वज्रपात – प्रेमचंद की कहानी | Vajrapaat Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों मुंशी प्रेमचंद ने बहुत सी प्रेरणादायक कहानियां लिखी हैं, जिन्होने देश की कुरुतियों को उजागर किया है। हिंदी साहित्य में उन्होने अपनी एक अलग छाप बनाई है उन्हें हिंदी साहित्य का स्तंभ कहा जाता है उनकी एक कहानी वज्रपात के बारे में आप इस लेख में पढ़ेंगे।

वज्रपात – मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी | Vajrapaat – A Story written by Munshi Premchand

वज्रपात – प्रेमचंद की कहानी | Vajrapaat Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दिल्ली की गलियां दिल्ली निवासियों के रुधीर से पल्लवित हो रही है। नादिर शाह की सेना ने सारे नगर में आतंक जमा रखा है। जो कोई सामने आता है, उसे उनकी तलवार से घाट उतरना पड़ता है। नादिर शाह का प्रचंड क्रोध किसी भारतीय शांत ही नहीं होता। रक्त की वर्षा भी उसके क्रोध कि आग को बुझा नहीं सकती।

नादरजाह दरबार ए आम में तख्त पर बैठा हुआ है। उसकी आंखो से जैसे ज्वाला निकल रही है। दिल्ली वालों की इतनी हिम्मत की उसके सिपाहियों का अपमान करें! उनकापुरुषों की यह मजाल। वह का फिर तो उसकी सेना की एक ललकार पर रणक्षेत्र से निकल भागे थे! नगर वासियों का विलाप सुनकर स्वयं सेना के दिल कांप जाते हैं; मगर नादिर शाह की क्रोध अग्नी शांत नहीं होती।

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यहाँ तक कि उसका सेनापति भी उसके सम्मुख जाने का साहस नहीं करता। वीर पुरुष दयालु होते हैं। असहाय पर, दुर्बलों पर, स्त्रियों पर उन्हें क्रोध नहीं आता। इनपर क्रोध करना वे अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं; किंन्तु निष्ठुर नादिर शाह की वीरता दया शून्य थी।

दिल्ली का बादशाह सिर झुकाए नादिर शाह के पास बैठा हुआ था। हरमसरामैं विलास करने वाला बादशाह नादिर शाह की अविनयपूर्ण बाते सुन रहा था। पर मज़ा लेना थी कि जुबान खोल सके। उसे अपनी ही जान के लाले पड़े थे, पीड़ित प्रजा की रक्षा कौन करें? वह सोचता था, मेरे मुँह से कुछ निकले और वह मुझ को डाट बैठते थे!

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अंत में जब सेना की पिशाचकी क्रूरता पराकाष्ठा को पहुँच गई, तो मोहम्मद शाह के वजीर से न रहा गया। वह कविता का मर्मज्ञ था, खुद भी कभी था। जान पर खेलकर नादिर शाह के सामने पहुंचा और यह शेर पढ़ा-

कसे न माँद कि दीगर व तेगे नाज कुशी

मगर कि ज़िंदा कुनी खलकरा व बाज़ कुशी।

मतलब तेरी निगाहों की तलवार से कोई नहीं बचा। अब यही उपाय है कि मुद्दों को फिर जिलाकर कतल कर।

शेर ने दिल पर चोट किया। पत्थर में भी सुराख होते हैं; पहाड़ों में भी हरियाली होती है; पाषाण हृदय में भी प्लस होता है। इस शेर ने पत्थर को पिघला दिया। नादिर शाह ने सेनापति को बुलाकर कत्लेआम बंद करने का हुक्म दिया। एकदम तलवारें म्यान में चली गई। कातिलों के उठे हुए हाथ उठे ही रह गए। जो सिपाही जहाँ था; वही बुत बन गया।

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शाम हो गई थी। नादिर शाह शाही बाग में सैर रहा था। बार बार वही शेर पढ़ता और झूमता-

कसे न माँद कि दीगर व तेगे नाज कुशी

मगर कि ज़िंदा कुनी खलकरा व बाज़ कुशी।

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दिल्ली का खजाना लूट रहा है। शाही महल पर पहरा है। कोई अंदर से बाहर या बाहर से अंदर आ जा नहीं सकता। बेगमेंभी अपने महलों से बाहर बाग में निकलने की हिम्मत नहीं कर सकतीं। महज खजाने पर ही आफत नहीं आई है, सोने चांदी के बर्तनों, बेशकीमती तस्वीरों और सजावट की अन्य सामग्रियों पर भी हाथ साफ किया जा रहा है। नादिर शाह तख्त पर बैठा हुआ हीरे और जवाहरात के ढेरों को गौर से देख रहा है; और वह चीज़ नजर नहीं आती, जिसके लिए मदद से उसका चित लालायित हो रहा था।

उसने मुगल ए आजम नाम के हीरे की प्रशंसा, उसकी करामातों की चर्चा सुनी थी- उसको धारण करने वाला मनुष्य दीर्घजीवी होता है, कोई रोग उसके निकट नहीं आता, उसपर पुत्र दायनी शक्ति है, इत्यादि। दिल्ली पर आक्रमण करने के जहाँ और अनेक कारण थे, वहाँ इस रत्न को प्राप्त करना भी एक कारण था।

सोने चांदी के ढेरों और बहुमूल्य रत्नों की चमक दमक से उसकी आंखें भले ही चौंधिया जाएं, पर हृदय उल्लासित न होता था। उसे तो मुगल ए आजम की धुन थी और मुगले आजम का वहाँ कहीं पता नहीं था। वह क्रोध से उन्मत होकर शाही मंत्रियों की ओर देखता और अपने अफसरों को झिड़कियां देता था। पर अपना अभिप्राय खोलकर न कह सकता था। किसी की समझ में आ जाता था कि वह इतना आतुर क्यों हो रहा है? यहाँ तो खुशी से फूल एन सामान्य का अवसर है।

अतुल संपत्ति सामने पड़ी है, संख्या में इतनी सामर्थ्य नहीं कि उनकी गणना कर सकें! संसार का कोई भी महीपति इस विपुल धन का एक अंश भी पाकर अपने को भाग्यशाली समझता; परन्तु यह पुरुष जिसने इस धनराशि का शतांश भी पहले कभी आँखों से न देखा होगा, जिसकी उम्र भेड़ चलाने में गुजरी, क्यों इतना उदासीन है? आखिर जब रात हुई, बादशाह का खजाना खाली हो गया और उस रत्न के दर्शन नहीं हुए, तो नादिर शाह की क्रोधाग्नि फिर भड़क उठी।

उसने बादशाह के मंत्री को- उसी मंत्री को, जिसकी काव्य मर्मज्ञता ने प्रजा के प्राण बचाए थे- एकांत में बुलाया और कहा- मेरा गुस्सा तुम देख चूके हो! अगर फिर उसे नहीं देखना चाहते हो तो लाजिम है कि मेरे साथ कामिल सफाई का बर्ताव करो। वरना दोबारा यह आग भड़की, तो दिल्ली की खैरियत नहीं।

वज़ीर- जहाँपनाह, गुलामों से तो कोई खता सरजद नहीं हुई। खजाने की सब कुंजियाँ जनाबेआली के सिपहसलार के हवाले कर दी गई है।

नादिर- तुमने मेरे साथ लगा किया है।

वजीर- आपके हाथ में तलवार है और हम कमजोर हैं, जो चाहे फरमाए; पर इलज़ाम के तस्लीम करने में मुझेहर्ज है।

नादिर- क्या उसके सबूत की जरूरत है?

वजीर- जी हाँ, क्योंकि दगा की सजा खत्म है और कोई भल्ला अपने मरनेपर रजामंद न होगा।

नादिर- इसका सबूत मेरे पास है, हालांकि नादिर ने कभी किसी को सबूत नहीं दिया। वह अपनी मर्जी का बादशाह हैं और किसी को सबूत देना अपनी शान के खिलाफ़ समझता है। पर यह जाती मामला है। तुमने मुगले आजम का हीरा क्यों छुपा दिया?

वजीर के चेहरे का रंग उड़ गया। वह सोचने लगा- यह हीरा बादशाह को जान से भी ज्यादा अज़ीज है। वह इसे एक क्षण भी अपने पास से जुदा नहीं करते। उनसे कैसे कहूं? उन्हें कितना सदमा होगा! मुल्क गया, खजाना गया, इज्जत गयी। बादशाही की यही एक निशानी उनके पास रह गई है। उनसे कैसे कहूं? मुमकिन है वह गुस्से में आकर इसे कहीं फेंक दें या तुड़वा डालें। इंसान की आदत है कि वह अपनी चीज़ दुश्मन को देने की अपेक्षा उसे नष्ट कर देना अच्छा समझता है।

बादशाह बादशाह हैं, मुल्क न सही, अधिकार न सही, सेना नसही; पर जिंदगी भर की स्वेक्षाचारीता 1 दिन में नहीं मिट सकती। यदि नादिर को हीरा न मिला, तो वह नजाने दिल्ली पर क्या सितम ढाएगा। आह! उसकी कल्पना ही से रोमांच हो जाता है। खुदा ना करे दिल्ली को फिर यह दिन देखना पड़ेगा।

सहसा नादिर ने पूछा– मैं तुम्हारे जवाब का मुन्तजिर हूँ क्या यह तुम्हारी धोखे काकाफी सबूत नहीं है?

वजीर– जहाँपनाह, वह हीरा बादशाह सलामत को जान से ज्यादा अज़ीज है। वह हमेशा अपने पास रखते हैं।

नादिर– झूठ मत बोलो, हीरा बादशाह के लिए है, बादशाह हीरे के लिए नहीं। बादशाह को हीरा जान से ज्यादा अज़ीज है- का मतलब सिर्फ इतना है कि वह बादशाह को बहुत अज़ीज है और यह कोई वजह नहीं है कि मैं उस हीरे को उनसे ना लू। अगर बादशाह योना देंगे, तो मैं जानता हूँ कि मुझे क्या करना होगा? तुम ज़रा इस मामलेमैं नाजुक फहमी से काम लो, जो तुमने कल दिखाई थी। ओह! कितना लाजवाब शेर था-

कसे न माँद कि दीगर व तेगे नाज कुशी

मगर कि ज़िंदा कुनी खलकरा व बाज़ कुशी।

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मंत्री सोचता हुआ चला की यह समस्या कैसे हल करूँ? बादशाह के दीवानखाने में पहुंचा तो देखा, बादशाह उसी हीरे को हाथ में लिए चिंता मेँ मग्न बैठे हुए हैं।

बादशाह को इस वक्त किसी हीरे की फिक्र थी। लूटे हुए पति की भांति वह अपनी वहाँ लकड़ी हाथ से न देना चाहता था। वह जानता था कि नादिर को इस हीरे की खबर है। वह यह भी जानता था कि खजाने में इसे न पाकर उसके क्रोध की सीमा न रहेंगी। लेकिन सब कुछ जानते हुए भी, वह हीरे को हाथ से न जाने देना चाहता था। अंत को उसने निश्चय किया, मैं इसे ना दूंगा, चाहे मेरी जान ही पर क्यों न बन जाए? रोगी की इस अंतिम सांस को न निकलने दूंगा। कहा छुपाऊँ?

इतना बड़ा मकान है कि उसमें एक नगर समा सकता है, पर इस नन्ही सी चीज़ के लिए कहीं जगह नहीं, जैसे किसी अभागे को इतनी बड़ी दुनिया में भी कही बनाना मिलतीं। किसी सुरक्षित स्थान में न रखकर क्यों न इसे किसी ऐसी जगह रख दूँ जहाँ किसी का खयाल ही न पहुंचे। कौन अनुमान कर सकता है कि मैने हीरे को अपनी सुराही में रखा होगा? अच्छा, हुक्के की फर्शी में क्यों न डाल दूँ? फरिश्तों को भी खबरन होगी।

यह निश्चय करके उसने हीरे को फर्शी में डाल दिया। पर तुरंत ही शंका हुई कि ऐसे बहुमूल्य रत्न को इस जगह रखना उचित नहीं। कौन जाने, जालिम को मेरी यह ही पसंद आ जाए। उसने तुरंत हुक्के का पानी तस्करी में उड़ेल दिया और हीरे को निकाल दिया। पानी की दुर्गंध उडी पर इतनी हिम्मत न पड़ती थी कि खिदमतगार को बुलाकर पानी फिकवा दे। भय होता था, कहीं वहदेखन जाए।

वह इसी दुविधा में पड़ा हुआ था कि मंत्री ने आकर बंदगी की। बादशाह को उस पर पूरा विश्वास था; किंतु उसे अपनी क्षुद्रता पर इतनी लज्जा आई कि वह इस रहस्य को उस पर भी प्रकट न कर सका। गुमसुम होकर उसकी ओर ताकने लगा।

मंत्री ने बात छेड़ी आज खजाने में हीरा ना मिला, तो नादिर बहुत गुस्सा हुआ, तुमने मेरे साथ धोखा किया है, मैं शहर लुटवा दूंगा, कत्लेआम करा दूंगा, सारे शहर को खाक मैं मिला दूंगा। मैने कहा, जनाब ई आदि को अख्तियार है, जो चाहे करें। पर हमने खजाने की सब कुंजियाँ आपके सिपाहसलार को दे दी है। वहाँ कुछ साफ साफ तो कहता न था, बस मुहावरों में बात करता था और भूले गीदड़ की तरह इधर उधर बौखलाया फिरता था कि किसे पाए और नोच खाएं।

मोहम्मद शाह- मुझे तो उसके सामने बैठते हुए ऐसा खौफ मालूम होता है, जैसे किसी शेर का सामना हो। जालिम की आंखें कितनी खतरनाक है। आदमी क्या है, शैतान है। खैर, मैं भी उधेड़बुन में पड़ा हुआ हूँ कि इसे कैसे छुपाऊँ। सल्तनत जाए गम नहीं; पर इस हीरे को मैं उस वक्त तक ना दूंगा, जब तक कोई गर्दन पर सवार होकर इसे छीन न लें।

वजीर- खुदा न करे किहुजूर के दुश्मनों को भी यह जिल्लत उठानी पड़े। मैं एक तरकीब बताता हूँ। हुजूरइसे अपनी पगड़ी में रख लें। वहाँ तक उसके फरिश्तों का भी खयाल न पहुंचेगा।

मोहम्मद शाह- वल्लाह, तुमने खूब सोचा; हजरत इधर उधर टटोलने के बाद अपना सा मुँह लेकर रह जाएगा। मेरे पगड़ी को कौन देखेगा? इसी से तो मैने तुम्हे लुकमान का खिताब दिया है। बस, यही तय रहा। तुम ज़रा देर पहले आ जाते, तो मुझे इतना सर दर्द ना उठाना पड़ता।

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दूसरे ही दिन दोनों बादशाहो में सुलह हो गई। वजीर नादिर शाह के कदमों पर गिर पड़ा और अर्ज किया- अब इस डूबती हुई कश्ती को आप ही पार लगा सकते हैं; वरना इसका अल्लाह ही मालिक है। हिंदुओं ने सिर उठाना शुरू कर दिया है; मराठे, राजपूत, सिख सभी अपनी अपनी ताकतों को मुकम्मल कर रहे हैं। जिसदिन उनमें मेल मिलाप हुआ उसी दिन यह नाव भंवर में पड़ जाएगी और चक्कर खाकर हमेशा के लिए नीचे बैठ जाएगी।

नादिर शाह को ईरान से चले अरसा हो गया था। वहाँ से रोजाना बागियों की बगावत की खबरें आ रही थी। नादिर शाह जल्द ही वहाँ लौट जाना चाहता था। इस समय उसे दिल्ली में अपनी सल्तनत कायम करने का अवकाश न था।संधि पर राजी हो गया। संधि पत्र पर दोनों बादशाहो ने हस्ताक्षर कर दिए।

दोनों बादशाहो ने एक ही साथ नमाज़ पढ़ी, एक ही दस्तरखान पर खाना खाया, एक ही हुक्का पिया और एक दूसरे के गले मिलकर अपने अपने स्थान को चले गए।

मोहम्मद शाह खुश था। राज्य बजाने की उतनी खुशी न थी, जितनी हीरे के बाद जाने की थी।

मगर नादिर शाह हीरा न पाकर भी दुखी न था। सब से हँस हंसकर बातें करता था मानो शील और विनय का साक्षात् अवतार हो।

प्रातःकाल; दिल्ली में नौबत ए बज रही है। खुशी की महफिलें सजाई जा रही है। 3 दिन पहले यहाँ रक्त की नदी बहती थी। आज आनंद की लहरें उठ रही है। आज नादिर शाह दिल्ली से रुखसत हो रहा है।

अशर्फियों से लदे हुए ऊंटों की कतार शाही महल के सामने रवाना होने को तैयार खड़ी है। बहुमूल्य वस्तुएं गाड़ियों में लगी हुई है। दोनों तरफ की फौजें गले मिल रहे हैं। अभी कल दोनों पक्ष एक दूसरे के खून के प्यासे थे। आज भाई भाई हो रहे हैं

नादिर शाह तक पर बैठा हुआ है। मोहम्मद शाह भी उसी तट पर उसकी बगल में बैठे हुए हैं। यहाँ पर भी परस्पर प्रेम का व्यवहार है। नादिर शाह ने मुस्कुराकर कहा- खुदा करे, यह सुलह हमेशा कायम रहे और लोगों के दिलों में से इन खूनी दिनों की याद मिट जाए।

मोहम्मद शाह- मेरी तरफ से ऐसी कोई बात न होगी जो सुलह को खतरे में डाले। मैं खुदा से या दोस्ती कायम रखने के लिए हमेशा दुआ रखूँगा।

नादिर शाह- सुलह की जितनी शर्तें थीं, सब पूरी हो चुकी है। सिर्फ एक बात बाकी है! इसके बगैर 16 की कार्रवाई पूरी नहीं होती। आइए हम लोग भी अपनी अपनी पगड़ी बदल लें। लीजिये, यह मेरी पगड़ी हाजिर हैं।

 यह कहकर नादिर ने अपनी पगड़ी मोहम्मद शाह की तरफ बढ़ाई। बादशाह के तोते उड़ गए। समझ गया, मुझसे दगा किया गया है, दोनोतरफ के सूर सामन्त खड़े थे। ना कुछ कहते बनता था ना सुनते। बचने का कोई उपाय न था और ना कोई उपाय सोच निकालने का अवसर ही। कोई जवाब न सूझा। इनकार की गुजारिश न थी। चुपचाप अपनी पगड़ी फिर से उतारी और नादिर शाह की तरफ बढ़ा दी।

हाथ कांप रहे थे, आंखोमे क्रोध और विशाल के आंसू भरे हुए थे। मुखपर हल्की सी मुस्कुराहट झलक रही थी- यह मुस्कुराहट जो अश्रुपात से भी कहीं अधिक दयनीय और व्यथा पूर्ण होती है। कदाचित अपने प्राण निकालकर देने में भी उसे इससे अधिक पीड़ा न होती।

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नादिर शाह पहाड़ों और नदियों को लांघता हुआ ईरान को चला जा रहा था। 77ऊंटों और इतनी ही बैल गाड़ियों की कतार देख देख कर उसका हृदय उछल रहा था। वह बार बार खुदा को धन्यवाद करता था जिसकी असीम कृपा से आज उसकी कीर्ति और उज्ज्वल होगई थी। अब वह केवल ईरान का बादशाह नहीं हिन्दुस्तान जैसे विस्तृत प्रदेश का भी स्वामी था। पर सबसे ज्यादा खुशी उसे मुगलेआजम हीरा हासिल करने की थी जिससे बार बार देखकर भी उसकी आँखे तृप्त होती थी। सोचता था, इस समय मैं दरबार में यह रत्न धारण करके आऊंगा सबकी आँखें झपक जाएगी लोग आश्चर्य से चकित रह जाएंगे।

उसकी सेना अन्य जल के कठिन कष्ट भोग रही थी सरहदों की विद्रोही सेना पीछे से हमले कर रही थी। हर दिन 10-20 आदमी मर जाता है हमारे जाते थे पर नादिर शाह को ठहरने की फुर्सत न थी। वह भागा भागा चला जा रहा था

ईरान की स्थिती बड़ी भयंकर थी।शहज़ादा खुद विद्रोह शांत करने के लिए गया हुआ था; पर विद्रोह दिन हर दिन उग्र रूप धारण कर रहा था। शाही सेना की युद्ध में परास्त हो चुकी थी। हर घड़ी यही भय होता था कि कहीं वह स्वयं शत्रुओं के बीच नाघिर जाए।

पर वहरे प्रताप! शत्रुओं ने जो सुना कि नादिर शाह ईरान आ पहुंचा, सुनते ही उनके हौसले पस्त हो गए। उसका सिंहनाद सुनते ही उनके हाथ पांव फूल गए। इधर नदी जहाँ ने तेहरान में प्रवेश किया उधर विद्रोहियों ने शहजादे से सुलह की प्रार्थना की, शरण में आ गए। नादिर शाह ने यह शुभ समाचार सुना, तो उसे निश्चय हो गया कि सब हीरे की करामात है। यह उसी का चमत्कार है, जिसने शत्रुओं का सिर झुका दिया, हारी हुई बाजी जिता दी।

शहज़ादा विजयी होकर घर लौटा तो प्रजा ने बड़े समारोह से उसका स्वागत और अभिवादन किया। सारा तेहरान दिवाली की ज्योतियों से जगमगा उठा। मंगल गान की ध्वनि से सब गली और कुछ गूंज उठे।

दरबार सजाया गया। शायरों ने कसीदे सुनाएँ। नादिर शाह ने गर्व से उठकर शहजादे के ताज को मुगलेआजम धीरे से अलंकृत कर दिया। चारों ओर मेहरबां मेहरबां की आवाजें बुलंद हुई। शहजादे के मुख क्रान्ति हीरे के प्रकाश से दोगुनी उठ चमक उठी। पिता स्नेह से हृदय पुलकित हो उठा। नादिर- वह नादिर, जिसने दिल्ली में खून की नदी बहाई थी- पुत्र प्रेम से फूला न समाता था। उसकी आँखों से गर्व और हार्दिक उल्लास के आंसू बह रहे थे।

सहसा बंदूक की आवाज आई- ढाए! धाए! दरबार ही उठा। लोगों के कलेजे धड़क उठे। वज्रपात हो गया! हाँयदुर्भाग्य! बंदूक की आवाज़ कानों में गूंज रही थी कि शहज़ादा कटे हुए पेड़ की तरह गिर पड़ा। साथ ही वह रत्नजड़ित मुकुट भी नादिर शाह के पैरों के पास आगिरा।

नादिर शाह ने हाथ उठाकर कहा- कातिलों को पकड़ो! साथ ही शोक से शहजादे के प्राणहीन शरीर पर गिर पड़ा। जीवन की सारी अभिलाषाओं का अंत हो गया।

लोग कातिलों की तरफ दौड़ें। फिर धाए धाए की आवाज आई और दोनों कातिल गिर पड़े। उन्होंने आत्महत्या कर ली। दोनों विद्रोही पक्ष के नेता थे।

हाइरे मनुष्य का मनोरथ, तेरी प्रवृत्ति कितनी अस्थिर है! बालू की दीवार तो वर्षा में गिरती हैं। पर तेरी दीवार बिना पानी बूंद के ढह गयी। आंधी मेँ दीपक का कुछ भरोसा किया जा सकता है, नहीं। तेरी अस्थिरता के आगे बालकों का घरौंदा अचल पर्वत है, वेश्या का प्रेम सती की प्रतिज्ञा की भांति अटल है।

नादिर शाह लोगो ने लाश पर से उठाया। उसका करुण क्रंदन हृदय को हिला देता था। सभी की आँखों से आंसू बह रहे थे। नजारा कितना प्रबल, कितना निष्ठुर, कितना निर्दय और कितना निर्मम है!

नादिर शाह ने हीरे को जमीन से उठा लिया। एक बार उसे विशाल पूर्ण नेत्रों से देखा। फिर मुकुट को शहजादे के सिर पररख दिया और वजीर से कहा- यह हीरा इसी लाश के साथ दफन होगा।

रात का समय था। तेहरान में मातम छाया हुआ था। कही दीपक या अग्नि का प्रकाश न था। न किसी ने दिया जलाया और न भोजन बनाया। अफीमचियों की चिलमें भी आज ठंडी हो रही थी। मगर कब्रिस्तान में मशालें रोशन थी- शहजादे की अंतिम क्रिया हो रही थी।

जब फातिहा खत्म हुआ, नादिर शाह ने अपने हाथों से मुकुट को लाश के साथ कब्र में रख दिया। उसी वक्त कब्र पर ईंट पत्थर और चुनें का मजाक बनने लगा।

नादिर एक महीने तक एक क्षण के लिए भी वहाँ सेना हटा। वहीं सोता, वहीं से राज्य करता। उसके दिल में यह बात बैठ गई थी कि मेरा अहित हीरे के कारण हुआ। यही मेरे सर्वनाश का अचानक वज्रपात का कारण बना।

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