सचिन पायलट (Sachin Pilot ki Jeevani – Indian Politician)

ब्रिटिश राज से न्यू इंडिया के आगाज तक भारतीय राजनीति में दिग्गज नेताओं की फेहरिस्त खासी लंबी है। राजनीति के इतिहास में हर नेता ने सत्ता के गलियारों में अपनी एक खास छाप छोड़ी है। इसी कड़ी में एक नाम सचिन पायलट का भी है।

राजस्थान की राजनीति में प्रख्यात शख्सियत बन चुके सचिन पायलट का नाम बेशक सत्ता के बड़े नेताओं में शामिल न हो लेकिन राजनीति के कई रिकॉर्डस इस युवा नेता के नाम हैं। मसलन सचिन महज 26 साल की उम्र में देश के सबसे युवा सासंद रह चुके हैं, तो 36 साल की उम्र में कांग्रेस के अध्यक्ष और सिर्फ 40 साल की उम्र में राजस्थान के उप मुख्यमंत्री के रुप में पदभार संभालने वाले युवा नेता बन चुके हैं। इसी के साथ महज राजस्थान की राजनीति तक सिमट कर रहने वाले सचिन देश की राजनीति का जाना-माना चेहरा बन गए हैं।

नाम / Nameसचिन पायलट
जन्मदिन / Birth Date7 सितंबर 1977
आयु / Sachin pilot Age40
जन्म स्थान / Birth Placeसहारनपुर, उत्तर प्रदेश
माता / Sachin pilot motherरमा पायलट
पिता / Sachin pilot fatherराजेश पायलट
पत्नी / Sachin pilot wifeसारा पायलट
बेटे / Sachin pilot sonआरान पायलट, विहान पायलट
राजनीतिक पार्टी / Political Partyभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC)
Sachin Pilot ki Jeevani

Sachin Pilot का शुरुआती जीवन

सचिन पायलट का जन्म 7 सितंबर 1977 में देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हुआ था। उनके पिता राजेश पायलट (Sachin pilot father) भारतीय वायु सेना में पायलट थे और बाद में उनका नाम कांग्रेस के कद्दावर नेताओं की फेहरिस्त में जुड़ गया। सचिन की मां रमा पायलट भी कांग्रेस की सदस्य थीं। वहीं सचिन का परिवार मूलतः उत्तर प्रदेश में ही नोएडा के वेदपुरा गांव से ताल्लुक रखता है।

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सचिन बचपन से ही मेधावी छात्र थे। पिता के वायु सेना में होने के कारण सचिन ने अपनी स्कूली शिक्षा दिल्ली के एयर फोर्स बाल भारती स्कूल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटि से संबंधित सेंट स्टीफन्स कॉलेज से बी.ए किया। आई.एम.टी गाजियाबाद से मार्केटिंग में डिप्लोमा करने के बाद सचिन आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए लंदन चले गए। यहां उन्होंने पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी से एमबीए की डिग्री हासिल की।

सचिन पायलट की जीवनी

पढ़ाई पूरी करने के बाद सचिन स्वदेश वापस लौटे तो वो मशहूर न्यूज चैनल BBC (British Broadcasting corporation) के दिल्ली ब्यूरो से जुड़ गए। जिसके बाद सचिन ने अमेरिकन कंपनी जनरल मोटर्स के साथ लगभग दो साल तक काम किया।

हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि मार्केटिंग में करियर बनाने वाले सचिन वास्तव में भारतीय वायुसेना में खासी दिलचस्पी रखते थे। सचिन का सपना था कि एक दिन वो भी अपने पिता की तरह वायुसेना में विमानों के साथ फर्राटे भरेंगे। मगर, सचिन की आंख कमजोर होने के कारण उनका यह सपना अधूरा ही रह गया। और सचिन ने मार्केटिंग की तरफ रुख कर लिया।

दिल की दास्तां (Sachin pilot love story)

लंदन में पढ़ाई के दौरान सचिन की मुलाकात सारा अब्दुल्ला से हुई। सारा जम्मू कश्मीर के मशहूर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री फाहरुख अब्दुल्ला की बेटी थीं। कुछ ही मुलाकातों में सारा और सचिन एक-दूसरे को पसंद करने लगे। हालांकि उन्होंने अपना यह रिश्ता परिवार से छुपा कर रखा। कुछ सालों बाद सचिन पढ़ाई पूरी कर के भारत लौट आए, वहीं सारा (Sachin pilot wife) अभी भी लंदन में थीं। सचिन और सारा के लिए प्यार की यह राह बिल्कुल भी आसान नहीं थी।

काफी सालों की लान्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप के बाद दोनों ने अपने परिवार को बताने का फैसला किया। जाहिर है राजस्थान के हिंदू परिवार से ताल्लुक रखने वाले सचिन और कश्मीर के मुस्लिम परिवार की सारा के सामने अब मजहब की दीवार खड़ी थी।

लिहाजा अपने प्यार को पाने के लिए सचिन ने बगावत कर दी और आखिरकार सचिन के परिवार ने सारा को अपना लिया। फाहरुख अबदुल्ला किसी भी कीमत पर इस रिश्ते को कबूल नहीं करना चाहते थे। 15 जनवरी 2004 को सचिन और सारा शादी के बंधन में बंध गए। दोनों की शादी के कुछ सालों बाद भी फाहरुख ने इस शादी को स्वीकार नहीं किया लेकिन बाद में उन्होंने भी सचिन को अपना लिया। सचिन और सारा के दो बेटे आरान और विहान हैं।

Sachin Pilot: राजनीति से सरोकार

एक तरफ सचिन मार्केटिंग में अपना करियर तलाश रहे थे, तो दूसरी तरफ किस्मत राजनीति के पन्नों में उनका नाम लिखने में जुटी थी। सत्ता की गलियां सचिन को रास आने लगीं थी। साल 2004 में सचिन अपनी किस्मत आजमाने के लिए राजनीति के अखाड़े में उतरे।

यह एक ऐसा दौर था जब कांग्रेस लगभग एक दशक से दिल्ली के सिंहासन पर काबिज नहीं हुई थी। तो दूसरी तरफ वाजपेयी के नेतृत्व में विपक्ष का गठबंधन कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी। इस दौरान जहां कांग्रेस के सभी दिग्गज नेता पार्टी के कमबैक का प्लान तैयार करने में जुटे थे, वहीं सचिन ने भी राजस्थान के दौसा सीट को अपना चुनावी क्षेत्र चुन लिया था।

2004 के आम चुनावों के नतीजे न सिर्फ सचिन के हित में आए बल्कि कांग्रेस ने भी भारी बहुमत के साथ केंद्र में वापसी कर ली। इन लोकसभा चुनावों में सचिन ने जीत हासिल कर राजनीति का सबसे अनोखा खिताब अपने नाम कर लिया था। महज 26 साल की उम्र में चुनाव जीत कर संसद पहुंचे सचिन देश के सबसे युवा सासंद बन गए।

बतौर सासंद सचिन की शख्सियत अब जनता के बीच आम हो चुकी थी। सचिन देश के उन नेताओं में से एक थे जो दफ्तर से ज्यादा जनता के बीच रह कर काम करना पसंद करते थे। उनकी यही सादगी उनकी पहचान थी। साल 2009 में सचिन ने अजमेर को अपनी संसदीय सीट चुना। इसी सीट से सचिन के पिता राजेश पायलट कई दफा जीत हासिल कर संसद पहुंचे थे।

यही कारण था कि अजमेर सचिन के दिल के बेहद करीब था और अहम भी। अपने पिता की संसदीय सीट से जीतना सचिन के लिए एक सपने जैसा था। सचिन की मेहनत और शानदान शख्सियत का ही नतीजा था कि उनका का यह सपना साकार हो गया और अजमेर की जनता ने सचिन को अपना नुमाइंदा चुना। इन चुनावों में सचिन ने भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार किरण महेश्वरी को 76,000 वोटों से हरा दिया।

अजमेर से सासंद बनकर संसद के सदन मे पहुंचे सचिन बेबाकी से अपनी बात रखने में माहिर थे। नतीजतन सचिन ने बहुत कम समय में संसद को भी अपना कायल बना लिया था। बतौर युवा नेता सचिन संसद की कई कमेटियों का भी हिस्सा रहे। इसी कड़ी में गृह मंत्रालय की स्टैंडिंग कमेटी और नगर विमानन मंत्रालय की कमेटी में भी सचिन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यही नहीं सचिन साल 2012 में मनमोहन कैबिनेट का भी हिस्सा बन गए। इस दौरान मनमोहन सराकर ने उन्हें कार्पोरेट कार्य मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी। जिसके साथ सचिन काफी कम उम्र में मंत्री बनने वाले नेता भी बन गए।

इसी के साथ सचिन का भारतीय वायुसेना का हिस्सा बनने का जो सपना तब पूरा न हो सका वो साल 2012 में पूरा हो गया। बेशक सचिन भारतीय वायुसेना की अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों का हिस्सा न बन सके लेकिन उन्हें प्रदेशिक सेना (territorial army) में बतौर लेफ्टिनेंट जनरल नियुक्त किया गया। जाहिर है यह पल सचिन की जिंदगी के अहम पलों में से एक बन गया। वहीं अपने दादा और पिता के बाद सेना का हिस्सा बनकर सचिन ने अपनी पारिवारिक परंपरा को भी बनाए रखा।

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सचिन पायलट: राजस्थान की राजनीति में वापसी

लगभग एक दशक पहले सत्ता के गलियारों से अनजान सचिन अब राजनीति का मशहूर चेहरा बन चुके थे। हालांकि यह भी सच था कि बेहद कम समय में शून्य से शिखर का सफर तय करने वाले सचिन अब दिल्ली के हो गए थे। राजस्थान से उनका सरोकार पहले जैसा नहीं रह गया था। जिसका परिणाम था साल 2014 के आम चुनावों में उनकी हार।

2014 में पूरे देश में मोदी लहर थी। बीजेपी भारी जनमत के साथ कमबैक कर रही थी। ऐसे में जाहिर है सचिन का संसदीय क्षेत्र अजमेर भी राजनीति के इस रुख से अछूता नहीं रहा। नतीजतन बीजेपी के उम्मीदवार सनवर लाल जाट ने सचिन को डेढ़ हजार से भी ज्यादा मतों से परास्त कर दिया।

2014 के आम चुनावों के बाद दिल्ली से कांग्रेस की सत्ता जा चुकी थी। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का बिगुल फूंक दिया था। ऐसे में जाहिर है सिर्फ सचिन ही राजस्थान की राजनीति में कांग्रेस की वापसी करा सकते थे। लिहाजा कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें राजस्थान की बागडोर सौंप दी।

साल 2014 में ही कांग्रेस हाईकमान ने महज 36 साल के युवा सचिन को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। इसी के साथ सचिन अध्यक्ष पद संभालने वाले भी सबसे युवा नेता बन गए।

2014 में जब सचिन को राजस्थान की कमान सौंपी गयी तो न सिर्फ राजस्थान से बल्कि देश के कई राज्यों से कांग्रेस का सफाया हो गया था। यह एक ऐसा दौर था जब पहली बार देश में काग्रेस विरोधी लहर अपने चरम पर थी। 2018 में राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने थे।

यानी राज्य में कांग्रेस की वापसी कराने के लिए सचिन के पास सिर्फ चार साल का वक्त था और राजपिरवार की सदस्य वसुंधरा राजे बतौर मुख्यमंत्री सचिन के सामने थीं। जाहिर है यह लड़ाई बिल्कुल आसान नहीं थी। ऐसे में कांग्रेस की वापसी नामुमकिन थी। लेकिन सचिन ने एक बार फिर नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया।

इन चार सालों में सचिन ने जमीनी स्तर पर खूब काम किया। इस गौरान उन्होंने न सिर्फ राजस्थान में मोदी लहर से हिम्मत हार रही पार्टी को समेटा बल्कि पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी हौसला दिया। राजस्थान की कांग्रेस में जोश भरने का ये काम सिर्फ सचिन ही कर सकते थे। इसी का नतीजा था कि साल 2018 के विधानसभा चुनावों में राजस्थान में कांग्रेस ने वापसी कर ली।

कई राजनीतिक विशेषज्ञों ने तो कांग्रेस की इस जीत का सेहरा सिर्फ सचिन के सर पर बांधा। उनका कहना था कि सचिन के बिना यह जीत मुमकिन ही नहीं थी। इस जीत के चलते सचिन की लोकप्रियता परवान चढ़ने लगी। सभी ने अनुमान लगाया कि सचिन राजस्थान के मुख्यमंत्री बन कर युवा मुख्यमंत्री होने का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लेगें। लेकिन राजनीति का हर रिकॉर्ड अपने नाम करने वाले सचिन यहां चूक गए।

कांग्रेस हाई कमान ने अशोक गहलोत को राजस्थान की कमान सौंप दी। वहीं सचिन पायलट को राज्य का उपमुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि इस बार भी सचिन सबसे कम उम्र में महज 40 साल में युवा उपमुख्यमंत्री बने। लेकिन कयास लगाया जा रहा था कि सचिन मुख्यमंत्री न बनने का विरोध दर्ज कराएंगे। मगर, हुआ इसका ठीक उलटा।

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मुख्यमंत्री की घोषणा के कुछ ही समय बाद सचिन ने सभी अफवाहों को सिरे से नकारते हुए कांग्रेस आला कमान के फैसले का सम्मान किया। सचिन के इस अंदाज ने न सिर्फ विरोध कर रहे पार्टी के कार्यकर्ताओं को बल्कि राजस्थान की जनता को भी उनका कायल बना दिया। और सचिन ने एक बार फिर अपनी अनोखी अदा से लोगों का दिल जीत लिया।

मेहनत के दम पर हर मुश्किल आसान बनाने वाले सचिन जितने भरोसे के साथ अपनी सहमति जताते हैं उतनी ही बेबाकी के साथ अपना विरोध दर्ज कराने से भी नहीं चूकते हैं। इसका उदाहरण हाल ही में जुलाई 2020 के महीने में देखा गया। जब सचिन की एक हुंकार पर कांग्रेस की सरकार गिरने की नौबत आ गयी।

Sachin Pilot ki Jeevani

दरअसल 13 जुलाई 2020 को सचिन ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के फैसलों से असहमति दर्ज की थी। राजस्थान की सत्ता में मचे इस कोहराम को गहलोत खेमे और पायलट खेमे के रूप में खासी हवा मिली और सचिन को उपमुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया।

कांग्रेस के इस कदम के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि सचिन अपने राजनीतिक दोस्त ज्योतिरादित्य सिंधिया की ही तरह बीजेपी का दामन थाम लेंगे। इन दावों पर मुहर तब लगी जब बीजेपी अध्यक्ष ने खुद सचिन को पार्टी में आने का निमत्रंण दे दिया। जाहिर है ऐसे में राजस्थान में स्थायी सरकार का सारा दारोमदार सचिन के हाथों में था और एक बार फिर जनता के इस युवा नुमाइंदे ने उन्हें निराश नहीं होने दिया।

सचिन ने सत्ता के गलियारों की सभी सुगबुगाहटों पर विराम लगाते हुए सूझबूझ से काम लिया और कांग्रेस आलाकमान से मिलकर मसले का हल निकाल लिया। इसी के साथ सचिन ने बीजेपी से जुड़ने की सभी अफवाहों को खारिज करत हुए बेबाकी के साथ अपना पक्ष रखा और कहा कि पार्टी के किसी फैसले पर असहमति जताने का मतलब पार्टी का विरोध करना नहीं हो सकता है।

कहते हैं राजनीति में अनुभव ही हार और जीत का फासला तय करने में मददगार होता है। मगर, सचिन ने इस कहावत को भी सिरे से नकार दिया। 26 साल की उम्र से सासंद बने सचिन (मात्र 10 साल में) 36 साल की उम्र में राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 40 साल उम्र में न सिर्फ राजस्थान के बल्कि पूरे देश के सबसे युवा उपमुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड भी सचिन ने अपने नाम कर लिया।

Reference –

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