मनोवृत्ति – मुंशी प्रेमचंद्र की कहानी | manovritti Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों आपने हिंदी साहित्य के स्तंभ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानियों के बारे में ज़रुर सुना होगा, उन्होने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज की कुरुतियों को उजागर करने का प्रयास किया और बहुत हद तक सफल भी रहे उन्होने कई रचनाएं, उपन्यास तथा कहानियाँ लिखी। इनमे से ही एक प्रसिद्ध कहानी – मनोवृत्ति के बारे मे आप इस लेख मे पढ़ेंगे।

मनोवृत्ति – मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी | Manovritti – A Story written by Munshi Premchand

manovritti Munshi Premchand ki kahani

मनोवृत्ति – मुंशी प्रेमचंद्र की अमर कहानियाँ | manovritti Munshi Premchand ki kahani in Hindi

एक सुंदर युवती, प्रात काल, गांधीपार्क में बिल्लोर के बेंच पर गहरी नींद में सोई पाई जाए, यह चौका देने वाली बात है। सुंदरिया पार्को में हवा खाने आती है हस्ती है, दौड़ती है, फूल पौधों से खेलती है, किसी का इधर ध्यान नहीं जाता, लेकिन कोई युवती रविश के किनारे वाले बेंच पर बेखबर सोए गामा यह बिल्कुल गैर मामूली बात है, अपनी ओर बलपूर्वक आकर्षित करने वाली।

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रविश पर कितने आदमी चहलकदमी कर रहे हैं, बूढ़े भी गामा जवान भी सभी एक क्षण के लिए वहाँ ठिठक जाते हैं, एक नज़र वह दृश्य देखते हैं और तब चले जाते हैं। युवक रहस्य भाव से मुस्कुराते हुए, वृद्धजन चिंता भाव से सिर हिलाते हुए और युवतिया लज्जासे आंखें नीचे किए हुए।

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बसंत और हाशिम निक्कर और बनियान पहने नंगे पांव दौड़ रहे हैं। बड़े दिन की छुट्टियों में ओलंपियन रेस होने वाली है, दोनों उसी की तैयारी कर रहे हैं। दोनों इस स्थल पर पहुँचकर रुक जाते हैं और दबी आंखो से युवती को देखकर आपस में खयाल दौड़ाने लगते हैं।

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वसंत ने कहा– इसे और कहीं सोने की जगह नहीं मिली।

हाशिम नहीं जवाब दिया- कोई वैश्या है।

‘ लेकिन वेश्या भी तो इस तरह बेशर्मी नहीं करती।‘

‘ वेश्या अगर बेशर्म ना हो तो वैश्या नहीं।’

‘ बहुत-सी ए सी बातें है, जिनमें कुलवधु और वैश्या दोनों एक व्यवहार करती है। कोई वैश्या मामूली तौर पर सड़क पर सोना नहीं चाहती।‘

‘ रूप-छवि दिखाने का नया आर्ट है।‘

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‘ आर्ट का सबसे सुंदर रूप छिपाव है, दिखावा नहीं। वेश्या इस रहस्य को खूब समझती है।‘

‘ उसका छिपाओ केवल आकर्षण बढ़ाने के लिए है।‘

‘ हो सकता है; मगर केवल यहाँ सो जाना यह प्रमाणित नहीं करता कि यह वैश्या है। इसकी मांग में सिंदूर है’

‘ वेश्याएं अफसर पड़ने पर सौभाग्यशाली बन जाती है। रात- भर प्याले के दौर चले होंगे। काम-क्रीडाएँ कोई होंगी। अवसाद के कारण, ठंडक पाकर सो गई होगी।‘

‘ मुझे तो कुलवधु-सी लगती है?’

‘ कुलवधु पार्क में सोने आएगी?’

‘ हो सकता है, घर से रूठकर आई हो?’

‘ चलकर पूछ ही लेते हैं।‘

‘ अजीब इंसान हो, बगैर परिचय के आप किसीको जगह कैसे सकते हैं?’

‘ अजी चलकर परिचय कर लेंगे। उलटे और एहसान जताएंगे।‘

‘ और जो कहीं झिड़क दे?’

‘ झिड़कने की कोई बातभी हो। उससे सौजन्य और सहृदय में डूबी हुई बातें करेंगे। कोई युवती ऐसी बातें सुनकर चिढ नहीं सकती। अजी, गत- युवतिया तक तो रस- भरी बातें सुनकर फूल ही उठती है। यहाँ तोनवयुवती है। मैने रूप और यौवन का ऐसा सुंदर संयोग नहीं देखा था।‘

‘ मेरे हृदय पर तो यह रुख अब जीवन-पर्यंत के लिए अंकित हो गया, शायद कभी न भूल सकूँ।‘

‘ मैं तो फिर यही कहता हूँ कि कोई वैश्या है।‘

‘ रूप की देवी वेश्या भी हो, तो क्या हुआ।‘

‘ यही खड़े-खड़े कवियों की-सी बातें करोगे, जरा़ वहाँ चलते क्यों नहीं। तुम केवल खड़े रहना, पाशा तो मैं डालूँगा।‘

‘ कोई कुलवधू है।‘

‘ कुलवधु पार्क में आकर सोए, तो इसका इसके सिवा कोई अर्थ नहीं कि वह आकर्षित करना चाहती है और यह वेश्या मनोवृत्ति है।‘

‘ आजकल कई युवतिया भी तो फॉरवर्ड होने लगी है।‘

‘ फोर्वर्ड युवती युवकों से आंखें नहीं चुराती।‘

‘ हाँ, लेकिन हैं कुलवधु गोमा कुलवधू से किसी तरह की बातचीत करना मैं बेहूदगी समझता हूँ।‘

‘ तो चलो फिर दौड़ लगाते हैं।‘

‘ लेकिन दिल में तो वह मूर्ति दौड़ रही हैं।‘

‘ तो आओ बैठे। जब वह उठकर जाने लगे; तो उसके पीछे चले। मैं कहता हूँ वैश्या है।‘

‘ और मैं कहता हूँ कुलवधू है।‘

‘ तो 10-10 की बाजी रही।‘

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दो वृद्ध पुरुष धीरे टेस्ट धीरे जमीन की ओर ताकते आ रहे हैं, मानों कोई जवानी ढूँढ रहे हो। एक की कमर झुकी हुई, बाल काले, शरीर स्थूल; दूसरे के बाल पके हुए, पर कमर सीधी, दुबला शरीर। दोनों के दांत टूटे; पर नकली दाँत लगाएं, दोनों की आँखों पर एक फल स्टॉप मोटे महाशय वकील हैं, दुबले महोदय डॉक्टर है।

वकील- देखा, यह 20 वीं सदी की करामात।

डॉ-जी हाँ देखा, हिन्दुस्तान दुनिया से अलग तो नहीं है।

‘ लेकिन आप इसे शिष्टता तो नहीं कह सकते?’

‘ शिष्टता की दुहाई देने का अब समय नहीं।‘

‘ है किसी भले घर की लड़की।‘

‘ वैश्य है साहब, आप इतना भी नहीं समझते।‘

‘ वेश्या इतनी फूहड़ नहीं होती।‘

‘ और भले घर की लड़कियां फूहड़ होती है?’

‘ नई आजादी है, नया नशा है।‘

‘ हम लोगो की तो बुरी-भली कट गई। जिनके सिर आएगी, वह झेलेंगे।‘

‘ अफसोस, जवानी रुखसत हो गई।‘’

‘ जिंदगी जहन्नुम से बदतर हो जाएगी।‘

‘ मगर आंख तो नहीं रुखसत हो गई; वह दिल तो नहीं रुखसत हो गया।‘

‘बस आग से देखा करो, दिल जलाया करो।’

‘ मेरा तो फिर जवान होने को जी चाहता है। सच पूछो तो आजकल के जीवन में की जिंदगीकी बाहर है। हमारे वक्ताओं में तो कहीं कोई सूरत ही नजर न आती थी। आज तो जिधर जाओ,  सुंदरता- ही- सुंदरता के जलवे है।‘

‘ सुना, युवतियों को दुनिया में ज इस चीज़ से सबसे ज्यादा नफरत है, वह बूढ़े मर्द है।‘

‘मैं इसका कायल नहीं। पुरुष का जौहर उसकी जवानी नहीं, उसका शक्ति-संपन्न होना है। कितने ही बूढ़े जवानों से ज्यादा कड़ियल होते हैं। मुझे तो आए दिन इस के तजुर्बे होते हैं। मैं ही अपने को किसी जवान से कम नहीं समझता।‘

‘ यही सब सही है; पर बूढ़ों का दिल कमजोर हो जाता है। अगर यह बात न होती तो इस रमणी को इस तरह देखकर हम लोग यूही न चले जाते। मैं तो आंखो भर देख भी ना सका। डर लग रहा था कि कहीं उसकी आंखें खुल जाए और वह मुझे ताकतें देख ले तो दिल में क्या समझे।‘

‘ खुश होती कि बूढ़े पर भी उसका जादू चल गया।‘

‘ अजी रहने भी दो।‘

‘ आप कुछ दिनों ‘ओकासा’ का सेवन कीजिए।‘

‘ चंद्रोदय खाकर देख चुका हूँ। सब लूटने की बातें हैं’’

‘ मंकी ग्लैंड लगवा लीजिए ना?’

‘ आप इस युवती से मेरी बातें पक्की करा दे। मैं तैयार हूँ।‘

‘ हाँ, यह मेरा जिम्मा, मगर भाई हमारा हिस्सा भी रहेगा।‘

‘ मतलब?’

‘ मतलब यह कि कभी-कभी मैं आपके घर आकर अपनी आँखें ठंडी कर लिया करूँगा।‘

‘ अगर आप इस इरादे से आए तो मैं आपका दुश्मन हो जाऊंगा।‘

‘ओहो, आप तो मंकी ग्लैंड का नाम सुनते ही जवान हो गए।

‘ मैं तो समझता हूँ, यह भी डॉक्टरों ने लूटने का एक लटका निकाला है। सच बात है’

‘ अरे साहब, इस रमणी स्पर्श में जवानी है, आप है किस फेर में, उसके एक-एक अंग में गामा एक-एक चितवन में गामा एक-एक मुस्कान में, एक-एक विलास में जवानी भरी हुई है। न 100 मंकी ग्लैंड न एक रमणी का बाहु-पाश।‘

‘ अच्छा कदम बढ़ाइए, मुवक्किल आकर बैठे होंगे।‘

‘ यह सूरत याद रहेंगी।‘

‘ फिर आपने याद दिला दी।‘

‘ वह इस तरह सोई है, इसलिए कि लोग उसके रुख को, उसके अंग-विन्यास को, उसके बिखरें हुए बालों को, उसकी खुली हुई गर्दन को देखें और अपनी छाती। इस तरह चले जाना, उसके साथ अन्याय है। बुला रही है और आप भागे जा रहे हैं।‘

‘ हम जीस तरह दिल से प्रेम कर सकते हैं, जवान कभी कर सकता है?’

‘ बिलकुल ठीक कहा, मुझे तो ऐसी औरतों से साबिका पड़ चुका है, जो रसिक बूढ़ों को खोजा करती है। जवान तो छिछोरे, अस्थिर और गर्व में ही रहते हैं। वे प्रेम के बदले में कुछ चाहते हैं। यह निस्वार्थ भाव से आत्म देश समर्पण करते हैं।‘

‘ आपकी बातों से दिल मेँ गुदगुदी हो गई।‘

‘ मगर एक बात याद रखें, कहीं उसका जीवन प्रेमी मिल गया तो?’

‘ तो मिला करें, यह एसो से नहीं डरते।‘

‘ आपकी शादी की कुछ बातचीत थी तो?’

‘ हाँ थी, मगर अपने ही लड़के जब दुश्मनी पर कमर बांधे, तो क्या हो, मेरा बड़ा लड़का यशवंत तो मुझे बंदूक दिखाने लगा। इस जमाने की खूबी है।‘

अक्टूबर की धूप तेज हो चली थी दोनों मित्र निकल गए।

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दो देवियो- एक वृद्धा को माँ दूसरी नवयुवती पार्क के फाटक पर मोटर से उतरी और पार्क में हवा खाने आई। उनकी निगाह भी उस नींद की मारी युवती पर पड़ी।

वृद्धा ने कहा-बड़ी बेशरम है।

नवयुवती ने तिरस्कार देश भाव से उसकी ओर देखकर कहा- ठाठ भले घर की देवीयों के हैं।

‘ बसठाठ ही देख लो। इसी से मर्द कहते हैं- लड़कियों को आजादी न मिलनी चाहिए।‘

‘ मुझे तो वैश्या मालूम होती है।‘

‘ वेश्या ही सही, पर इसे इतनी बेशर्मी करके स्त्री समाज को लज्जित करने का क्या अधिकार है?’

‘ कैसे मज़े से सो रही है, मानो अपने घर में है।‘

‘बेशर्मी है ये। मैं पर्दा नहीं चाहती, पुरुषों की गुलामी नहीं चाहती; लेकिन औरतों में जो गौरव शीलता और सजलता है, उसे नहीं छोड़ना चाहती। मैं किसी युवती को सड़क पर सिगरेट पीते देखती हूँ, तो मेरे बदन में आग लग जाती है, उसी तरह आँधी छाती का जंफर भी मुझे नहीं सुहाता। क्या अपने धर्म की लाज छोड़ देने से ही साबित होगा कि हम बहुत फॉरवर्ड है? पुरुष अपनी छाती या पीठ खोलें तो नहीं घूमते?’

‘इसी बात पर बाईजी, जब मैं आपको आड़े हाथों लेती हूँ, तो आप बिगड़ने लगती है। पुरुष स्वाधीन है, वह दिल में समझता है कि मैं स्वाधीन हूँ। वह स्वाधीनता का स्वांग नहीं भरता। स्त्री अपने दिल में समझती है कि वह स्वाधीन नहीं है, इसलिए वह अपनी स्वाधीनता का ढोंग करती है। जो बलवान है, वे अक्कड़ते नहीं। जो दुर्बल है, वही अकड़ दिखाते हैं। क्या आप उन्हें अपने आंसू पोछने के लिए इतना अधिकार भी नहीं देना चाहती?’

‘ मैं तो कहती हूँ, स्त्री अपने को छिपाकर पुरुष को जितना नचा सकती है, अपने को खोलकर नहीं न जा सकती।‘

‘ स्त्री ही पुरुष के आकर्षण की फिक्र क्यों करें? पुरुष क्यों स्त्री से पर्दा नहीं करता?’

‘अब मुँह न खुलवाओ मीनू, इस छोकरी को जगाकर कह दो- जाकर घर पर सोए। इतने आदमी आ- जा रहे हैं और निर्लज्ज टांग फैलाई पड़ी है। यहाँ इसे नींद कैसे आ गयी?’

‘ रात कितनी गर्मी थी बाई जी, ठंडक पाकर बेचारी की आंख लग गई है।‘

‘ रात भर यही रही है, कुछ-कुछ बोलती है?’

मीनू युवती के पास जाकर उसका हाथ पकड़ कर हिलाती है- यहाँ क्यों सो रही हो देवीजी, इतना दिन चढ़ आया, उठकर घर जाओ।

युवती आँखें खोल देती है- ओह इतना दिन चढआया? क्या मैं सो गई थी? मेरे सिर मेँ चक्कर आ जाया करता है। मैने समझा शायद हवा में कुछ लाभ हो। यहाँ आई; पर ऐसा चक्कर आया कि मैं इस बेंच पर बैठ गयी, फिर मुझे कुछ होश नहीं रहा। अब भी मैं खड़ी नहीं हो सकती। मालूम होता है, मैं गिर पढूंगी। बहुत दवा की; पर कोई फायदा नहीं होता। आप डॉ श्यामनाथ जी को जानती होंगी, वहाँ मेरे ससुर है।

युवती ने आश्चर्य से कहा- अच्छा, वह तो अभी इधर से ही गए है।

‘सच, लेकिन मुझे पहचान कैसे सकते हैं? अभी मेरा गौना नहीं हुआ है।‘

‘ तो क्या आप उनके लड़के वसंतलाल की धर्म पत्नी है?’

युवती ने शर्म में सिर झुकाकर स्वीकार किया। मीनू ने हंसकर कहा- वसंतलाल तो अभी इधर से गए हैं? मेरा उनसे यूनिवर्सिटी का परिचय है।

‘ अच्छा, लेकिन मुझे उन्होंने देखा कहा है?’

‘ तो मैं दौड़कर डॉक्टर को खबर दे दू।‘

‘ जी नहीं, मैं थोड़ी देर में बिल्कुल अच्छी हो जाऊंगी।‘

‘ वसंतलाल भी वहाँ खड़ा है, उसे बुला दूँ।‘

‘ जी नहीं, किसी को न बुलाएं।‘

‘ तो चलो, अपने मोटर पर तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचा दू।‘

‘ आपकी बड़ी कृपा होगी।‘

‘ किस मोहल्ले में?’

‘ बेगमगंज, मिस्टर जयराम दास के घर।‘

‘ मैं आज ही मिस्टर वसंतलाल से कहूँगी।‘

‘ मैं क्या जानती थी कि वह इस पार्क में आते हैं।‘

‘ मगर कोई आदमी तो साथ ले लिया होता?’

‘ किस लिए? कोई जरूरत न थी।‘

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