एक आँच की कसर – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | ek aanch ki kasar Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों आपने हिंदी साहित्य के स्तंभ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानियों के बारे में ज़रुर सुना होगा, इनमे से ही एक प्रसिद्ध कहानी – एक आँच की कसर के बारे मे आप इस लेख मे पढ़ेंगे।

एक आँच की कसर by मुंशी प्रेमचंद Ek Aanch ki Kasar by Munshi Premchand Hindi/Urdu story

ek aanch ki kasar Munshi Premchand ki kahani

एक आँच की कसर – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | ek aanch ki kasar Munshi Premchand ki kahani in Hindi

सारे नगर मेँ महाशय यशोदानंद का बखान हो रहा था। नगर हीं में नहीं, समस्त प्रांत में उनकी कीर्ति की जाती थी, समाचार पत्रों में टिप्पणियां हो रही थी, मित्रों से प्रशंसापूर्ण पत्रों का तांता लगा हुआ था। समाज सेवा इसको कहते हैं! उन्नत विचार के लोग ऐसा ही करते हैं। महाशय जी ने शिक्षित समुदाय का मुख उज्वल कर दिया।

अब कौन यह कहने का साहस कर सकता है कि हमारे नेता केवल बात के धनी हैं, काम के धनी नहीं! महाशय जी चाहते तो अपने पुत्र के लिए उन्हें कम से कम ₹20,000 रुपये दहेज में मिलते, उस पर खुशामद ढाते! मगर लाला साहब ने सिद्वान्त के सामने धन की रत्ती बराबर परवाह न की और अपने पुत्र का विवाह बिना एक रुपये दहेज लिए स्वीकार किया। वाह! हिम्मत हो तो ऐसी हो, सिद्वान्त प्रेम हो तो ऐसा हो, आदर्श पालन हो तो ऐसा हो। वहरे सचिव वीर, अपनी माता के सच्चे सपूत, तू ने वह कर दिखाया जो कभी किसीने न किया था। हम बड़े गर्व से तेरे सामने मस्तक नवाते हैं।

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महाशय यशोदानंद के दो पुत्र थे। बड़ा लड़का पढ़ लिखकर फाजिल हो चुका था। उसी का विवाह तय हो रहा था और हम देख चूके हैं, बिना कुछ दहेज लिए।

आज का तिलक था। शाहजहाँपुर स्वामीदयाल तिलक लेकर आने वाले थे। शहर के गणमान्य सज्जनों को निमंत्रण दे दिए गए थे। वे लोग जमा हो गए थे। महफिल सजी हुई थी। एक प्रवीण सितारिया अपना कौशल दिखाकर लोगों को मुग्ध कर रहा था। दावत का सामान भी तैयार था। मित्रगण यशोदानंदन को बधाई दे रहे थे।

एक महाशय बोले-तुमने तो कमाल कर दिया!

दूसरे-कमाल! यह कहिए कि झंडे गाढ़ दिए अब तक जिसे देखा मंच पर व्याख्यान झाड़ते ही देखा। जब काम करने का अवसर आता था तो लोग दुम लगा देते थे।

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तीसरे-कैसे कैसे बहाने गढ़े जाते हैं-साहब हमे तो दहेज से सख्त नफरत है यह मेरे सिद्धांत ये विरुद्ध है पर क्या करूँ, बच्चे की अम्मीजान नहीं मानती। कोई अपने बाप पर फेंकता है, कोई और किसी रिश्तेदार पर।

चौथे-अजी, कितने तो ऐसे विवाह है जो साफ साफ कह देते हैं कि हमने लड़के को शिक्षा दीक्षा में जितना खर्च किया है, वह हमें मिलना चाहिए। मानो उन्होंने यह रुपये किसी बैंक में जमा किए थे।

पांचवें-खूब समझ रहा हूँ, आप लोग मुझ पर छींटे उड़ा रहे हैं।

पहले-लड़की वालो का क्या दोष है सिवा इसके कि वह लड़की का बाप है।

दूसरे-सारा दोष ईश्वर का जिसने लड़कियां पैदा की। क्यों?

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पांचवें-मैं यह नहीं कहता। न सारा दोष लड़की वालो का है, न सारा दोष लड़के वालो का। दोनों ही दोषी हैं। अगर लड़की वाला कुछ ना दे तो उसे यह शिकायत करने का कोई अधिकार नहीं है कि गहने क्यों नहीं लाए, सुन्दर जोडे क्यों नहीं लाए, बाजे गाजे पर धूमधाम के साथ क्यों नहीं आए? बताइए!

चौथे-हाँ, आपका यह प्रश्न गौर करने लायक है। मेरी समझ में तो ऐसी दशा में लड़के के पिता से यह शिकायत नहीं होनी चाहिए।

पांचवें-तो यूं कहिए कि दहेज की प्रथा के साथ ही गहने और जोड़ों की प्रथा भी गलत है। केवल दहेज को मिटाने का प्रयत्न करना व्यर्थ है।

यशोदानंद-मैने दहेज नहीं लिया। लेकिन क्या मैं गहने जोडें ना ले जाऊंगा।

पहले-महाशय आपकी बात निराली है। आप अपनी गिनती हम दुनिया वालो के साथ क्यों करते हैं? आपका स्थान तो देवताओं के साथ है।

दूसरा-20,000 की रकम छोड़ दी? क्या बात है।

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यशोदानंद-मेरा तो यह निश्चित है कि हमें सदैव प्रिंसिपल पर स्थिर रहना चाहिए। प्रिंसिपल के सामने मनी की कोई वैल्यू नहीं है। हिचकी कुप्रथा पर मैने खुद कोई व्याख्या नहीं दिया, शायद कोई नोट तक नहीं लिखा। हाँ, कॉन्फ्रेंस में एक प्रस्ताव को साइन कर चुका है। मैं उसे तोड़ना भी चाहूं तो आत्मा न तोड़ने देगी। मैं सत्य कहता हूँ, यह रुपए लू तो मुझे इतनी मानसिक वेदना होगी शायद मैं इस आघात से बच ही न सकूँ।

पांचवें-अबकी कॉन्फ्रेंस आपको सभापति ना बनाएं तो उसका और अन्याय है।

यशोदानंद-मैने अपनी ड्यूटी कर दी उसका रिकॉग्नाइजेशन हो या न हो, मुझे इसकी परवाह नहीं।

इतने में खबर हुई कि महाशय स्वामीदयाल आ पहुंचे हैं। लोग उनका अभिवादन करने को तैयार हुए, उन्हें मसनद पर ला बैठाया और तिलक का संस्कार आरंभ हो गया। स्वामी दयाल ने एक पत्तल पर नारियल, सुपारी, चावल पान आदि वस्तुएं वर के सामने रखी। ब्राह्मणों ने मंत्र पढ़े हवन हुआ और वर्ग के माथे पर तिलक लगा दिया गया। तुरंत घर की स्त्रियों ने मंगलाचरण गाना शुरू किया। हे यहाँ महफिल में हे महाशय यशोदानंद ने एक चौकी पर खड़े होकर दहेज की कुप्रथा पर व्याख्यान देना शुरू किया। व्याख्यान पहले से लिखकर तैयार किया गया था, उन्होंने दहेज की ऐतिहासिक व्याख्या की थी।

 पूर्वकाल में दहेज का नाम भी न था। महाशयों! कोई जानता था कि दहेज किस चिड़िया का नाम है। सत्य मानिए, कोई जानता था कि दहेज है क्या चीज़, पशु या पक्षी, आसमान में या जमीन में, खाने में या पीने में, बादशाही जमाने में इस प्रथा की बुनियाद पड़ी। हमारे युवक सेनाओं में सम्मिलित होने लगे। वह वीर लोग थे, सेनाओं में जाना गर्व समझते थे। माताएं अपने दुलारो को अपने हाथ से शास्त्रों से सजाकर रणक्षेत्र भेजती थी।

इस भारतीय युवकों की संख्या कम होने लगी और लड़कों का मोल तोल शुरू हुआ। आज यह नौबत आ गयी कि मेरी इस कुछ महान तुच्छ सेवा पर पत्रों में टिप्पणियां हो रही है मानो मैने कोई असाधारण काम किया है। मैं कहता हूँ; अगर आप संसार में जीवित रहना चाहते हो तो इस प्रथा को तुरंत कीजिए।

एक महाशय ने शंका की-क्या इसका अंत के बिना हम सब मर जाएंगे?

यशोदानंद-संत अगर ऐसा होता है तो क्या पूछना था, लोगों को दंड मिल जाता और वास्तव में ऐसा होना चाहिए। यह ईश्वर का अत्याचार है कि ऐसे लोभी, धन पर गिरने वाले, अपनी संतान का विक्रय करने वाले नराधम जीवित है। और समाज उनका तिरस्कार नहीं करता। मगर वह सब बुद्ध फरोश है—इत्यादि।

व्याख्यान बहुत लम्बा और हास्य भरा था। लोगों ने खूब सराहना की। अपना वक्तव्य समाप्त करने के बाद उन्होंने अपने छोटे लड़के परमानंद को, जिसकी व्यवस्था सात वर्ष की थी, मंच पर खड़ा किया। उसे उन्होंने एक छोटा सा व्याख्यान लिखकर दे रखा था। दिखाना चाहते थे कि स्कूल के छोटे बालक भी कितने कुशाग्र बुद्धि है। सभा समाजों में बालकों से व्याख्यान दिलाने की प्रथा है, किसी को कौतुहल ना हुआ। बालक बड़ा सुंदर, होनहार, हसमुख था। मुस्कुराता हुआ मंच पर आया और एक जेब से कागज निकालकर बड़े गर्व के साथ उच्च स्वर में पढ़ने लगा—–

प्रिय बंधुवर,

नमस्कार!

आपके पत्र से विदित होता है कि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है। मैं ईश्वर को साक्षी करके धन आपकी सेवा में इतनी गुप्त रीती से पहुंचेगा कि किसी को लेश मात्र भी संदेह न होगा। हाँ केवल एक जिज्ञासा है। इस व्यापार को गुप्त रखने से आपको जो सम्मान और प्रतिष्ठा-लाभ होगा और मेरे निकटवर्ती में मेरी जो निंदा की जाएगी, उस के उपलक्ष्य में मेरे साथ क्या रियायत होगी? मेरा विनीत अनुरोध है कि 25 में से पांच निकाल कर मेरे साथ न्याय किया जाए…………।

महाशय यशोदानंद घर में मेहमानों के लिए भोजन परोसने का आदेश करने गए थे। निकले तो यह वाक्य उनके कानों में पड़ा-25 में से पांच मेरे साथ न्याय किया जाए। चेहरा फक हो गया, झपटकर लड़की के पास गए, कागज उसके हाथ से छीन लिया और बोले- नालायक, यह क्या पढ़ रहा है, यहाँ तो किसी मुवक्किल का खत है जो उसने अपने मुकदमे के बारे में लिखा था। यह तो कहा से उठा लाया, शैतान जा वो कागज ला जो तुझे लिख कर दिया गया था।

एक महाशय-पढ़ने दीजिए, इस तहरीर में मज़ा है, वह किसी दूसरी तहरीर में ना होगा।

दूसरे-जादू व जो सिर चढ़कर बोले!

तीसरे-अब जलसा बर्खास्त कीजिए। मैं तो चला।

चौथे-यहाँ भी चलते हुए।

यशोदानंद-बैठे बैठे, पत्तल लगाए जा रहे हैं।

पहले-बेटा परमानंद, ज़रा यहाँ तो आना, तुमने यह कागज कहाँ पाया?

परमानंद-बाबूजी ही तो लिखकर अपने मैच के अंदर रख आए थे। मुझसे कहा था कि इसे पढ़ना। अब नाहक मुझसे खफा हो रहे हैं।

यशोदानंद-वह यह कागज था कि गधे! मैने जो मेज के ऊपर ही रख दिया था। तुने ड्रॉर में से क्यों यह कागज निकाला?

परमानंद-मुझे मेज पर नहीं मिला।

यशोदानंद-तो मुझसे क्यों नहीं कहा, ड्रॉर  क्यों खोला देखो आज ऐसी खबर लेता हूँ कि तुम भी याद करोगे।

पहले-यह आकाशवाणी है।

दूसरे-इसको लीडर कहते हैं उनकी अपना उल्लू सीधा करो और नेकनाम भी बनो।

तीसरे-शर्म आनी चाहिए। यह त्याग से मिलता है धोखाधड़ी से नहीं।

चौथे-मिल तो गया था पर एक आंच की कसर रह गई।

पांचवें-ईश्वर पाखंडियों को यूं ही दंड देता है।

यह कहते हुए लोग उठ खड़े हुए हैं। यशोदानंद समझ गए कि भांडा फूट गया, अब रंग जमेगा। बार बार परमानंद को कुपित नेत्रों से देखते थे और डंडा तोड़कर रह जाते थे। इस शैतान ने आज जीती जिताई बाजी खो दी, मुँह में कालिख लग गई, सिर्फ नीचा हो गया। गोली मार देने का काम किया है।

उधर रास्ते में मित्र वर्ग टिप्पणियां करते जा रहे थे——————–

एक ईश्वर ने मुँह में कैसी कालिमा लगाई की शर्म होगी तो अब सूरत न दिखाएगा।

दूसरा-ऐसे ऐसे धनी, मानी, विद्वान लोग ऐसे पति हेत हो सकते हैं। मुझे यही आश्चर्य है। लेना है तो खुले खजाने लो, कौन तुम्हारा हाथ पकड़ता है; यह क्या कि माल चुपके चुपके उड़ाओ और यश भी कमाओ!

चौथा-यशोदानंद पर दया आ रही है। बेचारे ने इतनी दृढ़ता की, उस पर भी कलई खुल गई। बस एक आंच की कसर रह गई।

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