दरबारी की भूल | अकबर बीरबल की कहानियाँ | Akbar Birbal Story in Hindi | darbari ki bhul akbar birbal ki kahani

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जब बीरबल ने बादशाह अकबर को उनकी भूल का अहसास कराया, तो बादशाह अकबर बहुत खुश हुए और बीरबल की तारीफ की। बीरबल आगे आए और बड़े आदर से झुककर बादशाह को सलाम किया। बीरबल द्वारा बादशाह के सामने झुकने पर उनकी कमर की थैली से तांबे का एक सिक्का निकलकर वहीं गिर गया।

 बीरबल उसे कालीन पर तलाश करने लगे। उसी समय एक जलन खोर दरबारी खड़े होकर बादशाह अकबर से बोला, “ जहांपना आपने कितने कंजूस आदमी को अपना प्रिय दरबारी बना रखा है। आप बीरबल को कितने पुरस्कार और इनाम देते हैं। आप की ओर से सभी बेहतरीन इनाम भी इनके घर जाते हैं, फिर भी तांबे के एक सिक्के को खोजने के लिए कितने बेचैन है।”

darbari ki bhul
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 बादशाह अकबर ने बीरबल को गुस्से से देखा। बीरबल खड़े होकर बोले, “ जहांपना तांबे का सिक्का आपके राज्य की मुद्रा है। इस पर आपका चित्र अंकित है। अगर यह मुझे नहीं मिला, तो इस पर किसी का पैर पड़ सकता है और आपके प्रति वफादार होने के नाते मैं यह कभी नहीं देख सकता।”

 यह सुनकर बादशाह अकबर को बहुत खुशी हुई। वे सोचने लगे कि उन्होंने यूं ही बीरबल को अपना प्रिय मंत्री नहीं कहा है। अकबर ने तत्काल अपनी उंगली से हीरे की अंगूठी उतार कर बीरबल को दे दी। यह देखकर जलन खोर दरबारी का गुस्सा भड़क गया। वह बोला, “ जहांपना मेरी समझ में नहीं आता कि बीरबल मैं आपको ऐसा क्या दिखाई देता है, जो आप सदा इनका ही पक्ष लेते हैं।”

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 बादशाह अकबर को बहुत जोर से गुस्सा आ गया वह दरबारी लगातार उनके बीरबल के बारे में गलत बातें बोल रहा था। उन्होंने उस का सिर धड़ से अलग करने का हुक्म दे दिया। अब दरबारी को अपनी भूल के लिए पछतावा होने लगा। वह जोश में आकर बहुत बड़ी भूल कर चुका था। उसने बीरबल से अकेले में विनती की कि वे उसे बचाले। बीरबल ने उसे दिलासा दिया कि उसकी जान बचाने के लिए कोई ना कोई उपाय अवश्य करेंगे।

 योजना के अनुसार,  जलन खोर दरबारी बाजार में जा छिपा। जब उसे पकड़ा गया, तो उसने बादशाह अकबर के सामने जाने की इच्छा प्रकट की। सिपाहियों ने मना किया, तो वे उन से विनती करने लगा कि उसका सिर काटने से पहले एक बार बादशाह अकबर के सामने पेश किया जाए।

 जब  दरबारी को दरबार में ले जाया गया तो अकबर को फिर गुस्सा आ गया। वे बोले, “ तुम्हारी समझ में नहीं आया मैंने इसका सिर धड़ से अलग करने को कहा था। मुझे इस  का सिर चाहिए।”

दरबारी बोला, “ जहांपनाह मैं आपको नाराज करने के लिए माफी चाहता हूं। आप मेरा सिर चाहते हैं परंतु मैं नहीं चाहता कि यह काम कोई दूसरा करें। यह काम अच्छी तरह पूरा हो सके, इसलिए मैं स्वयं ही अपना सिर आपके सामने पेश करता हूं।”  फिर दरबारी ने अपनी पगड़ी उतारकर अकबर के पैरों में रख दी।

 दरबारी  की बात सुनकर बादशाह अकबर का सारा गुस्सा दूर हो गया। वे मुस्कुरा कर बोले, “ बहुत अच्छे तुमने अच्छा काम किया है। मैं तुम्हें माफ करता हूं तुम पुन: अपना सिर वापस उठा लो।”

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