गुल्ली डंडा – प्रेमचंद की कहानी | gulli danda Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों आपने हिंदी साहित्य के स्तंभ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानियों के बारे में ज़रुर सुना होगा, उन्होने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज की कुरुतियों को उजागर करने का प्रयास किया और बहुत हद तक सफल भी रहे उन्होने कई रचनाएं, उपन्यास तथा कहानियाँ लिखी। इनमे से ही एक प्रसिद्ध कहानी – गुल्ली डंडा के बारे मे आप इस लेख मे पढ़ेंगे।

मुंशी प्रेमचंद की कहानी – गुल्ली डंडा

gulli danda Munshi Premchand ki kahani

गुल्ली डंडा – प्रेमचंद की कहानी | gulli danda Munshi Premchand ki kahani in Hindi

हमारे अंग्रेजी दोस्त माने या ना माने मैं तो यही कहूंगा की गुल्ली डंडा सब खेलो का राजा है अब भी कभी लड़कों को गुल्ली डंडा खेलते देखता हूं तो जी लोटपोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर  खेलने लगे ना  ग्राउंड की जरूरत ना कोट की ना नेट की ना थापी की ।

मजे से किसी पेड़ की एक टहनी काट ली,  गुल्ली बना ली और 2 आदमी भी आ गए;  तो खेल शुरू हो गया। विलायती खेलों में सबसे  बड़ी परेशानी है कि उनके सामान  महंगे होते हैं।  जब तक कम से कम एक सैकड़ा ना खर्च  कीजिए,  खिलाड़ियों में शुमार ही नहीं हो सकते। यह गुल्ली डंडा है कि बिना हरण फिटकरी के चौका रंग देता है;  पर हम अंग्रेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरुचि हो गई है।

यहाँ पढ़ें : मुंशी प्रेमचंद सम्पूर्ण हिन्दी कहानियाँ

हमारे स्कूलों में हर एक लड़के  से तीन चार रुपए सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सोचता कि भारतीय खेल खिलाए; जो बिना दाम कौड़ी के खेले जाते हैं। अंग्रेजी खेल उनके लिए है जिनके पास धन है। गरीब लड़कों के सिर क्यों यह व्यसन मढ़ते हो। ठीक है, गुल्ली से आंख फूट जाने का भय रहता है। तो क्या क्रिकेट से सिर फूट जाने दिल्ली फट जाने टांग टूट जाने का भय नहीं रहता? अगर हमारे माथे में गुल्ली का दाग आज तक बना हुआ है,  तो हमारे कई दोस्त ऐसे भी हैं जो थापी को बैसाखी से बदल बैठे। खैर यह अपनी-अपनी रुचि है।

मुझे  गुल्ली ही सब खेलो से अच्छी लगती है और बचपन की मीठी स्मृतियों में  गुल्ली ही सबसे मीठी है।  वह प्रातः काल घर से निकल जाना वह पेड़ पर चढ़कर टहनियां काटना और गुल्ली डंडे बनाना वह उत्साह वह लगन वह खिलाड़ियों के जमघट वह पदना और पदाना वह लड़ाई झगड़े वह सरल स्वभाव जिसमें छूत अछूत अमीर गरीब का बिल्कुल  भेद ना रहता था जिसमें अमीराना ढंग की प्रदर्शन की अभिमान की गुंजाइश ही ना थी यह उसी वक्त भूलेगा जब घरवाले बिगड़ रहे हैं।

यहाँ पढ़ें : मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय

पिताजी चौके पर बैठे वेग से रोटी ऊपर अपना क्रोध उतार रहे हैं अम्मा की दौड़ केवल द्वार तक है लेकिन उनकी विचारधारा में मेरा अंधकारमय भविष्य टूटी हुई नौका की तरह डगमगा रहा है और मैं हूं कि  पदने मैं मस्त हूं ना नहाने की सुधि है ना खाने की गुल्ली है तो जरा सी पर उसमें दुनिया भर की मिठाइयों की मिठास और   तमाशा का आनंद भरा हुआ है।

 मेरे हमजोलीओं में एक लड़का गया नाम का था। मुझसे दो-तीन साल बड़ा होगा। दुबला लंबा बंदरों की सी लंबी लंबी पतली पतली उंगलियां बंदरों की सी  ही चपलता  वही झल्लाहट। गोली कैसी हो उस पर इस तरह लपकता  था जैसे छिपकली कीड़ों पर लपकती है। मालूम नहीं उसके मां-बाप थे या नहीं कहां रहता था क्या खाता था पर था हमारे गुल्ली क्लब का चैंपियन। जिसकी तरफ वह आ जाए उसकी जीत निश्चित थी,  हम सब उसे दूर से आते देख उसका दौड़ कर स्वागत करते थे और उसे  अपने साथ  कर लेते थे।

यहाँ पढ़ें : विष्णु शर्मा की 101 नैतिक कहानियां

 एक दिन हम और गया दो ही खेल रहे थे। वह पदा रहा था मैं पद रहा था मगर कुछ विचित्र बात है की पदआने में हम दिन भर मस्त रह सकते हैं पदना  1 मिनट का भी अखरता है मैंने गला छुड़ाने के लिए सब चालें चली जो ऐसे अवसर पर शास्त्र विहित ना होने पर भी क्षमा मान्य है लेकिन गया अपना दांव लिए बगैर मेरा पिंड ना छोड़ता था

 अनुनय विनय का कोई असर ना हुआ। मैं घर की ओर भागा।

 गया नहीं मुझे दौड़ कर पकड़ लिया और डंडा तानकर बोला मेरा दाव देकर जाओ। पदाया   तो बड़े बहादुर बनके  पदने  की बेर क्यों भागे जाते हो?

 तुम दिन भर पदाओ  तो मैं दिन भर पदता रहूं?

 हां तुम्हें दिन भर पदना पड़ेगा ।

 ना खाने जाओ ना पीने जाऊं?

  हां मेरा दाव  दिए बिना कहीं नहीं जा सकते।

 मैं तुम्हारा गुलाम हूं?

 हां मेरे गुलाम हो।

 मैं घर जाता हूं देखो मेरा क्या कर लेते हो?

 घर कैसे जाओगे कोई दिल लगी है? दाव  दिया है दाव लेंगे।

 अच्छा कल मैं तुम्हें अमरूद खिलाया था। वह लौटा दो।

 वह तो पेट में चला गया

 निकालो पेट से। तुमने क्यों खाया मेरा अमरूद?

 अमरूद तुमने दिया था तब मैंने खाया। तुमसे  मांगा ना था।

 जब तक मेरा अमरूद ना दोगे  मैं दाव  ना दूंगा

 मैं समझता था न्याय मेरी और है। आखिर मैंने किसी स्वार्थ से ही उसे अमरुद खिलाया होगा। कौन निस्वार्थ किसी के साथ सलूक करता है। भिक्षा तक तो स्वार्थ के लिए ही देते हैं। जब गया ने अमरुद खाया तो फिर उसे  मुझसे दाव  लेने का क्या अधिकार है? रिश्वत देकर तो लोग खून पचा लेते हैं यह मेरा अमरूद यूं ही हजम कर  जाएगा? अमरुद पैसे के पांच वाले थे जो गया  के बाप को भी नसीब ना होंगे । यह सरासर अन्याय था।

 गया ने मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा  मेरा दाव  देकर जाओ  अमरुद अमरुद मैं नहीं जानता।

 मुझे न्याय का बल था। वह अन्याय पर डटा हुआ था। मैं हाथ छुड़ाकर भागना चाहता था। वह मुझे जाने ना देता था। मैंने गाली दी उसने  उससे कड़ी गाली दी और गाली नहीं दो एक चांटा जमा दिया। मैंने उसे दांत काट लिया। उसने मेरी पीठ पर डंडा जमा दिया। मैं  रोने लगा। गया मेरी इस सत्र का मुकाबला ना कर सका भागा। मैंने तुरंत आंसू पोंछ डालें डंडे की चोट भूल गया और हंसता हुआ घर में जा पहुंचा। मैं थानेदार का लड़का  एक नीच जात के लड़के के हाथों पिट गया,  यह मुझे उस समय भी अपमानजनक मालूम हुआ लेकिन घर में किसी से शिकायत ना की।

 उन्हीं दिनों पिताजी का वहां से  तबादला हो गया। नई दुनिया देखने की खुशी में मैं ऐसा फूला कि अपने  दोस्तों से बिछड़ जाने का बिल्कुल दुखना हुआ। पिताजी दुखी थे। यह बड़ी आमदनी की जगह थी। अम्मा भी दुखी थी यहां सब चीजें सस्ती मिलती थी और मोहल्ले की  स्त्रियों से  घर जैसा व्यवहार हो गया था लेकिन मैं मारे खुशी के  फूला ना समाता था। लड़कों से जीत उड़ा रहा था वहां ऐसे घर थोड़े ही होते हैं।

ऊंचे ऊंचे घर आसमान से बातें करते हैं वहां के अंग्रेजी स्कूल में मास्टर लड़कों को नहीं   मारते। मेरे मित्रों की फैली हुई आंखें और चकित मुद्रा बता रही थी कि मैं उनकी निगाहों में कितना ऊंचा उठ गया हूं। बच्चों में मिथ्या को सत्य बना लेने की शक्ति है जिसे हम जो सत्य को मिथ्या बना लेते हैं क्या समझेंगे।  मेरे दोस्तों को मुझसे कितनी   जलन हो रही थी। मानो कह रहे थे तुम भाग्यवान हो भाई जाओ हमें तो इस  गांव में ही जीना और मरना भी है।

                                                            *****************

20 साल गुजर गए। मैंने इंजीनियरिंग पास की और उसी जिले  का दौरा करता हुआ  उसी कस्बे में पहुंचा और डाक बंगले में ठहरा। उस स्थान को देखते ही इतनी मधुर बाल प्रतियां हृदय में जाग उठी कि मैंने छड़ी उठाई और कस्बे की सैर करने निकला। आंखें किसी प्यासी पथिक की भांति बचपन के उन क्रीडा स्थलों को देखने के लिए व्याकुल हो रही थी पर उस परिचित नाम के सिवा वहां और कुछ परिचित ना था।

जहां खंडहर था पक्के मकान खड़े थे जहां बरगद का पुराना पेड़ था वहां अब एक सुंदर बगीचा था। स्थान का कायापलट हो गया था। अगर उसके नाम और स्थिति का ज्ञान ना होता तो मैं इसे पहचान भी ना सकता। बचपन की संचित और अमर स्मृतियां  बाजू खोलें अपने उन पुराने मित्रों से गले मिलने को अधीर हो रही थी मगर वह दुनिया बदल गई थी। ऐसा भी होता था कि उस धरती से लिपट कर  रो लूं और कहूं तुम मुझे भूल गई। मैं तो अभी तुम्हारा वही रूप देखना चाहता हूं।

 अचानक एक खुली हुई जगह में मैंने दो तीन लड़कों को गुल्ली डंडा खेलते दिखा। एक क्षण के लिए मैं अपने को बिल्कुल भूल गया। भूल गया कि मैं अफसर हूं सहाबी ठाठ में रौब और अधिकार के आवरण में।

 जाकर एक लड़के से पूछा क्यों बेटा यहां कोई गया नाम का आदमी रहता है?

 एक  लड़के ने गुल्ली डंडा समेटकर सहमे हुए स्वर में कहा कौन गया? गया चमार?

 मैंने यूं ही कहा हां हां वही। गया नाम का कोई आदमी है  तो। शायद वही हो।

 हां है तो।

 जरा उसे बुला सकते हो?

 लड़का दौड़ा हुआ गया और एक क्षण में 5 हाथ के काले देव को साथ लिए आता दिखाई दिया। मैं दूर से ही पहचान गया। उसकी ओर लपकना चाहता था कि उसके गले लिपट जाऊं पर कुछ सोच कर रह गया। बोला कहो गया मुझे पहचानते हो?

 गया ने झुक कर सलाम किया हां मालिक भला   पहचानेंगे क्यों नहीं? आप मजे में रहे?

 बहुत मजे में। तुम अपनी कहो?

 डिप्टी साहब का चपरासी हूं।

 मकई मोहन दुर्गा यह सब कहां है? कुछ खबर है?

 मकई तो मर गया, दुर्गा और मोहन दोनों डाकिए हो गए हैं, आप?

 मैं तो जिले का इंजीनियर हूं।

 सरकार तो पहले ही बड़े जहीन  थे।

 अब कभी गुल्ली डंडा खेलते हो?

 गया नहीं मेरी और प्रश्न की आंखों से देखा अब गुल्ली डंडा क्या खेलूंगा सरकार अब तो पेट के धंधे से छुट्टी नहीं मिलती।

 आओ आज हम तुम खेलें।

 गया बड़ी मुश्किल से राजी हुआ। वह ठहरा टके का मजदूर, मैं एक बड़ा अफसर, हमारा और उसका क्या जोड़? बेचारा  झेप रहा था, लेकिन मुझे भी कुछ कम  शर्म ना थी इसलिए नहीं कि मैं गया के साथ खेलने जा रहा था बल्कि इसलिए कि लोग इस खेल को अजूबा समझ कर इसका तमाशा बना लेंगे और अच्छी खासी भीड़ लग जाएगी। उस भीड़ में वह आनंद कहां रहेगा,  पर खेले बगैर तो रहा नहीं जाता था।

आखिर निश्चय हुआ कि दोनों जने बस्ती से दूर जाकर एकांत में खेलेंगे। वहां कौन सा कोई देखने वाला बैठा होगा। मजे से खेलेंगे और बचपन की उस मिठाई को खूब रस ले ले कर खाएंगे। मैं गया को लेकर डाक बंगले पर आया और मोटर में बैठा कर मैदान की और चला गया। साथ में एक कुल्हाड़ी ले ली। मैं गंभीर भाव  धारण किए हुए था, लेकिन गया उसे अभी तक मजाक ही समझ रहा था,  फिर भी  उसके मुख पर उत्सुकता या आनंद  नहीं दिखाई दे रहा था । शायद वह हम दोनों में जो अंतर हो गया था वह सोचने में मगन था।

 मैंने पूछा तुम्हें कभी हमारी याद आई थी गया? सच कहना।

 गया सोचते हुए बोला मैं आपको क्या याद करता  हुजूर किस लायक हूं मैं। भाग्य में आपके साथ कुछ दिन खेलना लिखा था, नहीं तो मेरी क्या गिनती।

 मैंने कुछ उदास होकर कहा लेकिन मुझे तो बार-बार तुम्हारी याद आती थी। तुम्हारा वह डंडा जो तुमने तानकर जमाया था याद है ना?

 गया नहीं पछताते हुए कहा वह लड़कपन था सरकार उसकी याद ना दिलाओ।

 वाह,   वह मेरी बाल जीवन की सबसे रसीली याद है। तुम्हारे उस डंडे में जो रस था, वह तो अपना आदर सम्मान में पाता हूं, ना  धन में। कुछ ऐसी मिठास थी उसमें कि आज तक उससे मन मीठा हो रहता है।

 इतनी देर में हम बस्ती के कोई तीन मील निकल आए हैं। चारों तरफ सन्नाटा है। पश्चिम की ओर कोशिश तक भीमताल फैला हुआ है, जहां आकर हम किसी समय कमल के पुष्प तोड़ ले जाते थे, और उसके झुमके बनाकर कानों में डाल लेते थे। मैं लपक कर एक पेड़ पर चढ़ गया और एक टहनी  कांट लाया। झटपट गुल्ली डंडा बन गया।

 खेल शुरू हो गया। मैंने गुच्ची में गुल्ली रखकर उछाली। गुल्ली गया के सामने से निकल गई। उसने हाथ  बढ़ाया जैसे मछली पकड़ रहा हो। उसके पीछे जाकर गिरी। यह वही गया है जिसकी हाथों में गोली जैसे आप ही आप जाकर बैठ जाती थी। वह दाहिने बाएं कहीं हो गुल्ली उसकी हथेलियों में ही पहुंचती थी। जैसे गोलियों पर वशीकरण डाल देता हो।

नई गुल्ली, पुरानी गुल्ली, छोटी गुल्ली, बड़ी गुल्ली,  सपाट गुल्ली, सभी उसे मिल जाती थी। जैसे उसके हाथों में कोई चुंबक हो, जो  गुल्ली को खींच लेता हो, लेकिन आज गुल्ली को उस से प्रेम नहीं रहा। फिर तो मैंने अच्छे से खेलना शुरू किया मैं तरह तरह की  धांधली  कर रहा था। अभ्यास की कसर बेईमानी  से पूरी कर रहा था। हालांकि शास्त्र के अनुसार गया की बारी आनी चाहिए थी।

गुल्ली पर जब छोटी चोट लगती और वह जरा दूर पर गिर पड़ती, तो मैं झटपट उसे खुद उठा लेता और दोबारा मारता। गया या सारी बेकयादे देख रहा था, पर कुछ ना बोलता था, जैसे उसे सब कायदे कानून भूल गए हो। उसका निशाना कितना अचूक था। गुल्ली उसके हाथ से निकल कर डंडे में आकर लगती थी। उसके हाथ से छूटकर उसका काम था डंडे से टकरा जाना, लेकिन आज वह गुल्ली डंडे में लगती ही नहीं। कभी दाहिने जाती है, कभी बाय जाती है, कभी आगे जाती है कभी पीछे।

 आधे घंटे खेलने के बाद एक बार गुल्ली डंडे में आग लगी। मैंने धांधली की, गुल्ली डंडे में नहीं लगी, बिल्कुल पास से गई, लेकिन लगी नहीं।

 गया ने किसी प्रकार का असंतोष ना प्रकट किया।

 ना लगी होगी।

 डंडे में लगती तो क्या मैं बेईमानी करता?

 नहीं भैया तुम भला बेईमानी करोगे;

 बचपन में मजाल थी कि मैं ऐसा घपला करके जीता  बचता यही गया गर्दन पर  बैठ जाता, लेकिन आज मैं उसे कितनी आसानी से धोखा दिए चला जाता था। गधा है, सारी बातें भूल गया।

 सहसा गुल्ली डंडे में लगी और इतनी जोर से लगी जैसे बंदूक  निकली हो। इस प्रमाण के सामने अब किसी तरह की धांधली करने का साहस मुझे इस वक्त भी नहीं हो सका, लेकिन क्यों ना एक बार सच को झूठ बनाने की चेष्टा करो? मेरा हर्ज ही क्या है। मान गया तो वाह वाह नहीं तो दो चार हाथ खेलने ही तो पड़ेगा। अंधेरे का बहाना करके जल्दी से गला बचा लूंगा। फिर कौन खेलने  आता है।

 गया नहीं विजय के उल्लास में कहां लग गई लग गई ।

 मैंने अनजान बनने की चेष्टा करके कहा तुमने लगते देखा? मैंने तो नहीं देखा।

  आवाज आई है सरकार;

   और जो किसी पत्थर से लग गई हो?

 मेरे मुख से यह वाक्य उस समय कैसे निकला, इसका मुझे खुद आश्चर्य है। इस तथ्य को झुठला ना  वैसे ही था जैसे दिन को रात बताना। हम दोनों ने गुल्ली को डंडे में जोर से लगते देखा था, लेकिन गया ने मेरा कथन स्वीकार कर लिया। 

 हां किसी पत्थर से लगी होगी। डंडे में लगती तो इतनी आवाज ना आती।

 मैंने फिर खेलना शुरू कर दिया, लेकिन इतनी प्रत्यक्ष धांधली  कर लेने के बाद, गया की सरलता पर मुझे दया आने लगी, इसलिए जब तीसरी बार गुल्ली डंडे में लगी, तो मैंने बड़ी उदारता से खेलने देना तय कर दिया।

 गया नहीं कहा अब तो अंधेरा हो गया भैया कल पर रखो।

 मैंने सोचा, कल बहुत सा समय होगा, यह ना जाने कितनी देर खिलाएगा, इसलिए इसी वक्त मामला साफ कर लेना अच्छा होगा।

 नहीं नहीं अभी बहुत उजाला है। तुम अपना खेल ले लो।

गुल्ली  दिखाई नहीं देगी।

 कोई बात नहीं।

 गया नहीं खिलाना शुरू किया पर उसे अब बिल्कुल अभ्यास ना था। उसने दो बार खेलने की कोशिश की पर दोनों ही बात छू गया। 1 मिनट से कम में वह खेल पूरा कर चुका। बेचारा घंटाघर खिलाने पर 1 मिनट में ही अपना खेल खो बैठा। मैंने अपने हृदय की विशालता का परिचय दिया।

 एक बार और खेलो। तुम पहले ही हाथ में हार गए।

 नहीं भैया अब अंधेरा हो गया।

 तुम्हारा अभ्यास छूट गया क्या कभी खेलते नहीं?

 खेलने का समय कहां मिलता है भैया

 हम दोनों मोटर पर जा बैठे और चिराग जलते जलते पढ़ाओ पर पहुंच गए। गया चलते-चलते बोला कल यहां गुल्ली डंडा होगा। सभी पुराने खिलाड़ी खेलेंगे। आप भी आओगे? जब आपको फुर्सत हो तभी खिलाड़ियों को बुला लूंगा।

 मैंने शाम का समय दिया और दूसरे दिन मैच देखने आया। कोई 10 10 आदमियों की मंडली थी। कई मेरे लड़कपन के  दोस्त निकले। अधिकांश युवक थे जिन्हें मैं पहचान ना सका। खेल शुरू हुआ।

 मैं मोटर पर बैठा बैठा तमाशा देख रहा था। आज गया का खेल उसका वह खेलना देखकर मैं चकित हो गया। जैसे ही गुल्ली उसके डंडे पर लगती तो गुल्ली आसमान से बातें करती। कल कि  सी वह झिझक वह हिचकिचाहट, वह बेदिली आज ना थी। लड़कपन में जो बात थी, आज उसने पूर्णता प्राप्त कर ली थी। कहीं कल इसने मुझे इस तरह खिलाया होता तो मैं जरूर रोने लगता। उसके डंडे की चोट खाकर गुल्ली 200 गज की खबर लाती थी।

 खेलने वालों में एक युवक ने धांधली की, उसने अपने विचार में गुल्ली लपक ली थी। गया का कहना था गुल्ली जमीन में लगकर   आई थी। इस  पर दोनों में ताल ठोकने की नौबत आई। युवक दब गया। गया का तम तम आया हुआ चेहरा देखकर डर गया। अगर वह दबना जाता, तो जरूर मारपीट हो जाती।

मैं खेल में ना था, पर दूसरों के इस खेल में मुझे वही लड़कपन का आनंद आ रहा था,  मुझे खिला रहा था, मेरा मान रख रहा था। वह मुझे सम्मान दे रहा था। मैं अब ऑफिसर हूं। यह अफसरी मेरे और उसके बीच में दीवार बन गई है। अब मैं उसका लिहाज पा सकता हूं, अदब पा सकता हूं,  साहचर्य नहीं पा सकता। लड़कपन था तब मैं उसका समकक्ष था हमें कोई  अंतर ना था। यह पद पाकर अब मैं केवल उसकी दया के योग्य हूं। वह मुझे अपना जोड़ नहीं समझता। वह बड़ा हो गया है, मैं छोटा हो गया हूं। 

Leave a Comment