आयुर्वेद अनुसार वसंत ऋतुचर्या: स्वस्थ जीवनशैली एवं आहार विहार – Spring Seasonal Regimen (Ritucharya) According To Ayurveda

आयुर्वेद कहता है की हमारा शरीर हमारे आसपास के वातावरण से काफी हद तक प्रेरित होता है। हमारे आसपास वातावरण में होने वाले बदलावों का असर सीधा हमारे शरीर पर पड़ता है। आयुर्वेद अनुसार भारत में छे ऋतुए पायी जाती है और प्रत्येक ऋतू का प्रभाव हमारे शरीर पर अलग अलग रूप से होता है। इसके कारण हमारे शरीर में स्थित शारीरिक दोष – वात, पित्त, और कफ असंतुलित हो जाते है जिसकी वजह से कई रोगों की उत्पत्ति हो सकती है।

ऋतुचर्या एक प्राचीन आयुर्वेद प्रथा है जो प्राचीन समय में ऋतुओ के अनुसार अपनी जीवनशैली तथा आहार विहार में बदलाव करके हमारे शरीर में स्थित त्रिदोष को संतुलित करने में मदद करता है। इसलिए, हमें अपने स्वास्थ्य को बरक़रार रखने के लिए प्रत्येक ऋतू के अनुसार ऋतुचर्या का पालन करना चाहिए।

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वसंत ऋतू क्या है? – What is Spring Season?

आयुर्वेद अनुसार वसंत ऋतुचर्या
आयुर्वेद अनुसार वसंत ऋतुचर्या


वसंत ऋतू षडऋतु में से एक ऋतू है। आयुर्वेद अनुसार भारत में कुल छे (६) ऋतुए पायी जाती है। इस दौरान प्रकृति में काफी बदलाव देखने को मिलते है। इस ऋतू में दिन लम्बे होते जाते है और राते छोटी होती जाती है। इस ऋतू में प्रकृति का सौंदर्य उभर आता है। पेड़पौधो में पुराने पत्ते गिरने लगते है और वह नए पत्ते उभर आते है। वसंत ऋतू आदानकाल की ऋतू है जिसमे शरीर की शक्ति काम होती जाती है।

वसंत ऋतू पंछियो और जानवरो को भी अच्छी लगती है। सुबह पंछियो के गुनगुनाने से दिन की शुरुआत होती है। ऐसा लगता है मानो की प्रकृति का फिरसे जनम हुआ हो। इस ऋतू में कई हिन्दू त्योहार जैसे की होली, वसंत पंचमी, गुड़ी पड़वा, बैसाखी, हनुमान जयंती आदि मनाये जाते है। यह ऋतू मानव जीवन में हर्ष और आनंद का भाव प्रगट करती है।


वसंत ऋतू कब आती है? – When do Spring Season start?

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार वसंत ऋतू ज्येष्ठ – आषाढ़ महीने में होती है। यह ऋतू शिशिर ऋतू के ठीक बाद और ग्रीष्म ऋतू से पहले आती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इसकी शुरुआत मध्य मार्च (March) तक हो जाती है और मध्य मई (May) तक सूरज की बढ़ती गर्मी के साथ ग्रीष्म ऋतू में बदल जाती है। पश्चिमी देशो (Western Countries) में भी लगभग यह मार्च से मई तक देखने को मिलती है।


वसंत ऋतू और हमारा शरीर – Spring Season and our body

आयुर्वेद अनुसार वसंत ऋतुचर्या
आयुर्वेद अनुसार वसंत ऋतुचर्या


आयुर्वेद के अनुसार वसंत ऋतू शरीर के शुद्धिकरण (Detoxification) के लिए सबसे उत्तम ऋतू है। इस ऋतू में प्रकृति में भी शुद्धिकरण देखने को मिलता है जैसे की पेड़ और पौधे नए पत्तो और फूलो के साथ खिल उठते है, तितलियाँ उड़ने लगती है और पंछिया चहचहाने लगते है। ऐसा लगता है प्रकृति हसने लगी हो। इस ऋतू में औसतम तापमान ३२ डिग्री रहता है जो की ठिठुरती ठंडी के बाद आराम दायक होता है।

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ठंडी शिशिर ऋतू के बाद वसंत आता है। शिशिर ऋतू में हमारी पाचन शक्ति सबसे अधिक होती है, लेकिन अधिकत्तम मात्रा में भारी भोजन (Heavy food) खाने की वजह से शरीर में कफ दोष का संचय होता है। इसके अतिरिक्त, अपचित खुराक का आम में परिवर्तन होता है।

जैसे धुप में शर्दी में जमी हुई बर्फ पिघलने लगती है वैसे ही वसंत ऋतू की हलकी धुप और हलके गरम वातावरण की वजह से शरीर में जमा हुआ कफ दोष और आम पिघलने लगता है। आम के पिघलने से शरीर में स्थित श्रोतास (Circulatory Channels) अवरुद्ध (Block) हो जाते है, और कफ पिघलने की वजह से शरीर की पाचक अग्नि कमजोर पड़ जाती है। इसकी वजह से कई रोगों की उत्पत्ति होती है।

अगर इस ऋतु में आप अपने शरीर में स्थित इन टॉक्सिक पदार्थों को नहीं निकालते है तो आप खांसी, जुकाम, एलर्जी आदि रोगों का शिकार बन सकते है। आप खाने के बाद असामान्य रूप से थका हुआ, सुस्त या फिर आलस महसूस कर सकते है।

वसंत हमारे शरीर के शुद्धिकरण के लिए सर्वश्रेष्ठ ऋतु है, क्योंकि इस ऋतु में प्रकृति भी हमारे शरीर में से टॉक्सिन्स निकालने में मदद करती है। यह शरीर के स्रोतास और धातु के शुद्धिकरण के लिए सबसे अच्छा समय है।


वसंत ऋतू में आहार और विहार – Dietary & lifestyle regimen for Spring Season


वसंत ऋतु में कफ दोष का प्रकोप होता है। इसलिए, इस ऋतु में कफ का शमन करने वाला आहार और जीवनशैली सबसे उत्तम है। कफ का शमन करने वाले रुक्ष और लघु गुण वाले पदार्थ का सेवन करना चाहिए। क्योंकि लघु और गुण कफ दोष से विपरीत होते है, वह कफ का शमन करते है। ठंडा, चिपचिपा और भारी (हेवी) यह कफ दोष के गुण है, इसलिए ऐसे पदार्थों का सेवन टालना चाहिए।

वसंत ऋतू में क्या खाना चाहिए? – What to eat in Spring Season?


कड़वे, तुरे, तीखे, और आसानी से पाचन होने वाले हलके खुराक का सेवन करे।
● सुबह हल्का नाश्ता करना ठीक होगा क्योंकि सुबह के समय कफ दोष प्रबल होता है।
एक साल पुराने जौ (यव) का सेवन करे।
शहद, किशमिश, भुना हुआ मांस (जो पचाने में आसान है), धनिया, जीरा, हल्दी, काली मिर्च, अदरक, लहसुन, लौंग, सौंफ, आदि का उचित उपयोग करना चाहिए।
मूंग दाल, चने और तोर दाल जैसी दाल का सेवन करने की सलाह दी जाती है।
फूलगोभी, मेथी, पालक, मूली, लेट्यूस, पुदीना, गोभी, गाजर और हरी बीन्स जैसी सब्जियों का सेवन करने की सलाह दी जाती है।
गेहूं, चावल, जौ, कॉर्नफ्लेक्स, फूला हुआ चावल, क्विनोआ और बाजरा जैसे अनाज का सेवन करने की सलाह दी जाती है।
सेब, चेरी, अंगूर, अनार और आम जैसे फलों का सेवन करने की सलाह दी जाती है।
मुस्तक नामक औषधि के साथ उबाले गए पानी का सेवन करें।
● इस ऋतु में समय-समय पर गर्म पानी की घुटे फायदेमंद होगी।
काली मिर्च के मसाले के साथ छाछ का सेवन भी सलहकारक है।


वसंत ऋतू में क्या नहीं खाना चाहिए? – What not to eat in Spring Season?


● पाचन में भारी (हेवी) खुराक को टालना चाहिए।
मधुर (मीठे) और आम्ल (खट्टे) स्वाद में प्रबल खुराकों को टालना चाहिए।
शीत (ठंडे), स्निग्ध (चिपचिपे) और गुरु (भारी) खुराकों को टालना चाहिए।
● नए और हालही में काटे गए अनाज का सेवन नहीं करना चाहिए।
ठंडे पिणे (कोल्ड ड्रिंक्स) नहीं पिने चाहिए।
मिल्क प्रोडक्ट्स जैसे की घी, मक्खन, पनीर आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए।
आइस क्रीम्स नहीं खाने चाहिए।
काली दाल और छोले नहीं खाने चाहिए।
● शाम को सूर्यास्त के बाद रसीले फल, छाछ, दही आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
बैंगन, शकरकंद, जैसी सब्जियां नहीं खानी चाहिए।
● चर्बी वाले खुराक जैसे की मांस, मटन, आदि नहीं खाना चाहिए।

आहार के अतिरिक्त, शरद ऋतु दौरान कफ को संतुलित करने के लिए जीवनशैली में भी बदलाव अनिवार्य है। पथ्य आहार और विहार की मदद से ही हम अपने शरीर में दोषों को संतुलित कर सकते है। वसंत ऋतु में कफ का शमन करने वाले विहार पथ्य है।


वसंत ऋतू में क्या करना चाहिए? – What to do in Spring Season?


● नियमित व्यायाम और योग करना चाहिए।
● अभ्यांग (तेल मालिश) करना चाहिए।
उपवास करने और वजन कम करने के लिए यह सबसे उत्तम समय है।
● उद्वर्तन (औषधीय पाउडर के साथ मालिश) और ड्राई मसाज करना चाहिए।
चंदन के पेस्ट को पानी में मिलकर उससे स्नान करना चाहिए।
कपाल पर कुमकुम लगाना चाहिए।
● अधिकतम समय बागो-बगीचों में ठंडी हवाओं का आनंद लेने में खर्च करना चाहिए।
गरम पानी से कुल्ले करने चाहिए।
● रात को जल्दी सो जाना चाहिए।
आंजन का प्रयोग करना चाहिए।


वसंत ऋतू में क्या नहीं करना चाहिए? – What not to do in Spring Season?

● आसीन जीवनशैली को टालना चाहिए, क्योकि इससे कफ का प्रमाण बढ़ता है और विविध रोगों की उत्पत्ति होती है।
● दिन में सोना नहीं है। दिन में सोने से शरीर में कफ दोष तेज़ी से संचय होता है।
● अधिकतम मात्रा में निंद्रा नहीं करनी है।
वसंत में एलर्जी की समस्या अधिकतम होती है, इसलिए हवा से सीधा संपर्क टालना चाहिए।
● अधिकतम मात्रा में अथवा सामान्य से अधिक भोजन टालना चाहिए।
देर रात तक नहीं जागना है।


वसंत ऋतु के लिए योग


योगासन का हमारे शरीर पर काफी सकारात्मक असर होता है और यह हमारे शरीर के साथ साथ हमारे मानसिक स्वास्थ्य को भी सहारा देता है। यह हमारे शरीर में हार्मोन प्रोब्लेम्स से लेकर स्ट्रेस प्रोब्लेम्स तक की सारी परेशानियों में मदद करता है।

वसंत ऋतु में निम्नलिखित योगासनों का प्रयोग किया जा सकता है:


१. त्रिकोणासन
२. पद्मासन
३. पवनमुखासन
४. मत्स्येन्द्रासन
५. भुजंगासन
७. उष्ट्रासन


उपसंहार – Conclusion

शरीर में से टॉक्सिन्स को निकालने और शरीर के शुद्धिकरण के लिए यह सबसे उत्तम समय है। हम योग्य आहार, विहार एवं योग की मदद से ऋतुओं के अनुसार एक बेहतर और स्वस्थ जीवन शैली का निर्माण करके रोगों से छुटकारा पा सकते है।

Reference
ayurveda anusaar vasant ritucharya, wikipedia

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