राई के दाने – भगवान बुद्ध की प्रेरणादायक कहानी | जातक कथाएँ | lokpriya Jatak Kathayen | rai ke dane Buddha story in hindi

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राई के दाने – भगवान बुद्ध की प्रेरणादायक कहानी | जातक कथाएँ | lokpriya Jatak Kathayen | rai ke dane Buddha story in hindi

श्रावस्ती नगरी में शागौतमी नाम की एक कन्या रहती थी। गौतमी उसका असली नाम था। काम करते-करते वह जल्दी थक जाती थी, इसीलिए लोग उसे शागौतमी के नाम से पुकारते थे। गौतमी ने जवानी में प्रवेश किया और उसका विवाह हो गया।

गौतमी गरीब घराने की थी, अतः उसकी ससुराल के लोग उसका यथोचित आदर नहीं करते थे।

कुछ समय बाद गौतमी के एक पुत्र हुआ। अब घर में उसका आदर होने लगा, लेकिन होनहार कुछ दूसरी ही थी। गौतमी का शिशु जब कुछ बड़ा हुआ और खेलने लायक हुआ तो ईश्वर ने उसे उठा लिया।

गौतमी ने सोचा पुत्र जन्म से पहले मेरा इस घर में अनादर होता था। पुत्र जन्म के बाद लोग मेरा आदर करने लगे, लेकिन अब यह लोग मेरे प्रिय शिशु को ना जाने कहां छोड़ देंगे?

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गौतमी अपने मृत पुत्र को गोद में ले,  उसके लिए घर-घर दवा मांगती फिरने लगी। लोग ताली बजाकर हंसी ठटठ आ करते हुए कहते, “पगली कहीं मरे हुए की भी दवा होती है।”

किसी भले आदमी को गौतमी पर बहुत दया आई। उसने सोचा इसमें  इस बेचारी का दोष नहीं। यह पुत्र शौक से पागल हो गई है। इसकी दवा बुध भगवान को छोड़कर और किसी के पास नहीं।

उसने कहा, “देवी तुम बुध भगवान के पास जाकर उनसे पूछो।”

गौतमी अपने शिशु को गोद में ले, जहां बुद्ध पालथी मारे बैठे थे, पहुंची और अभिवादन करके बोली, “महाराज, मेरे पुत्र को दवा दीजिए।”

तथागत ने कहा, ” तूने अच्छा किया, जो यहां चली आई। देख, तू इस नगर में से, जिस घर में किसी की मौत ना हुई हो, राई के दाने मांग लो। फिर मैं तुझे दवा दूंगा।”

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भगवान की बात सुनकर गौतमी बहुत प्रसन्न हुई और राई के दाने लेने के लिए जल्दी।

पहले घर में जाकर उसने निवेदन किया, “देखिए बुद्ध भगवान ने मुझे आप लोगों के घर से राई मांग कर लाने को कहा है, आप लोग राय देने की कृपा करें।”

गौतमी के यह शब्द सुनकर एक आदमी जट्ट से घर में से राई के दाने ले आया और गौतमी को देने लगा।

गौतमी ने पूछा, ” पहले यह बताइए कि इस घर में किसी की मौत तो नहीं हुई? “

यह सुनकर घर के लोग आश्चर्य से कहने लगे, “गौतमी, यह तू क्या कर रही कह रही है, यहां कितने आदमी मर चुके हैं इसका कोई हिसाब है?”

गौतमी बोली, “तो मैं आपके घर से राई ना लूंगी।”

गौतमी दूसरे घर गई। सब जगह यही जवाब मिला। उसने समझा शायद सारे नगर में यही बात हो।

उसे एकदम ध्यान आया कि बुद्ध भगवान ने शायद जानबूझकर ही मुझे राई मांगने के लिए भेजा है।

वह शीघ्र ही अपने मृत पुत्र को नगर के बाहर श्मशान में ले गई। उसे अपने हाथ में लेकर बोली, “प्रिय पुत्र, मैंने समझा था शायद तुम ही अकेले भरने के लिए पैदा हुए हो, लेकिन अब मुझे मालूम हुआ कि मौत सबके लिए है। जो पैदा हुआ है।”

इतना कहकर अपने पुत्र का श्मशान में अंतिम संस्कार करके वह वहां से लौट आई। लौटकर गौतमी बुध के पास गई। बुद्ध ने पूछा, “गौतमी, राई के दाने मिल गए?” गौतमी ने सिर हिला दिया। वह सच जान चुकी थी।

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दुष्ट कुमार

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