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आयुर्वेद और आयुर्वेदिक चिकित्‍सा पद्यति की व्‍यापकता -The prevalence of Ayurveda and Ayurvedic medicine system

भूमिका – Prelude

”जान है तो जहान है।” और ”स्‍वस्‍थ तन में ही स्‍वस्‍थ मन का वास होता है।” ऐसे हजारों स्‍लोगन हमारे भारतीय समाज में प्रचलित  हैं । ये सभी स्‍लोगन हमें अपने स्‍वाथ्य के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ स्‍वास्‍थ्य के महत्‍व को प्रदर्शित करते हैं ।

वास्‍तव में हमें कुछ भी छोटे से बड़े काम करने के लिये केवल और केवल दो बातों की आवश्‍यकता होती है । एक स्‍वस्‍थ मन की और दूसरी स्‍वस्‍थ तन की । स्‍वस्‍थ मन का अर्थ है कि मन में किसी प्रकार शोक, दुख, ग्‍लानी, चिंता जैसे कुभाव न हो क्‍योंकि इन कुभावों के होने से मन कुछ भी करने को तैयार नहीं होता । मन तैयार नहीं होता तो तन ऐसे भी निष्‍क्रिय रहता है मन के बिना । मन के इन कुभावों आधि कहते हैं ।

मन यदि चाहे, किंतु शरीर स्‍वस्‍थ न हो अर्थात शरीर के अंग शिथिल हो, दर्दो से भरे हों, शरीर का ताप अधिक हो, शरीर के आंतरिक एवं वाह्य अंग उचित रूप से काम न करें तो व्‍यक्ति का कोई भी काम करना आसान नहीं होता। शरीर के विकारों को ही व्‍याधी अथवा रोग कहते हैं ।

आधि और व्‍याधि दोनों का समुचित निदान का एक मात्र साधन आदिकाल से आयुर्वेद ही रहा है । यह अलग बात है कि बाद के समयों युनानी चिकित्‍सा पद्यति, हौम्‍योपैथी, एलोपैथी चिकित्‍सा पद्यति प्रचलन में आये । विभिन्‍न चिकित्‍सा पद्यतियॉं अपने भिन्‍न-भिन्‍न सिद्धांतों पर आ‍धारित हैं । एक दूसरे पद्यति का परस्‍पर तुलना करना उचित नहीं होगा । हम यहॉं केवल आयुर्वेदिक चिकित्‍सा पद्यति के व्‍यापकता पर ही चर्चा करेंगे ।

आयुर्वेदिक चिकित्‍सा पद्यति आयुर्वेद शास्‍त्र के सिद्धांतों पर कार्य करता है । आयुर्वेद अपने सिद्धांत से ही अन्‍य चिकित्‍सा पद्यतियों से भिन्‍न है ।

आयुर्वेदिक चिकित्‍सा पद्यति आयुर्वेद शास्‍त्र के सिद्धांतों पर कार्य करता है । आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है रोग का नहीं रोग के कारणों का उपचार किया जाना चाहिये, जिससे रोग स्‍वयं नष्‍ट हो जायेगा । आयुर्वेद अपने सिद्धांत से ही अन्‍य चिकित्‍सा पद्यतियों से भिन्‍न है ।

यहाँ पढ़ें : दैनिक जीवन में आयुर्वेद

आयुर्वेद के संबंध में कहा जाता है कि यह केवल रोग निदान का कोई उपाय नहीं है अपितु यह एक जीवन पद्यति है जिस जीवन पद्यति से व्‍यक्ति को निरोगी काया क्‍या मोक्ष तक की प्राप्ति होती है । यही बात आयुर्वेद की व्‍यापकता को प्रदर्शित करता है ।

आयुर्वेदिक चिकित्‍सा पद्यति आयुर्वेद शास्‍त्र के सिद्धांतों पर कार्य करती है – Ayurvedic Medicine works on the pricinple of Ayurveda

”किसी शारीरिक या मानसीक समस्‍या के बाहरी लक्ष्‍णों से शुरू कर मूल कारणों का पता लगाना ही निदान कहलाता है इसे आज के प्रचलित भाषा को डायग्नोसिस् ((Diagnosis) कहते हैं ।”  अन्‍य चिकित्‍सा पद्यति रोगों का डायग्नोसिस् कर रोग के कारण जान कर उपचार करते हैं ।  किन्‍तु आयुर्वेद के अनुसार रोग का कारण ही क्‍यों उत्‍पन्‍न हुआ इस बात पर भी चिंतन किया जाता है । 

”औषधि या दवाई के रूप में दिये जाने वाले पदार्थ एवं शल्‍यप्रक्रिया या अन्‍य प्रक्रियाओं के समूह को उपचार कहा जाता है ।” समान्‍यत: लोग उपचार पर ध्‍यान केन्द्रित करते हैा जबकि निदान पर अधिक ध्‍यान देने की आवश्‍यकता होती है ।

आयुर्वेदि ग्रंथों को यदि सरसरी तौर पर भी देखा जाये तो यह आसानी से दिख जाता है कि आयुर्वेदिक ग्रंथों निदान पर अधिक चर्चा है उपचार पर कम । इससे  यह प्रमाणित होता है कि आयुर्वेद रोग का नहीं रोगों के कारणों निदान करता है ।

आयुर्वेद का यह सिद्धांत इसके व्‍यापका को ही प्रदर्शित करता है । जब रोगों के कारणों का निदान किया जाता है तो व्‍यक्ति के जीवन शैली, खान-पान और रहन-सहन पर भी ध्‍यान दिया जाता है । आयुर्वेद की दूसरी बड़ी बात यह है कि यह व्‍याधि के निदान के साथ-साथ आधि अर्थात मन के विकारों का भी निदान किया जाता है ।

आयुर्वेद में निदान के मूलभूत सिद्धांत – Basic Principles of Diagnosis in Ayurveda

आयुर्वेद में मानव देह को इंद्रिय, मन और आत्‍मा का समूह माना गया है । मानव देह के ढांचे में तीन देहद्रव (कफ,वात और पित), सात मूलभूत तत्‍व (रस,रक्‍त, मज्‍जा, अस्थि मांस, मेद और शुक्र या वीर्य)  एवं तीन अपशिष्‍ट उत्‍पाद (मल, मूत्र और स्‍वेद या पसीना) होते हैं । देहद्रव में दोष या विकार आने से मूलभूत तत्‍व एवं अपशिष्‍ट उत्‍पाद का संतुलन टूट जाता है और देह विकार आधि या व्‍याधि के रूप में प्रकट होता है जिसे रोग कहते हैं ।

 आयुर्वेद निदान के त्रिदोष सिद्धांत पर आधारित है । ”शरीर के धातु और मल के दूषित होने से ही आधि और व्‍याधि उत्‍पन्‍न होते हैं । धातु और मल को दूषित करने वाले तीन कारक कफ, वात और पित होते हैं । ये तीन कारक ही तन और मन में दोष उत्‍पन्‍न करते हैं इस कारण इसे त्रिदोष सिद्धांत कहते हैं ।

आयुर्वेद में रोगों के निदान करने के लिये रोगी के दैनिक दिनचर्या, भोजन करने की रीति और रूचि, पाचन की स्थिति, नैदानिक प्रक्रिया, व्‍यक्तिगत आदतें, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति के साथ-साथ पर्यावरणीय स्थिाति का गंभीरता से अध्‍ययन किया जाता है ।

यहाँ पढ़ें : आयुर्वेद – एक परिचय

आयुर्वेद में उपचार के मूलभूत सिद्धांत – Basic Principles of Treatment in Ayurveda

”औषधि या दवाई के रूप में दिये जाने वाले पदार्थ एवं शल्‍यप्रक्रिया या अन्‍य प्रक्रियाओं के समूह को उपचार कहा जाता है ।”

आयुर्वेद के अनुसार  रोगों के उपचार के लिये पंचकर्म प्रक्रिया का विशेष उल्‍लेख मिलता है । पंचकर्म प्रक्रिया में पांच कर्म क्रमश: वमन, विरेचन, अनुवासन, आस्‍थापन और नास्‍य नामक प्रक्रिया की जाती है ।  इस प्रक्रिया के द्वारा शारीरिक घटकों को असंतुलन से बचाया जाता है, संतुलन बहाल करने के उपाय किये जाते हैं । ये उपाय मुख्‍य रूप से तीन प्रकार के होते है- औषधि, आहार और आचरण ।

आयुर्वेद के अनुसार मानव शरीर भोजन का उत्‍पाद माना गया है । भोजन सभी चयापचय परिवर्तनों ((Metabolic change) और जीवन की गतिविधयों ((Life activitie) का नींव है ।  भोजन की गुणवत्‍ता से ही मानव के मानसिक एवं शारीरिक विकास निर्धारित होता है । इसी प्रकार आचरण मतलब रोगी के पारिवारिक, सामाजिक, पर्यावरणीय स्थिति में में उसके रहवास की स्थिति  उनके व्‍यक्तिगत आदतों की स्थिति भी महत्‍वपूर्ण होता है । यही कारण है कि औषधि से अधिक आहार और आचरण को महत्‍व दिया जाता है ।


आयुर्वेद वैज्ञानिक कसौटी में – Scientific test of Ayurveda

 आयुर्वेद वैज्ञानिक कसौटी में - Scientific test of Ayurveda

पिछले दो सौ वर्षो के दौरान आधुनिक वैज्ञानिक शोधकर्ताओं ने आयुर्वेदिक जुड़ी-बुटियों की रासायनिक संरचना तथा उनके सैद्धांतिक पक्ष को उजागर करते हुये वैज्ञानिक स्‍वीकृती प्रदान कर रहे हैं । देश-विदेश में आयुर्वेदिक औषधियों का शोध का आधार  इनका रासायनिक विश्‍लेषण किया जाना रहा है ।

इन अध्‍ययनों का परिणाम यह हुआ कि बहुत सी रासायनिक दवाओं का निर्माण आयुर्वेद के सिद्धांत के आधार पर आयुर्वेदिक जुड़ी -बुटियों से हुआ है । ‘The woder that was India’ और “lmmortality and freedom” तक के आधार पर  -Raouwolia sertentina यह सर्पगंधा से बना है तथा Ephedra gerardiana सोमलता से बना है ।

भारत में सर्पगंधा को प्रारंभ से ही रक्‍तचाप कम करने के लिये प्रयोग मे लाया जाता रहा है । इस सर्पगंधा का ज्ञान यूरोप को 1703 में, फ्रांस के वनस्‍पती वैज्ञानिक प्लूमिए ने इसका पता लगाया तथा प्रसिद्ध चिकित्‍सक राउल्‍फ के नाम से इसका लैटिन नामकरण किया ।

1931 में भारतीय वैज्ञानिकों ने इससे ‘रेजपीन’ तथा ‘रिसाइनेमाइन’ नामक दो सक्रिय यौगिक प्राप्‍त किये । सीबा फर्मा नामक दवा कंपनी ने इसी सर्पगंधा के प्रयोग से हाइपरटेंशन की सबसे पहले अंग्रेजी दवा बनाने का श्रेय प्राप्‍त किया है । इसी प्रकार सोमलता नामक वनस्‍पती जो खॉंसी और अस्‍थमा के लिये आयुर्वेद प्रयुक्‍त होते रहा है, से एफिड्राइन नामक सक्रिय रसायन प्राप्‍त किया गया ।

यहाँ पढ़ें : आयुर्वेदीय चिकित्सा एवं आयुर्वेदिक औषधियां

आज भारत में राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ नई दिल्ली गुरु शिष्य परंपरा से आयुर्वेदिक स्नातक एवं स्नातकोत्तर का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करता है । राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर अंडर ग्रैजुएट पोस्टग्रेजुएट और पीएचडी शिक्षण निदान और अनुसंधान में संलग्न है और राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय जोधपुर से संबंध है ।आयुर्वेदिक स्नातकोत्तर शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान जामनगर गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय का घटक आयुर्वेद के लिए सबसे पुराना स्नातकोत्तर शिक्षण और अनुसंधान केंद्र है ।

इस प्रकार वर्तमान में भी आयुर्वेद पर कार्य सुचारू रूप से जारी है । आज भी  ग्रामीण भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयुर्वेद के सिद्धांत के आधार पर घरेलू उपचार प्रयोग में लाते हैं । शहरों में भी अब धीरे-धीरे आयुर्वेद के प्रति रुझान बढ़ रहा है । मैं विगत 2 वर्षों से अनुभव कर रहा हूं, जब से सोशल मीडिया का जोर बढ़ा है तब से भारतीय संस्कृति और भारतीय योग के साथ-साथ भारतीय आयुर्वेद के प्रति लोगों के रुझान में वृद्धि हो रहा है । आशा ही नहीं विश्वास है आने वाला समय पुन: एक बार आयुर्वेद का होगा ।

Reference

Written by Ramesh Chauhan

A Hindi content writer. Article writer, scriptwriter, lyrics or songwriter, Hindi poet and Hindi editor. Specially Indian Chand navgeet rhyming and non-rhyming poem in poetry. Articles on various topics especially on Ayurveda astrology and Indian culture. Educated best on Guru shishya tradition on Ayurveda astrology and Indian culture.

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