विक्रम-बैताल की कहानी: उग्रसेन और राजा वृषभानु | ugrasen aur vrishbhanu – Vikram betal story in hindi | बेताल पच्चीसी – story 10

ugrasen aur vrishbhanu – Vikram betal story in hindi

 बेताल पेड़ की शाखा से प्रसन्नता पूर्वक लटका हुआ था, तभी विक्रमादित्य,ने फिर से वहां पहुंच कर, उसे पेड़ से उतारा और अपने कंधे पर डाल कर चल दिए। बेताल ने फिर अपनी कहानी सुनानी शुरू कर दी।

ugrasen aur vrishbhanu
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बहुत पुरानी बात है। मधुपुरा राज्य में वृशभय़ानू नाम का एक दयालु राजा राज्य करता था। वह  बहुत ही बुद्धिमान  शासक था उसकी प्रजा शांतिपूर्वक रहती थी।

 राज्य के ठीक बाहर एक घना जंगल था। उस जंगल में डाकुओं का एक दल रहता था। जिसका नेता उग्रसील था। यह दल जंगल के आस-पास के गांवों में जाकर लूटपाट और मारकाट करता था। मधुपुरा के लोग हमेशा भयभीत रहते थे। राजा की ओर से डाकुओं को पकड़ने की सारी कोशिश बेकार हो गई थी।

 डाकू हमेशा अपना मुंह अपनी पगड़ी के छोर से ढके रहते थे। जिससे उन्हें कभी कोई पहचान ही नहीं पाता था।

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 इसी प्रकार कई साल बीत गए। उग्रसील ने एक सुंदर और दयालु महिला से प्रेम विवाह कर लिया। वह उग्रसील का साथ  उसके दुष्कर्म में नहीं देती थी। वह अक्सर उसे सुधारने की कोशिश करती रहती थी,पर उग्रसील उसकी बात नहीं सुनता था।

 कुछ दिनों के बाद उग्रसील  को एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिससे उसके जीवन की धारा बदलने लगी। वह विनम्र और दयालु बनने लगा। पुत्र प्रेम के कारण डाका डालने के बाद उसने औरतों और बच्चों को मारना बंद कर दिया।

 1 दिन भोजन के बाद उग्रसील को आराम करते हुए नींद आ गई। उसने सपने में देखा कि राजा के सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया है तथा उसकी पत्नी और बच्चों को नदी में डाल दिया है। वैभव से घबराकर उठ बैठा पूर्णविराम पसीने से लथपथ… उसी पल उग्रसील  ने निर्णय लिया कि अब वह इस धंधे को छोड़कर ईमानदारी का जीवन बिताएगा। उसने अपने दल के लोगों को बुलाकर अपनी इच्छा बताई।

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 एक स्वर में दल के लोगों ने कहा,  “सरदार, आप ऐसा नहीं कर सकते। आपके बिना हम लोग क्या करेंगे?” उग्रसील  के इस विचार से सभी असंतुष्ट हो गए और उग्रसील  को मारने का विचार करने लगे।

 अपने और अपने परिवार के जीवन की रक्षा के लिए उग्रसील उसी रात जंगल से भागकर राज महल जा पहुंचा। अपनी पत्नी और बच्चों को बाहर छोड़ कर, दीवान चढ़कर खिड़की के रास्ते वह राजा के आरामग्रह में पहुंचा और राजा के पैरों पर गिर कर माफी मांगने लगा। राजा हड़बड़ा कर उठे और चिल्लाई, “ सिपाहियों! चोर चोर..” सिपाहियों ने तुरंत आकर उग्रसील  को पकड़ लिया। उग्रसील  हाथ जोड़कर विनम्र स्वर मैं बोला –  महाराज, मैं चोर नहीं हूं। मैं अपनी गलतियों को सुधारने तथा आपसे क्षमा याचना करने आया हूं। मेरी पत्नी और मेरा पुत्र साथ में है, मेरे पास उन्हें रखने के लिए कोई जगह नहीं है। मैं आपको सब सच सच बता दूंगा।”

उग्रसील  की आंखों में आंसू तथा बातों में सच्चाई देखकर राजा ने उसे छोड़ने की आज्ञा दे दी। उससे पूरी बात सुनकर राजा ने  अशर्फियों से भरा एक छोटा थैला उसे दिया और कहां, “ यह लो,अब इससे तुम ईमानदारी का जीवन यापन शुरू करो। तुम आजाद हो और जहां चाहो जा सकते हो। प्रतिज्ञा करो कि 1 साल के बाद तुम आओगे और मुझे बताओगे कि तुमने गलत रास्ते पर चलना छोड़ दिया है।”

उग्रसील  की प्रशंसा का ठिकाना ही नहीं था। उसने नम आंखों से राजा के पैर छूकर थैली ले ली और उसी रात अपने परिवार के साथ शहर छोड़कर कहीं और चला गया।

 बेताल ने राजा विक्रमादित्य से पूछा, “राजन, तुम्हें क्या लगता है…. क्या राजा ने उस क्रूर डाकू को जमा करके सही किया?”

 विक्रमादित्य ने जवाब दिया, “ राजा वृषभानु का उदारता पूर्ण व्यवहार उनकी दयालुता और बुद्धिमानी का बहुत अच्छा उदाहरण है। राजा का मुख्य उद्देश्य दोषी को उसकी गलती का एहसास कराना होता है। क्योंकि उग्रसील  को अपनी गलती का एहसास हो चुका था, इसीलिए राजा द्वारा क्षमादान उचित था। ऐसा करके उन्होंने एक उदाहरण प्रस्तुत किया। संभव है यह दृष्टांत सुनकर दूसरे डाकू भी समर्पण के लिए खुद ही तैयार हो जाएं।”

  विक्रमादित्य के उत्तर से संतुष्ट होकर बेताल  तुरंत उड़कर पेड़ पर चला गया और राजा बेताल को लेने फिर से पेड़ की ओर चल दिए।

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