ा लें, लेकिन तिलोत्मा का बाहुपाश प्रशिक्षण सांप कि केडली की भाँति कठोर एवं संकुचित होता जाता था। उधर यह संदेश था कि इसने मुझे काटा तो कदाचित मुझे जान से हाथ धोना पड़ेगा। उन्होंने अभी जो औषधि पी थी, वह सर्प विष से अधिक घातक थी।

इस दशा में उन्हें यह शोकमय विचार उत्पन्न हुआ। यह भी कोई जीवन है कि दंपति का उत् तरदायित् तो सब सिर पर सवार, उसका सुख नाम का नहीं, उलटे रात दिन जान का खटका। यह क्या माया हैं। कोई प्रेत तो नहीं है जो इसके सिर आकर यह दशा कर दिया करता है। कहते हैं कि ऐसी अवस्था में रोगी पर चोट की जाती है, वह प्रेत पर ही पड़ती है नीचे जातियों में इसके उदाहरण भी देखे है। वे इसी विचार में पड़े हुए थे कि उनका दम घुटने लगा।

तिलोत्मा के हाथ रस्सी के फंदे की भांति उनकी गर्दन को कस रहे थे वे बेचारे असहाय भाव से इधर उधर ताकने लगे। कैसे जान बचे, कोई उपाय न सूझ पड़ता था। सांस लेना दूभर हो गया, शरीर स्थिर पड़ गया, पैर थरथराने लगे। सहसा तिलोत्मा ने उनके बाहों की ओर मुँह बढ़ाया। दयाराम कांप उठे। मृत्यु आंखें के सामने नाचने लगी। मन में कहा-यह इस समय मेरी स्त्री नहीं विष युक्त भयंकर नागिन है; इसके विष से जान बचानी मुश्किल है। अपनी औषधि पर जो भरोसा था, वह जाता रहा।

भगवान कितना विकराल रूप हैं? प्रत्यक्ष नागिन मालूम हो रही है। अब उल्टी पढ़ें या सीधी इस दशा का अंत करना ही पड़ेगा। तिलोत्मा बार बार सांप की भाँति फुंकार मारकर जीप निकालते हुए उनकी ओर झपटती थी। एकाएक वहाँ बड़े कर्कश स्वर में बोली-मूर्ख! तेरा इतना साहस की तू इस सुंदरी से प्रेमालिंगन करें। यह कहकर वह बड़े वेग से काटने को दौड़ी। दयाराम का धैर्य जाता रहा। उन्होंने दाहिना हाथ सीधा किया और तिलोत्मा की छाती पर पिस्तौल चला दी।

तिलोत्मा पर कुछ असर नहीं हुआ। बाहें और भी कड़ी हो गई; आंखो से चिंगारी निकलने लगी। दयाराम ने दूसरी गोली दाग दी। ये चोट पूरी पड़ी। तिलोत्मा का बाहु बंधन ढीला पड़ गया। एक क्षण में उसके हाथ नीचे को लटक गए, सिर झुक गया और वह भूमि पर गिर पड़ी।

तब वह दृश्य देखने में आया जिसका उदाहरण कदाचित अलिफ लैला चंद्रकांता में भी ना मिले। वही पलंग के पास जमीन पर एक काला दीर्घकाय सर पड़ा तड़प रहा था। उसकी छाती और मुँह से खून की धारा बह रही थी।

दयाराम को अपनी आँखों पर विश्वास ना आता था। ये कैसी अद्भुत लीला थी! समस्या क्या है किस्से पूछें। इस तिलिस्म को तोड़ने का प्रयत्न करना मेरे जीवन का एक कर्तव्य हो गया। ने सागी से सांप की देह में एक कोंचा मारा और फिर वे उसे लटकाए हुए आंगन में लाए। बिलकुल बेदम हो गया था। उसे अपने कमरे में ले जाकर एक खाली संदूक में बंद कर दिया। उसमें भूस भरवाकर बरामदे में लटकाना चाहते थे। इतना बड़ा गेहूंअन सांप किसी ने न देखा होगा।

तब वे तिलोत्मा के पास गए। डर के मारे कमरे में कदम रखने की हिम्मत न पड़ी। हाँ, इस विचार से कुछ तस्कीन होती थी कि सांप प्रीत मर गया है तो उसकी जान बच गई होगी। इस आशा और भय की दशा में वे अंदर गए तो तिलोत्तमा आईने के सामने खड़ी कैश सवार रही थी।

दयाराम को मानो चारों पदार्थ मिल गए। तिलोत्मा का मुख कमल खिला हुआ था। उन्होंने कभी उसे इतना प्रफुल्लित न देखा था। इन्हें देखते ही वह उनकी ओर प्रेम से चली और बोली-आज इतनी रात तक कहा रहे?

दयाराम प्रेम से भरे बोले-एक जलसे में चला गया था। तुम्हारी तबियत कैसी है? कहीं दर्द नहीं है?

तिलोत्मा ने उनको आश्चर्य से देख कर पूछा-तुम्हें कैसे मालूम हुआ? मेरी छाती में ऐसा दर्द हो रहा है जैसे चिलक पड़ गई हो।

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