आधार – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Aadhar Munshi Premchand ki kahani in Hindi

दोस्तों आपने हिंदी साहित्य के स्तंभ कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) की कहानियों के बारे में ज़रुर सुना होगा, इनमे से ही एक प्रसिद्ध कहानी – आधार के बारे मे आप इस लेख मे पढ़ेंगे।

प्रेमचंद की कहानी “आधार” Premchand Story “Aadhaar”

Aadhar Munshi Premchand ki kahani

आधार – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Aadhar Munshi Premchand ki kahani in Hindi

सारे गांव में मथुरा का सा गठीला जवान न था। कोई 20 बरस की उम्र थी। मश भीग रही थी। गाय चराता, दूध लेता, कसरत करता, कुश्ती लड़ता था और सारे दिन बांसुरी बजाता हाट में घूमता रहता था। विवाह हो गया था, पर अभी कोई बाल बच्चा न था। घर में खेती थी, छोटे बडे़ भाई थे। वे सब मिलजुलकर खेती बारी करते थे। मथुरा पर सारे गांव को गर्व था, जब उसे लंगोट, नाल या मुकदर के लिए रुपए पैसे की जरूरत पड़ती तो तुरंत दे दिए जाते थे।

सारे घर की यही अभिलाषा थी कि मथुरा पहलवान हो जाए और अखाड़े में अपने सवाए को पछाड़े। इस लाड प्यार से मथुरा ज़रा घमंडी हो गया था। गाय किसी के खेत में पड़ी है और आप अखाड़े में दंड लगा रहे हैं। कोई उलाहना देता तो उसे गुस्सा आ जाता गरजकर कहता, जो मन में आये कर लो, मथुरा तो अखाड़ा छोड़कर नहीं जाएगा। पर उसका शरीर देखकर किसी को उससे उलझने की हिम्मत न पड़ती। लोग गम खा जाते।

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गर्मियों के दिन थे, ताल तलैया सूखी पड़ी थी। जोरों की लू चलने लगी थी गांव में कहीं से एक सांड आ निकला और गायों के साथ हो लिया। सारे दिन गायों के साथ रहता, रात को बस्ती मेँ घुस आता और खूंटे से बंधे बैलों को सींगों से मारता। कभी कभी किसी गीली दीवार को सींगों से खराब कर देता, घर का कूड़ा सींगों से उड़ाता। कई किसानों ने सब्जी लगा रखी थी, सारे दिन सींचते सींचते मरते थे। यह सांड रात को उन हरे भरे खेतों मेँ पहुँच जाता और खेत का खेत तबाह कर देता।

लोग उसे डंडों से मारते, गांव के बाहर भगा आते, लेकिन ज़रा देर मेँ गायों मेँ पहुँच जाता। किसी की अकल काम ना करती थी कि इस संकट को कैसे टाला जाए। मथुरा का घर गांव के बीच मेँ था, इसलिए उसके खेतों को सांड से कोई हानि न पहुंचती थी। गांव में उपद्रव मचा हुआ था और मथुरा को ज़रा भी चिंता न थी।

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आखिर जब धैर्य का अंतिम बंधन टूट गया तो 1 दिन लोगों ने जाकर मथुरा को घेरा और बोले-भाई, कहूं तो गांव में रहे, है कहो तो निकल जाएं। जब खेती हि ना बचेगी तो रहकर क्या करेंगे? तुम्हारी गायों के पीछे हमारा सत्यानाश हुआ जाता है, और तुम अपने रंग मेँ मस्त हो। अगर भगवान ने तुम्हें बल दिया है तो इससे दूसरों की रक्षा करनी चाहिए, यह नहीं कि सबको पीसकर पी जाओ। सांड तुम्हारी गायों के कारण आता है और उसे भगाना तुम्हारा काम है; लेकिन तुम कानों में तेल डाल घर बैठे हो, मानों तुम से कुछ मतलब ही नहीं।

मथुरा को उनकी दशा पर दया आई। बलवान मनुष्य प्रायः दयालु होता है। बोला-अच्छा जाओ, हम आज सांड को भगा देंगे।

एक आदमी ने कहा-दूर तक भगाना, नहीं तो फिर लौट आएगा।

मथुरा ने कंधे पर लाठी रखते हुए उत्तर दिया-अब लौट कर ना आएगा।

चिलचिलाती दोपहरी थी। मथुरा सांड को भगाएं लिए जाता था। दोनों पसीने से तर थे। सांड बार बार गांव की ओर घूमने की चेष्टा करता, लेकिन मथुरा उसका इरादा ताड़कर दूर ही से उसकी राह के बीच आ जाता। सांड क्रोध से कभी कभी पीछे मुड़कर मथुरा पर तोड़ करना चाहता लेकिन उस समय मथुरा सामना बचाकर बगल से ताबड़ तोड़ इतनी लाठियां जमाता की सांड को फिर भागना पड़ता कभी दोनों अरहर के खेतों मेँ दौड़ते, कभी झाड़ियों में। अरहर की खूंटियों से मथुरा के पांव लहूलुहान हो रहे थे, झाड़ियों में धोती फट गई थी, पर उसे इस समय सांड का पीछा करने के सिवा और कोई सुध न थी।

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गांवों पर गांव आते थे और निकल जाते थे। मथुरा ने निश्चय कर लिया कि इसे नदी पर भगाएं बिना दम न लूँगा। उसका कंठ सूख गया था और आंखें लाल हो गई थी, रोम रोम से चिंगारियां से निकल रही थी, दम उखड़ रहा था; लेकिन वहाँ एक क्षण के लिए भी दम ना लेता था। दो ढ़ाई घंटों के बाद नदी आई। यहीं हार जीत का फैसला होना था, नहीं यहीं से दोनों खिलाडियों को अपने दांव पेंच के जौहर दिखाने थे। सांड सोचता था अगर नदी में उतर गया तो यह मान ही डालेगा, एक बार जान लड़ाकर लौटने की कोशीश करनी चाहिए। मथुरा सोचता था, अगर वह लौट पड़ा तो इतनी मेहनत व्यर्थ हो जाएगी और गांव के लोग मेरी हँसी उड़ाएंगे। दोनों अपने अपने घात में थे।

Aadhar Munshi Premchand ki kahani
Aadhar Munshi Premchand ki kahani

सांड ने बहुत चाह की तेज दौड़कर आगे निकल जाऊं और वहाँ से पीछे को फिरू, पर मथुरा ने उसे मुड़ने का मौका न दिया। उसकी जान इस वक्त सूई की नोक पर थी, एक हाथ भी चूका और प्राण भी गए, ज़रा पैर फिसला और फिर उठना नसीब ना होगा। आखिर मनुष्य ने पशु पर विजय पाई और सांड को नदी में घुसने के सिवाय और कोई उपाय न सूझा मथुरा भी उसके पीछे नदी में आप पहुंचा इतने डंडे लगाई कि उसकी लाठी टूट गई।

अब मथुरा को जोरों से प्यास लगी। उसने नदी मेँ मुँह लगा दिया और इस तरह पानी पीने लगा मानो सारी नदी पी जाएगा। उसे अपने जीवन में कभी पानी इतना अच्छा न लगा था और ना कभी उसने इतना पानी पीया था। मालूम नहीं, कितना पानी पी गया लेकिन पानी गर्म था इन, प्यास न बुझी इस ज़रा देर मेँ फिर नदी मेँ मुँह लगा दिया और इतना पानी पीया कि पेट में सांस लेने की जगह भी न रही। तब गीली धोती कंधे पर डालकर घर की ओर चल दिया।

लेकिन कुछ दूर ही चलना होगा कि पेट में मीठा मीठा दर्द होने लगा। उसने सोचा, दौड़कर पानी पीने से ऐसा दर्द अक्सर हो जाता है, ज़रा देर मेँ दूर हो जाएगा लेकिन दर्द बढ़ने लगा एव्रीथिंग और मथुरा का आगे जाना कठिन हो गया। वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया और दर्द से बेचैन होकर जमीन पर लोटने लगा। कभी पेट को दबाता कभी खड़ा हो जाता कभी बैठ जाता, पर दर्द बढ़ता ही जाता था। अंत मेँ उसने ज़ोर से कराहना और रोना शुरू किया; पर वहाँ कौन बैठा था जो उसकी खबर लेता। दूर तक कोई गांव नहीं, ना आदमी ना आदमजात। बेचारा दोपहर के सन्नाटे मेँ तड़प तड़प कर मर गया।

हम कड़े से कड़ा घाव सह सकते हैं लेकिन ज़रा सा भी व्यतिक्रम नहीं सह सकते। वही देव सा जवान जो कोसों तक सांड को भगाता चला आया था, तत्वों के विरोध का एक बार भी न सह सका। कौन जानता था कि यह दौड़ उसके लिए मात की दौड़ होगी! कौन जानता था कि मौत ही सांड का रूप धरकर उसे यू नचा रही है। कौन जानता था कि जल जिसके बिना उसके प्राण होठों पर आ रहे थे, उसके लिए जहर का काम करेगा।

संध्या समय उसके घरवाले उसे ढूँढते हुए आए। देखा तो वह अनंत विश्राम मेँ मग्न था।

एक महीना गुजर गया। गांववाले अपने काम धंधे में लगे। घरवालों ने रो धो कर सब्र किया; पर अभागिनी विधवा के आंसू कैसे पूछते। वह हरदम रोती रहती। आँखें चाहे चाहे बंद भी हो जाती, पर हृदय नित्य रोता रहता था। इस घर में अब कैसे निर्वाह होगा? किस आधार पर जीऊंगी? अपने लिए जीना तो महात्माओं को आता है। अनूपा को यह कला क्या मालूम? उसके लिए तो जीवन का एक आधार चाहिए था, जिसे वह अपना सब कुछ समझे, जिसके लिए वह जिए जिसपर वह घमंड करे।

घरवालों को यह गवारा न था कि वहाँ कोई दूसरा घर करें। इसमें बदनामी थी। इसके अलावा ऐसी सुशील, घर के कामों में कुशल, लेनदेन के मामले में इतनी चतुर और रंगरूप की ऐसी सराहनी स्त्री क्या किसी दूसरे के घर पर जाना ही उन्हें असहनीय था। उधर अनूपा के मायके वाले एक जगह बातचीत पक्की कर रहे थे। जब सब बातें तय हो गई, तो 1 दिन अनूपा का भाई उसे विदा कराने आ पहुंचा।

अब तो घर मेँ खलबली मची। इधर कहा गया, हम विदा न करेंगे। भाई ने कहा, हम बिना विदाई कराएं मानेंगे नहीं। गांव के आदमी जमा हो गए, पंचायत होने लगी। यह निश्चय हुआ कि अनूपा पर छोड़ दिया जाए, जी चाहे रहे। यहाँ वालों को विश्वास था कि अनूपा इतनी जल्दी दूसरा घर करने को राजी न होगी, दो बार ऐसा कह भी चुकी थी। लेकिन उस वक्त जो पूछा गया तो वह जाने को तैयार थी। आखिर उसकी विदाई का सामान होने लगा। डोली आ गयी। गांव भर की स्त्रियाँ उसे देखने आईं। अनुपा उठकर अपनी सांस के पैरों में गिर पड़ी और हाथ जोड़कर बोली-अम्मा, कहाँ सुना माफ़ करना। जी में तो था कि इसी घर में पढ़ी रहू, पर भगवान को मंजूर नहीं है। यह कहते कहते हैं उसकी जबान बंद हो गई।

सास करुणा से विमल हो उठी। बोली-बेटी, जहाँ जाओ वहाँ सुखी रहो। हमारे भाग्य ही फूट गए नहीं तो तुम्हें इस घर से क्यों जाना पड़ता। भगवान कर दिया और सब कुछ है, पर उन्होंने जो नहीं दिया उसमें अपना क्या बस; बस आज तुम्हारा देवर स्याना होता तो बिगड़ी बात बन जाती। तुम्हारे मन में बैठे तो इसी को अपना समझो; पालो पोसो बड़ा हो जाएगा तो सगाई कर दूंगी।

यह कहकर उसने अपने सबसे छोटे लड़के वासुदेव से पूछा-क्या रे! भोजाई से शादी करेगा?

वासुदेव की उम्र 5 साल से अधिक न थी। अबकी उसका ब्याह होने वाला था। बातचीत हो चुकी थी, बोला-तक दूसरे के घर न जाएगी न?

माँ-नहीं, हे जब तेरे साथ ब्याह हो जाएगा तो क्यों जाएगी।

वासुदेव-तब मैं करूँगा।

माँ-अच्छा, उससे पूछ, तुझसे प्यार करेगी।

वासुदेव अनुपा की गोद में जाकर बैठ गया और शर्माता हुआ बोला-हमसे ब्याह करोगी? यह कहकर वह हंसने लगा; लेकिन अनूपा की आँखों में आंसू आ गए वासुदेव को छाती से लगाते हुए बोली-अम्मा दिल से कहती हो?

सास-भगवान जानते हैं!

अनूपा-आज यह मेरे हो गए?

सास-हाँ सारा गांव देख रहा है।

अनूपा-तो भैया से कहला भेजो, घर जाए, मैं उनके साथ ना जाउंगी।

अनुभाग को जीवन के लिए आधार की जरूरत थी। वह आधार मिल गया, सेवा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है, सेवा ही उसके जीवन का आधार है।

अनूपा ने वासुदेव का लालन पोषण शुरू किया। उप टन और तेल लगाती, दूध रोटी मल मल के खिलाती। आप तालाब नहाने जाती तो उसे भी नहलाती। खेत में जाती तो उसे भी साथ ले जाती। थोड़े ही दिनों में उससे हिल मिल गया और एक क्षण भी उसे न छोड़ता था। माँ को भूल गया, कुछ खाने को जी चाहता तो अनूपा से मांगता, खेल मेँ मार खाता तो रोता हुआ अनूपा के पास आता। अनूपा ही उसे सुलाती अनूपा ही जगाती बीमार हो तो अनूपा ही गोद में लेकर वेद के घर ले जाती और दवाएं पिलाती।

गांव के स्त्री पुरुष उसकी यह प्रेम तपस्या देखते और दांतों ऊँगली दबाते। पहले बिरले ही किसी को उस पर विश्वास था। लोग समझते थे, साल 2 साल में इसका जी ऊब जाएगा और किसी तरह का रास्ता लेगी; इस दूधमुंहे बालक के नाम कब तक बैठी रहेंगी; लेकिन यह सारी आशंकाएं निर्मूल निकली। अनूपा को किसी ने अपने व्रत से विचलित होते न देखा। जिस हृदय में सेवा स्रोत बह रहा हो-उसमें वासनाओं के लिए कहा स्थान? वासना का वार निर्मम, आशाहीन, आधारहीन प्राणियों पर ही होता है चोर की अंधेरे में ही चलती है उजाले में नहीं।

वासुदेव को भी कसरत का शौक था। उसकी शक्ल सूरत मथुरा से मीलती जुलती थी, उसने फिर अखाड़ा जगाया और उसकी बांसुरी की तानें फिर खेतों मेँ गूंजने लगी। इस तरह 13 बरस गुजर गए। वासुदेव और अनूपा मेँ सगाई की तैयारी होने लगी। है

लेकिन अब अनूपा वह अनूपा न थी, जिसमें 14 वर्ष पहले वासुदेव को पति भाव से देखा था, अब उस भाव का स्थान मातृभाव ने लिया था। इधर कुछ दिनों से वह एक गहरी सोच मेँ डूबी रहती थी। सगाई के दिन जैसे जैसे निकट आते थे, उसका दिल बैठा जाता था। अपने जीवन में इतने बड़े परिवर्तन की कल्पना ही से उसका कलेजा दहक उठा था। जिसे बालक की भांति पाला पोसा, उसे पति बनाते हुए लज्जा से उसका मुँह लाल हो जाता था।

द्वार पर नगाड़ा बज रहा था, बिरादरी के लोग जमा थे, घर मेँ गाना हो रहा था! आज सगाई की तिथि थी।

सहसा अनूपा ने जाकर सास से कहा-मा मैं तो लाज के मारे मरी जा रही हूँ।

सास ने आश्चर्य से पूछा-क्यों बेटी, क्या हुआ?

अनूपा-मैं सगाई ना करूँगी।

सास-कैसी बात करती है बेटी? सारी तैयारी हो गई, लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे?

अनूपा-जो चाहे कहें, जिनके नाम पर 14 वर्ष बैठी रही उसी के नाम पर अब भी बैठी रहूंगी। मैने समझा था मदद के बिना औरत से रह ना जाता होगा। मेरी तो भगवान ने इज़्जत आबरू निभा दी। जब नई उम्र के दिन कट गए तो अब कौन चिंता है! वासुदेव की सगाई कोई लड़की खोजकर कर दो। जैसे अब तक उसे पाला, हे उसी तरह अब उसके बाल बच्चों को पाल लूंगी।

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