बालक – मुंशी प्रेमचंद्र की अमर कहानियाँ | balak Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों मुंशी प्रेमचंद ने बहुत सी प्रेरणादायक कहानियां लिखी हैं, जिन्होने देश की कुरुतियों को उजागर किया है। हिंदी साहित्य में उन्होने अपनी एक अलग छाप बनाई है उन्हें हिंदी साहित्य का स्तंभ कहा जाता है उनकी एक कहानी बालक के बारे में आप इस लेख में पढ़ेंगे।

बालक – मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी | Baalak – A Story written by Munshi Premchand

balak Munshi Premchand ki kahani in Hindi

बालक – मुंशी प्रेमचंद्र की अमर कहानियाँ | balak Munshi Premchand ki kahani in Hindi

गंगू को लोग ब्राह्मण कहते हैं और वह अपने को ब्राह्मण समझता भी है। मेरे नौकर और खिदमतगार मुझे दूर से सलाम करते हैं। गंगू मुझे कभी सलाम नहीं करता। वह शायद मुझसे पालागन की आशा रखता है। मीरा झूठा ग्लास कभी हाथ से नहीं छूटा और न मेरी कभी इतनी हिम्मत हुई कि उससे पंखा झलने को कहूँ।

जब मैं पसीने से तर होता हूँ और वहाँ कोई दूसरा आदमी नहीं होता, तो गंगू आप- ही- आप पंखा उठा लेता है; लेकिन उसकी मुद्रा से यह भाव स्पष्ट प्रकट होता है कि मुझ पर कोई एहसान कर रहा है और मैं भी ना- जानें क्यों फौरन ही उसके हाथ से पंखा छीन लेता हूँ।

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उग्र स्वभाव का मनुष्य है। किसी की बात नहीं कह सकता। ऐसे बहुत कम आदमी होंगे, जिनसे उसकी मित्रता हो; पर नौकर और खिदमतगार के साथ बैठना शायद वह अपमानजनक समझता है। मैने उसे किसी से मिलते जुलते नहीं देखा। आश्चर्य यह है कि उसे भंग- बूटी से प्रेम नहीं, जो इस श्रेणी की मनुष्यों में एक असाधारण गुण है।

मैने उसे कभी पूजा पाट करते या नदी में स्नान करते नहीं देखा। बिलकुल निर्जर है; लेकिन फिर भी वह ब्राह्मण हैं और चाहता है कि दुनिया उसकी प्रतिष्ठा तथा सेवा करें और क्यों न चाहें? जब पुरखों की पैदा की हुई संपत्ति पर आज भी लोग अधिकार जमाए हुए हैं और उसी शान से, मानो खुद पैदा किए हो, तो वहाँ क्यों इस प्रतिष्ठा और सम्मान को त्याग दें, जो उसकी पुरखों ने संचय किया था? यहाँ उसकी बपौती है।

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मेरा स्वभाव कुछ इस तरह का है कि मैं अपने नौकर से बहुत कम बोलता हूँ। मैं चाहता हूँ, जब तक मैं खुद ना पुकारूँ, कोई मेरे पास ना आए। मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि ज़रा सी बातों के लिए नौकरों को आवाज देता रहूँ।

मुझे अपने हाथ से सुराही से पानी उड़ेल लेना, अपना लैंप जला लेना, अपने जूते पहन लेना या अलमारी से कोई किताब निकाल लेना, इससे कहीं ज्यादा सरल मालूम होता है कि हिंगन और मैकू को पुकारूँ। इससे मुझे अपनी सुरक्षा और आत्मविश्वास का बोध होता है। नौकर भी मेरे स्वभाव से परिचित हो गए हैं और बिना जरूरत मेरे पास बहुत कम आते हैं।

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इसलिए 1 दिन जब प्रात काल गंगू मेरे सामने आकर खड़ा हो गया तो मुझे बहुत बुरा लगा। ये लोग जब आते हैं, तो पेशगी हिसाब में कुछ मांगने के लिए या किसी दूसरे नौकर की शिकायत करने के लिए। मुझे ये दोनों ही बातें अत्यंत अप्रिय है। मैं पहली तारीख को हरेक का वेतन चुका देता हूँ और बीच में जब कोई कुछ मांगता है, तो क्रोध आ जाता है; कौन दो- दो, चार- चार रुपयों का हिसाब रखता फिरे।

फिर जब किसी को महीने भर की पूरी मजदूरी मिल गई, तो उसे क्या हक है कि उसे 15 दिन में खर्चकरदे और ऋण यह पेशगी की शरण लें, और शिकायतों से तो मुझे घृणा है। मैं शिकायतों को दुर्बलता का प्रमाण समझता हूँ या ठकुरसुहाती की क्षुद्र चेष्टा।

मैने माथा सिकोड़ कर कहा– क्या बात है, मैने तो तुम्हें बुलाया नहीं?

गंगू के तीखे अभिमानी मुख पर आज कुछ ऐसी नम्रता, कुछ ऐसी याचना, कुछ ऐसा संकोच था कि मैं चकित हो गया। ऐसा जान पड़ा वह कुछ जवाब देना चाहता है; मगर शब्द नहीं मिल रहे हैं।

मैने ज़रा नम्र होकर कहा- आखिर क्या बात है, कहते क्यों नहीं? तुम जानते हो, यह मेरे टहलने का समय है। मुझे देर हो रही है।

गंगू ने निराशा भरे स्वर में कहा- तो आप हवा खाने जाए, मैं फिर आ जाऊंगा।

यह अवस्था और भी चिंताजनक थी। इस जल्दी में तो वह एक क्षण में अपना वृतांत कह सुनाएगा। वह जानता है कि मुझे ज्यादा अवकाश नहीं है। दूसरे अवसर पर तो दुष्ट घंटों रोएगा। मेरे कुछ लिखने-पढ़ने को तो वह शायद कुछ काम समझता हो; लेकिन विचार को, जो मेरे लिए सबसे कठिन साधना है, वह मेरे विश्राम का समय समझता है। वह उसी वक्त आकर मेरे सिर पर सवार हो जाएगा। मैने निर्दयता के साथ कहा- क्या कुछ पेशगी मांगने आए हो? मैं पेशगी नहीं देता।

‘ जी नहीं सरकार, मैने तो कभी पेशगी नहीं मांगा।‘

‘ तो क्या किसी की शिकायत करना चाहते हो? मुझे शिकायतों से घृणा है।‘

‘ जी नहीं सरकार, मैने तो कभी किसी की शिकायत नहीं की।‘

गंगू ने अपना दिल मजबूत किया। उसकी आकृति से स्पष्ट झलक रहा था, मानो वहाँ कोई छलांग मारने के लिए अपनी सारी शक्तियों को एकत्र कर रहा हो। और लड़खड़ाती हुई आवाज में बोला- मुझे आप छुट्टी दे दे। मैं आपकी नौकरी अब न कर सकूंगा।

यहाँ इस तरह का पहला प्रस्ताव था, जो मेरे कानों में पड़ा। मेरेआत्म अभिमान को चोट लगी। मै जब अपने को मनुष्यता का पुतला समझता हूँ, अपने नौकरों से कभी कटु वचन नहीं कहता, अपने स्वामित्व को यथासाध्य म्यान में रखने की चेष्टा करता हूँ, तब मैं इस प्रस्ताव पर क्यों न विस्मित हो जाता; कठोर स्वर में बोला- क्यों, क्या शिकायत है?

‘ आपने तो हुज़ूर, जैसा अच्छा स्वभाव पाया है, वैसा क्या कोई पाएगा; लेकिन बात ऐसी आ पड़ी है कि अब मैं आपके यहाँ नहीं रह सकता। ऐसा न हो कि पीछे से कोई बात हो जाए, तो आपकी बदनामी हो। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से आपकी आबरू में बट्टा लगे।‘

मेरे दिल में उलझन पैदा हुई। जिज्ञासा की अग्नि प्रचंड हो गई। आत्म समर्पण के भाव से बरामदे में पड़ी हुई कुर्सी पर बैठकर बोला- तुम तो पहेलियाँ पड़वा रहे हो। साफ साफ क्यों नहीं कहते, क्या मामला है?

गंगू ने बड़ी विनम्रता से कहा- बात यह है कि वह स्त्री, जो अभी विधवा आश्रम से निकाल दी गई है, वह गोमती देवी…..

वह चुप हो गया। मैने अधीर होकर कहा- हाँ, निकाल दी गई है, तो फिर? तुम्हारी नौकरी से उसका क्या संबंध?

गंगू ने जैसे अपने सिर का भारी बोझ जमीन पर पटक दिया।

‘ मैं उससे विवाह करना चाहता हूँ बाबूजी;’

मैं विस्मय से उसका मुँह ताकने लगा। वह पुराने विचारों का पोंगा ब्राह्मण जिसे नई सभ्यता की हवा तक न लगी, उस कुलटा से विवाह करने जा रहा है, जिसे कोई भला आदमी अपने घर में कदम भी ना रखने देगा। गोमती ने मोहल्ले के शांत वातावरण में थोड़ी सी हलचल पैदा कर दी।

कई साल पहले वह विधवा आश्रम में आई थी। तीन बार आश्रम के कर्मचारियों ने उसका विवाह करा दिया था, पर हर बार वह महीने 15 दिन के बाद भाग आती थी। यहाँ तक कि आश्रम के मंत्री ने अबकी बार उसे आश्रम से निकाल दिया था। तब से वह इसी मोहल्ले में एक कोठरी लेकर रहती थी और सारे मोहल्ले के शोहदों के लिए मनोरंजन का केंद्र बनी हुई थी।

मुझे गंगू की सरलता पर क्रोध भी आया और दया भी। इस गधे को सारी दुनिया में कोई स्त्री हीना मीलती थी, जो इससे विवाह करने जा रहा है। जब वह तीन बार पतियों के पास से भाग आई, तो इसके पास कितने दिन रहेंगी? कोई गांठ का पूरा आदमी होता, तो एक बात भी थी। शायद साल छह महीने टिक जाती। यहाँ तो निपट आंख का अंधा है। एक सप्ताह भी तो निबाह ना होगा।

मैने चेतावनी के भाव से पूछा- तुम्हें इस स्त्री की जीवन कथा मालूम है?

गंगू ने आंखोंदेखी बात की तरह कहा- सब झूठ है सरकार, लोगों ने हक नाहक उसको बदनाम कर दिया है।

‘ क्या कहते हो, तीन बार अपने पतियों के पास से नहीं भाग आई?’

‘ उन लोगों ने उसे निकाल दिया, तो क्या करती?’

‘ कैसे बुद्धि आदमी हो कोई इतनी दूर से आकर विवाह करके ले जाता है कोमा हजारों रुपये खर्च करता है, इसलिए कि औरत को निकाल दें?’

गंगू ने भावुकता से कहा- जहाँ प्रेम नहीं है हुजूर, वहाँ कोई दूसरी नहीं रह सकतीं। स्त्री केवल रोटी कपडा ही नहीं चाहती, कुछ प्रेम भी तो चाहती है। वे लोग समझते होंगे कि हमने एक विधवा से विवाह करके उसके ऊपर कोई बहुत बड़ा एहसान किया है। चाहते होंगे कि तन मन से वह उनकी हो जाए, लेकिन दूसरों को अपना बनाने के लिए पहले आप उसका बन जाना पड़ता है हुजूर। यह बात है। फिर उसे एक बीमारी भी है। उसे कोई भूत लगा हुआ है। यह कभी कभी ब ख झ क करने लगती है और बेहोश हो जाती है।

‘ और तुम ऐसी स्त्री से विवाह करोगे?’मैने संदिग्ध भाव से सिर हिलाकर कहा- समझ लो, जीवन करवा हो जाएगा।

गंगू ने शहीदों के से आवेश से कहा मैं तो समझता हूँ, मेरी ज़िंदगी बन जाएगी बाबूजी, आगे भगवान की मर्जी

मैं ने ज़ोर देकर पूछा- तो तुमने तय कर लिया है?

‘ हाँ, हुज़ूर।‘

‘ तो मैं तुम्हारा इस्तीफा मंजूर करता हूँ।‘ मैक्स लाइफ मैं निरर्थक रूढ़ियों और व्यर्थ के बंधनों का दास नहीं हूँ; लेकिन जो आदमी एक दुष्टा से विवाह करें, उसे मैं अपने यहाँ रखना वास्तव में जटिल समस्या समझता हूँ। आएदिन बखेड़े होंगे, नई नई उलझनें पैदा होगी, कभी पुलिस दौड लेकर आएगी, कभी मुकदमे खड़े होंगे। संभव है, चोरी की वारदातें भी हो। इस दलदल से दूर रहना ही अच्छा है।

गंगू सुधा- पीड़ित प्राणी की भाँति रोटी का टुकड़ा देखकर उसकी ओर लपक रहा है। रोटी जुटी है, सूखी हुई है, खाने योग्य नहीं है, इसकी उसे परवाह नहीं; उसको विचार बुद्धि से काम लेना कठिन था। मैनेउसे पृथक कर देने में ही अपनी कुशल समझी।

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पांच महीने गुजर गए। गंगू ने गोमती से विवाह कर लिया था और उसी मोहल्ले में एक खपरैल का मकान लेकर रहता था। अब चाट काठेला लगाकर गुजर बसर करता था। मुझे जब कभी बाजार में मिल जाता, तो मैं उसका हालचाल पूछता। मुझे उसके जीवन से विशेष अनुराग हो गया था। जहाँ एक सामाजिक प्रश्न की परीक्षा थी- सामाजिक ही नहीं, मनोवैज्ञानिक भी।

मैं देखना चाहता था, इसका परिणाम क्या होता है। मैं गंगू को सदैव प्रसन्न मुख देखता। समृद्धि और निश्चितता के मुख्य पर जो एक तेज और स्वभाव में जो एक आत्म सम्मान पैदा होता है, यह प्रत्यक्ष दिखाई देता था। रुपये 20 आने की रोज़ बिक्री हो जाती थी। इसमें लागत निकालकर 8-10 आने बच जाते थे। यही उनकी जीविका थी; किंतु इसमें किसी देवता का वरदान था; क्योंकि इस वर्ग के मनुष्यों में जो निर्लज्जता और विभिन्नता पाई जाती है, इसका वहाँ चिन्ह तक न था। उसके मुख पर आत्म विकास और आनंद की झलक थी, जो चित्त की शांति से ही आ सकती है।

1 दिन मैने सुना कि गोमती गंगू के घर से भाग गई है, कह नहीं सकता, क्यूँ? मुझे इस खबर से एक विचित्र आनंद हुआ। मुझे गंगू के संतुष्ट और सुखी जीवन पर एक प्रकार की ईर्षा होती थी।मैं उसके विषय में किसी अनिष्ट की, किसी घातक अनरथ कि, किसी लज्जास्पद घटना की प्रतीक्षा करता था। इस खबर से मुझे सांत्वना मिली। आखिर वही बात हुई, जिसका मुझे विश्वास था।

आखिर बच्चों को अपनी अदूरदर्शिता का दंड भोगना पड़ा। अब देखें, बच्चों कैसे मुँह दिखाते हैं। अब आखिर खुलेगी और मालूम होगा कि लोग, जो उन्हें इस विवाह से रोक रहे थे, उनके कैसे शुभचिंतक थे। उस वक्त तो ऐसा मालूम होता था, मानो आपको कोई दुर्लभ पदार्थ मिला जा रहा हो।

मानो मुक्ति का द्वार खुल गया है। लोगों ने कितना कहा कि यह स्त्री विश्वास के योग्य नहीं है, कितनों को दगा दे चुकी है, तुम्हारे साथ भी दगा करेगी; लेकिन इन कानों में जूं तक न रेंगी। अब मिले, तो ज़रा उसका मिजाज़ पूछूं। कहूँ- क्यों महाराज, देवी जी का यह वरदान पाकर प्रसन्न हुए या नहीं? तुम तो कहते थे, वह ऐसी है और वैसी है, लोग उस पर केवल दुर्भावना के कारण दोष आरोपित करते हैं। अब बदलाव, किसकी भूल थी?

उसी दिन संयोगवश गंगू से बाजार में भेंट हो गई। घबराया हुआ था, बदहवाश था, बिल्कुल खोया हुआ। मुझे देखते ही उसकी आँखों में आंसू भर आए, लज्जा से नहीं व्यथा से। मेरे पास आकर बोला- बाबूजी, गोमती ने मेरे साथ विश्वासघात किया।

मैने कुटिल आनंद से, लेकिन कृत्रिम सहानुभूति दिखाकर कहा- तुमसे तो मैने पहले ही कहा था; लेकिन तुम माने ही नहीं, अब सब्र करो। इसके सिवा और क्या उपाय है। रुपये पैसे ले गयी या कुछ छोड़ गईं?

गंगू ने छाती पर हाथ रखा। ऐसा जान पड़ा, मानव मेरे इस प्रश्न ने उसकी हृदय को विदीर्ण कर दिया।

‘अरे बाबूजी, ऐसा न कहिए, उसने डेल की भी चीज़ नहीं छुई। अपना जो कुछ था कॉम वह भी छोड़ गयी। नजाने मुझ में क्या बुराइ देखी। मैं उसके योग्य न था और क्या कहूँ। वह पढ़ी लिखी थी, मैं करिया अक्षर भैस बराबर। मेरे साथ इतने दिन रही, यह बहुत था। कुछ दिन और उसके साथ रह जाता, तो आदमी बन जाता।

उसका आपसे कहाँ तक बखान करो हुजूर। औरों के लिए चाहे वह कुछ और रही हो, मेरे लिए तो किसी देवता का आशीर्वाद थी। ना जाने मुझसे ऐसी क्या खतरा हो गई। मगर कसम ले लीजिए, जो उसके मुख पर मैल तक आया हो। मेरी क्या औकात ही क्या है बाबूजी, 10- 12 आने का मजदूर हूँ; पर इसी में उसके हाथों इतनी बरकत थी कि कभी कमी नहीं पड़ी।‘

मुझे इन शब्दों से घोर निराशा हुई। मैने समझा था, वह उसकी बेवफाई की कथा कहेगा और मैं उसकी अंधभक्ति पर कुछ सहानुभूति प्रकट करूँगा; मगर उस मूर्ख की आंखें अब तक नहीं खुली। अब भी उसी का मंत्र पढ़ रहा है। अवश्य ही इसका चित्त कुछ अव्यवस्थित है।

मैने कुटिल परिहास आरंभ किया- तो तुम्हारे घर से कुछ नहीं ले गई?

‘ कुछ भी नहीं बाबूजी, ढेले की भी चीज़ नहीं।‘

‘ और तुम से प्रेम भी बहुत करती थी?’

‘ अब आपसे क्या कहूं बाबूजी, प्रेम तो मरते दम तक याद रहेगा।‘’

‘ फिर भी तुम्हें छोड़ कर चली गयी?’

‘ यही तो आश्चर्य है बाबूजी’

‘उसका चरित्र कुछ अच्छा नहीं है?’

‘ अरे बाबूजी, ऐसान कहिए। मेरी गर्दन पर कोई छुरी रख दे, तो भी मैं उसका यश नहीं गवाऊंगा।‘

‘ तो फिर ढूँढो उसको;’

‘ हाँ, मालिक। जब तक उसको ढूंढना लाऊंगा, मुझे चैन ना आएगा। मुझे इतना मालूम हो जाए कि वह कहाँ है, फिर तो मैं उसे ले ही आऊंगा; और बाबूजी, मेरा दिल कहता है कि वह आएगी जरूर। देख लीजिएगा। वह मुझसे रूठकर नहीं गयी; लेकिन दिल नहीं मानता। जाता हूँ, महीने दो महीने जंगल, पहाड़ की धूल छानूगा। जीता रहा, तो फिर आपके दर्शन करूँगा।‘

यह कहकर वह उन्माद की दशा में एक तरफ चल दिया।

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इसके बाद मुझे एक जरूरत से नैनीताल जाना पड़ा। घूमने के लिए नहीं। एक महीने के बाद लौटा, और भी कपड़े भी न उतारने पाया था कि देखता हूँ, गंगू एक नवजात शिशु को गोद में लिए खड़ा है। शायद कृष्ण को पाकर नन्द भी इतने पुल कितना हुए होंगे। मालूम होता था, उसके रोम रोम में आनंद फूटा पड़ता है। चेहरे और आँखों से प्रतियोगिता और श्रद्धा के राव से निकल रहे थे। कुछ वही भाव था जो किसी सुधा पीड़ित भिक्षु के चेहरे पर भरपेट भोजन करने के बाद नजर आता है।

मैने पूछा- कहो महाराज, गोमती देवी का कुछ पता लगा, तुम तो बाहर गए थे?

गंगू ने आपे में न समझते हुए जवाब दिया- हाँ बाबूजी, आपके आशीर्वाद से ढूँढ लाया। लखनऊ के जनाना अस्पताल में मिली।

यहाँ एक सहेली से कह गई थी कि अगर वह बहुत घबराए तो बदला देना। मैं सुनते ही लखनऊ भागा और उसे घसीट लाया। घाटी में यह बच्चा भी मिल गया।

उसने बच्चे को उठाकर मेरी तरफ बढ़ाया। मानों कोई खिलाड़ी तमगा पाकर दिखा रहा हो।

मैने उपहास के भाव से पूछा- अच्छा, यह लड़का भी मिल गया? शायद इसलिए वह यहाँ से भागी थी। है तुम्हारा ही लड़का?

‘ मेरा काहे को है बाबूजी, आपका हैं, भगवान का है।‘

‘ तो लखनऊ में पैदा हुआ?’

‘ हाँ बाबूजी, अभी तो कुल एक महीने का है।‘

‘ तुम्हारे विवाह हुए कितने दिन हुए?’

‘ यह सातवाँ महीना जा रहा है।‘

‘ तो शादी के छठे महीने पैदा हुआ?’

‘ और क्या बाबूजी।‘

‘ फिर भी तुम्हारा लड़का है?’

‘ हाँ,’ जी।‘

‘ कैसी बेसिर पैर की बात कर रहे हो?’

मालूम नहीं, वह मेरा आशय समझ रहा था या बन रहा था। उसी निष्कपट भाव से बोला- मरते मरते बची, बाबूजी नया जन्म हुआ। 3 दिन, तीन रात छटपटाती रही। कुछ न पूछिए।

मैने अब ज़रा व्यंग्य भाव से कहा- लेकिन छह महीने में लड़का होते आज ही सुना।

यह चोट निशाने पर जा बैठी।

मुस्कुरा कर बोला- अच्छा, वह बात; मुझे तो इसका ध्यान भी नहीं आया। इसी भय से तो गोमती भागी थी।

मैने कहा- गोमती, अगर तुम्हारा मन मुझसे नहीं मिलता, तो तुम मुझे छोड़ दो। मैं अभी चला जाऊंगा और फिर कभी तुम्हारे पास ना आऊंगा। तुमको जब कुछ काम पड़े तो मुझे लिखना, मैं भरसक तुम्हारी मदद करूँगा। मुझे तुमसे कुछ मलाल नहीं है मेरी आँखों में तुम अब भी उतनी ही भली हो।

अब भी मैं तुम्हें उतना ही चाहता हूँ। नहीं, अब मैं तुम्हें और ज्यादा चाहता हूँ; लेकिन अगर तुम्हारा मन मुझसे फिर नहीं गया है, तो मेरे साथ चलो। गंगू जीते जी तुमसे बेवफाई नहीं करेगा। मैने तुमसे इसलिए विवाह नहीं किया कि तुम देवी हो; बल्कि इसलिए कि मैं तुम्हें चाहता था और सोचता था कि तुम भी मुझे चाहती हो। यह बच्चा मेरा बच्चा है। मेरा अपना बच्चा है। मैने एक बोया हुआ खेत लिया, तो क्या उसकी फसल को इसलिए छोड़ दूंगा कि उसे किसी दूसरे ने बोया था?

यह कहकर उसने ज़ोर के ठहाका मारा। मैं कपड़े उतारना भूल गया। कह नहीं सकता, क्यों मेरी आँखें सजल हो गईं। न जाने वह कौन सी शक्ति थी, जिसने मेरी मनोगत घृणा को दबाकर मेरे हाथों को बढ़ा दिया। मैने उस निष्कलंक बालक को गोद में ले लिया और इतने प्यार से उसका चुंबन लिया कि शायद अपने बच्चों का भी ना लिया होगा।

गंगो बोला- बाबूजी, आप बड़े सज्जन है। मैं गोमती से बार बार आप का बखान किया करता हूँ। कहता हूँ, चल, एक बार उनके दर्शन करा; लेकिन मारे इलाज के आती ही नहीं।

मैं और सज्जन; अपनी सज्जनता का पर्दा आज मेरी आँखों से हटा मैने भक्ति से डूबे हुए स्वर में कहा- नहीं जी, मेरे जैसे कलुषित मनुष्य के पास वह क्या आएगी। चलो, मैं उनके दर्शन करने चलता हूँ। तुम मुझे सज्जन समझते हो? मैं ऊपर से सज्जन हूँ; और यह बालक वह फूल है, जिससे तुम्हारी सज्जनता की महक निकल रही है।

मैं बच्चे को छाती से लगाए हुए गंगू के साथ चला।

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